पश्चाताप के कड़वे फल कभी-न-कभी सभी को चखने पड़ते है, लेकिन और लोग बुराइयों पर पछताते है, दारोगा कृष्णचन्द्र अपनी भलाइयों पर पछता रहे थे। उन्हें थानेदारी करते हुए पचीस वर्ष हो गए; लेकिन उन्होंने अपनी नीयत को कभी बिगड़ने न दिया था। यौवनकाल में भी, जब चित्त भोग-विलास के लिए व्याकुल रहता है उन्होंने नि.स्पृहभाव से अपना कर्तव्य-पालन किया था। लेकिन इतने दिनों के बाद आज वह अपनी सरलता और विवेक पर हाथ मल रहे थे। उनकी पत्नी गंगाजली सती-साध्वी स्त्री थी। उसने सदैव अपने पति को कुमार्ग से बचाया था। पर इस समय वह भी चिन्ता में डूबी हुई थी। उसे स्वयं सन्देह हो रहा था कि वह जीवन भर की सच्चरित्रता बिलकुल व्यर्थ तो नही हो गई? दारोगा कृष्णचन्द्र रसिक, उदार और बड़े सज्जन मनुष्य थे। मातहतों के साथ वह भाई चारे का सा व्यवहार करते थे; किन्तु मातहतों की दृष्टि से उनके इस व्यवहार का कुछ मूल्य न था। वह कहा करते थे कि यहां हमारा पेट नही भरता, हम इनकी भलमनसी को लेकर क्या करें—चाटे? हमें घुड़की,डाँट डपट,सख्ती सब स्वीकार है, केवल हमारा पेट भरना चाहिए। रूखी रोटिया चाँदी के थाल में परोसी जायँ तो भी पूरियां न हो जायेंगी। दारोगा जी के अफसर भी उनसे प्राय: प्रसन्न न रहते। वह दूसरे थाने में जाते तो उनका बडा आदर-सत्कार होता था, उनके अहलमद, मुहर्रिर और अरदली खूब दावत उड़ाते। अहलमद को नजराना मिलता, अरदली इनाम पाता और अफसरों को नित्य डालिया मिलती पर कृष्णचन्द्र के यहां यह आदर सत्कार कहां? वह न दावत करते थे, न डालिया ही लगाते थे। जो किसी से लेता नही, वह किसी को देगा कहा से? दारोगा कृष्णचन्द्र की इस शुष्कता को लोग अभिमान समझते थे। लेकिन इतने निर्लोभ होने पर भो दारोगा जी के स्वभाव में किफायत का नाम न था। वह स्वय तो शौकीन न थे लेकिन अपने घरवालो को आराम देना अपना कर्तव्य समझते थे। उनके सिवा घर में तीन प्रणी और थे, स्त्री और दो लड़कियाँ। दारोगा जी इन लडकियो को प्राण से भी अधिक प्यार करते थे। उनके लिए अच्छे-से-अच्छे कपड़े लाते और शहर से नित्य तरह-तरह की चीजे मँगाया करते। बाजार में कोई तरहदार कपड़ा देख कर उनका जी नही मानता था, लडकियों के लिए अवश्य ले आते थे। घर में सामान जमा करने की उन्हें धुन थी। सारा मकान कुर्सियो, मेजो और आल्मारियो से भरा हुआ था। नगीने के कलमदान, झासी के कालीन, आगरे की दरियां बाजार में नजर आ जाती तो उन पर लट्टू हो जाते। कोई लूट के धन पर भी इस भांति न टूटता होगा। लडकियों को पढ़ाने और सीना-पिरोना सिखाने के लिए उन्होने एक ईसाई लेडी रख ली थी। कभी-कभी स्वय उनकी परीक्षा लिया करते थे। गंगाजली चतुर स्त्री थी। उन्हें समझाया करती कि जरा हाथ रोक कर खर्च करो। जीवन में यदि और कुछ नही करना है तो लड़कियो का विवाह तो करना ही पड़ेगा। उस समय किसके सामने हाथ फैलाते फिरोगे? अभी तो उन्हे मखमली जूतिया पहनाते हो, कुछ इसकी भी चिन्ता है कि आगे क्या होगा? दरोगा जी इन बातों को हंसी में उडा देते, कहते, जैसे और सब काम चलते हैं वैसे ही यह काम भी हो जायगा। कभी झुंझला कर कहते, ऐसी बात कर के मेरे ऊपर चिन्ता का बोझ मत डालो। इस प्रकार दिन बीतते चले जाते थे। दोनो लड़कियाँ कमल के समान खिलती जाती थी। बडी लड़की सुमन सुन्दर, चञ्चल और अभिमानिनी थी। छोटी लडकी शान्ता भोली, गम्भीर, सुशील थी। सुमन दूसरो से बढ़ कर रहना चाहती थी। यदि बाजार से दोनों बहनों के लिए एक ही प्रकार की साड़ियां आती तो सुमन मुंह फुला लेती थी। शान्ता को जो कुछ मिल जाता उसीमें प्रसन्न रहती। गंगाजली पुराने विचार के अनुसार लड़कियों के ऋण से शीघ्र ही मुक्त होना चाहती थी। पर दारोगा जी कहते, यह अभी विवाह योग्य नही है। शास्त्रो मे लिखा है कि कन्या का विवाह सोलह वर्ष की आयु से पहले करना पाप है। वह इस प्रकार मन को समझाकर टालते रहते थे। समाचार पत्रों में जब वह दहेज के विरोध में बड़े बड़े लेख पढ़ते तो बहुत प्रसन्न होते। गंगाजली से कहते कि अब एक ही दो साल में यह कुरीति मिटी जाती है। चिन्ता करने की कोई जरुरत नही। यहा तक कि इसी तरह सुमन को सोलहवां वर्ष लग गया। अब कृष्णचन्द्र अपने को अधिक धोखा न दे सके। उनकी पूर्व निश्चिन्तता वैसी न थी जो अपनी सामर्थ्य के ज्ञान से उत्पन्न होती है। उसका मूल कारण उनकी अकर्मण्यता थी। उस पथिक की भाति जो दिन भर किसी वृक्ष के नीचे आराम से सोने के बाद सन्ध्या को उठे और सामने एक ऊँचा पहाड़ देख कर हिम्मत हार बैठे, दारोगा जी भी घबरा गये। वर की खोजमें दौडने लगे, कई जगहों से टिप्पणियाँ मँगवाई। वह शिक्षित परिवार चाहते थे। वह समझते थे कि ऐसे घरो मे लेन देन की चर्चा न होगी, पर उन्हे यह देख कर बडा आश्चर्य हुआ कि वरो का मोल उनकी शिक्षा के अनुसार है। राशि वर्ण ठीक हो जाने पर जब लेनदेन की बातें होने लगती तब कृष्णचन्द्र की आंखो के सामने अँधेरा छा जाता था। कोई चार हजार सुनाता, कोई पांच हजार और कोई इससे भी आगे बढ़ जाता। बेचारे निराश होकर लौट आते। आज छ: महीने से दरोगा जो इसी चिन्ता में पड़े हैं। बुद्धि काम नही करती। इसमे सन्देह नही कि शिक्षित सज्जनो को उनसे सहानुभूति थी; पर वह एक-न-एक ऐसी पख निकाल देते थे कि दारोगा जी को निरुत्तर हो जाना पड़ता। एक सज्जन ने कहा, महाशय, मैं स्वयं इस कुप्रथा का जानी दुश्मन हूँ, लेकिन करूँ क्या, अभी पिछले साल लडकी का विवाह किया, दो हजार रुपये केवल दहेज में देने पड़े, दो हजार और खाने-पीने में खर्च पड़े, आप ही कहिये, यह कमी कैसे पूरी हो? दूसरे महाशय इनसे अधिक नीतिकुशल थे। बोले, दारोगा जी, मैने लडके को पाला है, सहस्त्रो रुपये उसकी पढ़ाई मे खर्च किये है। आपकी लड़की को इससे उतना ही लाभ होगा जितना मेरे लड़के को। तो आप ही न्याय कीजिये कि यह सारा भार मैं अकेले कैसे उठा सकता हूँँ? कृष्णचन्द्र को अपनी ईमानदारी और सचाई पर पश्चात्ताप होने लगा। अपनी निःस्पृहता पर उन्हें जो घमण्ड था वह टूट गया। वह सोच रहे थे कि यदि मैं पाप से न डरता तो आज मुझे यो ठोकरे न खानी पड़ती। इस समय दोनों स्त्री-पुरुष चिन्ता में डूबे बैठे थे, बड़ी देर के बाद कृष्णचन्द्र बोले, देख लिया, संसार में सन्मार्ग पर चलने का यह फल होता है। यदि आज मैंने लोगो को लूट कर अपना घर भर लिया होता तो लोग मुझसे सम्बन्ध करना अपना सौभाग्य समझते; नही तो कोई सीधे मुंह बात नही करता है। परमात्मा के दरबार में यह न्याय होता है। अब दो ही उपाय है, या तो सुमन को किसी कगाल के पल्ले वाधू दू या कोई सोने की चिड़िया फँसाऊँ। पहली बात तो होने से रही; बस अब सोने की चिड़िया की खोज में निकलता हूँँ। धर्म का मजा चख लिया, सुनीति का हाल भी देख चुका। अब लोगो के के खूब गले दबाऊँगा, खूब रिश्वतें लूगा, यही अन्तिम उपाय है। संसार यही चाहता है, और कदाचित ईश्वर भी यही चाहता है, यही सही। आज से मैं भी वही करूँगा जो सब लोग करते हैं। गंगाजली सिर झुकाये अपने पति की ये बाते सुन कर दुःखित हो रही थी। वह चुप थी, आंखों में आँँसू भरे हुए थे। २ दारोगा जी के हल्के में एक महन्त रामदास रहते थे। वह साधुओ की एक गद्दी के महन्त थे। उनके यहा सारा कारोबार 'श्रीवाकेविहारीजी’ के नाम पर होता था। 'श्री बाँकेबिहारी जी’ लेनदेन करते थे और ३२ सैकडे से कम सूद न लेते थे। वही मालगुजारी वसूल करते थे, वही रेहननामे-बैनामे लिखाते थे। 'श्री बांकेबिहारी जी' की रकम दबाने का किसी को साहस न होता था और न अपनी रकम के लिए कोई दूसरा आदमी उनसे कड़ाई कर सकता था ‘श्री बाकेबिहारीजी' को रुष्ट करके उस इलाके में रहना कठिन था। महन्त रामदास के यहा दस बीस मोटे ताजे साधु स्थायी रूप से रहते थे। वह अखाड़े में दण्ड पेलते, भैस का ताजा दूध पीते, सन्ध्या को दूधिया भग छानते और गाजे चरस की चिलम तो कभी ठण्डी न होने पाती थी। ऐसे बलवान जत्थे के विरुद्ध कौन सिर उठाता? महन्त जी का अधिकारियो में खूब मान था। 'श्रीबांकेबिहारीजी’ उन्हें खूब मोतीचूर के लड्डू और मोहनभोग खिलाते थे। उनके प्रसाद से कौन इनकार कर सकता था? ठाकुर जी ससार में आकर ससार की रीति पर चलते थे। महन्त जी रामदास जब अपने इलाके की निगरानी करने निकलते तो उनका जुलूस राजसी ठाटबाट के साथ चलता था। सबके आगे हाथी पर ‘श्रीबाकेबिहारीजी' की सवारी होती थी, उसके पीछे पालकी पर महन्त जी चलते थे, उसके बाद साधुओ की सेना घोड़ों पर सवार,राम-नाम के झण्डे लिये अपनी विचित्र शोभा दिखाती थी। ऊँटो पर छोल-दारिया, डेरे शामियाने लदे होते थे, यह दल जिस गांव में जा पहुँँचता था उसकी शामत आ जाती थी। इस साल महन्त जी तीर्थयात्रा करने गए थे। वहा से आकर उन्होने एक बड़ा यज्ञ किया था। एक महीने तक हवनकुंड जलता रहा, महीनों तक कड़ाह न उतरे पूरे दस हजार महात्माओं का निमंत्रण था। इस यज्ञ के लिए इलाके के प्रत्येक आसामी से हल पीछे पांच रुपया चन्दा उगाहा गया था; किसी ने खुशी से दिया, किसी ने उधार लेकर जिसके पास न था उसे रुक्का ही लिखाना पड़ा। 'श्रीवाकेबिहारीजी’ की आज्ञा को कौन टाल सकता था? यदि ठाकुर जी को हार माननी पड़ी तो केवल एक अहीर से जिसका नाम चेतू था। वह बूढा दरिद्र आदमी था। कई साल से उसकी फसल खराब हो रही थी। थोड़े ही दिन हुए 'श्रोवाकेबिहारीजी’ ने उस पर इजाफा लगान की नालिश करके उसे ऋण के बोझ से और भी दबा दिया था। उसने यह चन्दा देने से इनकार किया; यहा तक कि रुक्का भी न लिखा। ठाकुर जी ऐसे द्रोही को भला कैसे क्षमा करते? एक दिन कई महात्मा चेतू को पकड लाये। ठाकुरदारे के सामने उस पर मार पडने लगी। चेतू भी बिगडा। हाथ तो बँधे हुए थे, मुंह से लात घूसां का जवाब देता रहा और जब तक जबाव बन्द न हो गई, चुप न हुआ। इतना कष्ट देकर भी ठाकुर जी को सन्तोष न हुआ।उसी रात को उसके प्राण हर लिये। प्रातःकाल चौकीदार ने थाने मे रिपोर्ट की। दारोगा कृष्णचन्द्र को मालूम हुआ, मानो ईश्वर ने बैठे बैठाये सोने की चिडिया उनके पास भेज दी, तहकीकात करने चले। लेकिन महन्त जी की उस इलाके में ऐसी धाक जमी हुई थी कि दारोगा जी को कोई गवाही न मिल सकी। लोग एकान्त में आकर उनसे सारा वृत्तान्त कह जाते थे, पर कोई अपना बयान न देता था। इस प्रकार तीन-चार दिन बीत गये। महन्त जी पहले तो अकड़े रहे। उन्हें निश्चय था कि यह भेद न खुल सकेगा। लेकिन जब उन्हे पता चला कि दारोगा जी ने कई आदमियो को फोड़ लिया है तो कुछ नरम पड़े। अपने मुख्तार को दारोगा जी के पास भेजा। कुबेर की शरण ली। लेन-देन की बातचीत होने लगी। कृष्णचन्द्रने कहा, मेरा हाल तो आप लोग जानते हैं कि रिश्वत को काला नाग समझता हूँ। मुख्तार ने कहा, हां, यह तो मालूम है, किन्तु साधुसन्तों पर कृपा रखनी ही चाहिए। इसके बाद दोनो सज्जनों में कानाफूसी हुई। मुख्तार ने कहा, नहीं सरकार, पाच हजार बहुत होते है, महन्त जी को आप जानते है, वह अपनी टेक पर आ जायँगे तो चाहे फासी हो ही जाय पर जी भर न हटेगे। ऐसा कीजिये कि उनको कष्ट न हो और आपका भी काम निकल जाय। अन्त में तीन हजार पर बात पक्की हो गई। पर कडवी दवा को खरीद कर लाने, उसका काढा बनाने और उसे उठा कर पीने में बडा अन्तर है। मुख्तार तो महन्त के पास गया और कृष्णचन्द्र सोचने लगे, यह मैं क्या कर रहा हूँ? एक ओर रुपया का ढेर था और चिन्ताव्याधि से मुक्त होने की आशा दूसरी ओर आत्मा का सर्वनाश और परिणाम का भय। न हाँ करते बनता था, न नाही। जन्म भर निर्लोभ रहने के बाद इस समय अपनी आत्मा का बलिदान करने में दारोगा जी को बडा दुख होता था। वह सोचते थे, यदि यही करना था तो आज से पचीस साल पहले ही क्यो न किया, अब तक सोने की दीवार खडी कर दी होती। इलाके ले लिये होते। इतने दिनो तक त्याग का आनन्द उठाने के बाद बुढापे मे यह कलक! पर मन कहता था, इसमें तुम्हारा क्या अपराध? तुमसे जब तक निभ सका, निवाहा। भोग-विलास के पीछे अधर्म नही किया; लेकिन जब देश, काल, प्रथा और अपने बन्धुओ का लोभ तुम्हे कुमार्ग की ओर ले जा रहे है तो तुम्हरा दोष? तुम्हारी आत्मा अब भी पवित्र है। तुम ईश्वर के सामने अब भी निरपराध हो। इस प्रकार तर्क कर के दरोगा जी ने अपनी आत्मा को समझा लिया। लेकिन परिमाण का भय किसी तरह पीछा न छोडता था। उन्होने कभी रिश्वत नही ली थी। हिम्मत न खुली थी। जिसने कभी किसी पर हाथ न उठाया हो, वह सहसा तलवार का वार नही कर सकता। यदि कही बात खुल गई तो जेलखाने के सिवा और कही ठिकाना नही; सारी नेकनामी धूल में मिल जायगी। आत्मा तर्क से परास्त हो सकती है, पर परिणाम का भय, तर्क से दूर नही होता। वह पर्दा चाहता है। दारोगा जी ने यथासम्भव इस मामले को गुप्त रक्खा। मुख्तार से ताकीद कर दी कि इस बात की भनक भी किसी के कान में न पड़ने पावे। थाने के कान्सटेबिलो और अमलो से भी सारी बाते गुप्त रखी गई। रात के नौ बजे थे। दारोगाजी ने अपने तीनो कान्सटेबिलो को किसी बहाने से थाने के बाहर भेज दिया था। चौकीदारो को भी रसद का सामान जुटाने के लिए इधर-उधर भेज दिया था और आप अकेले बैठे हुए मुख्तार की राह देख रहे थे। मुख्तार अभी तक नही लौटा, कर क्या रहा है? चौकीदार सब आकर घेर लेंगे तो बडी मुश्किल पड़ेगी। इसी से मैंने कह दिया था कि जल्द आना। अच्छा मान लो, जो महन्त तीन हजार पर भी राजी न हुआ तो? नहीं, इससे कम न लूगा। इससे कम में विवाह हो ही नही सकता। दारोगाजी मन-ही-मन हिसाब लगाने लगे कि कितने रुपये दहेज में दूँगा और कितने खाने-पीने में खर्च करूँगा। कोई आध घण्टे के बाद मुख्तार के आने की आहट मिली। उनकी छाती धडकने लगी। चारपाई से उठ बैठे, फिर पानदान खोल कर पान लगाने लगे कि इतने में मुख्तार भीतर आया। कृष्णचन्द्र——कहिए? मुख्तारदू—महन्त जी ...... कृष्णदन्द्र ने दरवाजे की तरफ देख कर कहा, रुपये लाये या नही? मुख्तार——जी हाँ, लाया हूँँ, पर महन्त जी ने .... .. कृष्णचन्द्र ने चारों तरफ देखकर चौकन्नी आंखो से देख कर कहा——मैं एक कोटी भी कम न करूँगा। मुख्तार——अच्छा मेरा हक तो दीजियेगा न? कृष्ण——अपना हक महन्त जी से लेना। मुख्तार——पांच रुपया सैकडा तो हमारा बँधा हुआ है। ⁠कृष्ण-—इसमें से एक कौड़ी भी न मिलेगी । मैं अपनी आत्मा बेच रहा हूँ,कुछ लूट नही रहा हूँ। मुख्तार—आपकी जैसी मरजी, पर मेरा हक मारा जाता है। कृष्ण--मेरे साथ घर तक चलना पड़ेगा। तुरन्त बहुली तैयार हुई और दोनों आदमी उस पर बैठ कर चले । बहली के आगे-पीछे,चौकीदारों का दल था। कृष्णचन्द्र उड़कर घर पहुंचना चाहते थे । गाड़ीवान को बार बार हांकने के लिए कह कर कहते कहते, अरे क्या सो रहा है ? हाके चल । ११ बजते-बजते लोग घर पहुंचे । दारोगा जी मुख्तार को लिए हुए अपने कमरे में गये और किवाड़ बन्द कर दिये । मुख्तार ने थैली निकाली । कुछ दिुन्नियां थी, कुछ नोट और नगद रुपये । कृष्णचन्द्र ने झट थैली ले ली और बिना देखे सुने उसे अपने सन्दूक में डाल कर ताला लगा दिया। गंगाजली अभी तक उनकी राह देख रही थी। कृष्णचन्द्र मुख्तार को बिदा करके घर में गये । गंगाजली ने पूछा, इतनी देर क्यों की ? कृष्ण-—काम ही ऐसा आ पड़ा और दूर भी बहुत है। भोजन कर के दारोगा जी लेटे, पर नींद न आती थी । स्त्री से रुपये की बात कहते उन्हे संकोच हो रहा था । गंगाजली को भी नीद न आती थी । वह बार-बार पति के मुंह की ओर देखती, मानों पूछ रही थी कि बचे या डूबे। अन्त में कृष्णचन्द्र बोले- यदि तुम नदी के किनारे खड़ी हो और पीछे से एक शेर तुम्हारे ऊपर झपटे तो क्या करोगी ? गंगाजली इस प्रश्न का अभिप्राय समझ गई । बोली, नदी में चली जाऊँगी। कृष्ण-चाहे डूब ही जाओ ? गंगा –हाँ डूब जाना शेर के मुह पड़ने से अच्छा है । कृष्ण—अच्छा, यदि तुम्हारे घर में आग लगी हो और दरवाजे से निकलने का रास्ता न हो तो क्या करोगी? गंगा-छत पर चढ़ जाऊँगी और नीचे कूद पड़ूगी। कृष्ण-इन प्रश्नों का मतलब तुम्हारी समझ में आया? गंगाजली ने दीनभाव से पति की ओर देख कर कहा, तब क्या ऐसी बेसमझ हूँ? कृष्ण-मै कूद पडा़ हूँ। बचूगा या डूब जाऊँगा, यह मालूम नहीं। ३ पण्डित कृष्णचन्द्र रिश्वत लेकर उसे छिपाने के साधन न जानते थे। इस विषय में अभी नोसिखुए थे। उन्हें मालूम न था कि हराम का माल अकेले मुश्किल से पचता है। मुख्तार ने अपने मन मे कहा, हमी ने सब कुछ किया और हमी से यह चाल! हमे क्या पडी़ थी कि इस झगड़े में पड़ते और रात दिन बैठे तुम्हारी खुशामद करते। महन्त फसते या बचते, मेरी बला से, मुझे तो अपने साथ न ले जाते। तुम खुश होते या नाराज, मेरी बला से, मेरा क्या बिगाड़ते? मैने जो इतनी दौड़-धूप की, वह कुछ आशा ही रख कर की थी। वह दारोगा जी के पास से उठ कर सीधे थाने में आया और बातो ही बातों में सारा भण्डा फोड़ गया। थाने के अमलो ने कहा, वाह हमसे यह चाल! हमसे छिपा-छिपा कर यह रकम उडा़ई जाती है। मानो हम सरकार के नौकर ही नही है। देखें यह माल कैसे हजम होता है। यदि इस वगुला भगत को मजा न चखा दिया तो देखना। कृष्णचन्द्र तो विवाह की तैयारियों में मग्न थे। वर सुन्दर, सुशील सुशिक्षित था। कुछ ऊँचा और धनी। दोनों ओर से लिखा-पढी हो रही थी। उधर हाकिमो के पास गुप्त चिट्ठियाँ पहुँच रही थी। उनमें सारी घटना ऐसी सफाई से बयान की गयी थी, आक्षेपो के ऐसे सबल प्रमाण दिये गए थे, व्यवस्या की ऐसी उत्तम विवेचना की गई थी कि हाकिमों के मन में सन्देह उत्पन्न हो गया। उन्होने गुप्त रीति से तहकीकात की। संदेह जाता रहा। सारा रहस्य खुल गया। एक महीना बीत चुका था। कल तिलक जाने की साइत थी। दारोगा जी संध्या समय थाने में मसनद लगाये बैठे थे, उस समय सामने से सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस आता हुआ दिखाई दिया। उसके पीछे दो थानेदार और कई कान्सटेबल चल आ रहे थे। कृष्णचन्द्र उन्हें देखते ही घबरा कर उठे कि एक थानेदार ने बढ़ कर उन्हें गिरफ्तारी का वारण्ट दिखाया। कृष्णचन्द्र का मुख पीला पड़ गया। वह जड़मूर्ति की भाति चुपचाप खड़े हो गए और सिर झुका लिया। उनके चेहरे पर भय न था, लज्जा थी। यह वही दोनो थानेदार थे, जिनके सामने वह अभिमान से सिर उठा कर चलते थे, जिन्हे वह नीच समझते थे। पर आज उन्ही के सामने वह सिर नीचा किये खडे़ थे। जन्म भर की नेक-नामी एक क्षण मे धूल में मिल गयी। थाने के अमलो ने मन में कहा, और अकेले-अकेले रिश्वत उडाओ। सुपरिन्टेन्डेन्ट ने कहा,-वेल किशनचन्द्र, तुम अपने बारे में कुछ कहना चाहता है? कृष्णचन्द्र ने सोचा--क्या कहूँ? क्या कह दूं कि मै बिल्कुल निरपराध हूँ, यह सब मेरे शत्रुओ की शरारत है, थानेवालो ने मेरी ईमानदारी से तंग आकर मुझे यहाँ से निकालने के लिए यह चाल खेली है? पर वह पापाभिनय में ऐसे सिद्धहस्त न थे। उनकी आत्मा स्वयं अपने अपराध के बोझ से दबी जा रही थी। वह अपनी ही दृष्टि में गिर गए थे। जिस प्रकार बिरले ही दुराचारियों को अपने कुकर्मों का दण्ड मिलता है उसी प्रकार सज्जन का दंड पाना अनिवार्य है। उसका चेहरा, उसकी ऑखें, उसके आकार-प्रकार, सब जिह्वा बन-बन कर उसके प्रतिकूल साक्षी देते है। उसकी आत्मा स्वयं अपना न्यायाधीश बन जाती है। सीधे मार्ग पर चलने वाला मनुष्य पेचीदा गलियो में पड़ जाने पर अवश्य राह भूल जाता है। कृष्ण--सुनो, यह रोने धोने का समय नही है। मै कानून के पन्जे में फँसा हूँ और किसी तरह नही बच सकता। धैर्य से काम लो, परमात्मा की इच्छा होगी तो फिर भेट होगी। यह कहकर वह बाहर की ओर चले कि दोनो लड़कियाँ आकर उनके पैरो से चिमट गई। गंगाजली ने दोनो हाथो से उनकी कमर पकड़ ली और तीनो चिल्लाकर रोने लगी। कृष्णचन्द्र भी कातर हो गए। उन्होने सोचा, इन अबलाओ की क्या गति होगी? परमात्मन्! तुम दीनो के रक्षक हो, इनकी भी रक्षा करना। एक क्षण में वह अपने को छुडा़कर बाहर चले गये। गंगाजली ने उन्हें पकड़ने को हाथ फैलाये, पर उसके दोनो हाथ फैले ही रह गये, जैसे गोली खाकर गिरनेवाली किसी चिङिया के दोनो पंख खुले रह जाते है। ४ कृष्णचन्द्र अपने कस्बे में सर्वप्रिय थे। यह खबर फैलते ही सारी बस्ती में हलचल मच गई। कई भले आदमी उनकी जमानत करने आये लेकिन साहब ने जमानत न ली। इसके एक सप्ताह बाद कृष्णचन्द्र पर रिश्वत लेने का अभियोग चलाया गया। महन्त रामदास भी गिरफ्तार हुए। दोनों मुकदमे महीने भरतक चलते रहे। हाकिम ने उन्हें दीरे सुपुर्द कर दिया। वहाँ भी एक महीना लगा। अन्त मे कृष्णचन्द्र को पाँच वर्ष की कैद हुई। महन्तजी सात वर्ष के लिए गये और दोनों चेलो को कालेपानी का दण्ड मिला। गंगाजली के एक सगे भाई पण्डित उमानाथ थे। कृष्णचन्द्र की उनसे जरा भी न बनती थी। वह उन्हें धूर्त और पाखंडी कहा करते, उनके लम्बे तिलककी चुटकी लेते। इसलिए उमानाथ उनके यहाँ बहुत कम आते थे। लेकिन इस दुर्घटना का समाचार पाकर उमानाथ से न रहा गया। वह आकर अपनी बहन और भांजियों को अपने घर ले गए। कृष्णचन्द्र को सगा भाई न था। चाचा के दो लड़के थे, पर वह अलग रहते थे। उन्होने बात तक न पूछी। कृष्णचन्द्र ने चलते-चलते गंगाजली को मना किया था कि रामदास के रुपयों में से एक कौडी भी मुकदमे मे न खर्च करना। उन्हें निश्चय था कि मेरी सजा अवश्य होगी। लेकिन गंगाजली का जी न माना। उसने दिल खोलकर रुपये खर्च किए। वकील लोग अन्त समय तक यही कहते रहे कि वे छूट जायेंगे। जज के फैसले की हाईकोर्ट मे अपील हुई। महन्तजी की सजा मे कमी न हुई। पर कृष्णचन्द्र जी की सजा घट गई। पाँच के चार वर्ष रह गए। गंगाजली आने को तो मैके आई, पर अपनी भूल पर पछताया करती थी। यह वह मैका न था जहाँ उसने अपनी बालकपन की गुडियाँ खेली थीं, मिट्टी के घरौदे बनाये थे, माता पिताकी गोद मे पली थी। माता पिता का स्वर्गवास हो चुका था, गाँव मे वह आदमी न दिखाई देते थे। यहाँ तक कि पेडो़ की जगह खेत और खेतो की जगह पेड़ लगे हुए थे। वह अपना घर भी मुश्किल से पहचान सकी और सबसे दुःखकी बात यह थी कि वहाँ उसका प्रेम या आदर न था। उसकी भावज जाह्नवी उससे मुंह फुलाये रहती। जाह्नवी अब अपने घर बहुत कम रहती। पड़ोसियो के यहाँ बैठी हुई गंगाजली का दुखडा़ रोया करती। उसके दो लड़कियाँ थीं। वह भी सुमन और शान्ता से दूर-दूर रहतीं। गंगाजली के पास रामदास के रुपयो मे से कुछ न बचा था। यही चार पाँच सौ रुपये रह गये थे जो उसने पहले काट कपटकर जमा किए थे। इसलिए वह उमानाथ से सुमन के विवाह के विषय में कुछ न कहती। यहाँ सदा बहार होती है। वही हँसी-दिल्लगी, वही तेल फुलेलका शौक। लोग जवान ही रहते है और, जवान ही मर जाते है। गंगा-कुल कैसा है? उमा-बहुत ऊँचा। हमसे भी दो विश्वे बडा है। पसन्द है न? गगाजलीने उदासीनभाव से कहा, जब तुम्हें पसन्द है तो मुझे भी पसन्द ही है। ५ फागन में सुमन का विवाह हो गया। गगाजली दामाद को देखकर बहुत रोई। उसे ऐसा दुःख हुआ, मानो किसी ने सुमन को कुएँ मे डाल दिया। सुमन ससुराल आई तो यहाँ की अवस्था उससे भी बुरी पाई जिसकी उसने कल्पना की थी। मकान मे केवल दो कोठरिया और एक सायवान। दीवारो मे चारो ओर लोनी लगी हुई थी। बाहर से नालियों की दुर्गन्ध आती रहती थी, धूप और प्रकाश का कही गुजर नही। इस घर का किराया ३) महीना देना पड़ता था। सुमन के दो महीने तो आराम से कटे। गजाधर की एक बूढी फुआ घर का सारा काम-काज करती थी। लेकिन गर्मियों में शहर मे हैजा फैला। और बुढिया चल बसी। अब वह बड़े फेर मे पड़ी। चौका बरतन करने के लिए महरियां ३) रुपया से कम पर राजी न होती थी। दो दिन घर में चूल्हा नही जला। गजाधर सुमन से कुछ न कह सकता था। दोनो दिन बाजार से पूरिया लाया, वह सुमन को प्रसन्न रखना चाहता था। उसके रूप-लावण्यपर मुग्ध हो गया था। तीसरे दिन वह घडी रात को उठा। और सारे बरतन माज डाले, चौका लगा दिया, कल से पानी भर लाया। सुमन जब सोकर उठी तो यह कौतुक देखकर दंग रह गई। समझ गई कि इन्हीने सारा काम किया है। लज्जाके मारे उसने कुछ न पूछा। सन्ध्या को उसने आप ही सारा काम किया। बरतन मांजती थी और रोती जाती थी। पर थोड़े ही दिनों में उसे इन कामों की आदत पड़ गई। उसे अपने जीवन में आनन्द सा-अनुभव होने लगा। गजाधर को ऐसा मालूम होता था मानों जग जीत लिया है। अपने मित्रो से सुमन की प्रशंसा करता फिरता। स्त्री नहीं है, देवी है। इतने बड़े घर की लड़की, घर का छोटे-से छोटा काम भी अपने हाथ से करती है। भोजन तो ऐसा बनाती है कि दाल रोटी में पकवान का स्वाद आ जाता है। दूसरे महीने मे उसने वेतन पाया तो सबका सब सुमन के हाथों में रख दिया। सुमन को आज स्वच्छन्दता का आनन्द प्राप्त हुआ। अब उसे एक एक पैसे के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़ेगा। वह इन रुपयों को जैसे चाहे खर्च कर सकती है। जो चाहे खा पी सकती है। पर गृह-प्रबन्ध मे कुशल न होने के कारण वह आवश्यक और अनावश्यक खर्च का ज्ञान न रखती थी। परिणाम यह हुआ कि महीने में दस दिन बाकी थे और सुमन ने सब रुपये खर्च कर डाले थे। उसने गृहिणी बनने की नही, इन्द्रियों के आनन्द भोग की शिक्षा पाई थी। गजाधर ने यह सुना तो सन्नाटे में आ गया। अब महीना कैसे कटेगा? उसके सिरपर एक पहाड़-सा टूट पड़ा। इसकी शंका उसे कुछ पहले ही हो रही थी। सुमन से तो कुछ न बोला, पर सारे दिन उसपर चिन्ता सवार रही, अब बीच में रुपये कहाँ से आवें? गजाघर ने सुमन को घर की स्वामिनी बना तो दिया था, पर वह स्वभाव से कृपण था। जलपान को जलेबियाँ उसे विष के समान लगती थी। दाल में घी देखकर उनके हृदय मे शूल होने लगता। वह भोजन करता तो बटुलीकी ओर देखता कि कही अधिक तो नहीं बना है। दरवाजे पर दाल चावल फेंका देखकर उसके शरीर मे ज्वाला-सी लग जाती थी, पर सुमन की मोहनी सूरत ने उसे वशीभूत कर लिया था। मुंह से कुछ न कह सकता। पर आज जब कई आदमियो से उधार माँगने पर उसे रुपये न मिले तो वह अधीर हो गया। घर में आकर बोला, रुपये तो तुमने सब खर्च कर दिये अब बताओ कहां से आवें? सुमन-—मैने कुछ उडा़ तो नही दिए। गजाघर—उड़ाये नही, पर यह तो तुम्हें मालूम था कि इसी में महीने भर चलाना है। उसी हिसाब से खर्च करना था। सुमन-—उतने रुपयो मे बरकत थोड़े ही हो जायगी। गजाधर-तो मैं डाका तो नही मार सकता। बातो बातों में झगड़ा हो गया। गजाधर ने कुछ कठोर बाते कही। अन्त को सुमन ने अपनी हँसुली गिरवी रखने को दी और गजाधर भुनभुनाता हुआ लेकर चला गया। लेकिन सुमन का जीवन सुख में कटा था। उसे अच्छा खाने, अच्छा पहिनने की आदत थी। अपने द्वार पर खोमचे वालो की आवाज सुनकर उससे रहा न जाता। अबतक वह गजाधर को भी खिलाती थी। अब से अकेली ही खा जाती। जिह्वा रस भोग के लिए पति से कपट करने लगी। धीरे-धीरे सुमन के सौन्दर्य की चर्चा मुहल्ले मे फैली। पास-पड़ोस की स्त्रियाँ आने लगी। सुमन उन्हें नीच दृष्टि से देखती; उनसे खुलकर न मिलती। पर उसके रीति व्यवहार में वह गुण था जो ऊँचे कुलो में स्वाभाविक होता है। पड़ोसिनो ने शीघ्र ही उसका आधिपत्य स्वीकार कर लिया। सुमन उनके बीच में रानी मालूम होती थी। उसकी सगर्वा प्रकृति को इसमें अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता था। वह उन स्त्रियों के सामने अपने गुणो को बढा कर दिखाती। वह अपने भाग्य को रोती, सुमन अपने भाग्य को सराहती। वे किसी की निन्दा करती तो सुमन उन्हें समझाती। वह उनके सामने रेशमी साडी़ पहनकर बैठती, जो वह मैके से लाई थी। रेशमी जाकट खूटीपर लटका देती। उनपर इस प्रदर्शन का प्रभाव सुमन की बात चीत से कही अधिक होता था। वह वस्त्राभूषण के विषय मे उसकी सम्मति को बड़ा महत्व देती। नये गहने बनवाती तो सुमन से सलाह लेती, साडियाँ लेतीं तो पहले सुमन को अवश्य दिखा लेती। सुमन ऊपर से उन्हें निष्काम भाव से सलाह देती, पर उसे मन में बड़ा दुःख होता। वह सोचती यह सब नये नये गहने बनवाती है, नये-नये कपड़े लेती है और यहाँ रोटियो के लाले है। क्या संसार में मैं ही सबसे अभागिनी हूँ? उसने अपने घर यही सीखा था कि मनुष्य को जीवन में सुख भोग करना चाहिए। उसने कभी वह धर्म चर्चा न सुनी थी, वह धर्म-शिक्षा न पाई थी, जो मन में सन्तोष का बीजारोपण करती है। उसका हृदय असन्तोष से व्याकुल रहने लगा। गजाधर इन दिनो बडी मेहनत करता। कारखाने से लौटते ही एक दूसरी दूकान पर हिसाब-किताब लिखने चला जाता था। वहाँ से ८ बजे रात को लौटता। इस काम के लिए उसे ५) और मिलते थे। पर उसे अपनी आर्थिक दशा में कोई अन्तर न दिखाई देता था। उसकी सारी कमाई खाने पीने में उड़ जाती थी। उसका सञ्चयशील हृदय इस ‘खा पी बराबर' दशा में बहुत दुःखी रहता था। उस पर सुमन उसके सामने अपने फूटे कर्म का रोना रो-रोकर उसे और भी हताश कर देती थी। उसे स्पष्ट दिखाई देता था कि सुमन का हृदय मेरी ओर से शिथिल होता जाता है। उसे यह न मालूम था कि सुमन मेरी प्रेम-रसपूर्ण बातो से मिठाई के दोनों को अधिक आनन्दप्रद समझती है। अतएव वह अपने प्रेम और परिश्रम से फल न पाकर, उसे अपने शासनाधिकार से प्राप्त करने की चेष्टा करने लगा। इस प्रकार रस्सी मे दोनो ओर से तनाव होने लगा। हमारा चरित्र कितना ही दृढ हो, पर उसपर सगतिका असर अवश्य होता है। सुमन अपने पड़ोसियो को जितनी शिक्षा देती थी उससे अधिक उनसे ग्रहण करती थी। हम अपने गार्हस्थ्य जीवन की ओर से कितने बेसुध है। उसके लिए किसी तैयारी किसी शिक्षा की जरूरत नही समझते। गुडियाँ खेलने वाली बालिका, सहेलियो के साथ विहार करने-वाली युवती, गृहिणी बनने के योग्य समझी जाती है। अल्हड बछडे़ के कन्धे पर भारी जुआ रख दिया जाता है। एसी दशा में यदि हमारा गार्हस्थ्य जीवन आनन्दमय न हो तो कोई आश्चर्य नही। जिन महिलाओ के साथ सुमन उठती-बैठती थी,वे अपने पतियो को इन्द्रियसुखका यन्त्र समझती थीं। पति, चाहे जैसे हो, अपनी स्त्री को सुन्दर आभूषणो से उत्तम वस्त्रों से सजावे, उसे स्वादिष्ट पदार्थ खिलावे। यदि उसमें वह सामर्थ्य नहीं है तो वह निखट्टू है, अपाहिज है, उसे विवाह करने का कोई अधिकार नही था, वह आदर और प्रेम के योग्य नही। सुमन ने भी यही शिक्षा प्राप्त की और गजाधर प्रसाद जब कभी उसके किसी काम से नाराज होते तो उन्हें पुरुषो के कर्त्तव्य पर एक लम्बा उपदेश सुनना पडता था। उस मुहल्ले में रसिक युवकों तथा शोहदो की भी कमी न थी। स्कूल से आते हुए युवक सुमन के द्वार की ओर टकटकी लगाते हुए चले जाते। शोहदे उधर से निकलते तो राधा और कान्हा के गीत गाने लगते। सुमन कोई काम करती हो, पर उन्हें चिककी आड़ से एक झलक दिखा देती। उसके चञ्चल हृदय को इस ताक-झाँक मे असीम आनन्द प्राप्त होता था। किसी कुवासना से नही, केवल अपनी यौवन की छटा दिखाने के लिए केवल दूसरो के हृदयपर विजय पाने के लिए वह यह खेल खेलती थी। ६ सुमन के घर के सामने भोली नाम की एक वेश्या का मकान था। भोली नित नये सिंगार करके अपने कोठे के छज्जेपर बैठती। पहर रात तक उसके कमरे से मधुर गान की ध्वनि आया करती। कभी-कभी वह फिटन पर हवा खाने जाया करती। सुमन उसे घृणा की दृष्टि से देखती थी। सुमन ने सुन रखा था कि वेश्याएं अत्यन्त दुश्चरित्र और कुलटा होती है। वह अपने कौशल से नवयुव को को अपने मायाजाल में फंसा लिया करती है। कोई भलामानुस उनसे बातचीत नही करता, केवल शोहदे रात को छिपकर उनके यहाँ जाया करते है। भोली ने कई बार उसे चिककी आड़ में खड़े देखकर इशारे से बुलाया था, पर सुमन उससे बोलने मे अपना अपमान समझती। वह अपने को उससे बहुत श्रेष्ठ समझती थी। मैं दरिद्र सही, दीन सही पर अपनी मर्यादा पर दृढ़ हूँ, किसी भलेमानुस के घर से मेरी रोक तो नही, कोई मुझे नीच तो नहीं समझता। वह कितना ही भोग-विलास करे पर उसका कही आदर तो नही होता। बस, अपने कोठे पर बैठी अपनी निर्लज्जता और अधर्म का फल भोगा करे। लेकिन सुमन को शीघ्र ही मालूम हुआ कि मैं इसे जितनी नीच समझती हूँ, उससे वह कही ऊंची है। आषाढ के दिन थे। गरमी के मारे सुमन का दम फूल रहा था सन्ध्या को उसे किसी तरह न रहा गया। उसने चिक उठा दी और द्वार पर बैठी पंखा झल रही थी। देखती क्या है कि भोली बाई के दरवाजे पर किसी उत्सव की तैयारियाँ हो रही है। भिश्ती पानी का छिड़काव कर रहे थे। आगंन मे एक शामियाना ताना जा रहा था। उसे सजाने के लिए बहुत से फूल-पत्ते रखे हुए थे। शीशे के सामान ठेलो पर लदे चले आते थे। फ़र्श बिछाया जा रहा था। बीसो आदमी इधर-से-उधर दौडते फिरते थे, इतने में भोली की निगाह उस घर पर गई। सुमन के समीप आकर बोली, आज मेरे यहाँ मौलूद है। देखना चाहो तो परदा करा दूँ। सुमन ने बेपरवाही से कहा--मै यही बैठे-बैठे देख लूगी। भोली-—देख तो लोगी, पर सुन न सकोगी। हर्ज क्या है, ऊपर परदा करा दूँ? सुमन--मुझे सुनने की उतनी इच्छा नही है। भोली ने उसकी ओर एक करुण सूचक दृष्टि से देखा और मन में कहा, यह गँवारिन अपने मन में न जाने क्या समझे बैठी है। अच्छा, आज तू देख ले कि मैं कौन हूँ? वह बिना कुछ कहे चली गयी। रात हो रही थी। सुमन का चूल्हे के सामने जाने को जी न चाहता था। बदन मे योंही आग लगी हुई है। आँच कैसे सही, जायगी, पर सोच-विचार कर उठी। चूल्हा जलाया खिचड़ी डाली और फिर आकर वहाँ तमाशा देखने लगी। आठ बजते-बजते शामियाना गैस के प्रकाश से जगमगा उठा। फूल-पत्तो की सजावट उसकी शोभा को और भी बढ़ा रही थी। चारो ओर से दर्शक आने लगे। कोई वाइसिकिल पर आता था, कोई टमटम पर, कोई पैदल, थोड़ी देर में दो तीन फिटने भी आ पहुंची और उनमें कई बाबू लोग उतर पड़े। एक घण्टे में सारा आंगन भर गया। कई से मनुष्यो का जमाव हो गया। फिर मौलाना साहब की सवारी आई। उनके चेहरे से प्रतिभा झलक रही थी। वह सजे हुए सिंहासन-पर मसनद लगाकर बैठ गये और मौलूद होने लगा। कई आदमी मेहमानो का स्वागत-सत्कार कर रहे थे। कोई गुलाब छिड़क रहा था, कोई खास दान पेश करता था। सभ्य पुरुषो का ऐसा समूह सुमन ने कभी न देखा था। नौ बजे गजाधर प्रसाद आये। सुमन ने उन्हें भोजन कराया। भोजन करके गजाधर भी जाकर उसी मण्डली में बैठे। सुमन को तो खाने की भी सुझ न रही। बारह बजे रात तक वह वही बैठी रही-यहाँ तक कि मौलूद समाप्त हो गया। फिर मिठाई बँटी और बारह बजे सभा विसर्जित हुई। गजाधर घर मे आये तो सुमन ने कहा, यह सब कौन लोग बैठे हुए थे? गजाधर-में सबको पहचानता थोड़े ही हुँ। पर भले-बुरे सभी थे। शहर के कई रईस भी थे। सुमन- क्या यह लोग वेश्या के घर आने मे अपना अपमान नही समझते? गजाधर—अपमान समझते तो आते ही क्यों? सुमन-तुम्हें तो वहाँ जाते हुए संकोच हुआ होगा? गजाधर-जब इतने भले मानुस बैठे हुए थे तो मुझे क्यो संकोच होने लगा। वह सेठजी भी आये हुए थे जिनके यहाँ मै शाम को काम करने जाया करता हूँ। सुमन ने विचार पूर्ण भाव से कहा,-मैं समझती थी कि वेश्याओ को लोग बडी घृणा की दृष्टि से देखते हैं। गजाधर—हाँ, ऐसे मनुष्य भी है, गिने-गिनाये। पर अंगरे जी शिक्षा ने लोगों को उदार बना दिया है। वेश्याओ का अब उतना तिरस्कार नही किया जाता। फिर भोली वाई का शहर मे बड़ा मान है। आकाश मे बादल छा रहे थे। हवा बन्द थी। एक पत्ती भी न हिलती थी। गजाधर प्रसाद दिन भर के थके हुए थे। चारपाई पर जाते ही निद्रा में निमग्न हो गये पर सुमन को बहुत देर तक नीद न आई। दूसरे दिन सन्ध्या को जब फिर चिक उठाकर बैठी तो उसने भोली को छज्जेपर बैठे देखा। उसने बरामदे मे निकलकर भोली से कहा रात तो आपके यहाँ बड़ी धूम थी। भोली समझ गई कि मेरी जीत हुई! मुस्कुराकर बोली, तुम्हारे लिए शीरनी भेज दूं? हलवाई की बनाई हुई है। ब्राह्मण लाया है। सुमन ने संकोच से कहा भिजवा देना। ७ सुमन को ससुराल आये डेढ़ साल के लगभग हो चुका था, पर उसे मैके जाने का सौभाग्य न हुआ था। वहीं से चिट्ठयाँ आती थी। सुमन उत्तर में अपनी माँ को समझाया करती, मेरी चिन्ता मत करना, मैं बहुत आनन्द से हूं, पर अब उसके उत्तर अपनी विपत्ति की कथाओ से भरे होते थे। मेरे जीवन के दिन रो-रोकर कट रहे है। मैने आप लोगो का क्या विगाडा़ था कि मुझे इस अन्धे कुएँ में ढकेल दिया। यहाँ न रहने को घर है, न पहिनने को वस्त्र, न खाने को अन्न। पशुओं की भांति रहती हुँ। उसने अपनी पडोसिनो से मैके का बखान करना छोड़ दिया। कहाँ तो उनसे अपनी पति की सराहना किया करती थी, कहाँ अब उसकी निन्दा करने लगी। मेरा कोई पूछने वाला नही है। घरवालो ने समझ लिया कि मर गई। घर में सब कुछ है, पर मेरे किस काम का? वह समझते होगे, यहाँ में फूलों की सेज पर सो रही हुँ और मेरे ऊपर जो बीत रही है बह में ही जानती हूं। गजाधरप्रसाद साथ उसका बर्ताव पहले से कही रूखा हो गया। वह उन्ही को अपनी इस दशा का उत्तरदाता समझती थी। वह देर मे सोकर उठती, कई दिन घरों झाडू़ नहीं देती। कभी कभी गजाधर को बिना भोजन किए काम पर जाना पड़ता। उसकी समझ मे न आता कि यह क्या मामला है, यह कायापलट क्यो हो गई है। सुमन को अपना घर अच्छा न लगता। चित्त हर घडी उचटा रहता। दिन दिनभर पड़ोसिनो के घर बैठी रहती। एक दिन गजाधर आठ बजे लौटे तो घर का दरवाजा बन्द पाया। अन्धेरा छाया हुआ था। सोचने लगे रात को वह कहाँ गई है? अब यहाँ तक नौबत पहुँच गई? किवाड खटखटाने लगे कि कही पड़ोस मे होगी तो सुनकर चली आवेगी। मन मे निश्चय कर लिया था कि आज उसकी खबर लूँगा। सुमन उस समय भोली बाई के कोठे पर बैठी हुई बातें कर रही थी। भोली ने आज उसे बहुत आग्रह करके बुलाया था। सुमन इनकार कैसे करती? उसने अपने दरवाजे का खटखटाना सुना तो घबराकर उठ खड़ी हुई और भागी हुई अपने घर आई। बातो मे उसे मालूम ही न हुआ कि कितनी रात चली गई। उसने जल्दी से किवाड खोले चटपट दीया जलाया और चूल्हे में आग जलाने लगी। उसका मन अपना अपराध स्वीकार कर रहा था। एकाएक गजाधर ने बुद्ध भाव से कहा तुम इतनी रात तक वहाँ बैठी क्या कर रही थी? क्या लाज शर्म बिलकुल घोलकर पी ली है? सुमन ने दीन भाव से उत्तर दिया-उसने कई बार बुलाया तो चली गई। कपड़े उतारो अभी खाना तैयार हुआ जाता है। आज तुम ओर दिनो से जल्दी आये हो। गजाधर—खाना पीछे बनाना, मैं ऐसा भूखा नही हूँ। पहले यह बताओ कि तुम वहाँ मुझसे पूछे बिना गई क्यो? क्या तुमने मुझे बिलकुल मिट्टी का लोदा ही समझ लिया है? सुमन-—सारे दिन अकेले इस कुप्पी में बैठा भी तो नही रहा जाता। गजाधर--तो इसलिए अब वेश्याओ से मेलजोल करोगी? तुम्हे अपनी इज्जत आवरू का भी कुछ विचार है? सुमन-—क्यों, भोली के घर जाने में कोई हानि है? उसके घर तो बड़े-बड़े लोग आते है, मेरी क्या गिनती है। गजाधर—बड़े बड़े भले ही आवे,लेकिन तुम्हारा वहाँ जाना बड़ी लज्जा की बात है। मैं अपनी स्त्री को वेश्या से मेलजोल करते नही देख सकता। तुम क्या जानती हो कि जो बड़े-बड़े लोग उसके घर आते है यह कौन लोग हैं? केवल धन से कोई बड़ा थोड़े ही हो जाता है? धर्म का महत्व कहीं धन से बढ़कर है। तुम उस मौलूद के दिन जमाव देखकर धोखे मे आ गई होगी, पर यह समझ लो कि उनमें से एक भी सज्जन पुरुष नही था। मेरे सेठजी लाख धनी हों पर उन्हे मैं अपनी चौखट न लांघने दूँगा। यह लोग धनके घमण्ड में धर्म की परवाह नही करते। उनके आने से भोली पवित्र नही हो गई है। मैं तुम्हे सचेत कर देता हूँ कि आज से फिर कभी उधर मत जाना, नही तो अच्छा न होगा। सुमन के मन मे बात आ गई ठीक ही है, मै क्या जानती हूँ कि वह कौन लोग थे। धनी लोग तो वेश्याओ के दास हुआ ही करते है। यह बात रामभोली भी कह रही थी। मुझे बड़ा धोखा हो गया था। सुमन को इस विचार से बड़ा सन्तोष हुआ। उसे विश्वास हो गया कि वे लोग नीच प्रकृति के विषय-वासनावाले मनुष्य थे। उसे अपनी दशा अब उतनी दुःखदायी न प्रतीत होती थी। उसे भोली से अपने को ऊंचा समझने के लिए एक आधार मिल गया था। 8 सुमन की धर्मनिष्ठा जागृत हो गई। वह भोलीपर अपनी धार्मिकता का सिक्का जमाने के लिए नित्य गंगा स्नान करने लगी। एक रामायण मँगवाई और कभी-कभी अपनी सहेलियों को उसकी कथाएँ सुनाती। कभी अपने आप उच्च स्वर मे पढ़ती। इससे उसकी आत्मा को तो क्या शान्ति होती, पर मन को बहुत सन्तोष होता था। चैत का महीना था। रामनौमी के दिन सुमन कई सहेलियो के साथ एक बड़े मन्दिर में जन्मोत्सव देखने गई। मन्दिर खूब सजाया हुआ था। बिजली बत्तियों से दिनका-सा प्रकाश हो रहा था, बड़ी भीड थी। मन्दिर के सुमन ने सावधान होकर उत्तर दिया, उसमें कोई छूत तो नही लगी है! शोलस्वभाव में वह किसी से घटकर नही, मान-मर्यादा मे किसी से कम नही, फिर उससे बातचीत करने में मेरी क्या हेठी हुई जाती है? वह चाहे तो हम जैसो को नौकर रख ले। गजाघर-—फिर तुमने वही बेसिर-पैर की बातें की। मान-मर्यादा वन से नहीं होती। सुमन—पर घर्म से तो होती है? गजाधर--तो वह बडी धर्मात्मा है? सुमन-—यह भगवान जानें, पर धर्मात्मा लोग उसका आदर करते है। अभी रामनवमी के उत्सव में मैने उन्हें बडे-बडे पण्डितो और धर्मात्माओ की मण्डलो में गाते देखा। कोई उससे घृणा नही करता था। सब उसका मुह देख रहे थे। लोग उसका आदर सत्कार ही नही करते थे, बल्कि उससे बातचीत करने में अपना अहोभाग्य समझते थे। मन में वह उससे घृणा करते थे या नही, यह ईश्वर जाने पर देखने मे तो उस समय भोली ही भोली दिखाई देती थी। संसार तो व्यवहारो को ही देखता है, मनकी बात कौन किसकी जानता है। गजाधर--तो तुमने उन लोगो के बड़े-पड़े तिलक छापे देखकर ही उन्हें धर्मात्मा समझ लिया? आजकल धर्म तो धूर्तो का अड्डा बना हुआ है। इस निर्मल सागर में एक-एक मगरमच्छ पड़े हुए है। भोले-भाले भक्तों को निगल जाना उनका काम है। लम्बी लम्बी जटाएँ लम्बे-लम्बे तिलक छापे और लम्बी-लम्बी दाढियाँ देखकर लोग धोखे में आ जाते है, पर वह सबके सब महापाखण्डी, धर्म के उज्ज्वल नाम को कलंकित करने वाले, घर्म के नाम पर टका कमानेवाले, भोग-विलास करनेवाले पापी है। भोली का आदर सम्मान उनके यहाँ न होगा तो किसके यहां होगा? सुमन ने सरल भाव से पूछा, फुसला रहे हो या सच कह रहे हो? गजाघर ने उसकी ओर करुण दुष्टि से देखकर कहा, नही सुमन, वास्तव में यही बात है। हमारे देश मे सज्जन मनुष्य बहुत कम है, पर अभी देश उनसे खाली नही है। वह दयावान होते है, सदाचारी होते है, सदा परोपकार मे तत्पर रहते है। भोली यदि अप्सरा बनकर आवे तो वह उसकी ओर आँख उठाकर भी न देखेंगे। सुमन चुप हो गयी। वह गजाधर की बातों पर विचार कर रही थी। ९ दूसरे दिन से सुमन ने चिकके पास खड़ा होना छोड दिया। खोचे वाले आते और पुकार कर चले जाते। ठेले गजल गाते हुए निकल जाते। चिककी आड़ मे अब उन्हें कोई न दिखाई देती थी। भोली ने कई बार बुलाया, लेकिन सुमन ने बहाना कर दिया कि मेरा जी अच्छा नही है। दो-तीन बार वह स्वयं आई पर सुमन उससे खुलकर न मिली। सुमन को यहाँ आये अब दो साल हो गए थे। उसकी रेशमी साड़ियाँ फट चली थी। रेशमी जाकटे तार-तार हो गई थी। सुमन अब अपनी मंडली की रानी न थी। उसकी बात उतने आदर से न सुनी जाती थी। उसका प्रभुत्व मिटता जाता था। उत्तम वस्त्रविहीन होकर वह अपने उच्चासन से गिर गई थी। इसलिए वह पडोसिनो के घर भी न जाती। पडोसिनो का आना जाना भी कम हो गया था। सारे दिन अपनी कोठरी में पड़ी रहती। कभी कुछ पढ़ती, कभी सोती। बन्द कोठरी मे पड़े-पड़े उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। सिर में पीडा़ हुआ करती। कभी बुखार आ जाता, कभी दिल मे धड़कन होने लगती। मन्दारिन के लक्षण दिखाई देने लगे। साधारण कामो से भी जी घबराता, शरीर क्षीण हो गया और कमलका-सा वदन मुरझा गया। गजाधर को चिन्ता होने लगी। कभी-कभी वह सुमन पर झुझलाता और कहता जब देखो पड़ी रहती है। जब तुम्हारे रहने से मुझे इतना भी सुख नही कि ठीक समय पर भोजन मिल जाय तो तुम्हारा रहना न रहना दोनो बराबर है, पर शीघ्र ही उसे सुमन पर दया आ जाती। वह अपनी स्वार्थपरतापर लज्जित होता। उसे धीरे-धीरे ज्ञान होने लगा कि सुमन के सारे रोग अपवित्र वायु के कारण है। कहा तो उस चिकके पास खडे होने से मना किया करता था, मेलो में जाने और गंगा स्नान करने से रोकता था, कहाँ अब स्वंय चिक उठा देता और सुमन को गंगा स्नान करने के लिए ताकीद करता। उसके आग्रह से सुमन कई दिन लगातार स्नान करने गई और उसे अनुभव हुआ कि मेरा जो कुछ हल्का हो रहा है। फिर तो वह नियमित रूप से नहाने लगी। मुरझाया हुआ पौधा पानी पाकर फिर लहलहाने लगा। माघ का महीना था। एक दिन सुमन की कई पडोसिनें भी उसके साथ नहाने चली। मार्ग में, वनो-बाग पड़ता था। उसमें नाना प्रकार के जीव-जन्तु पले हुए थे। पक्षियों के लिए लोहे के पतले तारो से एक विशाल गुम्बद बनाया गया था । लोटती बार सबकी सलाह हुई कि बाग की सैर करनी चाहिए। सुमन तत्काल ही लौट आया करती थी, पर आज सहेलियो के आग्रह से उसे भी बाग में जाना पड़ा। सुमन बहुत देर तक वहाँ के अद्भूत जोववारियो को देखतो रही। अन्त को वह थककर एक। बेंच पर बैठ गयी। सहसा उसके कान मे आवाज आई, अरे यह कौन औरत बेंचपर बैठी है? उठ वहाँ से। क्या सरकार ने तेरे ही लिए बेंच रख दी है? सुमन ने पोछे फिरकर कातर नेत्रो से देखा। बाग का रक्षक खडा डाँट बता रहा था। सुमन लज्जित होकर बेंच पर से उठ गई और इस अपमान को भुलाने के लिए चिड़ियो को देखने लगी। मन में पछता रही थी कि कहाँ से में इस बेंच पर बैठी। इतने में एक किराये की गाड़ी आकर चिड़ियाघर के सामने रुकी। बाग के रक्षक ने दौड़कर गाडी़ के पट खोले। दो महिलाएँ उतर पड़ी। उनमे से एक वही सुमन की पडो़सिन भोली थी। सुमन एक पेड़ की आढ में छिप गई और वह नो स्त्रियाँ बाग की सैर करने लगी। उन्होने बन्दरो को चने खिलाये चिड़िवो को दाने चुगाये कछुए की पीठपर खडी हुई, फिर सरोवर में मछलियो को देखने चली गयीं। रक्षक उनके पीछे-पीछे सेवकों की भांति चल रहा था। वे सरोवर के किनारे मछलियो को कीडा़ देख रही थी; तब तक रक्षक ने दौड़कर गुलदस्ते बनाये और उन महिलाओं को भेट किये। थोड़ी देर बाद वह दोनों आकर उसी बेंच पर बैठ गयी, जिस पर से सुमन उठा दी गई थी। रक्षक एक किनारे अदबसे खड़ा था। यह दशा देखकर सुमन की आँखों से क्रोध के मारे चिनगारियाँ निकलने लगी। उसके एक-एक रोमसे पसीना निकल आया। देह तृण के समान काँपने लगी। हृदय मे अग्निकी एक प्रचंड ज्वाला दहक उठी। वह अञ्चल मे मुँह छिपाकर रोने लगी। ज्योंही दोनो वेश्याएँ वहाँ से चली गयी, सुमन सिंहिनी की भांति लपककर रक्षक के सम्मुख आ खड़ी हुई और क्रोध से काँपती हुई बोली, क्यों जी, तुमने मुझे तो बेंचपर से उठा दिया जैसे तुम्हारे बाप ही की है, पर उन दोनों राड़ों से कुछ न बोले? रक्षक ने अपमानसूचक भाव से कहा, वह और तुम बराबर! आगपर घी जो कुछ करता है वह इस वाक्यने सुमन के हृदय पर किया। ओठ चबाकर बोली, चुप रह मूर्ख! टके के लिए वेश्याओं की जूतियाँ उठाता है, उसपर लज्जा नहीं आती। ले देख तेरे सामने फिर इस बेंचपर बैठती हूँ, देखूँ तू मुझे कैसे उठाता है। रक्षक पहले तो कुछ डरा, किन्तु सुमन के बेंचपर बैठते ही वह उसकी ओर लपका कि उसका हाथ पकड़ कर उठा दे। सुमन सिंहनी की भाँति आग्नेय नेत्रोंसे ताकती हुई उठ खड़ी हुई। उसकी एड़ियाँ उछली पड़ती थी। सिसकियों के आवेग को बलपूर्वक रोकने के कारण मुँह से शब्द न निकलते थे। उसकी सहेलियाँ जो इस समय चारों ओर से घूमघामकर चिड़ियाघर के पास आ गई थीं, दूर से खड़ी यह तमाशा देख रही थीं। किसी को बोलने की हिम्मत न पड़ती थी। इतने में फिर एक गाड़ी सामने से आ पहुँची। रक्षक अभी सुमन से हाथापाई कर ही रहा था कि गाड़ी में से एक भलेमानस उतरकर चौकीदार के पास झपटे हुए आए और उसे जोर से धक्का देकर बोले, क्यों बे, इनका हाथ क्यों पकड़ता है? दूर हट। चोकीदार हकवकाकर पीछे हट गया। चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी। बोला, सरकार, क्या यह आपके घर की है? भद्र पुरुष में क्रोध मे कहा, हमारे घर की हो या न हों, तू इनसे हाथा-पाई क्यों कर रहा था? अभी रिपोर्ट कर दुँ तो नौकरी से हाथ धो बैैठगा। चोकीदार हाथ पैर जोड़ने लगा। इतने मे गाड़ी में बैठी हुई महिला ने सुमन काे इसारे से बुलाया ओर पूछा, यह तुमसे क्या कह रहा था? सुमन--कुछ नही, मै इस बेंच पर बैठी थी, वह मुझे उठाना चाहता था। अभी दो वेश्याएँ इसी बेंच पर बैठी थी। क्या मै ऐसी गई बीती हूँ कि यह मुझे वेश्याओ से भी नीच समझे? रमणीने उसे समझाया कि यह छोटे आदमी जिससे चार पैसे पाते है। उसी की गुलामी करते है। इनके मुँह लगना अच्छा नही। दोनों स्त्रियो मे परिचय हुआ। रमणीका नाम सुभद्रा था। वह भी सुमन के मुहल्ले मे पर उसके मकान से जरा दूर, रहती थी। उसके पति वकील थे। स्त्री-पुरुष गंगास्नान करके घर जा रहे थे। यहाँ पहुँचकर उसके पति ने देखा कि चौकीदार एक भले घर की स्त्री से झगड़ा कर रहा है तो गाड़ी से उतर पड़े। सुभद्रा सुमन के रंग-रूप, बातचीत पर ऐसी मोहित हुई कि उसे अपनी गाड़ी में बैठा लिया। वकील साहब कौचवक्सपर जा बैठे। गाड़ी चली। सुमन को ऐसा मालूम हो रहा था कि में विमान पर बैठी स्वर्ग को जा रही हूं। सुभद्रा बहुत रूपवती न थी और उसके वस्त्राभूषण भी साधारण ही थे, पर उसका स्वभाव ऐसा नम्र, व्यवहार ऐसा सरल तथा विनयपूर्ण था कि सुमन का हृदय पुलकित हो गया। रास्ते मे उसने अपनी सहेलियो को जाते देखा खिड़की खोलकर उनकी और गर्व से देखा, मानो कह रही थी, तुम्हें भी कभी यह सोभाग्य प्राप्त हो सकता है? पर इस गर्व के साथ ही उसे यह भय भी था कि कही मेरा मकान देख कर सुभद्रा मेरा तिरस्कार न करने लगे। जरूर यही होगा। यह क्या जानती है कि मै ऐसे फटे हालाे रहती हूँ। यह कैसी भाग्यवान् स्त्री है! कैसा देवरूप पुरुष है! यह न आ जाते तो वह निर्दयी चौकीदार न जाने मेरी क्या दुर्गति करता। कितनी सज्जनता है कि मुझे भीतर बिठा दिया और आप कोचवान के साथ जा बैठे! वह इन्हीं विचारो में मग्न थी कि उसका घर आ गया। उसने सकुचाते हुए सुभद्रा से कहा, गाड़ी रुकवा दीजिए मेरा घर आ गया। सुभद्रा ने गाड़ी रुकवा दी। सुमन ने एकबार भोली बाई के मकान की ओर ताका। वह अपने छज्जेपर टहल रही थी। दोनों की आंँखे मिलीं, भोली ने मानो कहा, अच्छा यह ठाठ है। सुमन ने जैसे उत्तर दिया, अच्छी तरह देख लो यह कौन लोग है। तुम मर भी जाओ तो इस देवी के साथ बैठना नसीब न हो। सुमन उठ खडी हुई और सुभद्रा की ओर सजल नेत्रो से देखती हुई बोली; इतना प्रेम लगाकर बिसरा मत देना। मेरा मन लगा रहेगा। सुभद्रा ने कहा नही बहिन, अभी तो तुमसे कुछ बात भी न करने पाई। में तुम्हे कल बुलाऊॅगी। सुमन उतर पड़ी। गाड़ी चली गई। सुमन अपने घर में गई तो उसे ऐसा मालूम हुआ मानो कोई आनन्दमय स्वपन देखकर जागी है। गजाधर ने पूछा, यह गाडी किसकी थी? सुमन-यही के कोई वकील है। बेनीबाग मे उनकी स्त्री से भेट हो गई। जिद्द करके गाड़ी पर बैठा लिया। मानती ही न थी| गजाधर-—तो क्या तुम वकील के साथ बैठी थी? सुमन-कैसी बातें करते हो? वह बेचारे तो कोचवान के साथ बैठे थे। गजाधर—तभी इतनी देर हुई। सुमन—दोनो सज्जनता के अवतार है। गजाधर—अच्छा, चल के चूल्हा जलाओ, बहुत बखान हो चुका। सुमन-—तुम वकील साहब को जानते तो होगे? गजाधर—इस मुहल्ले मे तो वही एक पद्मसिंह वकील है? वही रहे होगे। सुमन-गोरे-गोरे लम्बे आदमी है। ऐनक लगाते है। गजाधर--हाँ, हाँ, वही है, यह क्या पूरव की ओर रहते है । सुमन-कोई बड़े वकील है? गजाघर--मैं उनका जमाखर्च थोडे ही लिखता हूँ। आते-जाते कभी कभी देख लेता हूँ। आदमी अच्छे है। सुमन ताड़ गई कि वकील साहब की चर्चा गजाघर को अच्छी नहीं मालूम होती। उसने कपड़े बदले और भोजन बनाने लगी। १० दूसरे दिन सुमन नहाने न गई। सवेरे ही से अपनी एक रेशमी साडी की मरम्मत करने लगी। दोपहर को सुभद्रा की एक महरी उसे लेने आई। सुमन ने मन में सोचा था, गाड़ी आवेगी। उसका जी छोटा हो गया। वही हुआ जिसका उसे भय था। वह महरी के साथ सुभद्रा के घर गई और दो-तीन घण्टे तक बैठी रही। उसका वहाँ से उठने को जी न चाहता था। उसने अपने मैके का रत्ती-रत्ती हाल कह सुनाया पर सुभद्रा अपनी ससुराल की ही बाते करती रही। दोनों स्त्रियों में मेल-मिलाप बढ़ने लगा। सुभद्रा जब गंगा नहाने जाती तो सुमन को साथ ले लेती। सुमन को भी नित्य एक बार सुभद्रा घर गये बिना कल न पडती थी। जैसे बालू पर तडपती हुई मछली जलधरा में पहुँचकर किलोले करने लगती है, उसी प्रकार सुमन भी सुभद्रा की स्नेहरूपी जलधारा में अपनी विपत्ति को भूलकर आमोद-प्रमोद में मग्न हो गई। सुभद्रा कोई काम करती होती तो सुमन स्वंय उसे करने लगती। कभी पण्डित पद्मसिंह के लिए जलपान बना देती, कभी पान लगाकर भेज देती। इन कामो में उसे जरा भी आलस्य न होता था। उसकी दृष्टि में सुभद्रा-सी सुशील स्त्री और पद्मसिह सरीखे सज्जन मनुष्य संसार में और न थे। एकबार सुभद्रा को ज्वर आने लगा। सुमन कभी उसके पास से न टलती। अपने घर एक क्षण के लिए जाती और कच्चा-पक्का खान बनाकर फिर भाग आती पर गजाधर उसकी इन बातो से जलता था। उसे सुमन पर विश्वास न था। वह उसे सुभद्रा के यहां जाने से रोकता था, पर सुमन उसका कहना न मानती थी। फागुन के दिन थे। सुमन को यह चिन्ता हो रही थी कि होली के लिए कपडो का क्या प्रबन्ध करे? गजाधर को इधर एक महीने से सेठजी ने जवाब दे दिया था। उसे अब केवल पन्द्रह रुपयो का ही आधार था। वह एक तजेब की साडी और रेशमी मलमलकी जाकेट के लिए गजाधर से कई बार कह चुकी थी, पर गजाधर हूं-हाँ करके टाल जाता था। वह सोचती यह पुराने कपड़े पहनकर सुभद्रा के घर होली खेलने कैसे जाऊँगी? इसी बीच सुमन को अपनी माता के स्वर्गवास का शोक समाचार मिला। सुमन को इसका उतना शोक न हुआ जितना होना चाहिए था, क्योकि उसका हृदय अपनी माता की ओर से फट गया था। लेकिन होली के लिए नये और उत्तम वस्त्रों की चिन्ता से निवृत्त हो गई। उसने सुभद्रा से कहा- बहूजी, अब में अनाथ हो गई। अब गहने कपडे की तरफ ताकने को जी नही चाहता। बहुत पहन चुकी। इस दु:ख ने सिंगार-पटार की अभिलाषा ही नही रहने दी। जो अधम है, शरीर से निकलता नही, लेकिन हृदय पर जो कुछ बीत रही है वह मैं ही जानती हूं। अपनी सहचरियो से भी उसने ऐसी ही शोकपूर्ण बाते की। सब की सब उसकी मातृभक्ति की प्रशंसा करने लगी। एक दिन वह सुभद्रा साथ बैठी हुई रामायण पढ़ रही थी कि पद्मसिंह प्रसन्नचित्त घर में आकर बोले आज वाजी मार ली। सुभद्रा ने उत्सुक होकर कहा-—सच? पद्मसिह—अरे क्या अबकी भी सन्देह था? सुभद्रा-अच्छा तो लाइये मेरे रुपये दिलवाइये वहाँ आपकी बाजी थी, यहाँ मेरी बाजी है। पद्म--हॉ,हाँ तुम्हारे रुपये मिलेंगे, जरा सब्र करो। मित्र लोग आग्रह कर रहे है कि धूमधाम से आनन्दोत्सव किया जाय। सुभद्रा-—हाँ, कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा और यह उचित भी है। पद्म-मैने प्रीतिभोज का प्रस्ताव किया, किन्तु इसे कोई स्वीकार नहीं करता। लोग भोली वाई का मुजरा कराने के लिए अनुरोध कर रहे है। सुभाद्रा-—अच्छा तो उन्ही की मान लो, कौन हजारो का खर्च है। होली भी आ गई है, बस होली ही के दिन रक्खो। एक पन्य दो काज हो जायगा। पद्म-—खर्च की बात नही, सिद्धान्त की बात है। सुभद्रा-भला, अबकी बार सिद्धान्त के विरुद्ध ही सही। पद्म-विट्ठलदास किसी तरह राजी नही होते। पीछे पड़ जायेंगे। सुभद्रा-उन्हें बकने दो। संसार के सभी आदमी उनकी तरह थोड़े ही हो जायेंगे। पण्डित पद्मसिंह आज कई वर्षो के विफल उद्योग के बाद म्युनिसिपैलिटी के मेम्बर बनने में सफल हुए थे। इसी के आनन्दोत्सव की तैयारियाँ हो रही थी। वे प्रीतिभोज करना चाहते थे, किन्तु मित्र लोग मुजरे पर जोर देते थे। यद्यपि वे स्वयं बडे आचारवान् मनुष्य थे, तथापि अपने सिद्धान्तों पर स्थिर रहने को सामर्थय उनमे नही थी। कुछ तो मुरोवत से कुछ अपने सरल स्वभाव और कुछ मित्रो की व्यगोविन के भय से, वह अपने पक्षपर अड़ न सकते थे। बाबू विट्ठलदास उनके परम मित्र थे। वह वेश्या नाच गानके कट्टर शत्रु थे। इस कुप्रथा को मिटाने के लिए उन्होने एक सुधारक संस्था स्थापित की थी। पण्डित पद्मसिंह उनके इने-गिने अनुयायियो में थे। पण्डितजी इसीलिए विट्ठलदास से डरते थे। लेकिन सुभद्रा के बढावा देने से उनका संकोच दूर हो गया। वह अपने वेश्याभक्त मित्रो से सहमत हो गए। भोली बाई का मुजरा होगा, यह बात निश्चित हो गई। इसके चार दिन पीछे होली आई। उसी रात को पद्मसिंह की बैठक ने नृत्यशाला का रूप धारण किया। सुन्दर रंगीन कालीनों पर मित्रवृन्द बैठे हुए थे और भोली बाई अपने समाजियो के साथ मध्य में बैठी हुई भाव बता-बताकर मधुर स्वर में गा रही थी। कमरा बिजली की दिव्य बत्तियो से ज्योतिर्मय हो रहा था। इत्र और गुलाब की सुगधि उड़ रही थी। हास्य-परिहास, आमोद-प्रमोद का बाजार गर्म था। सुमन और सुभद्रा दोनों झरोखे मे चिककी आड़ से यह जलसा देख रही थी। सुभद्रा को भोली का गाना नीरस फीका मालूम होता था। उसको आश्चर्य मालूम होता था कि लोग इतने एकाग्रचित होकर क्या सुन रहे है? बहुत देर के बाद गत के शब्द उसकी समझ मे आये। शब्द अलकारो से दब गये थे। सुमन अधिक रसञा थी। वह गाने को समझती थी और ताल स्वर का ज्ञान रखती थी। गीत कान में आते ही उसके स्मरण पटपर अंकित हो जाते थे। भोलो बाई ने गाया--- ऐसी होली में आग लगे, पिया विदेश में द्वारे ठाढी, धीरज कैसे रहे? ऐसी होली में आग लगे, सुमन ने भी इस पद को धीरे-धीरे गुनगुनाकर गाया और अपनी सफलता पर मुग्ध हो गई। केवल गिटकिरी न भर सकी। लेकिन उसका सारा ध्यान गानपर ही था। वह देखती थी कि सैकड़ो आंख भोली बाई की ओर लगी हुई है। उन नेत्रो से कितनी तृष्णा थी। कितनी विनम्रता, कितनी उत्सुकता! उनकी पुतलियाँ भोलो के एक-एक इशारे पर एक-एक भाव पर नाचती थी, चमकती थी। जिस पर उसकी दृष्टि पड़ जाती थी वह आनन्द से गद्गद् हो जाता और जिससे वह हंसकर दो एक बात कर लेती उसे तो मानो कुबेर का धन मिल जाता था। उस भाग्यशाली पुरुष पर सारी सभा की सम्मान दृष्टि पडने लगती। उस सभा मे एक से एक धनवान, एक से एक विद्वान् एक से एक रूपवान सज्जन उपस्थित थे, किन्तु सबके सब इस वेश्या हाव-भावपर मिटे जाते थे। प्रत्यक मुख इच्छा और लालसा का चित्र बना हुआ था। सुमन सोचने लगी, इस स्त्री में कौन सा जादू है! सौन्दर्य? हाँ, हाँ, बह रूपवती है, इसमें सन्देह नही। मगर में भी तो ऐसी बुरी नही हूं। वह सवली है, मैं गोरी हूँ। वह मोटी है, मै दुबली हुँ। पण्टितजी के कमरे में एक बड़ा शीशा था। सुमन इस शीशे के सामने जाकर खड़ी हो गई और उसमें अपना नखसे शिखतक देखा। भोली बाई के अपने हृदयांकित चित्र से अपने एक-एक अंग की तुलना की। तब उसने आकर सुभद्रा से कहा, बहूजी एक बात पूछूँ बुरा न मानना। यह इन्द्र की परी क्या मुझसे बहुत सुन्दर है? सुभद्रा ने उसकी ओर कौतूहल से देखा और मुस्कराकर पूछा, यह क्यो पूछती हो? सुमन शर्म से सिर झुकाकर कहा कुछ नही, योही। बतलाओ? सुभद्र ने कहा उसका सुखका शरीर है, इसलिए कोमल है लेकिन रंग रूप में वह तुम्हारे बराबर नही। सुमन ने फिर सोचा, तो क्या उसके बनाव सिंगापर, गहने कपड़े पर लोग इतने रीझे हुए है? मैं भी यदि वैसा बनाब चुनाव करूँ, वैसे गहने कपडे पहनूँ, तो मेरा रंग-रूप और न निखर जायगा, मेरा यौवन और न चमक जायगा? लेकिन कहां मिलेंगे? क्या लोग उसके स्वर लालित्य पर इतने मुग्ध हो रहे है? उसके गले में लोच नही, मेरी आवाज उससे बहुत अच्छी है। अगर कोई महीने भर भी सिखा दे तो मैं उससे अच्छा गाने लगूँ। मैं भी बक्र नेत्रो से देख सकती हूँ। मुझे भी लज्जा से आखे नीची करके मुस्कराना आता है। सुमन बहुत देर तक वहां बैठी कार्य मे कारण का अनुसंधान करती रही। अन्त मे वह इस परिणाम पर पहुंची कि वह स्वाधीन है, मेरे पैरो मे बेडियाँ है। उसकी दुकान खुली है इसलिए ग्राहको की भीड़ है, मेरी दुकान बन्द है, इसलिए कोई खडा़ नही होता। वह कुत्तो के थूकने की परवाह नही करती, में लोकनिन्दा से डरती हूँ। वह परदे के बाहर है, मै परदे के अन्दर हूँ। वह डालियो पर स्वच्छदता से चहकती है, मैं उसे पकड़े हुए हुँ। इसी लज्जा ने, इसी उपहास भय ने मुझे दूसरे की चेरी बना रक्खा है। आधी रात बीत चुकी थी। सभा विसर्जित हुई। लोग अपने-अपने घर गये। सुमन भी अपने घर की ओर चली। चारो तरफ अंधकार छाया हुआ था। सुमन के हृदय में भी नैराश्यका कुछ ऐसा ही अन्धकार था। वह घर जाती तो थी, पर बहुत धीरे-धीरे जैसे घोड़ा बमकी तरफ जाता है। अभिमान जिस प्रकार नोच़ता से दूर भागता है उसी प्रकार उसका हृदय उस घर से दूर भागता था। गजाधर नियमानुसार नौ बजे घर आया। किवाड बन्द थे। चकराया कि इस समय सुमन कहाँ गई? पड़ोस मे एक विधवा दर्जीन रहती थी, जाकर उससे पूछा। मालूम हुआ कि सुभद्र के घर किसी काम से गई है। कुंजी मिल गई आकर किवाड़ खोले, खाना तैयार था। वह द्वार पर बैठकर सुमन की राह देखने लगा। जब दस बज गये तो उसने खाना परोसा लेकिन क्रोध में कुछ खाया न गया। उसने सारी रसोई उठाकर बाहर फेंक दी आर भीतर से किवाड़ बन्द करके सो रहा। मन मे यह निश्चय कर लिया कि आज कितना ही सिर पटके किवाड़ न खोलूगा, देखें कहाँँ जाती है। किन्तु उसे बहुत देर तक नींद नही आयी। जरा सी भी आहट होती तो वह डंडा लिये किवाड़ के पास आ जाता। उस समय यदि सुमन उसे मिल जाती तो उसकी कुशल न थी। ग्यारह बजने के बाद निद्रा का देव उसे दवा बैठा। सुमन जब अपने द्वार पर पहुंची तो उसके कान में एक बजने की आवाज आई। वह आवाज उसकी नस नस मे गूंज उठी, वह अभी तक दसग्यारह के धोखे में थी। प्राण सूख गये। उसने किवाड़ की दरारोसे झांका, ढेबरी जल रही थी, उसके धुंए से कोठरी भरी हुई थी और गजाधर हाथ मे डण्डा लिये चित्त पडा़ जोर से खराठे ले रहा था। सुमन का हृदय काँप उठा किवाड खटखटाने का साहस न हुआ। पर इस समय जाऊँ कहाँ? पद्मसिंह के घर का दरवाजा भी बन्द हो गया होगा, कहार सो गये होगे। बहुत चीखने-चिल्लाने पर किवाड तो खुल जायगी, लेकिन वकील साहब अपने मन में न जाने क्या समझे नहीं, वहाँ जाना उचित नही, क्यो न यही बैठी रहूँ। एक बज ही गया है, तीन चार घण्टे मे सबेरा हो जायगा। यह सोचकर वह बैठ गई, किन्तु यह घडका लगा हुआ था कि कोई मुझे इस तरह यहाँ बैठे देख ले तो क्या हो? समझेगा कि चोर है, घातमें बैठा है। सुमन वास्तव मे अपने ही घर में चोर बनी हुई थी। फागुन में रात को ठंडी हवा चलती है। सुमन की देहपर एक फटी हुई रेशमी कुरती थी। हवा तीर के समान उसकी हड्डियो में चुभी जाती थी। हाथ-पाँव अकड़ रहे थे। उसपर नीचे की नाली से ऐसी दुर्गध उठ रही थी कि साँस लेना कठिन था। चारो ओर तिमिर मेघ छाया हुआ था, केवल भोली बाई के कोठे पर से प्रकाश की रेखाएँ अन्धेरी गली की तरफ दया की स्नेह-रहित दृष्टि से ताक रही थी। सुमन ने सोचा मै कैसी हतभागिनी हूँ। एक वह स्त्रियाँ है जो आराम से तकिये लगाये सो रही है, लौंडियाँ पैर दवाती है। एक में हैं कि यहाँ बैठी हुई अपने नसीव को रो रही हूँ। मै यह सब दुःख क्यो झेलती हूँ? एक झोपड़ी में टूटी खाटपर सोती हूँ, रूखी रोटियाँ खाती हूं, नित्य घुडकियाँ सुनती हूं, क्यो? मर्यादा पालन के लिए ही न? लेकिन संसार मेरे इस मर्यादा-पालन को क्या समझता है? उसकी दृष्टि में इसका क्या मूल्य है? क्या यह मुझ से छिपा हुआ है? दशहरे के मेले में, मोहर्रम के मेले में फूनवाग में, मन्दिरो में, सभी जगह तो देख रही हूँ। आजतक मैं समझती थी कि कुचरित्र लोग ही इन रमणियो पर जान देते है, किन्तु आज मालूम हुआ कि उनकी पहुंच सुचरित्र और सदाचारशील पुरुषों मे भी कम नही है। वकील साहब कितने सज्जन आदमी है, लेकिन आज वह भोलीबाई पर कैसे लट्टू हो रहे थे? इस तरह सोचते हुए वह उठी कि किवाड़ खटखटाऊँ जो कुछ होना है हो जाय। ऐसा कौन सा सुख भोग रही हूँ जिसके लिए यह आपत्ति सहूँ? यह मुझे कौर सोने के कौन खिला देते है, कौन फूलो की सेज पर सुला देते है। दिन भर छाती फाड़कर काम करती हूं, तब एक रोटी खाती हूँ। उस पर यह धोस, लेकिन गजाधर के डंडे को देखते ही फिर छाती दहल गई। पशु बल ने मनुष्य को परास्त कर दिया। अक़स्मात् सुमन ने दो कान्स्टेबलो को कन्धे पर लट्ठ रखे आते देखा। अन्धकार मे वह बहुत भयंकर दीख पड़ते थे। सुमन का रक्त सूख गया, कही छिपने की जगह न थी। सोचने लगी कि यदि यही बैठी हूँ तो यह सब अवश्य ही कुछ पूछगे तो क्या उत्तर दूँगी। वह झपटकर उठी और जोर से किवाड़ खटखटाया। चिल्लाकर बोली, दो घड़ी से चिल्ला रही हूँ, सुनते हो नही। गजाधर चौका। पहली नींद पूरी हो चुकी थी। उठकर किवाड़ खोल दिये। आवाज में कुछ भय था, कुछ घबराहट। सुमन ने कृत्रिम क्रोध स्वर में कहा, वाह रे सोनेवाले! घोड़े बेचकर सोये हो क्या? दो घडी से खड़ी चिल्ला रही हूँ, मिनकते ही नही। ठण्ड के मारे हाथ-पांव अकड़ गये। गजाधर निशक होकर बोला, मुझसे उडो़ मत, बताओ सारी रात कहाँ रही? सुमन निर्भय होकर बोली, कैसी रात नौ बजे सुभद्रा देवी के घर गई थी। दावत का बुलावा आया था। दस बजे उनके यहाँ से लोट आई। दो घण्टे से तुम्हारे द्वार पर खड़ी चिल्ला रही हूँ। बारह बजे होगे तुम्हे अपनी नींद में कुछ सुधि भी रहती है? गजाधर—तुम दस बजे आई थी? सुमन ने दृढ़ता से कहा, हाँ, हॉ, दस बजे। गजाधर--बिलकुल झूठ है, बारह का घंटा अपने कानो से सुनकर सोया हूँ सुमन--सुना होगा, नींद मे सिर पैर की खबर ही नहीं रहती, घण्टे गिनने बैठे थे। गजाधर-अब यह धाँवलो एक न चलेगो। साफ-साफ बताओ, तुम अब तक कहां रही। में तुम्हारा रंग ढंग आजकल देख रहा हूँ। अन्धा नही हूँ। मैं ने भो त्रियाचरित पढा है। ठीक-ठीक बता दो, नही तो आज जो कुछ होना है हो जायगा। सुमन-एक बार तो कह दिया कि में दस-ग्यारह बजे यहाँ आ गई। अगर तुम्हें विश्वास नही आता, न आवे। जो गहने गढ़ाते हो मत गढाना। रानी रूठगी अपना सुहाग लेगी। जब देखो म्यान से तलवार बाहर ही रहती है, न जाने किस विरते पर! यह कहते-कहते सुमन चौक गई। उसे ज्ञात हुआ कि में सीमा से बाहर हुई जाती हूं। अभी द्वार पर बैठे हुए उसने जो जो बात सोची थी और मन में जो बात स्थिर की थी, वह सब उसे विस्मृत हो गई। लोकाचार और हृदय में जमे हुए विचार हमारे जीवन में आकस्मिक परिवर्तन नही होने देते। गजाधर सुमन की यह कठोर बाते सुनकर सन्नाटे मे आ गया। यह पहला ही अवसर था कि सुमन यो उसके मुँह आई थी। क्रोधोन्मत्त होकर बोला, क्या तू चाहती है कि जो कुछ तेरा जी चाहे किया करे और मै कुछ न करुँ? तु सारी रात न जाने कहाँ रही, अब जो पूछता हूँ तो कहती है मुझे तुम्हारी परवा नही है, तुम मुझे क्या कर देते हों? मुझे मालूम हो गया कि शहर का पानी तुझे भी लगा, तूने भी अपनी सहेलियों का रंग पकडा। बस अब मेरे साथ तेरा निबाह न होगा। कितना समझाता रहा कि इन चुडैलो के साथ न बैठे, मेले-ठेले मत जा, लेकिन तूने न सुना न सुना। मुझे तु जब तक बता न देगी कि तू सारी रात कहाँ रही, तब तक मै तुझे घर मे पैठने न दूँगा। न बतावेगी तो समझ ले कि आज से तू मेरी कोई नही, तेरा जी जहाँ चाहे जा, जो मन में आवे कर। सुमन ने कातर भाव से कहा, वकील साहब के घर को छोड़कर में और कही नही गई, तुम्हें विश्वास न हो तो आप जाकर पूछ लो। वही चाहे जितनी देर लगी हो। गाना हो रहा था, सुभद्रा देवी ने आने नही दिया। गजाधर ने लांछनायुक्त शब्दो मे कहा, अच्छा, तो अब वकील साहब से मन मिला है, यह कहो, फिर भला मजूर की परवाह क्यो होने लगी? इस लांछना ने सुमन के हृदय पर कुठाराघात का काम किया। झूठा इलजाम कभी नही सहा जाता। वह सरोष होकर बोली, कैसी बातें मुंह से निकालते हो, हक-नाहक एक भले मानस को बदनाम करते हो। मुझे आज देर हो गई है मुझे जो चाहो कहो, मारो, पीटो, वकील साहब को क्यो बीच में घसीटते हो? वह बेचारे तो, जबतक मै घर में रहती हूँ अन्दर कदम नही रखते। गजाघर बोला, चल छोकरी, मुझे न चरा, ऐसे-ऐसे कितने भले आदमियों को देख चुका हूँ। वह देवता है, उन्ही के पास जा। यह झोपड़ी तेरे रहने योग्य नही है। तेरे हौसले बढ़ रहे है। अब तेरा गुजर यहाँ न होगा। सुमन देखती थी कि बात बढती जाती है। यदि उसकी बात किसी तरह लोौट सकतीं तो उन्हें लौटा लेती, किन्तु निकला हुआ तीर कहाँ लौटता है? सुमन रोने लगी और बोली, मेरी आंखें फूट जाएँ, अगर मैंने उनकी तरफ ताका भी हो। मेरी जीभ गिर जाय अगर मै ने उनसे एक बात की हो। जरा मन बहलाने सुभद्रा के पास चली जाती हूंँ, अब मना करते हो, न जाऊँगी। मन में जब एक बार भ्रम का प्रवेश हो जाता है तो उसका निकलना कठिन हो जाता है। गजाधर ने समझा कि सुमन इस समय केवल मेरा क्रोध शान्त करने के लिए यह नम्रता दिखा रही है। कटुतापूर्ण स्वर से बोला, नही, जाओगी क्यों नहीं। वहाँ ऊँची अटारी सैर को मिलेगी, पकवान खाने को मिलेंगे, फूलों की सेज पर सोओगी, नित्य राग-रंग की घूम रहेगी। व्यंग और क्रोध में आग और तेल का संबंध है। व्यंग हृदय को इस प्रकार विदीर्ण कर देता है जैसे छेनी बर्फ के टुकड़े को। सुमन क्रोध से विह्वल होकर बोली, अच्छा तो जवान संभालो, बहुत हो चुका। घंटे भर से मुह मे जो अनाप-शनाप आता है बकते जाते हो। मैं तरह देती जाती हूँ, उसका यह फल है। मुझे कोई कुलटा समझ लिया है? गजाधर—मै तो ऐसा ही समझाता हूँ। सुमन-तुम मुझे मिथ्या पाप लगाते हो, ईश्वर तुम से समझेगे। गजाधर-चली जा मेरे घर से, राँड़! कोसती है? सुमन—हाँ, यों कहो कि तुझे रखना नही चाहता। मेरे सिर पाप क्यों लगाते हो? क्या तुम्ही मेरे अन्नदाता हो? जही मजूरी करूँगी वही पेट पाल लूँगी। गजाधर—जाती है कि खडी गालियाँ देती है? सुमन जैसी सगर्वा स्त्री इस अपमान को सह न सकी। घर से निकालने को उनकी भयकर इरादो को पूरा कर देती है। सुमन बोली, अच्छा लो, जाती हूँ। यह कहकर उसने दरवाजे की तरफ एक कदम बढ़ाया, किन्तु अभी उसने जाने का निश्चय नहीं किया था। गजाधर एक मिनट तक कुछ सोचता रहा, फिर बोला, अपने गहने-कपड़े लेती जा, यहाँ कोई काम नही है। इस वाक्य ने टिमटिमाते हुए आशा रूपी दीपक को बुझा दिया। सुमन को विश्वास हो गया कि अब यह घर मुझसे छूटा। रोती हुई बोली, मैं लेकर क्या करूँगी। सुमन ने सन्दूकची उठा ली और द्वार से निकल आई, अभी तक उसकी आस नही टूटी थी। वह समझती थी कि गजाधर अब भी मनाने आवेगा। इसलिये वह दरवाजे के सामने सड़़क पर चुपचाप खड़ी रही। रोते-रोते उसका आँचल भीग गया था। एकाएक गजाधर ने दोनो किवाड़ जोर से बन्द कर लिये। यह मानो सुमन की आशा का द्वार था जो सदैव के लिये उसकी ओर से बन्द हो गया। सोचने लगी, कहाँ जाऊँ? उसे अब ग्लानि और पश्चात्ताप के बदले गजाधर पर क्रोध आ रहा था। उसने अपनी समझ में ऐसा कोई काम नही किया था,जिसका ऐसा कठोर दण्ड मिलना चाहिये था। उसे घर आने में देर हो गयी थी इसके लिए दो-चार घुडकियाँँ बहुत थीं। यह निर्वासन उसे घोर अन्याय प्रतीत होता था। उसने गजाधर को मनाने के लिये क्या नही किया? विनती की, खुशामद की, रोई, किन्तु उसने सुमन का अपमान ही नहीं किया, उसपर मिथ्या दोषा-रोपण भी किया। इस समय यदि गजाधर मनाने भी आता तो सुमन राजी न होती। उसने चलते-चलते कहा था, जाओ अब मुँँह मत दिखाना। यह शब्द उसके कलेजे में चुभ गये थे। मैं ऐसी गई बीती हूँ कि अब वह मेरा मुँह भी देखना नही चाहते, तो फिर क्यों उन्हें मुँँह दिखाऊँ? क्या संसार में सब स्त्रियों के पति होते है? क्या अनाथाएँ नही है? मैं भी अब अनाथा हूँ। वसन्त के समीर और ग्रीष्म की लू में कितना अन्तर है! एक सुखद और प्राणपोषक, दूसरी अग्निमय और विनाशिनी। प्रेम बसन्त-समीर है, द्वेष ग्रीष्म की लू। जिस पुष्प को बसन्त समीर महीनो में खिलाती है, उसे लू का एक झोका जलाकर राख कर देता है। सुमन के घर से थोड़ी दूर पर एक खाली बरामदा था। वहाँ जाकर उसने सन्दूकची सिरहाने रक्खी और लेट गई। तीन बज चुके थे। दो घण्टे उसने यह सोचने में काटे कि कहाँ जाऊँ। उसकी सहचरियो मे हिरिया नामकी एक दुष्ट स्त्री थी, वहाँ आश्रय मिल सकता था, किन्तु सुमन उधर नही गई। आत्मसम्मान का कुछ आश अभी बाकी था। अब वह एक प्रकार से स्वच्छन्द थी और उन दुष्कामनाओं को पूर्ण कर सकती थी जिनके लिये उसका मन बरसों से लालायित हो रहा था। अब उस सुखमय जीवन के मार्ग मे कोई बाधा न थी। लेकिन जिस प्रकार बालक किसी गाय या बकरी को दूर से देखकर प्रसन्न होता है,पर उसके निकट आते ही भय से मुँँह छिपा लेता है, उसी प्रकार सुमन अभिलाषाओ के द्वार पर पहुँचकर भी भीतर प्रवेश न कर सकी। लज्जा, खेद, घृणा, अपमान ने मिलकर उसके पैरों में बेड़ी सी डाल दी ।उसने निश्चय किया कि सुभद्रा के घर चलूँ, वही खाना पका दिया करूँगी, सेवा टहल करूँगी और पड़ी रहूँँगी। आगे ईश्वर मालिक है। उसने सदूकची आचंल में छिपा ली और पड़ित पद्मसिंह के घर आ पहुँची। कई मुवक्किल हाथ-पांव धो रहे थे। कोई आसन बिछाये ध्यान करता था और सोचता था, वही मेरे गवाह न बिगड़ जायें। कोई मालाफेरत था, मगर उसके दानों से उन रुपयों का हिसाब लगा रहा था जो आज उसे व्यय करने पड़ेंगे। मेहतर खड़ा रात की पूड़ियाँ समेट रहा था। सुमन को भीतर जाते हुए संकोच हुआ लेकिन जीतन कहार को आते देखकर वह शीघ्रता से अन्दर चली गयी। सुभद्रा ने आश्चर्य मे पूछा-घर से इतने सवेरे कैसे चली? सुमन ने कुण्डित स्वर से कहा, घर से निकाल दी गई हूं। सुभदा-—अरे! यह किस बात पर? सुमन-—यही कि रात मुझे यहाँ जाने में देर हो गई। सुभद्रा-—इस जरा सी बात का इतना बतंगड़ देखो, मै उन्हें बुलवाती हुँ, विचित्र मनुष्य है। सुमन-—नहीं नही, उन्हें न बुलाना, मै रो-धोकर हार गई। लेकिन उस निर्दयी को तनिक भी दया न आई। मेरा हाथ पकड़़कर घर से निकाल दिया। उसे घमंड है कि मै ही इसे पालता हूं। में उसका यह घमंड तोड़ दूँगी। सुभद्रा--चलो, ऐसी बातें न करो, मैं उन्हें बुलवाती हूं। सुमन-—मै अब उसका मुंह नही देखना चाहती। सुभद्रा-—तो क्या ऐसा बिगाड़ हो गया है? सुमन-—हां, अब ऐसा ही है। अब उससें मेरा कोई नाता नही। सुभद्रा ने सोचा, अभी क्रोध में कुछ न सूझेगा, दो-एक रोज में शान्त हो जायगी। बोलो, अच्छा मुंह हाथ तो धो डालो, आंखें चढी हुई है, मालूम होता है, रातभर सोई नही हो। कुछ देर सो लो, फिर बातें होंगी। सुमन-—आराम से सोना ही लिखा होता तो क्या ऐसे कुपात्र से पाला पड़ता। अब तो तुम्हारी शरण आई हूं। शरण दोगी तो रहेंगी, नही कहीं मुंह में कालिग लगाकर डूब मरूँगी। मुझे एक कोने मे थोडी़-सी जगह दे दो, वही पड़ी रहूँगी। अपने से जो कुछ हो सकेगा तुम्हारी सेवा-टहल कर दिया करुँगी। जब पडितजी भीतर आये तो सुभद्रा ने सारी कथा उनसे कही। पंडितजी बडी चिन्ता में पड़े। एक अपरिचित स्त्री को उसके पति से पूछे बिना अपने घर मे रखना अनुचित मालूम हुआ। निश्चय किया कि चलकर गजाधर को बुलवाऊँ और समझाकर उसका क्रोध शान्त कर दूँ। इस स्त्री का यहाँ से चला जाना ही अच्छा है। उन्होंने बाहर आकर तुरन्त गजाधर के बुलाने को आदमी भेजा, लेकिन वह घर पर न मिला। कचहरी से आकर पण्डितजी ने फिर गजाधर को बुलवाया, लेकिन फिर वही हाल हुआ। उधर गजाधर को ज्योही मालूम हुआ कि सुमन पद्मसिंह के घर गई है, उसका सन्देह पूरा हो गया। वह घूम-घूमकर शर्माजी को बदनाम करने लगा। पहले विट्दाठलदास के पास गया। उन्होने उसकी कथा को वेद-वाक्य समझा। यह देश का सेवक और सामाजिक अत्याचारों का शत्रु-उदारता और अनुदारता का विलक्षण संयोग था, उसके विश्वासी हृदय में सारे जगत् के प्रति सहानुभूति थी, किन्तु अपने वादी के प्रति लेशमात्र भी सहानुभूति न थी। वैमनस्यमें अन्ध-विश्वास की चेष्टा होती है। जबसे पद्मसिंह लने मुजरे का प्रस्ताव किया था विट्ठलदास को उनसे द्वेष हो गया था। वे यह समाचार सुनते ही फूले न समाये। शर्माजी के मित्र और सहयोगियो के। पास जा-जाकर इसकी सूचना दे आये। लोगो से कहते, देखा आपने! मैं कहता न था कि यह जलसा अवश्य रंग लायेगा। एक ब्राह्मणी को उसके घर से निकालकर अपने घर मे रख लिया। बेचारा पति चारों ओर रोता फिरता है। यह है उच्च शिक्षा का आदर्श! में तो ब्राह्मणी को उसके यहाँ देखते ही भाँप गया था कि दाल में कुछ काला है। लेकिन यह न समझता था कि अन्दर ही अन्दर यह खिचड़ी पक रही है। आश्चर्य तो यह था कि जो लोग शर्माजी स्वभाव से भली भाति परिचित थे उन्होंने भी इस पर विश्वास कर लिया। दूसरे दिन प्रातकाल जीतन किसी काम से बाजार गया। चारों तरफ यही चर्चा सुनी। दूकानदार पूछते थे, क्यों जीतन नयी मालकिन के क्या रंग-ढंग है? जीतन यह आलोचनापूर्ण बाते सुनकर घबराया हुआ घर आया और बोला, भैया, बहूजी ने जो गजाधर की दुलहिन को घर ठहरा लिया है, इस पर बाजार मे बडी़ बदनामी हो रही है। ऐसा मालूम होता है कि यह गजाधर से लड़कर आई है। वकील साहब ने यह हाल सुना तो सन्नाटे में आ गये। कचहरी जाने के लिए अचकन पहन रहे थे, एक हाथ आस्तीन मे था, दूसरा बाहर। कपड़े पहनने की भी सुधि न रही। उन्हे जिस बात का भय था वह हो ही गई। अब उन्हे गजाधर की लापरवाही का मर्म ज्ञात हुआ। मूर्तिवत् खडे़ सोचते रहे कि क्या करूँ? इसके सिवा और कौन-सा उपाय है कि घर से निकाल दूँ। उस पर जो बीतनो हो बीते, मेरा क्या वश है? किसी तरह बदनामी से तो बचुँ। सुभद्रा पर जी मे झुझलाये। इसे क्या पड़ी थी कि उसे अपने घर में ठहराया। मुझ से पूछताछ नही। उसे तो घर में रहना है, दूसरों के सामने आँखे तो मेरी नीची होगी। मगर यहाँ से निकाल दूँगा तो बेचारी जायगी कहाँ? यहाँ तो उसका कोई ठिकाना नही मालूम होता। गजाधर अब उसे शायद अपने घर में रखेगा, आज दूसर दिन है, उसने खबर तक नही ली। इससे तो यह विदित होता है कि उसने उसे छोड़ने का निश्चय कर लिया। दिल में मुझे दयाहीन और क्रूर समझेगी। लेकिन बदनामी से बचने का यही एकमात्र उपाय है। इसके सिवा और कुछ नही हो सकता। यह विवेचना करके वह जीतन से बोले, तुमने अबतक मुझ से क्यों न कहा? जीतन--सरकार मुझे आज ही तो मालूम हुआ है, नही तो जान लो भैया, मैं बिना कहे नहीं रहता। शर्म्मा जी—अच्छा तो घर मे जाओ और सुमन से कहो कि तुम्हारे यहाँ रहन से उनकी बदनामी हो रही है। जिस तरह बन पड़े आज ही यहाँ से चली जाय। जरा आदमी की तरह बोलना, लाठी मत मारना। खूब समझाकर कहना कि उनका कोई वश नही है। जीतन बहुत प्रसन्न हुआ। उसे सुमन से बड़ी चिढ़ थी, जो नौकरों को उन छोटे मनुष्यों से होती है, जो उनके स्वामी के मुंह लगे होते है। सुमन की चाल उसे अच्छी नही लगती थी। बुड्ढे लोग साधारण बनाव-सिंगार को भी सन्देह की दृष्टि से देखते है। वह गँवार था। काले को काला कहता था, उजले को उजला, काले को उजला कहने का ढंग उसे न आता था। यद्यपि शर्म्माजी ने समझा दिया था कि सावधानी से बातचीत करना, किन्तु उसने जाते-ही जाते सुमन का नाम लेकर जोर से पुकारा। सुमन शर्म्माजी के लिए पान लगा रही थी। जीतन की आवाज सुनकर चौक पडी़ और कातर नेत्रो से उसकी ओर ताकने लगी। जीतन ने कहा, ताकती क्या हो, वकील साहब का हुक्म है कि आज ही यहाँ से चली जाओ। सारे देशभर में बदनाम कर दिया। तुमको लाज नही है, उनको तो नाम की लाज है। बाँड़ा आप गये चार हाथ की पगहिया भी लेते गये। सुभद्रा के कान में भी भनक पडी़। आकर बोली, क्या है जीतन? क्या कह रहे हो? जीतन--कुछ नही, सरकार का हुक्म है कि यह अभी यहां से चली जायें। देशभर से बदनामी हो रही है। सुभद्रा--तुम जाकर जरा उन्ही को यहां भेज दो। सुमन की आंखो मे आँसू भरे थे। खड़ी होकर बोली, नही बहूजी। उन्हें क्यों बुलाती हो? कोई किसी के घर में जबर्दस्ती थोड़े ही रहता है, मैं अभी चली जाती हूं। अब इस चौखट के भीतर फिर पाँव न रखूँगी। विपत्ति मे हमारी मनोवृत्तियाँ बडी प्रबल हो जाती है। उस समय बेमुरौवती घोर अन्याय प्रतीत होती है और सहानुभूति असीम कृपा। सुमन को शर्म्माजी से ऐसी आशा न थी। उस स्वाधीनता के साथ जो आपत्तिकाल मे हृदय पर अधिकार पा जाती है उसने शर्म्माजी को दुरात्मा, भीरु, दयाशून्य तथा नीच ठहराया। तुम आज अपनी बदनामी को डरते हो, तुम को इज्जत बड़ी प्यारी है! अभी कल एक वेश्या के साथ बैठे हुए फूले न समाते थे उसके पैरों तले आँख बिछाते थे, तब इज्जत न जाती थी! आज तुम्हारी इज्जत में बट्टा लगा जाता है! उसने सावधानी से सन्दूकची उठा ली और सुभद्रा को प्रणाम करके घर से चली गई। ११ दरवाजे पर आकर सुमन सोचने लगी कि अब कहाँ जाऊँ। गजाधर की निर्दयता से भी उसे इतना दु:ख न हुआ था जितना इस समय हो रहा था। उसे अब मालूम हुआ कि मैंंने अपने घर से निकलकर बडी़ भूल की। मैं सुमद्रा के बल पर कूद रही थी। मैं इन पण्डितजी को कितना भला आदमी समझती थी। पर अब यह मालूम हुआ कि यह भी रँगे हुए सियार है। अपने घर के सिवा अब मेरा कही ठिकाना नही है। मुझे दूसरो की चिरोरी करने की जरूरत ही क्या? क्या मेरा घर नही था? क्या मैं इनके घर जन्म काटने आई थी। दो-चार दिन में जब उनका क्रोध शान्त हो जाता, आप ही चली जाती। ओह! नारायण! क्रोध में बुद्धि कैसे भ्रष्ट हो जाती है। मुझे इनके घर में भूलकर भी न आना चाहिए था, मैंने अपने पाँव में आपही कुल्हाड़ी मारी। वह अपने मन मे न जाने क्या समझते होंगे। यह सोचते हुए सुमन आगे चली, पर थोड़ी ही दूर चलकर उसके विचारो ने फिर पलटा खाया। मैं कहाँँ जा रही हूँ? वह अब मुझे कदापि घर में न घुसने देगे। मैने कितनी विनती की, पर उन्होंने एक न सुनी। जब केवल रात दों घण्टे की देर हो जाने से उन्हें इतना सन्देह हो गया तो अब मुझे पूरे चौबीस घण्टे हो चुके है और में शामत की मारी वही आई जहाँँ मुझे न आना चाहिए था। वह तो अब मुझे दूर ही से दुत्कार देंगे। यह दुत्कार क्यों सहूँ? मुझे कही रहने का स्थान चाहिए। खाने भर को किसी-न-किसी तरह कमा लूंगी। कंपडे भी सीऊंगी तो खाने भर को मिल जायगा, फिर किसी की धौस क्यो सहूँ? इनके यहाँ मुझे कौन-सा सुख था? व्यर्थ मे एक बेडी पैरों में पड़ी हुई थी और लोक-लाज से वह मुझे रख भी ले तो उठते-बैठते ताने दिया करेगे। बस चलकर एक मकान ठीक कर लू, भोली क्या मेरे साथ इतना भी सलूक न करेगी? वह मुझे अपने घर बार-बार बुलाती थी, क्या इतनी दया भी न करेगी? अमोला चली जाऊँ तो कैसा हो? लेकिन वहाँ कौन अपना बैठा हुआ है। अम्मां मर गई। शान्ता है, उसीका निर्वाह होना कठिन है, मुझे कौन पूछने वाला है। मामी जीने न देंगी। छेद-छेदकर मार डालेगी। चलू भोली से कहूँ, देखू क्या कहती है। कुछ न हुआ तो गंगा तो कही नही गयी है? यह निश्चय करके सुमन भोली के घर चली। इधर-उधर ताकती जाती थी कि कही गजाधर न आता हो। भोली के द्वारपर पहुँचकर सुमन ने सोचा, इसके यहाँ क्यो जाऊँ? किसी पड़ोसिन के घर जाने से काम न चलेगा? इतने मे भोली ने उसे देखा ओर इशारे से ऊपर बुलाया। सुमन ऊपर चली गई। भोली का कमरा देखकर सुमन की आंखें खुल गई। एक बार वह पहले भी गई थी, लेकिन नीचे के आंगन से ही लौट गई थी। कमरा फर्श, मसनद, चित्रो और शीशे के सामानो से सजा हुआ था। एक छोटी सी चौकीपर चाँदी का पानदान रक्ख हुआ था। दूसरी चौकीपर चाँदी की एक तश्तरी और चाँदी का एक ग्लास रखा हुआ था। सुमन यह सामान देखकर दंग रह गई। भोली ने पूछा आज यह सन्दूकची लिए इधर कहाँ से आ रही थी? सुमन-यह रामकहानी फिर कहूँगी, इस समय तुम मेरे ऊपर इतनी कृपा करो कि मेरे लिए कही अलग एक छोटा-सा मकान ठीक करा दो। मैं उसमे रहना चाहती हूँ। भोली ने विस्मित होकर कहा, यह क्यो, शौहर से लडा़ई हो गई है? सुमन--नही, लडा़ई की क्या बात है? अपना जी ही तो है। भोली-जरा मेरे सामने तो ताको। हाँँ, चेहरा साफ कह रही है। क्या बात हुई? सुमन--सच कहती हूँ कोई बात नही है। अगर अपने रहने से किसी को कोई तकलीफ हो तो क्यों रहे। भोली-अरे तो मुझ से साफ-साफ कहती क्यों नही, किस बातपर बिगड़े है? सुमन--बिगड़ने की बात नही है। जब बिगड़ ही गये तो क्या रह गया? भोली--तुम लाख छिपाओ मैं ताड़ गई सुमन, बुरा न मानो तो कह दूँ। मैं जानती थी कि कभी-न-कभी तुमसे खटकेगी जरूर। एक गाडी़ में कहीं अरबी घोडी़ और लद्द टटटू जुत सकते है? तुम्हें तो किसी बड़े घर की रानी बनना चाहिए था। मगर पाले पडी़ एक खूसट के, जो तुम्हारा पैर धोने लायक भी नहीं। तुम्हीं हो कि यों निबाह रही हो, दूसरी होती तो ऐसे मियाँपर लात मारकर कभी की चली गई होती। अगर अल्लाहताला ने तुम्हारी शक्ल सूरत मुझे दी होती तो मैंंने अब तक सोने की दीवार ख़डी कर ली होती, मगर मालूम नहीं, तुम्हारी तबीयत कैसी है। तुमने शायद अच्छी तालीम नही पाई। सुमन--मैं दो साल तक एक ईसाई लेडी से पढ़ चुकी हूँँ। भोली--दो तीन साल की ओर कसर रह गई। इतने दिन और पढ़ लेती तो फिर यह ताक न लगी रहती। मालूम हो जाता कि हमारी जिन्दगी का क्या मकसद है, हमें जिन्दगी का लुत्फ कैसे उठाना चाहिए। हम कोई भेड़ बकरी तो है नहीं कि माँ-बाप जिसके गले मढ़ दें बस उसी की हो रहे। अगर अल्लाह को मंजूर होता कि तुम मुसीबतें झेलो तो तुम्हें परियों की सूरत क्यों देता? यह बेहूदा रिवाज यहीं के लोगो में है कि औरत को इतना जलील समझते है, नहीं तो और सब मुल्कों में औरतें आजाद है अपनी पसन्द से शादी करती है और जब उससे रास नही आती तो तलाक दे देती है। लेकिन हम सब वही पुरानी लकीर पीटे चली जा रही है। सुमन ने सोचकर कहा, क्या करूँ बहन, लोकलाज का डर है, नही तो आराम से रहना किसे बुरा मालूम होता है? भोली--यह सब उसी जिहालत का नतीजा है। मेरे माँ-बाप ने भी मुझे एक बड़े मियाँँ के गले बाँध दिया था। उसके यहाँँ दौलत थी और सब तरह का आराम था, लेकिन उसकी सूरत से मुझे नफरत थी। मैंने किसी तरह छः महीने तो काटे, आखिर निकल खडी़ हुई। जिन्दगी जैसी निआमत रो-रोकर दिन काटने के लिए नहीं दी गई है। जिन्दगी का कुछ मजा ही न मिला तो उससे फायदा ही क्या? पहले मुझे भी डर लगता था कि बड़ी बदनामी होगी, लोग मुझे जलील समझगे, लेकिन घर से निकलने की देर थी, फिर तो मेरा वह रंग जमा कि अच्छे-अच्छे खुशामद करने लगे। गाना मैने घर पर ही सीखा था, कुछ और सीख लिया, बस सारे शहर में धूम मच गई। आज यहाँ कौन रईस, कौन महाजन, कौन मौलवी, कौन पंडित ऐसा है जो मेरे तलुवे सहलाने में अपनी इज्जत न समझे? मन्दिर में, ठाकुर द्वारे में मेरे मुजरे होते है। लोग मिन्नते करके ले जाते है। इसे मैं अपनी बेइज्जती कैसे समझू? अभी एक आदमी भेज दू तो तुम्हारे कृष्णमन्दिर के महन्तजी दौड़े चले आवें। अगर कोई इसे बेइज्जती समझे तो समझा करे। सुमन--भला यह गाना कितने दिन में आ जायगा? भोली--तुम्हे छ: महीन मे आ जायगा! यहाँ गाने को कौन पूछता है, ध्रुपद और तिल्लाने की जरूरत ही नहीं। बस चलती हुई गजलों की धूम है, दो-चार ठुमरियाँ और कुछ थियेटर के गाने आ जायें और बस फिर तुम्ही तुम हो। यहाँ तो अच्छी सूरत और मजेदार बाते चाहिये, सो खुदा ने यह दोनों बात तुममे कूट-कूटकर भर दी है। मैं कसम खाकर कहती हूँ सुमन, तुम एक बार इस लोहे की जंजीर को तोड़ दो, फिर देखो लोग कैसे दीवानो की तरह दौड़ते है। सुमन ने चिन्तित भाव से कहा, यही बुरा मालूम होता है कि.... भोली--हाँ हाँ कहो, यही कहना चाहती हो न कि ऐरे गैरे सब से बेशरमी करनी पड़ती है। शुरू में मुझे भी यही झिझक होती थी। मगर बाद को मालूम हुआ कि यह खयाल ही खयाल है। यहाँ ऐरे गैरो के आने की हिम्मत ही नही होती। यहाँ तो सिर्फ रईस लोग आते है। बस, उन्हें फंसाये रखना चाहिए। अगर शरीफ है तब तो तबीयत आप ही आप उससे मिल जाती है और बेशरमी का ध्यान भी नही होता, लेकिन अगर उससे अपनी तवीयत न मिले तो उसे बातो से लगाये रहो, जहाँ तक उसे नोचते-खसोटते बने, नोचे-खसोटो। आखिर को वह परेशान होकर खुद ही चला जायगा। उसके दूसरे भोई और आ फँसेगे। फिर पहले पहल तो झिझक होती ही है, क्या शोहर से नही होतो? जिस तरह धीरे-धीरे उसके साथ झिझक दूर होती जाती है, उसी तरह यहाँ होता है। सुमन ने मुस्कराकर कहा, तुम मेरे लिए एक मकान तो ठीक कर दो। भोली ने ताड़ लिया कि मछली चारा कुतरने लगी, अब शिस्त को कड़ा करने की जरूरत है। बोली, तुम्हारे लिये यही घर हाजिर है। आराम से रहो। सुमन—तुम्हारे साथ न रहूंगी। भोली--बदनाम हो जाओगी क्यो? सुमन--(झेंपकर) नहीं, यह बात नही है। भोली--खानदान की नाक कट जायगी? सुमन--तुम तो हंसी उडा़ती हो। भोली—-फिर क्या, पंडित गजाधर प्रसाद पाँडे नाराज हो जायेंगे? सुमन—-अब में तुमसे क्या कहूँ? सुमन के पास यद्यपि भोली का जवाब देने के लिए कोई दलील न थी, भोली ने उसकी शंकाओं का मजाक उडा़कर उन्हें पहले से ही निर्बल कर दिया था, यद्यपि अघर्म और दुराचार से मनुष्य को जो स्वाभाविक घृणा होती है वह उसके हृदय को डावाँडोल कर रही थी। वह इस समय कालिख मुंह मे लग ही गयी। अब चाहे सिर पर जो कुछ पड़े मगर उस घर मे न जाऊंगी। यह कहते-कहते सुमन की आंखें भर आई। भोली ने दिलासा देकर कहा, अच्छा पहले हाथ-मुंह धो डालो, कुछ नाश्ता कर लो, फिर सलाह होगी। मालूम होता है कि तुम्हें रातभर नींद नही आई। सुमन—यहाँ पानी मिल जायगा? भोली ने मुस्कराकर कहा, सब इन्तजाम हो जायगा। मेरा कहार हिन्दु है। यहाँ कितने ही हिन्दु आया करते है। उनके लिए एक हिन्दु कहार रख लिया है। भोली की बूढी मामा सुमन को गुसलखाने मे ले गई। वहाँ उसने साबुनसे स्नान किया। तब मामा ने उसके बाल गूथे। एक नई रेशमी साडी़ पहिनने के लिए लाई। सुमन जब ऊपर आई और भोली ने उसे देखा तो मुस्कुराकर बोली, जरा जाकर आईने मे मुँह देख लो। सुमन शीशे के सामने गई। उसे मालूम हुआ कि सौन्दर्य की मूर्ति सामने खडी़ है। सुमन अपने को कभी इतना सुन्दर न समझती थी। लज्जायुक्त अभिमान से मुख-कमल खिल उठा और आँखों में नशा छा गया। वह एक कोच पर लेट गई। भोलो ने अपनी मामा से कहा-—क्यो जहूरन, अब तो सेठजी आ जायगे पंजेमे? जहूरन बोली, तलुवे सुहलायेगे--तलुवे। थोडे़ देर में कहार मिठाइयाँ लाया। सुमन ने जलपान किया, पान खाया और फिर आइने के सामने खडी़ हो गई। उसने अपने मन में कहा, यह सुख छोड़कर उस अन्धेरी कोठरी में क्यो रहूँ? भोली ने पूछा, गजाधर शायद मुझसे तुम्हारे बारे में कुछ पूछे तो क्या कह दूँगी? सुमन ने कहा, कहला देना कि यहाँ नही है। भोली का मनोरथ पूरा हो गया। उसे निश्चय हो गया कि सेठ बलभद्रदास जो अब तक मुझसे कन्नी काटते फिरते थे, इस लावण्यमयी सुन्दरी पर भ्रमर की भाति मडलायेगे। सुमन की दशा उस लोभी डाक्टर की सी थी जो अपने किसी रोगी मित्र को देखने जाता है और फीस के रुपये अपने हाथो से नही लेता। संकोचवश कहता है, इसकी क्या जरूरत है लेकिन जब रुपये उसकी जेब में डाल दिये जाते है तो हर्ष से मुस्कुराता हुआ घर की राह लेता है। १२ पद्मसिंह के एक बड़े भाई मदनसिह थे। वह घर का कामकाज देखते थे। थोडी़ सी जमीदारी थी, कुछ लेन-देन करते थे। उनके एक ही लड़का था, जिसका नाम सदनसिंह था। स्त्री का नाम भामा था। माँ-बाप का एकलौता लड़का बड़ा भाग्यशाली होता है। उसे मीठे पदार्थ खूब खाने को मिलते है, किन्तु कड़वी ताड़ना कभी नही मिलती। सदन बाल्यकाल मे ढोठ, हठी और लड़ाका था। वयस्क होने पर वह आलसी, क्रोधी और बड़ा उद्दड हो गया। मॉ-बाप को यह सब मंजूर था। वह चाहे कितना ही बिगड़ जाय पर आँख के सामने से न टले। उससे एक दिन का विछोह भी न सह सकते थे। पद्मसिंह ने कितनी ही बार अनुरोध किया कि इसे मेरे साथ जाने दीजिये, मैं इसका नाम किसी अंग्रेजी मदरसे में लिखा दूँगा, किन्तु माँ-बाप ने कभी स्वीकार नही किया। सदन ने अपने कस्बेही के मदरसे में उर्दू और हिन्दी पढ़ी थी। भामा के विचार मे उसे इससे अधिक विद्या की जरूरत ही नही थी। घर मे खाने को बहुत है, वन-वन की पत्ती कौन तोड़वाये? बला से न पढ़ेगा, आंखो से देखते तो रहेगे। सदन अपने चाचा के साथ जाने के लिए बहुत उत्सुक रहता था। उनके साबुन, तोलिये, जूते, स्लीपर, घड़ी और कालर को देखकर उसका जी बहुत लहराता। घर मे सब कुछ था; पर यह फैशन की सामग्रियाँ कहाँ? उसका जी चाहता, मै भी चचा की तरह कपडो़ से सुसज्जित होकर टमटमपर हवा खाने निकलूँ। वह अपने चचा का बड़ा सम्मान करता था। उनकी कोई बात न टालता। माँ-बाप की बातो पर कान न धरता, प्राय: सम्मुख विवाद करता। लेकिन चचा के सामने वह शराफत का पुतला बन जाता था। उनके ठाट-बाट ने उसे वशीभूत कर लिया था। पद्मसिंह घर आते तो सदन के लिए अच्छे-अच्छे कपडे़ जूते लाते। सदन इन चीजो पर लहालोट हो जाता। होली के दिन पद्मसिंह अवश्य घर आया करते थे। अबकी भी एक सप्ताह पहले उनका पत्र आया था कि हम आवेंगे। सदन रेशमी अचकन और वारनिशदार जूतो के स्वप्न देख रहा था। होली के एक दिन पहले मदनसिंह ने स्टेशन पर पालकी भेजी। प्रातकाल भी; सन्ध्या भी। दूसरे दिन भी दोनो जून सवारी गई, लेकिन वहाँ तो भोली बाई के मुजरे की ठहर चुकी थो, घर कौन आता। यह पहली ही होली थी कि पद्मसिंह घर नही आये। भामा रोने लगी। सदन के नैराश्य की तो कोई सीमा ही न थी, न कपड़े, न लत्ते, होलो कैसे खेले! मदनसिह भी मन मारे बैठे थे, एक उदासी सी छाई हुई थी। गाँव की रमणियाँ होली खेलने आई। भामा को उदास देखकर तसल्ली देने लगी, बहन, पराया कभी अपना नही होता। वहाँ दोनों जने शहर की वहार देखते होगे, गाँव में क्या करने आते। गाना बजाना हुआ, पर भामा का मन न लगा। मदनसिंह होली के दिन खूब भांग पिया करते थे। आज भांग छूई तक नही। सदन सारे दिन नंगे बदन मुंह लटकाये बैठा था। सन्ध्या को जाकर माँ से बोला, मै चचा के पास जाऊंगा। भामा—वहाँ तेरा कौन बैठा हुआ है? सदन—क्यो, चचा है नही? भामा—अब वह चचा नही है। वहाँ कोई तुम्हारी बात भी न पूछेगा। सदन--मै तो जाऊंगा। भामा—एक बार कह दिया मुझे दिक मत करो, वहाँ जाने को मैं न कहूँगी । ज्यों ज्यों भामा मना करती थी सदन जिद पकड़ता था। अन्त में वह झुझलाकर वहाँ से उठ गई। सदन भी बाहर चला आया। जिद सामने को चोट नही सह सकती, उस पर बगली वार करना चाहिए। सदन ने मन मे निश्चय किया कि चचा के पास भाग चलना चाहिए। न जाऊँ तो यह लोग कौन मुझे रेशमी अचकन बनवा देंगे। बहुत प्रसन्न होंगे तो एक नैनसुख का कुरता सिलवा देगे। एक मोहनमाला बनवाया है तो जानते होंगे जग जीत लिया। एक जोशन बनवाया है तो सारे गॉव में दिखाते फिरते है। मानो मैं जोशन पहनकर बैठूंगा। मैं तो जाऊँगा, देखूँ कौन रोकता है? यह निश्चय करके वह अवसर ढूँढ़ने लगा। रात को जब सब लोग सो गये तो चुपके से उठकर घर से निकल खड़ा हुआ। स्टेशन वहॉ से तीन मील के लगभग था। चोथ का चाँद डूब चुका था, अँधेरा छाया हुआ था। गाँव के निकास पर बाँस की एक कोठी थी। सदन वहाँ पहुँचा तो कुछ चूँचूँ सी आवाज सुनाई दी। उसका कलेजा सन्न हो गया। लेकिन शीघ्र ही मालूम हो गया कि बाँस आपस मे रगड़ खा रहे है। जरा और आगे एक आम का पेड़ था। बहुत दिन हुए इसपर से एक कुर्मी का लड़का गिरकर मर गया था। सदन यहाँ पहुँचा तो उसे शंका हुई जैसे कोई खड़ा है। उसके रोगटे खड़े हो गये, सिर में चक्कर-सा आने लगा। लेकिन मन को सम्भाल कर जरा ध्यान से देखा तो कुछ न था। लपककर आगे बढ़ा। गाँव से बाहर निकल गया। गाँव से दो मीलपर पीपल का एक वृक्ष था। यह जनश्रुति थी कि वहाँ भूतों का अड्डा है। सबके सब उसी वृक्ष पर रहते है। एक कमली वाला भूत उनका सरदार है। वह मुसाफिरो के सामने काली कमली ओढे खडाऊँ पहने आता है और हाथ फैलाकर कुछ माँगता है। मुसाफिर ज्योही देने लिए हाथ बढ़ाता है, वह अदृश्य हो जाता है। मालूम नही, क्रीड़ा से उसका क्या प्रयोजन था! रात को कोई मनुष्य उस रास्ते से अकेले न आता और जो कोई साहस करके चला जाता, वह कोई-न-कोई अलोकिक बात अवश्य देखता। कोई कहता गाना हो रहा था, कोई कहता पञ्वायत बैठी हुई थी। सदन की अब यही एक शंका और थी। वह पहले से हृदय के स्थिर किये हुए था, लेकिन ज्यो-ज्यों वह स्थान समीप आता जाता था, उसका हिसाब बर्फ के समान पिघलता जाता था। जब एक फलग्डि शेष रह गया तो उसके पग न उठे। वह जमीनपर बैठ गया और सोचने लगा कि क्या करूँ। चारों ओर देखा कही कोई मनुष्य न दिखाई दिया। यदि कोई पशु ही नजर आाता तो उसे धैर्य हो जाता। अब घंटे तक वह किसी आने-जानेवाले की राह देखता रहा, पर देहात का रास्ता रात को नही चलता। उसने सोचा, कब तक बैठा रहूँगा, एक बजे रेल आती है, देर हो जायगी तो सारा खेल ही बिगड़ जायगा। अतएव वह हृदय में बल का संचार करके उठा और रामायण की चौपाइयाँ उच्च स्वर से गाता हुआ चला। भूत-प्रेत के विचार को किसी बहान से दूर रखना चाहता था। किन्तु ऐसे अवसरों पर, गर्मी की मक्खियो की भाँति विचार टालने से नही टलता। हटा दो, फिर आ पहुँचा थे। निदान वह सघन वृक्ष सामने दिखाई देने लगा। सदन ने उसकी ओर ध्यान से देखा। रात अधिक जा चुकी थी, तारों का प्रकाश भूमिपर पड़ रहा था। सदन को वहाँ कोई वस्तु न दिखाई दी, उसनें और भी ऊँचे स्वर में गाना शुरू किया। इस समय उसका एक-एक रोम सजग हो रहा था। कभी इधर ताकता, कभी उधर, नाना प्रकार के जीव दिखाई देते, किन्तु ध्यान से देखते ही लुप्त हो जाते। अकस्मात्उ से मालूम हुआ कि दाहिनी ओर कोई बन्दर बैठा हुआ है। कलेजा सन्न हो गया। किन्तु क्षणमात्र में बन्दर मिट्टी का ढेर बन गया। जिस समय सदन वृक्ष के नीचे पहुँचा, उसका गला थरथाराने लगा, मुँह से आवाज न निकली। अब विचार को बढाने की आावश्यकता भी न थी, मन और बुध्दि की सभी शक्तियों का संचय परमावश्यक था। अकस्मात् उसे कोई वस्तु दौड़ती नजर आई। वह उछल पड़ा, ध्यान से देखा तो कुत्ता था। किन्तु वह सुन चुका था कि भूत कभी कभी कुत्तों के रूप में भी आया करते है। शंका और भी प्रचंड हुई, सावधान होकर खड़ा हो गया, जैसे कोई वीर पुरुष शत्रु के वार की प्रतीक्षा करता है। कुत्ता सिर झुकाए चुपचाप कतराकर निकल गया। सदन ने जोरसे डाँटा, धत्। कुत्ता दुम दबाकर भागा। सदन कई पग उसके पीछे दौड़ा। भयकी चरम सीमा ही साहस है। सदन को विश्वास हो गया, कुत्ता था, भूत होता तो अवश्य कोई न कोई लीला करता। भय कम हुआ, किन्तु वह वहां से भागा नहीं। वह अपने भीरु हृदय को लज्जित करने के लिए कई मिनट तक पीपलके नीचे खड़ा रहा। इतना ही नहीं उसने पीपलकी परिक्रमा की और उसे दोनों हाथो से बलपूर्वक हिलाने की चेष्टा की। यह विचित्र साहस था। ऊपर पत्थर, नीचे पानी, एक जरा-सी आवाज, एक जरा-सी पत्तीकी खड़कन उसके जीवन का निपटारा कर सकती थी। इस परीक्षा से निकलकर सदन अभिमानसे सिर उठाए आगे बढ़ा। १३ सुमन के चले जानेके बाद पद्मसिंहके हृदयमें एक आत्मग्लानि उत्पन्न हुई। मैंने अच्छा नही किया। न मालूम वह कहाँ गई। अपने घर चली गई हो तो पूछना ही क्या, किन्तु वहाँ वह कदापि न गई होगी। मरता क्या न करता, कही कुली डिपो वालो के जालमे फंस गई तो फिर छूटना मुश्किल है। यह दुष्ट ऐसे ही अवसर पर अपना बाण चलाते है, कौन जाने कही उनसे भी घोर तर दुष्टाचारियों के हाथ में न पड़ जाय। साहसी पुरुष को कोई सहारा नही होता तो वह चोरी करता है, कायर पुरुषको कोई सहारा नही होता तो वह भीख माँगता है, लेकिन स्त्रीको कोई सहारा नही होता तो वह लज्जाहीन हो जाती है। युवती का घर से निकलना मुँह से बात का निकलना है। मुझसे वही भूल हुई, अब इस मर्यादा पालन से काम न चलेगा। वह डूब रही होगी, उसे बचाना चाहिए। वह गजाधर के घर जाने के लिए कपड़े पहनने लगे। तैयार होकर घर से निकले। किन्तु यह सशय लगा हुआ था कि कोई मुझे उसके दरवाजेपर देख न ले। मालूम नहीं, गजाधर अपने मन मे क्या समझे। कही उलझ पड़ा तो मुश्किल होगी। घर से बाहर निकल चुके थे, लौट पड़े और कपड़े उतार दिये। शर्माजी को ऐसा जान पड़ा मानो किसी ने लोहे की छड़ लाल करके उनके हृदय मे चुभा दी। माथे पर पसीना आ गया। वह सामने से तलवार का वार रोक सकते थे, किन्तु पीछे से सूई की नोक भी उनकी सहन-शक्ति से बाहर थी। विट्ठलदास उनके परम मित्र थे। शर्माजी उनकी इज्जत करते थे। आपस में बहुधा मतभेद होने पर भी वह उनके पवित्र उद्देश्यो का आदर करते थे। ऐसा व्यक्ति जान-बुझकर जब किसी पर कीचढ फेंके तो इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है कि शुद्ध विचार रखते हुए भी वह क्रूर है। शर्माजी समझ गये कि होली के जल्से के प्रस्ताव से नाराज होकर विट़्ठलदास ने यह आग लगाई है, केवल मेरा अपमान करने के लिए, जनता की दृष्टि में गिराने के लिए मुझ पर यह दोषारोपण किया है। क्रोध से कांपते हुए बोले, तुम उनके मुंह पर कहोगे? गजाधर—हाँ, सांच को क्या आंच? चलिये, अभी मैं उनके सामने कह दूं। मजाल है कि वह इन्कार कर जायें। क्रोध के आवेगमें शर्माजी चलने को प्रस्तुत हो गये। किन्तु इतनी देर में आंधी का वेग कुछ कम हो चला था। संभल गये। इस समय वहाँ जाने से बात बढ़ जायगी, यह सोचकर गजाधर से बोले, अच्छी बात है, जब बुलाऊँ तो चले आना। मगर निश्चिन्त मत बैठो। महाराजिनकी खोज में रहो, समय बुरा है। जो खर्च की जरूरत हो, वह मुझसे लो। यह कहकर शर्माजी घर चले आये। विट्ठलदासकी गुप्त छुरी के आघात ने उन्हें निस्तेज बना दिया था। वह यही समझते थे कि विट्ठलदासने केवल द्वेष के कारण यह षड्यंत्र रचा है। यह विचार शर्माजी के ध्यान में न आया कि सम्भव है, उन्होंने जो कुछ कहा हो वह शुभचिन्ताओ से प्रेरित होकर कहा हो और उसपर विश्वास करते हो। १४ दूसरे दिन पद्मसिंह सदन को साथ लेकर किसी स्कूल में दाखिल कराने चले। किन्तु जहाँ गये साफ जवाब मिला 'स्थान नहीं है'। शहर में बारह पाठशालाएँ थी, लेकिन सदन के लिए कही स्थान न था। शर्माजी ने विवश होकर निश्चय किया कि मै स्वयं पढ़ाऊँगा। प्रातः काल तो मुवक्किल के मारे अवकाश नहीं मिलता। कचहरी से आकर पढ़ाते किन्तु एक ही सप्ताह में हिम्मत हार बैठे। कहाँ कचहरी से आकर पत्र पढ़ते थे, कभी हारमोनियम बजाते, कहाँ अब एक बूढे तोते को रटाना पड़ता था। वह बारम्बार झुझलाते, उन्हें मालूम होता कि सदन मन्दबुद्धि है। यदि वह कोई पढ़ा हुआ शब्द पूछ बैठता तो शर्मा जी झल्ला पड़ते। वह स्थान उलट-पलट कर दिखाते, जहाँ वह शब्द प्रथम आया था। फिर प्रश्न करते और सदन ही से उस शब्दका अर्थ निकलवाते। इस उद्योग में काम कम होता था किन्तु उलझन बहुत थी। सदन भी सामने पुस्तक खोलते हुए डरता। वह पछताता कि कहाँ से कहाँ यहाँ आया, इससे तो गॉव ही अच्छा था। चार पक्तियाँ पढायगे, लेकिन घण्टों बिगड़ेगे। पढ़ा चुकने के बाद शर्माजी कुछ थकसे जाते। सैर करने को भी जी नही चाहता। उन्हें विश्वास हो गया कि इस काम की क्षमता मुझमें नहीं है। मुहल्ले में एक मास्टर साहब रहते थे। उन्होने २०) मासिक पर सदन को पढाना स्वीकार किया। अब यह चिन्ता हुई कि यह रुपये आवें कहाँ से? शर्माजी फैशनेबुल मनुष्य थे, खर्च का पल्ला सदा दबा ही रहता था। फैशन का बोझ अखरता तो अवश्य था, किन्तु उसके सामने कन्धा न डालते थे। बहुत देर तक एकान्त में बेठे सोचते रहे, किन्तु बुद्धि ने कुछ काम न किया, तव सुभद्रा के पास जाकर बोले, मास्टर २०) पर राजी है। सुभद्रा-तो क्या मास्टर ही न मिलते थे? मास्टर तो एक नहीं सौ है, रुपये कहाँ है? शर्मा-रुपये भी ईश्वर कही से देगे ही। सुभद्रा-मै तो कई साल से देख रही हूँ, ईश्वर ने कभी विशेषकृपा नहीं की। बस इतना दे देते है कि पेट की रोटियाँ चल जायँ, वही तो ईश्वर है! अपने हाथों से उस के जूते साफ करने पड़े तब भी मुझे इन्कार न होगा; नहीं तो मुझ जैसा कृतध्न मनुष्य संसार में न होगा। ग्लानि से सुभद्रा का मुखकमल कुम्हला गया। यद्यपि शर्माजी ने वे बातें सच्चे दिल से कही थी, पर उसने समझा कि यह मुझे लज्जित करने के निमित्त कही गई है। सिर नीचा कर बोली, तो मैने यह कब कहा कि सदन के लिए मास्टर न रखा जाय? जो काम करना ही है उसे करा डालिये। जो कुछ होगा देखा जायेगा। जब दादाजी ने आपके लिए इतने कष्ट उठाए है तो यही उचित है कि आप भी सदन के लिए कोई बात उठा न रखे मुझसे जो कुछ करने को कहिए वह करूँ। आपने अबतक कभी इस विषय पर जोर नहीं दिया था, इसलिए मुझे भ्रम हुआ कि यह कोई आवश्यक खर्च नही है। आपको पहले हो दिनसे मास्टरका प्रबन्ध करना चाहिए था। इतने आगे-पीछे का क्या काम था? अबतक तो यह थोड़ा बहुत बढ़ भी चुका होता। इतनी उम्र गंवाने के बाद जब पढ़ने का विचार किया है तो उसका एक दिन भी व्यर्थ न जाना चाहिए। सुभद्रा ने तत्क्षण अपनी लज्जा का बदला ले लिया। पंडितजी को अपनी मूल स्वीकार करनी पड़ी। यदि अपना पुत्र होता तो उन्होंने कदापि इतना सोचविचार न किया होता। सुभद्रा को अपने प्रतिवाद पर खेद हुआ। उसने एक पान बनाकर शर्माजी को दिया। यह मानो सन्धिपत्र था। शर्माजी ने पान ले लिया, सन्धि स्वीकृत हो गई। जब वह चलने लगे तो सुभद्रा ने पूछा, कुछ सुमन का पता चला? शर्माजी-कुछ भी नहीं, न जाने कहाँ गायब हो गई, गजाधर भी नही दिखाई दिया। सुनता हूं। घर-बार छोड़ कर किसी तरफ निकल गया है। दूसरे दिनसे मास्टर साहब सदन को पढ़ाने लगे। नौ बजे वह पढ़ाकर चले जाते तब सदन स्नान भोजन करके सोता। अकेले उसका जी बहुत घबराता, कोई संगी न साथी, न कोई हंसी न दिल्लगी, कैसे जी लगें। हाँ, प्रातःकाल थोडी-सी कसरत कर लिया करता था। इसका उसे व्यसन था। अपने गाँव में उसने एक छोटा-सा अखाड़ा बनवा रखा था। यहाँ अखाडा तो न था, कमरे ही में डंड कर लेता। शाम को शर्माजी उसके लिए फिटिन तैयार करा देते। तब सदन अपना सूट पहनकर गर्व के साथ फिटिन पर सैर करने निकलता। शर्माजी पैदल घूमा करते थे। वे पाक या छावनी की ओर जाते, किन्तु सदन उस तरफ न जाता। वायुसेवन में जो एक प्रकार का दार्शनिक आनन्द होता है उसका उसे क्या ज्ञान! शुद्ध वायु को सुखद शीतलता, हरे भरे मैदानों की विचारोत्पादक निर्जनता और सुरम्य दृश्यों की आनन्दमयी निस्तब्धता उसमे इनके रसास्वादन की योग्यता न थी। उसका यौवनकाल था, जब बनाव-सिंगार का भूत सिरपर सवार रहता है। वह अत्यन्त रूपवान, सुगठित, बलिष्ठ युवक था। देहात में रहा, न पढ़ना, न लिखना, न मास्टर का भय न परीक्षा की चिन्ता, सेरों दूध पीता था। घर की भैसें थीं, घी के लोदे के लोदे उठाकर खा जाता। उसपर कसरत का शौक। शरीर बहुत सुडौल निकल आया था। छाती चौड़ी, गरदन तनी हुई, ऐसा जान पड़ता था, मानो देह में ईगूर भरा हुआ है। उसके चेहरे पर वह गम्भीरता और कोमलता न थी जो शिक्षा और ज्ञान से उत्पन्न होती है। उसके मुखसे वीरता और इण्डता झलकती थी आंखें मतवाली, सतेज और चञ्चल थी। वह वाग का कलमी पौधा नही, वन का सुदृढ वृक्ष था। निर्जन पार्क या मैदान में उसपर किसकी निगाह पड़ती है कौन उसके रूप और यौवन को देखता! इसलिए वह कभी दालमंडी की तरफ जाता, कभी चौक की तरफ! उसके रंगरूप ठाटबाट पर बूढ़े जवान सबकी आंखें उठ जाती। युवक उसे ईर्षा से देखते, बूढ़े स्नेह से। लोग राह चलते चलते उसे एक आँख देखने के लिए ठिठक जाते| दूकानदार समझते कि यह किसी रईसका लडका है। इन दुकानों के ऊपर सौन्दर्य का बाजार था। सदन को देखते ही उस बाजार में एक हलचल मच जाती। वेश्याएँ छज्जों पर आ आकर खड़ी हो जाती और प्रेम कटाक्ष के वाण उसपर चलातीं। देखें यह बहका हुआ कबूतर किस छतरीपर उतरता है? यह सोनेकी चिडिया किस जालमे फंसती है? सदन में वह विवेक तो नही था जो सदाचार की रक्षा करता है। उसमें वह आत्म-सम्मान भी नही था जो आँखो को ऊपर नही उठने देता। उसकी फिटन बाजार में बहुत धीर-धीरे चलती। सदन की आँखे उन्ही रमणियों की ओर लगी रहती। यौवन के पूर्वजाल में हम अपनी कुवासनाओं के प्रदर्शन पर गर्व करते है, उत्तर काल अपने सद्गुणों प्रदर्शन पर। सदन अपने को रसिया दिखाना चाहता था, प्रेम से अधिक बदनामी का आकांक्षी था। इस समय यदि उसका कोई अभिन्न मित्र होता तो सदन उससे अपने कल्पित दुष्प्रेम की विस्तृत कथाएँ वर्णन करता। धीरे-धीरे सदन के चित्त की चंचलता यहाँ तक बढ़ी कि पढ़ना लिखना सब छूट गया। मास्टर आते और पढाकर चले जाते। लेकिन सदन को उनका आाना बहुत बुरा मालूम होता। उसका मन हर घडी बाजार की ओर लगा रहता, वही दृश्य आँखों में फिरा करते, रमणियो के हाव-भाव ओर मृदु मुस्कान के स्मरण में मग्न रहता। इस भाँति दिन काटने के बाद ज्यों ही शाम होती वह बनठन कर दालमंडी की ओर निकल जाता। अन्त में मन को इस कुप्रवृति का बही फल हुआ जो सदैव हुआ करता है तीन ही चार मास में उसका संकोच उड़ गया। फिटिन पर दो आदमी दूतों की तरह उसके सिरपर सवार रहते। इसलिए वह इस वाग के फूलो में हाथ लगाने का साहस न कर सकता था। वह सोचने लगा कि किसी भांति इन दूतों से गला छुडाऊँ। सोचते सोचते उसे एक उपाय सूझ गया। एक दिन उसने शर्माजी से कहा चचा, मुझे एक अच्छा सा घोडा ले दोजिये। फिटिन पर अपाहिजों की तरह बैठे रहना कुछ अच्छा नही मालूम होता। घोडेपर सवार होने से कसरत भी हो जायगी और मुझे सवारी का भी अभ्यास हो जायगा। जिस दिन से सुमन गई थी शर्माजी कुछ चिन्तातुर रहा करते थे। मुवक्किल लोग कहते कि आजकल इन्हें न जाने क्या हो गया है बात बात पर झुझला जाते है। हमारी बात ही न सुनेंगे तो वह क्या करेंगे। जब हमको मेहनताना देना है तो क्या यही एक वकील है? गली-गली तो मारे-मारे फिरते है। इससे शर्माजी की आमदनी दिन प्रतिदिन कम होती जाती थी। यह प्रस्ताव सुनकर चिन्तित स्वर से बोले, अगर इसी घोड़े पर जीन खिंचा लो तो कैसा हो? दो-चार दिन में निकल जायगा। सदन—जी नही, बहुत दुर्बल है, सवारी में न ठहरेगा। कोई चाल भी तो नही, न कदम, न सरपट। कचहरी से थका माँदा आयेगा तो क्या चलेगा? शर्मा—अच्छा, तलाश करूंगा, कोई जानवर मिला तो ले लूँगा। शर्माजी ने चाहा कि इस तरह बात टाल दूँ। मामूली घोड़ा भी ढाई तीन सौ से कम न मिलेगा, उसपर कमसे कम २५) मासिक का खर्च अलग। इस समय वे इतना खर्च उठाने मे समर्थ न थे, किन्तु सदन कब मानने वाला था। नित्यप्रति उनसे तकाजा करता, यहॉ तक कि दिन में कई बेर टोंकने की नौबत पहुँची। शर्माजी उसकी सूरत देखते ही सूख जाते। यदि उससे अपनी आर्थिक दशा साफ-साफ कह देते तो सदन चुप हो जाता, लेकिन अपनी चिन्ताओं की राम कहानी सुनाकर वह उसे कष्टमें नही डालना चाहते थे। सदन ने अपने दोनो साईसोसे कह रक्खा था कि कही घोड़ा बिकाऊ हो तो हमसे कहना। साईसों ने दलाली के लोभसे दत्तचित होकर तलाश की। घोड़ा मिल गया। डिगवी नाम के एक साहब विलायत जा रहे थे। उनका घोड़ा बिकनेवाला था। सदन खुद गया, घोडे को देखा, उसपर सवार हुआ, चाल देखी। मोहित हो गया। शर्माजी से आकर कहा, चलिये घोड़ा देख लीजिये मुझे बहुत पसन्द है। शर्माजी को अब भागने का कोई रास्ता न रहा, जाकर घोड़े को देखा, डिगबी साहब से मिले, दाम पूछे। उन्होने ४००) माँगे, इससे कौड़ी कम नही। अब इतने रुपये कहाँ से आवें। घर में अगर सौ-दो-सौ रुपये थे तो वह सुभद्रा के पास थे और सुभद्रा से इस विषयमे शर्माजी को सहानुभूति की लेशमात्र भी आशा न थी। उपकारी बैंक के मैनेजर बाबू चारुचन्द्र से उनकी मित्रता थी। उनसे उधार लेने का विचार किया लेकिन आज तक शर्माजी को ऋण माँगने का अवसर नही पड़ा था। बार-बार इरादा करते और फिर हिम्मत हार जाते। कही वह इन्कार कर गये तब? इस इन्कार का भीषण भय उन्हें सता रहा था। वह यह बिल्कुल न जानते थे कि लोग कैसे महाजनों पर अपना विश्वास जमा लेते है। कई बार कलम दवात लेकर रुक्का लिखने बैठे, किन्तु लिखें क्या यह न सूझा। इसी बीच में सदन डिगवी साहब यहाँ से घोडा ले आया। जीन साजका मूल्य ५०) और हो गया। दूसरे दिन रुपये चुका देने का वादा हुआ। केवल रातभर की मोहलत थी। प्रातःकाल रुपये देना परमावश्यक था। शर्माजी की-सी हैसियत के आदमी के लिए इतने रुपये का प्रबन्ध करना कोई मुश्किल न था। किन्तु उन्हें चारो ओर अन्धकार दिखाई देता था। उन्हें आज अपनी क्षुद्रता का ज्ञान हुआ। जो मनुष्य कभी पहाड़ पर नही चढ़ा है, उसका सिर एक छोटे से टीले पर भी चक्कर खाने लगता है। इस दुरवस्था में सुभद्रा के सिवा उन्हें कोई अवलम्ब न सूझा। उसने उनकी रोनी मूरत देखी तो पूछा, आज इतने उदास क्यो हो? जी तो अच्छा है? शर्माजीने सिर झुकाकर उत्तर दिया, हाँ, जी तो अच्छा है। सुभद्रा—तो चेहरा क्यों उतरा है? शर्मा— क्या बताऊँ कुछ कहा नही जाता, सदन के मारे हैरान हूँ। कई दिन से घोड़े की रट लगाये हुए था। आज डिगबी साहबके यहाँ से घोड़ा ले आया, साढ़े चार सौ रुपये के मत्थे डाल दिया। सुभद्रा ने विस्मित होकर कहा, अच्छा यह सब हो गया और मुझे खबर ही नहीं। शर्मा—तुमसे कहते हुए डर मालूम होता था। सुभद्रा—डर की कौन बात थी? क्या में सदन की दुश्मन थी जो जलभुन जाती? ... उसके खेलने खाने के क्या और कोई दिन आवेंगे? कौन बड़ा खर्च है, तुम्हें ईश्वर कुशल से रखें, ऐसे चार-पाँच सौ रुपये कहाँ आवेंगे और कहाँ जायेंगे। लड़के का मन तो रह जायगा। उसी भाई का बेटा है जिसने आपको पाल पोसकर आज इस योग्य बनाया। शर्माजी इस व्यंग के लिए तैयार थे। इसीलिए उन्ही ने सदन की शिकायत करके यह बात छोड़ी थी। किन्तु वास्तव में उन्हे सदन का यह व्यसन उतना दुखजनक नही मालूम होता था जितनी अपनी दारुण धनहीनता। सुभद्रा की अनुमति प्राप्त करने के लिए उसके हृदय में पैठना जरूरी था। बोले, चाहे जो कुछ हो, मुझे तो तुमसे कहते हुए डर लगता था। मन की बात कहता हूँ। लडकों का खाना-खेलना सबको अच्छा लगता है, पर घर में पूजी हो तब। दिनभर से इसी फिक्र में पडा हुआ हूँ| कुछ बुद्धि काम नहीं करती। सबेरे डिगवी साहब का आदमी आवेगा उसे क्या उत्तर दूंगा? बीमार भी पड जाता तो एक बहाना मिल जाता। सुभद्रा—तो यह कौन मुश्किल बात है। सवेरे चादर ओढ़कर लेट रहियेगा, मैं कह दूंगी कि आज तबीयत अच्छी नहीं है। शर्माजी हँसी को रोक न सके। इस व्यंग में कितनी निर्दयता कितनी विरक्ति थी। बोले, अच्छा मान लिया कि आदमी कल लौट गया, लेकिन परसों तो डिगवी साहब जानेवाले ही है, कल कोई न कोई फिक्र करनी ही पड़ेगी। सुभद्रा—तो वही फिक्र आज क्यों नही कर डालते। शर्मा—भाई, चिढाओ मत, अगर मेरी बुद्धि काम करती तो तुम्हारी शरण क्यों आता? चुपचाप काम न कर डालता? जब कुछ नहीं बन पड़ा है तब तुम्हारे पास आया हूँ। बताओ क्या करूँ? सुभद्रा—मै क्या बताऊँ? आपने तो वकालत पढ़ी है, मैं तो मिडिल तक भी नहीं पढ़ी, मेरी बुद्धि यहाँ क्या काम देगी? इतना जानती हूँ कि घोड़े का द्वार पर हिनहिनाते सुनकर बैरियों की छाती धड़क जायगी जिस वक्त आप सदन को उसपर बैठे देखेंगे, तो आंखे तृप्त हो जायेंगी। शर्मा—वही तो पूछता हूँ कि यह अभिलाषाएँ कैसे पूरी हों? सुभद्रा—ईश्वर पर भरोसा रखिए, वह कोई-न-कोई जुगुत निकालेगा ही। शर्मा—तुम तो ताने देने लगी। सुभद्रा—इसके सिवा मेरे पास और है ही क्या? अगर आप समझते हों कि मेरे पास रुपये होंगे तो यह आपकी भूल है। मुझे हेर-फेर करना नही आाता सन्दूक की चाबी लीजिये, सौ सवा सौ रुपये पड़े हुए है, निकाल ले जाइये। बाकी के लिए और कोई फिक्र कीजिये। आपके कितने ही मित्र है, क्या दो-चार सौ रुपये का प्रबन्ध नही कर देगे। यद्यपि पद्मसिंह यही उत्तर पाने की आशा रखते थे, पर इसे कानो से सुनकर वह अघोर हो गये। गाँठ जरा भी हलकी न पड़ी। चुपचाप आकाश की ओर ताकने लगे जैसे कोई अथाह जल में बहा जाता हो। सुभद्रा सन्दुक की चाबी देने को तैयार तो थी, लेकिन सन्दूकमें १००) की जगह पूरे ५००) बटुए में रक्खे हुए थे। यह सुभद्रा की दो सालकी कमाई थी। इन रुपयों को देख-देख सुभद्रा फूली न समाती थी। कभी सोचती, अबकी घर चलूँगी तो भाभी के लिए अच्छा सा कगन लेती चलूगी और गाँव की सब कन्याओंके लिए एक-एक साडी। कभी सोचती, यही कोई काम पड़ जाय और शर्माजी रुपये लिए परेशान हो तो मैं चट निकालकर दे दगी। वह कैसे प्रसन्न होगे! चकित हो जायेंगे। साघारणतः युवतियो के हृदय में ऐसे उदार भाव नही उठा करते। वह रुपये जमा करती है अपने गहनो के लिए। लेकिन सुभद्रा बढे घरकी बेटी थी, गहनो से मन भरा हुआ था। उसे रुपयों का जरा भी लोभ न था। हाँ, एक ऐसे अनावश्यक कार्यलिए उन्हें निकालने में कष्ट होता था, पर पण्डितजी की रोनी सूरत देखकर उसे दया आ गई वोली, आपने बैठे-बिठाये यह चिन्ता अपने सिर ली। सीधी-सी तो बात थी। कह देते, भाई अभी रुपये नही है, तब तक किसी तरह काम चलाओ। इस तरह मन बढाना कौन सी अच्छी बात है? आज घोड़े की जिद है, कल मोटरकार की घुन होगी, तब क्या कीजियेगा? माना कि दादाजी ने आपके साथ बड़े अच्छे सलूक किये है, लेकिन सब काम अपनी हैसियत देखकर ही किये जाते है। दादाजी यह सुनकर आपसे खुश न होंगे। यह कहकर वह झमककर उठी और सन्दूक मेंं से रुपयों की पाँच पोटलियाँ निकाल लाई, उन्हें पति के सामने पटक दिया और कहा—यह लीजिये ५००) है, जो चाहे कीजिये। रक्खे रहते तो आप ही के काम आते, पर ले जाइये किसी भाँति आपकी चिन्ता तो मिटे। अब सन्दूक में फूटी कौड़ी भी नहीं है। पण्डिजी ने हकबकाकर रुपयों की ओर कातर, नेत्रों से देखा, पर उनपर टूटे नहीं। मन का बोझ हलका अवश्य हुआ, चेहरे से चित्त की शान्ति झलकने लगी। किन्तु वह उल्लास, वह विह्वलता जिसकी सुभद्रा को आशा थी, दिखाई न दी। एक ही क्षण में वह शान्ति की झलक भी मिट गई। खेद और लज्जा का रंग प्रकट हुआ। इन रुपयों मे हाथ लगाना उन्हें अतीव अनुचित प्रतीत हुआ। सोचने लगे, मालूम नही; सुभद्रा ने किस नियत से यह रुपये बचाये थे, मालूम नही, इनके लिए कौन-कौन से कष्ट सहे थे। सुभद्राने पूछा, सेत का धन पाकर भी प्रसन्न नही हुए? शर्माजी ने अनुग्रहपूर्ण दृष्टि से देखकर कहा, क्या प्रसन्न होऊँ? तुमने नाहक यह रुपये निकाले। मैं जाता हूँ, घोडे को लोटा देता हूँ। यह कह दूँगा 'सितारा, पेशानी' है या और कोई दोष लगा दूँगा। सदन को बुरा लगेगा, इसके लिए क्या करूँ। यदि रुपये देने के पहले सुभद्रा ने यह प्रस्ताव किया होता तो शर्माजी बिगड़ जाते। इसे सज्जनता के विरुद्ध समझते और सुभद्रा को आड़े हाथों लेते, पर इस समय सुभद्रा के आत्मोत्सर्ग ने उन्हें वशीभूत कर लिया था। समस्या यह थी कि घर में सज्जनता दिखावे या बाहर। उन्होने निश्चय किया कि घर में इसकी अधिक आवश्यकता है, किन्तु हम बाहरवालों की दृष्टि में मान मर्यादा बनाये रखनेके लिए घरवालों की कब परवाह करते है? सुभद्रा विस्मित होकर बोली, यह क्या? इतनी जल्दी काया पलट हो गई। जानवर लेकर उसे लौटा दोगे तो क्या बात रह जायगी? यदि डिगबी साहब फेर भी लें तो यह उनके साथ कितना अन्याय है? वह बेचारे विलायत जानेके लिए तैयार बैठे है। उन्हें यह बात कितनी अखरेगी? नहीं, यह छोटी सी बात है, रुपये ले जाइये दे दीजिये, रुपया इन्हीं दिनों लिए जमा किया जाता है। मुझे इनकी कोई जरूरत नही है में सहर्ष दे रही हूं। यदि ऐसा ही है तो मेरे रूपये फेर दीजियेगा, ऋण समझकर लीजिये। बात ही थी, पर जरा बदले हुए रूप में। शर्माजी ने प्रसन्न होकर कहा, हां, इस शर्तपर ले सकता हूँ, मासिक किस्त वाँवकर अदा करूँगा। १५ प्राचीन ऋषियों ने इन्द्रियों का दमन करने के दो साधन बताये हैं-—एक राग दूसरा वैराग। पहला साधन अत्यन्त कठिन और दुस्साध्य है। लेकिन हमारे नागरिक समाज ने अपने मुख्य स्थानों पर मीनाबाजार सजाकर इसी कठिन मार्ग को ग्रहण किया है। उसने गृहस्थों को कीचड़ का कमल बताना चाहा है। जीवनकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न वासनाओं का प्राबल्य रहता है। बचपन मिठाइयों का समय है, बुढ़ापा लोभ का, यौवन प्रेम और लालसाओं का समय है। इस अवस्था में मीनाबाजार की सैर मन में विप्लव मचा देती है। जो सुदृढ हैं, लज्जाशील वा भाव-शून्य वह सँभल जाते है। शेष फिसलते है और गिर पड़ते है। शराब की दुकानों को हम बस्ती से दूर रखने का यत्न करते हैं, जुएखाने में भी हम घृणा करते है, लेकिन वेश्याओं की दुकानों को हम सुसज्जित कोठों पर चौक बाजारी में ठाट से सजाते है। यह पापोत्तेजना नहीं तो और क्या है? बाजार की साधारण वस्तुओं में कितना आकर्षण है! हम उनपर लट्टू हो जाते है और कोई आवश्यकता न होनेपर भी उन्हें ले लेते है। तब वह कौन-सा हृदय है जो रूपराशि जैसे अमूल्य रत्न पर मर न मिटेगा? क्या हम इतना भी नही जानते? विपक्षी कहता है, यह व्यर्थ की शंका है। सहस्रों युवक नित्य शहरों में घूमते रहते है,किन्तु उनमें से विरला ही कोई बिगड़ता है। वह मानव-पतन का प्रत्यक्ष प्रमाण चाहता है। किन्तु उसे मालूम नही कि वायु की भाँति दुर्बलता भी एक अदृश्य वस्तु है, जिसका ज्ञान उसके कर्म से ही हो सकता है। हम इतने निर्लज्ज, इतने साहसरहित क्यों हैंं? हममें आत्मगौरव का इतना अभाव क्यों है? हमारी निर्जीविता का क्या कारण है? वह मानसिक दुर्बलता के लक्षण है। इसलिए आवश्यक है कि इन विषभरी नागिनों को आबादी से दूर, किसी पृयक् स्थान मे रखा जाय। तब उन निन्द्य स्थानों की ओर सैर करने को जाते हुए हमें संकोच होगा। यदि वह आबादी से दूर हो और वहाँ घूमने के लिए किसी बहाने की गुजाइश न हो तो ऐसे बहुत कम बेहया आदमी होगे जो इस मीनाबाजार में कदम रखने का साहस कर सकें। कई महीने बीत गये। वर्षाकाल आ पहुँचा। मेलों-ठेलों की धूम मच गई। सदन बाकी सजधज बनाये मनचले घोड़ेपर चारों ओर घुमा करता। उसके हृदयमे प्रेम लालसा की एक आग-सी जलती रहती अब वह इतना नि:शक हो गया था कि दालमण्डी में घोड़े से उतरकर तम्बोलियों की दूकान पर पान खाने बैठ जाता। वह समझते, यह कोई बिगडा हुआ रईसजादा है। उससे रूप हाटकी नई-नई घटनाओं का वर्णन करते। गाने में कौन अच्छी है और कौन सुन्दरता में अद्वितीय है, इसकी चर्चा छिड़ जाती। इस बाजार में नित्य यह चर्चा रहती। सदन इन बातों को चाव से सुनता। अबतक वह कुछ रसज्ञ हो गया था। पहले जो गजलें निरर्थक मालूम होती थी उन्हें सुनकर अव उसके हृदय का एक एक तार सितार की भाँति गूजने लगता था। संगीत के मधुर स्वर उसे उन्मत्त कर देते, बडी कठिनता से वह अपने को कोठों पर चढने से रोक सकता। पद्मसिंह सदन को फैशनेबुल तो बनाना चाहते थे, लेकिन उसका यहां चली आई। जब हिन्दू जाति को खुदही लाज नही है तो फिर हम जैसी अबलाएँ उसकी रक्षा कहाँ तक कर सकती है। विट्ठलदास—सुमन, तुम सच कहती हो, बेशक हिन्दू जाति अधोगति को पहुँँच गई, और अब तक वह कभी भी नष्ट हो गई होती, पर हिन्दू स्त्रियों ही ने अभी तक उसकी मर्यादा की रक्षा की है। उन्ही के सत्य और सुकीर्ति ने उसे बचाया है। केवल हिन्दुओं की लाज रखने के लिए लाखों स्त्रियाँ आग में भस्म हो गई है। यही वह विलक्षण भूमि है जहाँ स्त्रियाँ नाना प्रकार के कष्ट भोगकर, अपमान और निरादर सहकर पुरुषों की अमानुषीय क्रूरताओं को चित्त में न लाकर हिन्दू जाति का मुख उज्ज्वल करती थी। यह साधारण स्त्रियों का गुण था और ब्राह्मणियों का तो पूछना ही क्या? पर शोक है कि वही देवियाँ अब इस भाँति मर्यादा का त्याग करने लगी। सुमन, मैं स्वीकार करता हूँ कि तुमको घर पर बहुत कष्ट था, माना कि तुम्हारा पति दरिद्र था, क्रोधी था, चरित्रहीन था, माना कि उसने तुम्हें अपने घर से निकाल दिया था, लेकिन ब्राह्मणी अपनी जाति और कुलके नामपर यह सब दुख झेलती है, आपत्तियों का झेलना और दुरवस्था में स्थिर रहना यही सच्ची ब्राह्मणियों का धर्म है, पर तुमने वह किया जो नीच जाति की कुलटायें किया करती है, पति से रूठकर मैके भागती, और मैके में निबाह न हुआ तो चकलेकी राह लेती है। सोचो तो कितने खेद की बात हैकि जिस अवस्था मे तुम्हारी लाखों बहन हंसी-खुशी जीवन व्यतीत कर रही है, वही अवस्था तुम्हें इतनी असह्य हुई कि तुमने लोकलाज, कूल-मर्यादा को लात मार कर कुपथ ग्रहण किया। क्या तुमने ऐसी स्त्रियाँ नही देखी जो तुमसे कही दीन, हीन, दरिद्र, दुखी है? पर ऐसे कुविचार उनके पास नहीं फटकने पाते, नही आज यह स्वर्गभूमि नरक के समान हो जाती। सुमन, तुम्हारे इस कर्मने ब्राह्मण जाति का नही, समस्त हिन्दू जाति का मस्तक नीचा कर दिया। सुमन की आँख सजल थी। लज्जा से सिर न उठा सकी। विट्ठलदास फिर बोले! इसमें सन्देह नहीं कि यहाँ तुम्हें भोग विलास की सामग्रियां खूब मिलती है, तुम एक ऊँचे, सुसज्जित भवन में निवास करती हो, नर्म कालीनों पर बैठती हो, फूलों की सेजपर सोती हो; भॉति भॉति के पदार्थ खाती हो; लेकिन सोचो तो तुमने यह सामग्रियाँ किन दामों मोल ली हैंं? अपनो मान मर्यादा बेचकर। तुम्हारा कितना आदर था, लोग तुम्हारी पदरज माथे पर चढ़ाते थे, लेकिन आज तुम्हे देखना भी पाप समझा जाता है............. सुमन ने बात काट कर कहा, महाशय, यह आप क्या कहते है? मेरा तो यह अनुभव है कि जितना आदर मेरा अब हो रहा है उसका शतांश भी तब नही होता था।एक बार में सेठ चिम्मनलाल के ठाकुर द्वारे में झूला देखने गई थी, सारी रात बाहर खडी भीगती रही, किसी ने भीतर न जाने दिया, लेकिन कल उसी ठाकुर द्वारे में मेरा गाना हुआ तो ऐसा जान पड़ता था मानों मेरे चरणो से वह मन्दिर पवित्र हो गया। विट्ठलदास—लेकिन तुमने यह भी सोचा है कि वह किस आचरण के लोग है। सुमन—उनके आचरण चाहे जैसे हों, लेकिन वह काशी के हिन्दूसमाज के नेता अवश्य है। फिर उन्ही पर क्या निर्भर है? मै प्रातःकाल से सन्ध्या तक हजारों मनुष्यों को इसी रास्ते आते-जाते देखती हूँ। पढ़े-अपढ़, मूर्ख-विद्वान, धनी-गरीब सभी नजर आते है, तुरन्त सबको अपनी तरफ खुली या छिपी दृष्टि से ताकते पाती हूँ, उनमें कोई ऐसा नही मालूम होता जो मेरी कृपादृष्टि पर हर्ष से मतवाला न हो जाय। इसे आप क्या कहते है? सम्भव है,शहर में दो चार मनुष्य ऐसे हों जो मेरा तिरस्कार करते हो। उनमें से एक आप है, उन्ही में आपके मित्र पद्मसिह है, किन्तु जब संसार मेरा आदर करता है तो इने-गिने मनुष्यों के तिरस्कार की मुझे क्या परवाह है? पद्मसिंह को भी जो चिढ़ है वह मुझसे है, मेरे विरादरी से नही। मैने इन्हीं आँखों से उन्हे होली के दिन भोली से हँसते देखा था। विट्ठलदास को कोई उत्तर न सूझता था। बुरे फँसे थे। सुमन ने फिर कहा, आप सोचते होगे कि भोगविलास की लालसा से कुमार्ग में आई हूँ, पर वास्तव में ऐसा नही है। में ऐसी अन्धी नहीं कि भले-बुरे की पहचान न कर सकूँ। मैं जानती हूंँ कि मैने अत्यन्त निकृष्ट कर्म किया है। लेकिन में विवश थी, इसके सिवा मेरे लिए और कोई रास्ता न था। आप अगर सुन सके तो मैं अपनी राम कहानी सुनाऊँ। इतना तो आप जानते ही है कि संसार में सबकी प्रकृति एक सी नहीं होती। कोई अपना अपमान सह सकता है, कोई नहीं सह सकता। मैं एक ऊँचे कुल की लडकी हूंँ, पिताकी नादानी से मेरा विवाह एक दरिद्र मूर्ख मनुष्य से हुआ, लेकिन दरिद्र होने पर भी मुझसे अपना अपमान न सहा जाता था। जिनका निरादर होना चाहिए उनका आदर होते देखकर मेरे हृदय में कुवासनाएँ उठने लगती थी। मगर मैं इस आग से मन ही मन जलती थी। कभी अपने भावों को किसी से प्रकट नहीं किया। सम्भव था कि कालान्तर में यह अग्नि आप ही आप शान्त हो जाती, पर पद्मसिंह के जलसे ने इस अग्नि को भड़का दिया। इसके बाद मेरी जो-दुर्गति हुई वह आप जानते ही है। पद्मसिंह के घर से निकलकर से भोली बाई की शरण में गई। मगर उस दशा में भी से इस मार्ग से भागती रही। मैने चाहा कि कपड़े सीकर अपना निर्वाह करूँ पर दुष्टों ने मुझे ऐसा तंग किया कि अन्त में मुझे इस कुएँ में कूदना पड़ा। यद्यपि इस काजल की कोठरी आकर पवित्र रहना अत्यन्त कठिन है, पर मैंने यह प्रतिज्ञा कर ली है कि अपने सत्य की रक्षा करूँगी, गाऊँगी, नाचूँगी पर अपने को भ्रष्ट न होने दूँगी। विठ्ठल-तुम्हारा यहाँ बैठना ही तुम्हे भ्रष्ट करने के लिए काफी है। सुमन-तो फिर और क्या कर सकती हूं। आप हो बताइये। मेरे लिए मुझे जीवन बिताने का और कौन-सा उपाय है। बिठ्ठल—अगर तुम्हें यह आशा है कि यहाँ सुख से जीवन कटेगा तो तुम्हारी बड़ी भूल है। यदि अभी नहीं तो थोड़े दिनों में तुम्हे अवश्य मालूम हो जायगा कि यहां सुख नहीं है। सुख सन्तोष से प्राप्त होता है, बिलास से सुख कभी नही मिल सकता। सुमन-—सुख न सही यहां पर मेरा आदर तो है। में किसी की गुलाम तो नहीं हूँ। विट्ठल—यह भी तुम्हारी भूल है। तुम यहाँ चाहे और किसी की गुलाम न हो, पर अपनी इन्द्रियों की गुलाम तो हो? इन्द्रियों की गुलामी उस पराधीनता से कही दु़:खदायिनी होती है। यहाँ तुम्हें न सुख मिलेगा, न आदर। हाँ, कुछ दिनों भोग विलास कर लोगी, पर अन्त में इससे भी हाथ धोना पड़ेगा। सोचो तो, थोडे दिनों तक इन्द्रियों को सुख देने के लिए तुम अपनी आत्मा और समाज पर कितना बड़ा अन्याय कर रही हो? सुमन ने आजतक किसी से ऐसी बात न सुनी थी। वह इन्द्रियों के सुख को अपने आदर को जीवन का मुख्य उद्देश्य समझती आई थी उसे आज मालूम हुआ कि सुख सन्तोष से प्राप्त होता है और आदर सेवा से। उसने कहा, मैं सुख और आदर दोनों ही को छोड़ती हूँ, पर जीवन-निर्वाह का तो कुछ उपाय करना पडेगा? विट्ठलदास—अगर ईश्वर तुम्हे सुबुद्धि दे तो सामान्य रीति से जीवन-निर्वाह करने के लिए तुम्हे दालमण्डी में बैठने की जरूरत नही है। तुम्हारे जीवन-निर्वाह का केवल यही एक उपाय नही है। ऐसे कितने धन्धे है जो तुम अपने घर में बैठी हुई कर सकती हो। सुमन का मन अब कोई बहाना न ढूँढ सका। विट्ठलदास के सदुत्साह ने उसे वशीभूत कर लिया। सच्चे आदमी को हम धोखा नही दे सकते। उंसकी सच्चाई हमारे हृदय में उच्च भावों को जागृत कर देती है। उसने कहा, मुझे यहाँ बैठते स्वतः लज्जा आती है। बताइये, आप मेरे लिए क्या प्रबन्ध कर सकते है? मै गाने में निपुण हूँँ। गाना सिखाने का काम कर सकती हूँ। विट्ठलदास-ऐसी तो यहाँ कोई पाठशाला नहीं है। सुमन-मैने कुछ विद्या भी पढ़ी है, कन्याओं को अच्छी तरह पढ़ा सकती हूँ। विट्ठलदासने चिन्तित भाव से उत्तर दिया, कन्या पाठशालाएँ तो कई हैं, पर तुम्हें लोग स्वीकार करेंगे, इसमे सन्देह है। सुमन-तो फिर आप मुझसे क्या करने को कहते है? कोई ऐसा हिन्दू जातिका प्रेमी है जो मेरे गुजारे के लिए ५०) मासिक देने पर राजी हो? विट्ठलदास-यह तो मुश्किल है। सुमन-तो क्या आप मुझसे चक्की पिसाना चाहते है? मैं ऐसी सन्तोषी नही हूँ। विट्ठलदास (झेंपकर) विधवाश्रम में रहना चाहो तो उसका प्रबन्ध कर दिया जाय। सुमन-(सोचकर) मुझे यह भी मंजूर है, पर वहां ने स्त्रियों को अपने सम्बन्ध में कानाफूसी करते देखा तो पलभर न ठहरूंगी। विट्ठलदास-यह टेढ़ी शर्त है, मैं किस किसकी जबान को रोकूँगा। लेकिन मेरी समझमें सभा वाले तुम्हे लेने पर राजी भी न होगे। सुमन ने तान से कहा, तो जब आपकी हिन्दू जाति इतनी ह्दयशून्य है। तो उसकी मर्यादा पालन के लिए क्यों कष्ट भोगूँ, क्यों जान दूँ। जब आप मुझे अपनाने के लिए जाति को प्रेरित नहीं कर सकते, तब जाति आप ही लज्जाहीन है तो मेरा क्या दोष है। मैं आपसे केवल एक प्रस्ताव और करूंगी और यदि आप उसे भी पूरा न कर सकेंगे तो फिर मैं आपको और कष्ट न दूंगी। आप पं पद्मसिंह को एक घंटे के लिए मेरे पास बुला लाइये, में उनसे एकान्त में कुछ कहना चाहती हूं। उसी घड़ी में यहां से चली जाऊंगी। मैं केवल यह देखना चाहती हूं कि जिन्हें आप जाति के नेता कहते हैं, उनकी दृष्टि में मेरे पश्चाताप का कितना मूल्य है। विट्ठलदास खुश होकर बोले, हाँ, यह में कर सकता हूँ, बोलो किस दिन? सुमन--जब आपका जी चाहें। विठ्ठलदास-फिर तो न जाओगी? सुमन—अभी इतनी नीच नही हुई हूँ? १६ महाशय विठ्ठलदास इस समय ऐसे खुश थे मानों उन्हे कोई सम्पत्ति मिल गई हो। उन्हें विश्वास था कि पद्मसिंह इस जरा से कष्ट से मुँह न मोड़ेंगे, केवल उनके पास जाने की देर है। वह होली के कई दिन पहले से शर्माजी के पास नहीं गये थे। यथाशक्ति उनकी निन्दा करने में कोई बात उठा न रक्खी थी, जिस पर कदाचित् अब वह मन से लज्जित थे, तिस पर भगे शर्माजी के पास जाने में उन्हे जरा भी सकोच न हुआ। उनके घर की ओर चले। रात के दस बजे गये थे। अकाशमे बादल उमड़े हुए थे, घोर अन्धकार छाया हुआ था। लेकिन राग-रंग का बाजार पूरी रौनकपर था। अट्टालिकाओ से प्रकाश की किरणे छिटक रही थी। कही सुरीली तानें सुनाई देती थी, कही मधुर हास्य की ध्वनि, कही आमोदप्र-मोदकी बातें। चारो ओर विषय-वासना अपने नगन रूप मे दिखाई दे रही थी। दालमण्डी से निकलकर विट्ठलदास को ऐसा जान पड़ा मानों वह किसी निर्जन स्थान में आ गये। रास्ता अभी बन्द न हुआ था। विट्ठलदास को ज्योंही कोई परिचित मनुष्य। मिल जाता, वह उसे तुरन्त अपनी सफलता की सूचना देते। आप कुछ-समझते हैं, कहाँ से आ रहा हूँ? सुमनबाई की सेवा में गया था। ऐसा मन्त्र पढ़ा कि सिर न उठा सकी, विधवाश्रम में जाने पर तैयार है। काम करनेवाले यों काम किया करते है। पद्मसिंह चारपाई पर लेटे हुए निद्रादेव की आराधना कर रहे थे कि इतनेमें विट्ठलदास ने आकर आवाज दी। जीतन कहार अपनी कोठरी में बैठा हुआ दिन भर की कमाई का हिसाब लगा रहा था कि यह आवाज कान में आई। बडी फुरतीसे पैसे समेट कर कमर में रख लिए और बोला, कौन है? विट्ठलदासने कहा अजी में हैं, क्या पण्डितजी सो गये? जरा भीतर जाकर जगा तो दो, मेरा नाम लेना, कहना बाहर खड़े है, बड़ा जरूरी काम है, जरा चले आवे। जीतन मन में बहुत झुंझलाया, उसका हिसाब अधूरा रह गया, मालूम नही अभी रुपया पूरा होने में कितनी कसर है। अलसाता हुआ उठा, किवाड़ खोले और पंडितजीको खबर दो। वह समझ गये कि कोई नया समचार होगा तभी यह इतनो रात गये आये है। पुरन्त बाहर निकल आये। विट्ठल--आइये, मैंने आपको बहुत कष्ट दिया, क्षमा कीजियेगा। कुछ समझे, कहाँ से आ रहा हूँ सुमनबाई के पास गया था, आपका पत्र पाते ही दौड़ा कि बन पड़े तो उसे सीधी राह पर लाऊँ। इसमें उसी की बदनामी नहीं सारी जाति की बदनामी है। वहाँ पहुँचा तो उसके ठाट देखकर दंग रह गया। वह भोली-भाली स्त्री अब दालमंडी की रानी है; मालूम नहीं इतनी जल्दी वह ऐसी चतुर कैसे हो गई। कुछ देर तक तो चुपचाप मेरी बातें सुनती रही, फिर रोने लगी। मैने समझा, अभी लोहा लाल है, दो-चार चोटे और लगाई, बस आ गई पंजे में। पहले विधवाश्रम का नाम सुनकर घबराई। कहने लगी—मुझे ५०) महीना गुजर के लिये दिलवाइये। लेकिन आप जानते है यहाँ ५०) देन वाला कौन है? मैने हामी न भरी। अन्तमें कहते सुनते एक शर्त पर राजी हुई। उस शर्तको पूरा करना आपका काम है। पद्मसिंह ने विस्मित होकर विट्ठलदासकी ओर देखा। विट्ठलदास--घबराइये नही, बहुत सीधी-सी शर्त है, बस यही कि आप जरा देर के लिये उसके पास चले जाँय, वह आपसे कुछ कहना चाहती है। यह तो मुझे निश्चय था कि आपको इसमें कोई आपत्ति न होगी। यह शर्त मजूर कर लो, तो बताइये कब चलने का विचार है। मेरी समझ में सवरे चलें। किन्तु पद्मसिह विचारशील मनुष्य थे। वह घण्टों सोच विचार के बिना कोई फैसला न कर सकते थे। सोचने लगे कि इस शर्तका क्या अभिप्राय है? वह मुझसे क्या कहना चाहती है? क्या बात पत्र द्वारा न हो सकती थी? इसमें कोई न कोई रहस्य अवश्य है। आज अबुल वफा ने मेरे बग्घी पर से कूद पड़ने का वृत्तांत उससे कहा होगा । उसने सोचा होगा; यह महाशय इस तरह नही आते तो यह चाल चलूँ, देखूँ कैसे नही आते। केवल मुझे नीचा दिखाना चाहती है। अच्छा अगर में जाऊंगा भी पीछ से वह अपना वचन पूरा न करे क्या होगा? यह युक्ति उन्हे अपना गला छुड़ाने के लिय उपयोगी मालूम हुई। बोले, अच्छा, अगर यह फिर जाय तो? विट्ठल-फिर क्यो जायगी? ऐसा हो सकता है? पद्म---हाँ, ऐसा होना असभव नहीं। विठ्ठल तो क्या आप कोई प्रतिज्ञा पत्र लिखवाना चाहते हैं? पद्म-नहीं, मुझ सदेह यही है कि वह सुख-विलास छोड़कर विधवाश्रम मे क्यों जाने लगी और सभा वाले उसे लेना स्वीकार कब करेंगे? विट्ठल---सभा वालो को मनाना तो मेरा काम है। न मानेगे तो में उसके गुजारे का और कोई प्रबंध करूंगा। रही पहली बात। मान लीजिये, वह अपने वचन को मिथ्या ही कर दे तो इसमें हमारी क्या हानि है? हमारा कर्तव्य तो पूरा हो जायगा। पद्म-हाँ, यह सन्तोष चाहे हो जाये, लेकिन देख लीजियेगा वह अवश्य धोखा देगी। विठ्ठलदास अधीर हो गये; झुंझलाकर बोले, अगर धोखा ही दे दिया तो आपका कौन छप्पन टका खर्च हुआ जाता है। पद्म-आपके निकट मेरी कुछ प्रतिप्ठा न हो, लेकिन मैं अपने को इतना तुच्छ नही समझता। विट्ठल---सारांश यह कि न जायगे? पद्म-मेरे जानसे कोई लाभ नही है। हाँ, यदि मेरा मानमर्दन कराना ही अभीष्ट हो तो दूसरी बात है। विटठल---कितने खेद की बात है कि आप एक ज़ातीय कार्य के लिये इतनी मीनमेष निकाल रहे है। शोक। आप ऑखो से देख रहे हैं कि हिन्दू जाति की स्त्री कुंए में गिरी हुई है, और आप उसी जाति के एक विचारवान पुरुष होकर उसे निकालने में इतना आगा-पीछा कर रहे है! बस, आप इसी काम के है कि मूर्ख किसानो और जमींदारो का रक्त चूसे। आपसे और कुछ न होगा। शर्माजी ने इस तिरस्कार का उत्तर न दिया। वह मन में अपनी अकर्मण्यता पर स्वयं लज्जित थे और अपने को इस तिरस्कार का भागी समझते थे। लेकिन एक ऐसे पुरुष के मुँह से ये बातें अत्यंत अप्रिय मालूम हुई, जो इस बुराई का मूल कारण हो। वह बड़ी कठिनाई से प्रत्युत्तर देने के आवेग को रोक सके। यथा में वह सुमन की रक्षा करना चाहते थे, लेकिन गुप्तरीति से। बोले, उसकी और भी तो शर्त है? विठ्ठल—जो हाँ, है तो, लकिन आपमें उन्हे पूरा करने की सामर्थ्य है? वह गुजारे लिये ५० मासिक मॉगती है, आप दे सकते है? शर्माजी-५०) नही, लेकिन २०) देने को तैयार हूँ। विठ्ठल-शर्माजी बातें न बनाइये। एक जरा सा कष्ट तो आपसे उठाया नही जाता, आप २० मासिक देगे! शर्माजी—मैं आपको वचन देता हूँ कि २०) मासिक दिया करेगा और अगर मेरी आमदनी कुछ भी बढ़ी तो पूरी रकम दे दूंगा। हां, इस समय विवश हैं। यह २०) भी घोडागाड़ी बेचने से बच सकेंगे मालूम नही क्यों इन दिनों मेरा बाजार गिरा जा रहा है। विट्ठल—अच्छा, आपने २०) दे ही दिये तो शेष कहाँ से आयेंगे? औरों का तो हाल आप जानते ही है, विधवाश्रमके चन्दे ही कठिनाईसे वसूल होते है। में जाता हूँ यथाशक्ति उद्योग करेगा, लेकिन यदि कार्य सिद्ध न हुआ तो उसका दोप आपके सिर पड़ेगा। १७ सन्ध्या का समय है। सदन अपने घोड़े पर सवार दालमंडी में दोनों तरफ छजो और खिड़कियो की ओर ताकता जा रहा है। जब से सुमन वहीं आई है, सदन उसके छज्जे के सामने किसी-न किसी बहाने जरा देर के लिए अवश्य ठहर जाता है। इस नव-कुसुम ने उसकी प्रेमलाल सा को ऐसा उत्तेजित कर दिया है कि अब उसे किसी पल चैन नही पड़ता। उसके रूप-लावण्य में एक प्रकार की मनोहारिणी सरलता है जो उसके हृदय को बलात्अ पनी ओर खींचती है। वह इस सरल सौंदर्यमूर्ति को अपना प्रेम अर्पण करने का परम अभिलाषी है, लेकिन उसे इसका कोई अवसर नही मिलता, सुमन के यहाँ रसिकों का नित्य जमघट रहता है। सदन को यह भय होता कि इनमे कोई चचा की जान-पहचान का मनुष्य न हो। इसलिये उसे ऊपर जाने का साहस नहीं होता। अपनी प्रबल आकांक्षा को हृदय में छिपाये वह नित्य इसी तरह निराश होकर लौट जाता है। लेकिन आज उसने मुलाकात करने का निश्चय कर लिया है, चाहे कितनी देर क्यों न हो जाय। विरह का दाह अब उससे नही सहा जाता। वह सुमन के कोठे के सामने पहुंचा। श्यामकल्याण की मधुर ध्वनि आ रही थी। आगे बढा और दो घंटे तक पार्क और मैदान में चक्कर लगाकर नौ बजे फिर दालमंडी की ओर चला। आश्विन के चन्द्र की उज्ज्वल किरणों न दालमंडी की ऊँची छतों पर रुपहली चादर-सी बिछा दी थी। वह फिर सुमन के कोठे सामने रुका। संगीत ध्वनि बन्द थी, कुछ बोलचाल न सुनाई दी। निश्चय हो गया कि कोई नही है। घोडे से उतरा उसे नीचे की दूकान के एक खम्भे से बॉध दिया और सुमन के द्वार पर खड़ा हो गया। उसकी सॉस बड़े वेग से चल रही थी और छाती जोर से धड़क रही थी। सुमन का मुजरा अभी समाप्त हुआ था, और उसके मन पर वह शिथिलता छाई हुई थी जो आँधी के पीछे आनेवाले सन्नाटे के समान आमोद-प्रमोद का प्रतिफल हुआ करती है। यह एक प्रकार की चेतावनी होती है जो आत्मा की ओर से भोगविलास में लिप्त मन को मिलती है। इस दशा में हमारा हृदय पुरानी स्मृतियों का क्रीड़ा क्षेत्र बन जाया करता है। थोडी देर के लिए हमारे ज्ञानचक्षु खुल जाते है। सुमन का ध्यान इस समय सुभद्रा की ओर लगा हुआ था। वह मन उससे अपनी तुलना कर रही थी। जो शान्तिमय सुख उसे प्राप्त है, क्या वह मुझे मिल सकता है? असभव! यह तृष्णासागर है, यहाँ शान्तिसुख कहाँ? जब पद्मसिंह के कचहरी से आने का समय होता तो सुभद्रा कितनी उल्लसित होकर पान के वीड़े लगाती थी, ताजा हलवा पकाती थी। जब वह घर आते थे तो वह कैसी प्रेम विह्वल होकर उनसे मिलने दौड़ती थी। आह! मैंने उनका प्रेमालिंगन भी देखा है कितना भाव समय में कितना सच्चा। मुझे वह सुख कहाँ? यहाँ तो अन्धे आते है, या बातों के वीर। कोई अपने धन का जाल बिछाता है, कोई अपनी चिकनी चुपडी बातो का। उनके हृदय भावशून्य, शुष्क ओर ओछेपन से भरे हुए होते है। इतने में सदन ने कमरे में प्रवेश किया। सुमन चौंक पड़ी। उसने सदन को कई दिन देखा था। उसका चेहरा उसे पद्मसिंह के चेहरे से मिलता हुआ मालूम होता था। हाँ उस गंभीरता की जगह एक उदंडता झलकती थी? वह काइयाँपन, वह क्षुद्रता, जो इस माया नगर के प्रेमियों का मुख्य लक्षण है, वहाँ नामको भी न थी। वह सीधासादा, सहज स्वभाव, सरल नवयुवक मालूम होता था। सुमन ने आज उसे कोठों का निरीक्षण करते देखा था। उसने ताड़ लिया था कि कबूतर अब पर तौल रहा है, किसी छतरी उतरना चाहता है। आज उसे अपने यहाँ देखकर उसे गर्वपूर्ण आनन्द हुआ जो दंगल में कुश्ती मारकर किसी पहलवान को होता है। वह उठी और मुस्कुराकर सदन की ओर हाथ बढाया। सदन का मुख लज्जासे अरुणव हो गया। आँखे झुक गई। उस पर एक रोब-सा छा गया। मुख से एक शब्द भी न निकला। जिसने कभी मदिरा का सेवन न किया हो, मदलालसा होने पर भी उसे मुँह से लगाते हुए वह झिझकता है। यद्यपि सदन ने सुमनबाई को अपना परिचय ठीक नहीं दिया, उसने अपना नाम कुंवर सदनसिंह बताया, पर उसका भेद बहुत दिनों तक न छिप सका। सुमन ने हिरिया के द्वारा उसका पता भली भाँति लगा लिया और तभी से वह बड़े चक्कर में पड़ी हुई थी। सदन को देखे बिना उसे चैन न पड़ता, उसका हृदय दिनो दिन उसको ओर खिंचता जाता था। उसके बैंठे सुमन के यहाँ किसी बड़े से-रईस का गुजर होना भी कठिन था। किन्तु वह इस प्रेम को अनुचित और निषिद्ध समझती थी, इसे छिपाती थी। उसकी कल्पना किसी अव्यक्त कारण से प्रेमलालसा को भीषण विश्वासघात समझती थी? कही पद्मसिंह और सुभद्रा पर यह रहस्य खुल जाय तो वह मुझे क्या समझेगे? उन्हें कितना दु:ख होगा? में उनकी दृष्टि में कितनी नींव अीर घृणित हो जाऊंगी? जब कभी सदन प्रेमरहस्य की बात करने लगता तो सुमन बात को पलट देती जब कभी सदन की अँगुलियाँ ढिठाई करना चाहती तो वह उसकी और लज्जा युक्त नेत्रों से देखकर धीरे से उसका हाथ हटा देती। साथ ही, वह सदन को उलझाये भी रखना चाहती थी। इस प्रेम कल्पना से उसे जो आनन्द मिलता था, उसका त्याग करने में वह असमर्थ थी। लेकिन सदन उसके भावों से अनभिज्ञ होने के कारण उसकी प्रेम शिथिलता को अपनी धनहीनता पर अवलबित समझता था। उसका निष्कपट हृदय प्रगाढ़ प्रेम में मग्न हो गया था। सुमन उसके जीवन का आधार बन गई थी। मगर विवित्रता यह थी कि प्रेमलालसा के इतने प्रबल होते हुए भी वह अपनी कुवासनाओं को दबाता था। उसका अक्खड़पन लुप्त हो गया था। वह वही करना चाहता था जो सुमन को पसन्द हो। वह कामातुरता जो कलुषित प्रेम में व्याप्त होती है, सच्चे अनुराग के आधीन होकर सहृदयता में परिवर्तित हो गई थी, पर सुमन की अनिच्छा दिनों दिन बढ़ती देखकर उसने अपने मन में यह निर्धारित किया कि पवित्र प्रेम की कदर यहाँ नही हो सकती। यहाँ के देवता उपासना से नही, भेंट से प्रसन्न होते है लेकिन भटके लिये रुपये कहाँ से आधे? मांगे किससे? निदान उसने पिता को एक पत्र लिखा कि यहाँ मेरे भोजन का अच्छा प्रबंध नही है, लज्जावश चाचा साहब से कुछ कह नही सकता, मुझे कुछ रुपये भेज दीजिये। घरपर यह पत्र पहुँचा तो मामा ने पति को ताने देने शुरू किये इसी भाई का तुम्हें इतना भरोसा था, घमंड से धरती पर पाँव नहीं रखते थे। अब घमंड टूटा कि नहीं? वह भी चाचा पर बहुत फूला हुआ था, अब आंखें खुली होगी। इस काल में नेकी किसी को याद नही रहती, अपने दिन भूल जाते है। उसके लिये ने कौन-कौन सा यत्न नही किया, छाती से दूध भर नहीं पिलाया। उसी का यह बदला मिल रहा है। उस बेचारे का कुछ दोष नहीं, उसे में जानती हूँ, यह सारी करतूत उन्ही महारानी की है। अबकी भेंट हुई तो वह खरी खरी सुनाऊँ कि याद करे। मदनसिंह को सन्देह हुआ कि सदन ने यह पाखंड रचा है। भाई पर उन्हें अखंड विश्वास था, लेकिन जब मामा ने रुपये भेजने पर जोर दिया तो उन्हें जमे पड़े। सदन रोज डाकघर जाता, डाकिये से बारबार पूछता। आखिर चौथे दिन २५) का मनीआर्डर आया। डाकियां उसे पहचानता था, रुपये मिलने में कोई कठिनाई न हुई। सदन हर्षसे फूला न समाया। सन्ध्या को बाजार से एक उत्तम रेशमी साड़ी मोल ली। लेकिन यह शंका हो रही थी कि कही सुमन इसे नापसन्द न करे। वह कुँवर बन चुका था, इसलिए ऐसी तुच्छ भेंट देते हुए झेंपता था। साड़ी जेब में रख बड़ी देर तक घोड़े पर इधर-उधर टहलता रहा। खाली हाथ वह सुमन के यहाँ नित्य बेधड़क चला जाया करता था, पर आज यह भेंट लेकर जाने में संकोच होता था। जब खूब अन्धेरा हो गया तो मन को दृढ़ करके कोठे पर चढ़ गया और साड़ी चुप के से जेब से निकालकर शृंगारदान पर रख दी। सुमन उसके इस विलंब से चिंतित हो रही थी: उसे देखते ही फूल के समान खिल गई, बोली, यह क्यों लाये? सदन ने झेंपते हुए कहा, कुछ नहीं, आज एक साड़ी नजर आ गई, मुझे अच्छी मालूम हुई, ले ली, यह तुम्हारी भेंट है। सुमन मुस्करा कर कहा-आज इतनी देरतक राह दिखाई, क्या यह उसका प्रायश्चित है? यह कहकर उसने साड़ी को देखा। सदन की वास्तविक अवस्था के विचारसे वह बहुमूल्य कही जा सकती थी। सुमन के मन में प्रश्न हुआ कि इतने रुपये इन्हें मिले कहाँ? कहीं घरसे तो नही उठा लाये? शर्माजी इतने रुपये क्यों देने लगे? या इन्होंने उनसे कोई बहाना करके ठगे होगे या उठा लाये होगे। उसने विचार किया कि साड़ी लौटा दूँ, लेकिन उससे उसके दुःखी हो जाने का भय था। इसके साथही साड़ी को रख लेने से उसके दुरुत्साह के बढ़नेकी आंशका थी। निदान उसने निश्चय किया कि इसे अबकी बार रख लूँ, पर भविष्य के लिये चेतावनी दे दूँ। बोली, इस अनुग्रह से कृतार्थ हुई, लेकिन आपसे मैं भेंट की भूखी नहीं, आपकी यही कृपा क्या कम है कि आप यहाँ तक आने का कष्ट करते है? मैं केवल आपकी कृपादृष्टि चाहती हूँ। लेकिन जब इस पारितोषिक से सदन का मनोरथ पूरा न हुआ और सुमनके बर्ताव में उसे कोई अन्तर न दिखाई दिया तो उसे विश्वास हो गया गोया कि मेरा उद्योग निष्फल हुआ। वह अपने मन में लज्जित हुआ कि मैं एक तुच्छ भेंट देकर उससे इतने बड़े फलकी आशा रखता हूँ, जमीन से उचककर आकाशसे तारे तोड़ने की चेष्टा करता हूँ। अतएव वह कोई मूल्यवान् प्रेमोपहार देनेकी चिन्ता मे लीन हो गया। मगर महीनों तक उसे इसका कोई अवसर न मिला। एक दिन वह नहाने बैठा, तो साबुन न था। वह भीतर के स्नानालय में साबुन लेने गया । अन्दर पैर रखते ही उसकी निगाह ताकपर पड़ी, उसपर एक कंगन रखा हुआ था। सुभद्रा अभी नहाकर गई थी, उसने कंगन उतारकर रख दिया था, लेकिन चलते समय उसकी सुध न रही। कचहरीका समय निकट था, वह रसोई में चली गई । कंगन वही धरा रह गया। सदनने उसे देखते ही लपकर उठा लिया। इस समय उसके मनमे कोई बुरा भाव न था? उसने सोचा, चाचीको खूब हैरान करके तब दूंगा; अच्छी दिल्लगी रहेगी। कंगनको छिपाकर बाहर लाया और संदूक में रख दिया। सुभद्रा भोजन से निवृत होकर लेट रही, आलस्य आया, सोई तो तीसरे पहरको उठी। इसी बीच में पंडितजी कचहरी से आ गये, उनसे बातचीत करने लगी, कंगन का ध्यान ही न रहा। सदन कई बार भीतर गया कि देखू इसकी कोई चर्चा हो रही है या नहीं, लेकिन उसका कोई जिक्र न सुनाई दिया। सन्ध्या समय जब वह सैर करने के लिये तैयार हुआ तो एक आकस्मिक विचारसे प्रेरित होकर उसने वह कंगन जेब में रख लिया । उसने सोचा, क्यों न यह कंगन सुमनबाई की नजर करूँ ? यहाँ तो मुझसे कोई पूछेगा ही नहीं और अगर पूछा भी गया तो कह दूंगा, मैं नहीं जानता। चाची समझेगी नौकरों में से कोई उठा ले गया होगा। इस तरह के कुविचारों ने उसका संकल्प दृढ़ कर दिया । उसका जी कही सैर करने मे न लगा । वह उपहार देने के लिए व्याकुल हो रहा था । नियमित समय से कुछ पहले ही घोड़े को दालमंडी की तरफ फेर दिया । यहाँ उसने एक छोटा सा मखमली बक्स लिया, उसमें कंगन को रखकर सुमनके यहाँ जा पहुँचा । वह इस बहुमूल्य वस्तुको इस प्रकार भेट करना चाहता था मानो वह कोई अति सामान्य वस्तु दे रहा हो । आज वह बहुत देर तक बैठा रहा। सन्ध्या का समय उसने उसके लिये निकाल रखा था किन्तु आज प्रेमालाप में भी उसका जी न लगता था। उसे चिंता प्रस्ताव तो बहुत उत्तम है, लेकिन यह बताइये, सुमन को आप रखना कहाँ चाहते है? बिट्ठलदास—विधवाश्रम में। बलभद्र-आश्रम सारे नगर में बदनाम हो जायेगा, और संभव है कि अन्य विधवाये भी छोड़ भागे। बिट्ठल मैं-तो अलग मकान लेकर रख दूँगा। बलभद्र-मुहल्ले के नवयुवकों मे छुरी चल जायगी। विठ्ठल-तो फिर आप ही कोई उपाय बताइये। बलभद्र-मेरी सम्पत्ति तो यह है कि आप इस तामझाम में न पड़े। जिस स्त्री को लोकनिंदा की लाज नही, उसे कोई शक्ति नही सुधार सकती। यह नियम है कि जब हमारा कोई अगं विकृत होता है तो उसे काट डालते हैं, जिससे उसका विष समस्त शरीर को नष्ट न कर डाले। समाज में भी उसी नियम का पालना करना चाहिए। मैं देखता हूँ कि आप मुझसे सहमत नहीं है, लेकिन मेरा जो कछ विचार था वह मैने स्पष्ट कह दिया। आश्रम की प्रबन्धकारिणी सभा का एक मेम्बर में भी तो हूँ? मैं किसी तरह इस बेश्या को आश्रम में रखने की सलाह न दूँगा। बिट्ठलदास ने रोष से कहा सारांश यह कि इस काम में आप मुझे कोई सहायता नही दे सकते? अब आप जैसे महापुरुषो का यह हाल है। तो दूसरो से क्या आशा हो सकती है। मैंने आपका बहुत समय नष्ट किया, इसके लिये मुझे क्षमा कीजियेगा। यह कहकर बिट्ठलदास उठ खड़े हुए ओर सेठ चिम्मनलाल की सेवा में पहुँचे। यह सॉवले रगं के बेडौल मनुष्य थे। बहुत ही स्थूल ढीले ढाले, शरीर से हाड़ की जगह माँस और माँस की जगह वायु भरी हुई थी। उनके विचार भी शरीर के समान बेडौल थे। वह ऋषि-धर्म-सभा के सभापति, रामलीला कमेटी चेयरमैन और रासलीला परिषद् के प्रबंधकर्त्ता थे। राजनीति को विषभरा साँप समझते थे और समाचार पत्रो को साँप की बांबी। उच्च अधिकारियो से मिलने की धुन थी। अंग्रजों समाज से उनका विशेष मान था। वहाँ उनके सदगुणों की बडी प्रशंसा होती थी। वह उदार न थे, न कृपण। इस विषय में चन्दे की नामवलि उनका मार्ग निश्चय किया करती थी। उनमें एक बड़ा गुण था जो उनकी दुर्बलताओं को छिपाये रहता था। यह उनकी विनोदशीलता थी। विट्ठलदास का प्रस्ताव सुनकर बोले, महाशय, आप भी बिलकुल शुष्क मनुष्य है। आप में जरा भी रस नहीं। मुद्दत के बाद तो दालमंडी में एक चीज नजर आई, आप उसे भी गायब करनेपर तुले हुए है। कम से कम अबकी रासलीला तो हो जाने दीजिये। राजगद्दी के दिन उसका जल्सा होगा, धूम मच जायगी। आखिर तुर्किन आकर मन्दिर को भ्रष्ट करती है, ब्राह्मणी रहे तो क्या बुरा है, खैर, यह तो दिल्लगी हुई क्षमा कीजियेगा। आपको धन्यवाद है कि ऐसे-ऐसे शुभ कार्य आपके हाथो पूरे होते है। कहाँ है चन्दे की फिहरिस्त? विट्ठलदास ने सिर खुजलाते हुए कहा, अभी तो मैं केवल सेठ बलभद्र दासजी के पास गया था, लेकिन आप जानते ही है, वह एक बैठकबाज हैं, इधर-उधर की बात करके टाल दिया। अगर बलभद्रदास ने एक लिखा होता तो यहाँ दो में संदेह न था, दो लिखते तो चार का निश्चित था। जब गुण कही शून्य हो तो गुणनफल शून्य के सिवा और क्या हो सकता था, लेकिन बहाना क्या करते। एक आश्रय मिल गया। बोले महाशय मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है। लेकिन बलभद्रदास ने कुछ समझकर ही टाला होगा। जब मैं भी दूर तक सोचता हूँ तो इस प्रस्ताव में कुछ राजनीति का रंग दिखाई देता है, इसमें जरा भो सन्देह नहीं। आप चाहे इसे उस दृष्टि से न देखते हों लेकिन मुझे तो इसमें गुप्त राजनीति भरी हुई साफ नजर आती है। मुसलमानों को यह बात अवश्य बुरी मालूम होगी, वह जाकर अधिकारियों से इसकी शिकायत करेंगें। अधिकारियों को आप जानते ही है, आँख नहीं, केवल कान होते हैं। उन्हें तुरन्त किसी षड्यन्त्र का सन्देह हो जायगा। विट्ठलदास ने झुँझलाकर कहा, साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि मैं कुछ नहीं देना चाहता? चिम्मनलाल-आप ऐसा ही समझ लीजिये। मैंने सारी जाति का कोई ठेका थोड़े ही लिया है? विट्ठलदास का मनोरथ यहाँ भी पूरा न हुआ, लेकिन यह उनके लिये कुछ नई बात न थी। ऐसे निराशाजनक अनुभव उन्हें नित्य ही हुआ करते थे। वह डाक्टर श्यामाचरण के पास पहुँचे। डाक्टर महोदय बड़े समझदार और विद्वान पुरुष थे। शहर के प्रधान राजनीतिक नेता थे। उनकी वकालत खूब चमकी हुई थी। बहुत तौल-तौल कर मुँह से शब्द निकालते थे। उनकी मौन गंभीरता विचारशीलता का द्योतक समझी जाती थी। शान्ति के भक्त थे, इसलिये उनके विरोध से न किसी को हानि थी, न उनके योग से किसी को लाभ। सभी तरह के लोगो को वे अपना मित्र समझते थे, वह अपनी कमिश्नरी की ओर से सूबे के सलाहकारी सभा के सभासद् थे। विट्ठलदास जी की बात सुनकर बोले मेरे योग्य से जो सेवा होगा वह मैं करने को तैयार हूँ। लेकिन उद्योग यह होना चाहिये कि उन कुप्रथाओ का सुधार किया जाये जिनके कारण ऐसी समस्याएँ उपस्थित होती है। इस समय आप एक की रक्षा कर ही लेंगे तो इससे क्या होगा? यहाँ तो नित्य ही ऐसी दुर्घटनाएं होती रहती है। मूल कारणों का सुधार होना चाहिये। आपकी इजाजत हो तो मैं कुछ प्रश्न पूछ सकता हूँ? विट्ठलदास उछलकर बोल, जी हाँ, यह तो बहुत ही उत्तम होगा? डाक्टर साहब ने तुरन्त प्रश्नों की एक माला तैयार की-- (१) क्या गवर्नमेंट बता सकती है कि गत वर्ष वेश्याओं की संख्या कितनी थी? (२) क्या गवर्नमेंट ने इस बात का पता लगाया है कि इस वृद्धि के कारण क्या है और सरकार उसे रोकने के लिये क्या उपाय करना चाहती है? (३) ये कारण कहाँ तक मनोविकारों से संबंध रखते है, कहाँ तक आर्थिक स्थिति और कहाँ तक सामाजिक कुप्रथाओं से? इसके बाद डॉक्टर साहब अपने मुवक्किलो से बाते करने लगे; विट्ठलदास आध घंटे तक बैठे रहे, अन्त में अधीर होकर बोले, तो मुझे क्या आज्ञा होती है? श्यामाचरण-आप इतमीनान रक्खे, अबकी कौसिलकी बैठक मे मैं गवर्नमेंट का ध्यान इस ओर अवश्य आकर्षित करूँगा। विट्ठलदास के जी में आया कि डाक्टर साहब को आडे हाथो लूँ, किन्तु कुछ सोचकर चुप रह गये। फिर किसी बड़े आदमी के पास जाने का सहस न हुआ। लेकिन उस कर्मवीर ने उधोग से मुँह नहीं मोडा़। नित्य किसी सज्जन के पास जाते और उससे सहायता की याचना करते। यह उधोग सर्वथा निष्फल तो नहीं हुआ। उन्हे कई सौ रुपये के वचन और कई सौ रुपये नकद मिल गये, लेकिन ३०) मासिक की जो कमी थी वह इतने धन से क्या पूरी होती? तीन महीने की दौड़-धूप के बाद वह बडे़ मुश्किल से १०) मासिक का प्रबंध करने मे सफल हो सके। अन्त मे जब उन्हें अधिक सहायता की कोई आशा न रही तो वह एक दिन प्रातःकाल सुमनवाई के पास गये। वह इन्हे देखते ही कुछ अनमनी-सी होकर बोली, कहिये महाशय, कैसे कृपा की? विट्ठल--तुम्हे अपना वचन याद है? सुमन--इतने दिनो की बाते अगर मुझे भूल जायें तो मेरा दोष नहीं। विट्ठल--मैने तो बहुत चाहा कि शीघ्र ही प्रबन्ध हो जाय, लेकिन ऐसी जाति से पाला पडा़ है। जिसमें जातियता का सर्वथा लोप हो गया है। तिसपर भी मेरा उधोग बिलकुल व्यर्थ नहीं हुआ। मैने ३०) मासिकका प्रबन्ध कर लिया है और आशा है कि और जो कसर है वह भी पूरी हो जायगी। अब तुम से मेरी यह प्रार्थना है कि इसे स्वीकार करो और आज ही नरककुण्ड को छोड़ो दो। सुमन-- शर्माजी को आप नहीं ला सके क्या? बिट्ठल-यह किसी तरह जाने पर राजी न हुए। इस ३० में २० मासिक का वचन उन्होंने दिया है। सुमन ने विस्मित होकर कहा अच्छा! वह तो बड़े उदार व्यक्ति निकले। सेठों से भी कुछ मदद मिली? बिट्ठल—सेठों की बात न पूछों। चिम्मनलाल रामलीला के लिये हजार दो हजार रुपये खुशी से दे देंगे। बलभद्र से अफसरों की बधाई के लिये इससे भी अधिक मिल सकता है, लेकिन इस विषय में उन्होंने कोरा जवाब दिया। सुमन इस समय सदन के प्रेमजाल में फंसी हुई थी। प्रेम का आंनन्द उसे कभी प्राप्त नहीं हुआ था, इस दुर्लभ रत्न को पाकर वह उसे हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। यद्यपि वह जानती थी कि इस प्रेम का परिणाम वियोग के सिवा और कुछ नहीं हो सकता था लेकिन उसका मन कहता था कि जब तक यह आंनन्द मिलता है तब तक उसे क्यों न भोगूँ। आगे चलकर न जाने क्या होगा, जीवन की नाव न जाने किस-किस भंवर में पड़ेगी, न जाने कहाँ-कहाँ भटकेगी। भावी चिंताओ को वह अपने पास न आने देती थी। क्योंकि उधर भयंकर अंधकार के सिवा और कुछ न सूझता था। अतएव जीवन के सुधार का वह उत्साह, जिसके वशीभूत होकर उसने विट्ठलदास से वह प्रस्ताव किये थे, क्षीण हो गया था। इस समय अगर विट्ठलदास १०० मासिक को लोभ दिखाते तो भी वह खुश न होती, किन्तु एक बार जो बात खुद ही उठाई थी उससे फिरते हुए शर्म आती थी। बोली, में इसका जवाब आपको कल दूँगी। अभी कुछ सोचने दीजिये। विट्ठल-इसमें क्या सोचना समझना है? सुमन-कुछ नही, लेकिन कल ही पर रखिये। रात के दस बज गये थे। शरद ऋतु की सुनहरी चाँदनी छिपी हुई थी। सुमन खिड़की से नीलवर्ण आकाश की ओर ताक रही थी। जैसे चांदनी के प्रकाश में तारागण की ज्योति मलीन पड़ गई थी, उसी प्रकार उसके हृदय से चन्द्ररूपी सुविचार ने विकाररू़पी तारागण को ज्योतिहीन कर दिया था। सुमन के सामने एक कठिन समस्या उपस्थित थी, विट्ठलदास को क्या उत्तर दूँ? आज प्रात:काल उसने कल जवाब देने का बहाना करके विट्ठलदास को टाला था। लेकिन दिन भर के सोच-विचार ने उसके विचारो में कुछ संशोधन कर दिया था। सुमन को यद्यपि यहाँ भोग-विलास के सभी सामान प्राप्त थे, लेकिन बहुधा उसे ऐसे मनुष्यों की आवभगत करनी पड़ती थी जिनकी सूरत से उसे घृणा होती थी, जिनकी बातों को सुनकर उसका जी मचलाने लगता था। अभी उसके मन मे उत्तम भावों का सर्वथा लोप नही हुआ था। वह उस अधोगति को नहीं पहुँची थी जहाँ दुर्व्यसन हृदय के समस्त भावों को नष्ट कर देता है। इसमे संन्देह नही कि वह विलास की सामग्रियों पर जान देती थी, लेकिन इन सामग्रियों की प्राप्ति के लिये जिस बेहयाई की जरूरत थी वह उसके लिये असहय थी और कभी कभी एकान्त में वह अपनी वर्तमान दशा को पूर्वावस्था से तुलना किया करती थी। वहाँ यह टीमटाम न थी, किन्तु वह अपने समाज में आदर की दृष्टि से देखी जाती थी। वह अपनी सामने अपनी कुलीनता पर गर्व कर सकती थी, अपनी धार्मिकता और भक्ति भाव का रोब जमा सकती थी। किसी के सम्मुख उसका सिर नीचा नही होता था। लेकिन यहाँ उसके सगर्व हृदय को पग-पगपर लज्जा से मुँह छिपाना पड़ता था। उसे ज्ञात होता था कि मैं किसी कुलटा के सामने भी सिर उठाने योग्य नहीं हूँ। जो निरादर और अपमान उसे उस समय सहने पड़ते थे उनको अपेक्षा यहाँ की प्रेमवार्ता और आँखों की सनकियाँ अधिक दुःखजनक प्रतीत होती थीं और उसके भावपूर्ण हृदयपर कुठाराघात कर देती थी। तब उसका व्यथित हृदय पद्मसिंह पर दाँँत पीसपर रह जाता था। यदि उस निर्दय मनुष्यन ने अपनी बदनामी के भय से मेरी अवहेलना न की होती तो मुझे इस पापकुण्ड में कूदने का साहस न होता। अगर वह मुझे चार दिन भी पड़ा रहने देते तो कदाचित् मैं अपने घर लौट जाती अथवा वह (गजाधर) ही मुझे मना ले जाते, फिर उसी प्रकार लड़-झगड़कर जीवनके दिन काटने कटने लगते। इसलिये उसने विट्ठलदास से पद्मसिंह को अपने साथ लाने की शर्त की थी। लेकिन जब आज जब विट्ठलदस से उसे ज्ञात हुआ कि शर्माजी मुझे उबारने के लिये कितने उत्सुक हो रहे है और कितनी उदारता के साथ मेरी सहायता करने पर तैयार है तो उनके प्रति घृणा के स्थान पर उसके मन मेें श्रद्धा उत्पन्न हुई। वह बड़े सज्जन पुरुष है। मैं खामखाह अपने दुराचार का दोष उनके सिर रखती हूँँ। उन्होने मुझपर दया की है। मैं जाकर उनके पैरो पर गिर पड़ूगी और कहूँगी कि आपने इस अभागिनी का उपकार किया है उसका बदला अपको ईश्वर देगे: यह कंगन भी लौटा दूँ, जिसमें उन्हें यह संतोष हो जाय कि जिस आत्मा की मैंने रक्षा की है, वह सर्वथा उसके अयोग्य नहीं है। बस, वहाँ से आकर इस पाप के माया जाल से निकल भागूँ। लेकिन सदन को कैसे भुलाऊँगी। अपने मन की इस चंचलता पर वह झुझला पड़ी। क्या उस पापमय प्रेम के लिये जीवन-सुधारक इस दुर्लभ अवसर को हाथ से मैं जाने दूँ! चार दिन की चाँदनी के लिये सदैव पाप के अन्धकार में पड़ी रहूँ? अपने हाथ से एक सरल हृदय युवक का जीवन नष्ट करूं? जिस सज्जन पुरुष ने मेरे साथ वह सद्व्यवहार किया है उन्ही के साथ यह छल! यह कपट नहीं, मैं इस दूषित प्रेम को हृदय से निकाल दूँगी। सदन को भूल जाऊँगी। उससे कहूँगी, तुम भी मुझे इस मायाजाल से निकलने दो। आह! मुझे कैसा धोखा हुआ! यह स्थान दूर से कितना मुहावना, मनोरम, कितना सुख मय दिखाई देता था। मैंने इसे फूलो का बाग समझा, लेकिन है क्या? एक भंयकर वन, मांसाहारी पशुओं और विषैले कीड़ो से भरा हुआ। यह नदी दूर से चाँद की चादर-सी बिछी हुई कैसी भली मालूम होती थी? पर अन्दर क्या मिलता है? बड़े बडे़ विकराल जल जन्तुओं का क्रीडास्थल! सुमन इसी प्रकार विचार सागर में मग्न थी। उसे यह उत्कंठा हो रही थी कि किसी तरह सवेरा हो जाय और विट्ठलदास आ जाये, किसी तरह यहाँ से निकल भागूँ। आधी रात बीत गई और उसे नींद न आई। धीरे धीरे उसे शंका होने लगी कि कही सबेरे विट्ठलदास न आये तो क्या होगा? क्या मुझे फिर यहाँ प्रात:काल से संध्या तक मीरासियों और धाड़ियों की चापलूसियाँ सुननी पड़ेगी। फिर पापरजोलिप्त पुतलियों का आदर सम्मान करना पड़ेगा? सुमन को यहाँ रहते हुए अभी छः मास भी पूरे नहीं हुए थे लेकिन इतने ही दिनों में उसे यहाँ का पूरा अनुभव हो गया था। उसके यहाँ सारे दिन मीरासियों का जमघट रहता था। वह अपने दुराचार, छल और क्षुद्रता की कथाएँ बड़े गर्व से कहते, उनमें कोई चतुर गिरहकट था, कोई धूर्त ताश खेलने वाला, कोई टपके की विद्या में निपुण कोई दीवार फांदने के फनका उस्ताद और सबके सब अपने दुस्साहस और दुर्बलता पर फूले हुए। पड़ोस को रमणियाँ भी नित्य आती थी, रंगी, बनी ठनी, दीपक के समान जगमगाती हुई किन्तु यह स्वर्णपात्र थे हलाहल से भरे हुए पात्र उन में कितना छिछोरापन था! कितना छल! कितनी कुवासना! वह अपनी निर्लज्जता और कुकर्मों के वृत्तांत कितने मजे ले लेकर कहती। उनमें लज्जा का अंश भी न रहा था। सब ठगने की, छलने की धुन में मन सदैव पापतृष्णा में लिप्त। शहर में जो लोग सच्चिरित्र थे उन्हें यहाँ खूब गालियाँ हो जाती थी, उनकी खूब हंसी उड़ाई जाती थी, बुध्दू गोखा आदि की पदवियाँ दी जाती थी। दिनभर सारे शहर की चोरी और डाके, हत्या और व्यभिचार, गर्भपात और विश्वासघात की घटनाओं की चर्चा रहती। यहाँ का आदर और प्रेम अब अपने यथार्य रूप में दिखाई देता था। यह प्रेम नहीं था, आदर नही था, केवल कामलिप्सा थी। अबतक सुमन धैर्य के साथ यह सारी विपत्तियाँ के झेलती थी, उसने समझ लिया था कि अब इसी नरक कुण्ड में जीवन व्यतीत करना है तो इन बातो से कहाँ तक भागूँ। नरक में पड़कर नारकीय धर्म का पालन करना अनिवार्य था। पहली बार विट्ठलदास जब उसके पास आये थे तो उसने मन में उनकी उपेक्षा की थी, उस समय तक उसे यह रंग ढंग का ज्ञान न था। लेकिन आज मुक्ति का द्वार सामने खुला देखकर इस कारागार में उसे क्षण भर भी ठहरना असहय हो रहा था। जिस तरह अवसर पाकर मनुष्य की पाप चेप्टा जागृत हो जाती है, उसी प्रकार अक्सर पाकर उसकी धर्मचेष्टा भी जागृत हो जाती है। रात के तीन बजे थे। सुमन अभी तक करवटे बदल रही थी, उसका मन वलात् सदन की ओर खिंचता था। ज्यो-ज्यो प्रभात निकट आता था, उसकी व्यग्रता बढ़ती जाती थी। वह अपने मन को समझा रही थी। तू इस प्रेम पर फूला हुआ है? क्या तुझे मालूम नही कि इसका आधार केवल रंग रूप है! यह प्रेम नही है, प्रेम की लालसा है। यहाँ कोई सच्चा प्रेम करने नहीं आता। जिस भाँति मन्दिर मे कोई सच्ची उपासना करने नही जाता, उसी प्रकार उस मंण्डी मे कोई प्रेम का सौदा करने नही आता, सब लोग केवल मन बहलाने के लिये आते है। इस प्रेम के भ्रम मे मत पड़। अरुणोदय के समय सुमन को नींद आ गयी। २२ शाम हो गई। सुमन ने दिन भर विट्ठलदासकी राह देखी, लेकिन वह अब तक नही आये। सुमन के मन में जो नाना प्रकार की शंकाएँ उठ रही थीं वह पुष्ट हो गईं। विट्ठलदास अब नही आवेगे, अवश्य कोई विध्न पड़ा। या तो वे किसी दूसरे काम में फंस गये या जिन लोगों ने सहायता का वचन दिया था पलट गये। मगर कुछ भी हो एक बार विट्ठलदास को यहाँ आना चाहिये था मुझे मालूम तो हो जाता कि क्या निश्चय हुआ। अगर कोई मेरी सहायता न करता, न करे, मैं अपनी मदद आप कर लूँगी, केवल एक सज्जन पुरुष की आड़ चाहिये। क्या विट्ठलदास से इतना भी नही होगा। चलूँ, उनसे मिलूँ और कह दूँ कि मुझे आर्थिक सहायता की इच्छा नही है, आप इसके लिये हैरान न हों, केवल मेरे रहने का प्रबंध कर दे और मुझे कोई काम बता दें, जिससे मुझे सूखी रोटियाँ मिल जाया करे, मैं और कुछ नही चाहती। लेकिन मालूम नही, वह कहां रहते है, वे पते-ठिकाने कहाँ कहाँ भटकती फिरूंगी। चलूँ पार्क की तरफ, लोग वहाँ हवा खाने आया करते हैं, सम्भव है, उनसे भेंट हो जाये। शर्माजी नित्य उधर ही घूमने जाया करते है, संभव है, उन्हीं से भेंट हो जाय। उन्हें यह कंगन दे देंगी और इसी बहाने से इस विषय में भी कुछ बातचीत कर लूँगी। यह निश्यच करके सुमन ने एक किराये की बग्घी मँगवाई और अकेले सैर को निकली। दोनों खिडकियाँ बन्द कर दी, लेकिन झँझरियों से झाँकती जाती थी। छावनी की तरफ दूर तक इधर उधर ताकती चली गई लेकिन दोनों आदमियों में कोई भी न दिखाई पड़ा। वह कोचवान को कुइन्स पार्क की तरफ चलन के लिये कहना ही चाहती थी कि सदन घोड़े को दौड़ाता हुआ आता दिखाई दिया। सुमन का हृदय उछलने लगा। ऐसा जान पड़ा मानो इसे बरसों बाद देखा है। स्थान बदलने से कदाचित् प्रेम में नया उत्साह आ जाता है। उसका जी चाहा कि उसे आवाज दें लेकिन जब्त कर गई। जब तक आँखो से ओझल न हुआ उसे सतृष्ण प्रेम दृष्टि से देखती रही। सदन के सर्वांगपूर्ण सौंदर्य पर वह कभी इतनी मुग्ध न हुई थी। वग्घी कुइन्स पार्क की ओर चली। यह पार्क शहर से बहुत दूर था। कम लोग इधर आते थे। लेकिन पद्मसिंह का एकान्त प्रेम उन्हें यहाँ खीच लाया था। यहाँ विस्तृत मैदान मे एक तकियेदार बेच पर बैठे हुए वह घंटों विचार से मन रहे। ज्योही बग्घी फाटक के भीतर आई सुमन को शर्माजी मैदान में अकेले बैठे दिखाई दिये। सुमन का हृदय दीपशिखा की भाँति थरथराने लगा। भय की इस दशा का ज्ञान पहले होता तो वह यहाँ तक आ ही न सकती। लेकिन इतनी दूर आकर और शर्माजी को सामने बैठे देखकर निष्काम लौट जाना मूर्खता थी। उसने जरा दूर पर बग्घी रोक दी और गाड़ी से उतरकर शर्माजी की ओर चली, उसी प्रकार जैसे शब्द वायु के प्रतिकूल चलता है। शर्माजी कुतूहल से बग्घी देख रहे थे। उन्होने सुमन को पहचाना नहीं, आश्चर्य हो रहा था कि यह कौन महिला इधर चली आ रही है। विचार किया कि कोई ईसाई लेडी होगी, लेकिन जब सुमन समीप आ गई तो उन्होने उसे पहचाना। एक बार उसकी ओर दबी आँखों से देखा, फिर जैसे हाथ पाँव फूल गये हो। जब सुमन सिर झुकाये हुए उनके सामने आकर खड़ी हो गई तो वह झेंपे हुए दीनतापूर्ण नेत्रो से इधर-उधर देखने लगे, मानो छिपने के लिये कोई बिल ढूँढ रहे हो। तब अकस्मात् वह लपककर उठे अीर पीछे की और फिरकर वेग के साथ चलने लगे। सुमन पर जैसे वज्रपात हो गया। वह क्या आशा मन में लेकर आयी थी और क्या आँखों से देख रही है! प्रभु यह मुझे इतना नीच और अधम समझते है कि मेरी परछाई से भी भागते है। वह श्रद्धा जो उसके हृदय मे शर्माजी के प्रति उत्पन्न हो गई थी, क्षण मात्र में लुप्त हो गई। बोली, में आपसे कुछ कहने आई हुँ, जरा ठहरिये मुझ पर इतनी कृपा कीजिये। शर्माजी ने और भी कदम बढ़ाया, जैसे कोई भूत देख कर वहाँ से भागे। सुमन से यह अपमान न सहा गया। तीव्र स्वर से बोली, मैं आापसे कुछ माँगने नही आई हूँ कि आप इतना डर रहे है। मैं आपको केवल यह कंगन देने आई हूँ। यह लीजिए अब में आपने आप ही चली जाती हूँ। यह कहकर उसने कंगन निकाल कर शर्माजी की तरफ फेंका। शर्माजी ठिठक गये, जमीन पर पड़े हुए कंगन को देखा। यह सुभद्रा का कंगन था। सुमन बग्घी की तरफ कई कदम जा चुकी थी। शर्माजी उसके निकट आकर बोले, तुम्हें यह कंगन कहाँ मिला? सुमन अगर मैं आपकी बातें न सुनूँ और मुँह फेर कर चली जाऊँ तो आपको बुरा न मानना चाहिये। पद्म—सुमन बाई, मुहँ लज्जित न करो मैं तुम्हारे सामने मुँह दिखाने योग्य नहीं हूँ। सुमन-क्यों? पद्म-मुझे बार-बार यह वेदना होती है कि अगर उस अवसर पर मैंने तुम्हें अपने घर से जाने के लिये न कहा होता तो यह नौबत न आती। सुमन-तो इसके लिये आपको लज्जित होने की क्या आवश्यकता है? अपने घर से निकाल कर आपने मुझपर बड़ी कृपा की, मेरा जीवन सुधार दिया। शर्माजी इस ताने से तिलमिला उठे, अगर यह कृपा है तो गजाधर पाँडे और विट्ठलदास की है, मैं ऐसी कृपा का श्रेय नही चाहता। सुमन—आप 'नेकीकर और दरिया में डाल' वाली कहावत पर चले, पर मैं तो मन में आपका एहसान मानती हूँँ। शर्माजी, मेरा मुँह न खुलवाइये, मन की बात मन ही में रहने दीजिये, लेकिन आप जैसे सहृदय मनुष्य से मुझे ऐसी निर्दयता की आशा न थी। आप चाहे समझते हों कि आदर और सम्मान की भुख बड़े आदमियो की ही होती है किन्तु दीनदशा वाले प्रणियों को इसकी भूख और अधिक होती है, क्योंकि उनके पास इसके प्राप्त करने का कोई साधन नहीं होता। वे इसके लिये चोरी, छल कपट सब कुछ कर बैठते है। आदर में वह संतोष है जो धन और भोग विलास में भी नहीं है। मेरे मन से नित्य यही चिंता रहती थी कि यह आदर कैसे मिले। इसका उत्तर मुझे कितनी ही बार मिला, लेकिन होली वाले दिन जो उत्तर मिला, उसने भ्रम दूर कर दिया, मुझे आदर और सम्मान का मार्ग दिखा दिया। यदि मैं उस जलसे में न आती तो आज मैं अपने झोपड़े मे संतुष्ट होती! आपको में बहुत सच्चरित्र पुरुष समझती थी, इसलिये आपकी रसिकता का मुझ पर और भी प्रभाव पड़ा। भोलीबाई आपके सामने गर्व से बैठी हुई थी, आप उसके सामने आदर और भक्ति की मूर्ति बने हुए थे। आपके मित्र-वृन्द उसके इशारों पर कठपुतली की भाँति नाचते थे। एक सरलहृदय आदर को अभिलापिणी स्त्री पर इस दृश्यकता जो फल हो सकता था वही मुझपर हुआ, पर अब उन बातों का क्या जो हुआ वह हुआ। आपको क्यों दोष दूँ? यह सब मेरा अपराध था। मैं....... सुमन और कुछ कहना चाहती थी, लेकिन शर्माजी ने, जो इस कथा को बड़े गंभीर भाव से सुन रहे थे, बात काट दी और पूछा, सुमन, ये बातें तुम मुझे लज्जित करने के लिये कह रही हो या सच्ची है? सुमन-कह तो मैं आपको लज्जित करने के लिये रही हूँ लेकिन बातें सच्ची है। इन बातों को बहुत दिन हुए। मैंने सब भुला दिया था लेकिन इस समय आपने मेरी परछाई से भी दूर रहने की कोशिश करके वे सब बातें मुझे याद दिला दी। लेकिन अब मुझे स्वयं पछतावा हो रहा है, मुझे क्षमा कीजिये। शर्माजी ने सिर न उठाया, फिर विचार मे डूब गये। सुमन उन्हें धन्यवाद देने आई थी, लेकिन बातों का कुछ क्रम ऐसा बिगडा़ कि उसे इसका अवसर ही न मिला और अब इतनी अप्रिय बातों के बाद उसे अनुग्रह और कृपा की चर्चा असंगत जान पड़ी। वह अपनी बग्घी की ओर चली। एकाएक शर्माजी ने पूछा-और कंगन? सुमन--यह मुझे कल सर्राफे में दिखाई दिया। मैंने बहूजी के हाथों में इसे देखा था, पहचान गई; तुरन्त वहाँ से उठा लाई। शर्मा--कितना देना पड़ा? सुमन-कुछ नहीं, उलटे सर्राफे पर और धौंस जमाई। शर्मा-सर्राफ का नाम बता सकती हो। सुमन-नहीं, वचन दे आई हूँ। यह कहकर सुमन चली गई। शर्माजी कुछ देर तक तो बैठे रहे, फिर बेंचपर लेट गये। सुमन का एक एक शब्द उनके कानों में गूँज रहा था। वह ऐसे चिंतामग्न हो रहे थे कि कोई उनके सामने आकर खड़ा हो जाता तो भी उन्हे खबर न होती। उनके विचारों ने उन्हें स्तंभित कर दिया था। ऐसा मालूम होता था मानों उनके मर्मस्थान पर कड़ी चोट लग गई है, शरीर में एक शिथिलता सी प्रतीत होती थी। वह एक भावुक मनुष्य थे। सुभद्रा अगर कभी हँसी में भी कोई चुभती हुई बात कह देती तो कई दिनों तक वह उनके हृदय को भयभीत रहती थी। उन्हें अपने व्यवहार पर, आचार विचार पर, अपने कर्तव्यपालन पर अभिमान था। आज वह अभिमान चूर-चूर हो गया। जिन अपराध को उन्होंने पहले गजाधर और विट्ठलदास के सिर मढ़कर अपने को संतुष्ट किया था, वही आज सौगुने बोझले बाते उनके सिर पर लद गया! सिर हिलाने की भी जगह न थी। वह इस अपराध से दबे जा रही थी। विचार तीव्र होकर मूर्तिमान हो जाता है। कहीं बहुत दूर से उनके कान में आवाज आई वह जलसा न होता तो आज मैं अपने झोपड़े मे मग्न होती। इतने में हवा चली, पत्तियाँ हिलने लगी, मानो वृक्ष अपने काले, भयंकर सिरो को हिला हिलाकर कहते थे, सुमन की यह दुर्गति तुमने की है। शर्मा जी घबरा कर उठे, देर होती थी? सामने गिरजाघर का ऊँचा शिखर था। उसमें घण्टा बज रहा था। घण्टे की सुरीली ध्वनि कह रही थी, सुमन की यह दुर्गति तुमने की। शर्माजी ने बलपूर्वक विचारों को समेट कर आगे कदम बढ़या। आकाश पर दृष्टि पड़ी। काले पटल पर उज्ज्वल दिव्य अक्षरों में लिखा हुआ था, सुमन की यह दुर्गति तुमने की। जैसे किसी चटैल मैदान में सामने से उमड़ी हुई काली घटाओं को देखकर मुसाफिर दूर अकेले वृक्ष की ओर सवेंग चलता है उसी प्रकार शर्माजी लम्बे लम्बे पग धरते हुए उस पार्क से आबादी की तरफ चले, किन्तु विचार चित्र को कहाँ छोड़ते? सुमन उनके पीछे पीछे आती थी, कभी सामने आकर रास्ता रोक लेती और कहती, मेरी यह दुर्गति तुमने की है। कभी इस तरफ से कभी उस तरफ से निकल आती और यही शब्द दुहराती। शर्मा जी ने बड़ी कठिनाई से उतना रास्ता तय किया, घर आये और कमरे में मुँह ढाँपकर पड़े रहे। सुभद्रा ने भोजन करने के लिए आग्रह किया तो उसे सिर दर्द का बहाना करके टाला। सारी रात सुमन उनके हृदय में बैठी हुई उन्हे कोसती रही, तुम विद्वान् बनते हो, तुमको अपने बुद्धि विवेक पर घमंड है, लेकिन तुम फूस झोपड़ों के पास बारूद की हवाई फुलझड़ियाँ छोड़ते हो। अगर तुम अपना धन फूंकना चाहते हो तो जाकर मैदान में फूंको, गरीब दुखियों का घर क्यों जलाते हो? प्रात:काल शर्माजी विट्ठलदास के घर जा पहुँचे। २० सुभद्रा को संध्या के समय कंगन की याद आई। लपकी हुई स्नान घर में गई। उसे खूब याद था कि उसने यही ताक पर रख दिया था, लेकिन उसका वहाँ पता न था, इस पर वह घबराई। अपने कमरे के प्रत्येक ताक और आालमारी को देखा, रसोई के कमरे में जाकर चारों ओर ढूँढा घबराहट और भी बढ़ी। फिर तो उसने एक-एक सन्दूक, एक एक कोना छान मारा मानो कोई सूई ढूँढ रही है, लेकिन कुछ पता न चला। महरी से पूछा तो उसने बेटे की कसम खाकर कहा, मैं नहीं जानती। जीतन को बुलाकर पूछा, वह बोला, मालकिन, बुढ़ा यह दाग मत लगाओ मुझ पर। सारी उमिर भले भले आदमियों की चाकरी ही में कटी है, लेकिन कभी नीयत नही बिगाड़ी, अब कितने दिन जीना है कि नीयत बद करूँगा। सुभद्रा हताश हो गई, अब किससे पूछे? जी न माना, फिर सन्दूक, कपडो की गठरियाँ आदि खोल-खोलकर देखी। आटा दाल की हाँडियाँ भी न छोड़ी, पानी मटकी पे हाथ डालडाल कर टटोला पानी ना मिलने पर निराश होकर चारपाई पर लेट गई। उसने सदन को स्नान गृह में जाते देखा था, शंका हुई कि उसी ने हंसी से छिपाकर रखा हो, लेकिन उससे पूछने की हिम्मत न पड़ी। सोचा शर्मा जी घुमकर खाना खाने आयें तो उनसे कहूँगी। ज्योंही शर्मा जी घर में आये। सुभद्रा ने उनसे रिपोर्ट की! शर्मा जी कहा अच्छी तरह देखो, घर ही में होगा, ले कौन जायेगा? सुभद्रा—घर की एक एक अँगुल जमीन छान डाली। शर्मा जी-—नौकरो से पुछा? सुभद्रा सबसे पूछा, दोनो कसम खाते है, मुझे खूब याद है कि मैंने उसे नहाने के कमरे मे ताकपर रख दिया था। शर्मा जी-तो क्या उसके पर लगे थे जो आप ही उड़ गया? सुभद्रा—नौकरो पर तो मेरा सन्देह नहीं है। शर्माजी-तो दूसरा कौन ले जायगा? सुभद्रा-—कहो तो सदन से पूछूँ? मैं ने उसे उस कमरे में जाते देखा था, शायद दिल्लगी के लिये छिपा रखा हो। शर्मा जी-—तुम्हारी भी क्या समझ है। उसने छिपाया होता तो कह न देता? सुभद्रा तो पूछने में हर्ज ही क्या है? सोचता हो कि खूब हैरान करके बताऊँगा। शर्मा-हर्ज क्यों नही है? कही उसने न देखा हो तो समझेगा मुझे चोरी लगाती है। सुभद्रा—उस कमरे में तो वह गया था? मैंने अपनी आँखों देखा। शर्मा जी —तो क्या वहाँ तुम्हारा कंगन उठाने गया था? वे बात की बात करती हो। उससे भूलकर भी न पूछना। एक तो वह ले ही न गया होगा, और ले भी गया होगा, तो आज नही कल दे देगा, जल्दी क्या है? सुभद्रा तुम्हारे जैसा दिल कहाँ से लाऊँ? ढाढ़स तो हो जायगी? शर्मा-चाहे जो कुछ हो, उससे कदापि न पूछना। सुभद्रा उस समय तो चुप हो गई लेकिन जब रातको चाचा भतीजे भोजन करने बैठे तो उससे न रहा गया। सदन से बोली—लाला मेरा कंगन नहीं मिलता, छिपा रखा हो तो दे दो, क्यो हैरान करते हो? सदन के मुख का रंग उड़ गया और कलेजा कांपने लगा। चोरी करके सीनाजोरी करने का ढंग न जानता था। उसके मुँह में कौर था, उसे चबाना भूल गया। इस प्रकार मौन हो गया कि मानों कुछ सुना ही नहीं। शर्माजी ने सुभद्रा की ओर ऐसे आग्नेय नेत्रों से देखा कि उसका रक्त सूख गया। फिर जबान खोलने का साहस न हुआ। फिर सदन ने शीघ्रतापूर्वक दो चार ग्रास खाये और चौके से उठ गया। शर्मा जी बोले, यह तुम्हारी क्या आदत है कि मैं जिस काम को मना करता हूँ वह अदबदा के करती हो। सुभद्रा तुमने उसकी सूरत नहीं देखी? वही ले गया है, अगर झूठ निकल जाय तो जो चोर की सजा वह मेरी। शर्मा—यह सामुद्रिक विद्या कब से सीखी? सुभद्रा-—उसकी सूरत से साफ मालूम होता था। शर्मा अच्छा मान लिया वही ले गया हो तो? कंगन की क्या हस्ती है मेरा तो यह शरीर ही उसी का पाला है। वह अगर मेरी जान माँगे तो में खुशी से दे दूँ! मेरा सब कुछ उसका है, वह चाहे माँगकर ले जाय चाहे उठा ले जाय। सुभद्रा चिढ़ कर बोली, तो तुमने गुलामी लिखाई है, गुलामी करो; मेरी चीज कोई उठा ले जायगा तो मुझसे चुप न रहा जायगा। दूसरे दिन सन्ध्या को जब शर्मा जी सैर करके लौटे तो सुभद्रा उन्हें भोजन करनेके लिये बुलाने गई। उन्होने कंगन उसके सामने फेंक दिया। सुभद्रा ने आश्चर्य से दौड़कर उठा लिया और पहचानकर बोली, मैने कहा था न कि उन्होंने छिपाकर रखा होगा, वही बात निकली न? शर्मा—फिर वही वे सिर पैर की बातें करती हो। इसे मैंने बाजार में एक सर्राफे की दुकान पर पाया है। तुमने सदन पर सन्देह करके उसे भी दुःख पहुँचाया और आपने आप को भी कलुषित किया। २१ विट्ठलदास को सन्देह हुआ कि सुमन ३०) मासिक स्वीकार नहीं करना चाहती, इसलिये उसने कल उत्तर देने का बहाना करके मुझे टाला है। अतएव वह दूसरे दिन उसके पास नही गये। इसी चिन्ता में पड़े रहे कि शेष रुपयों का कैसे प्रबन्ध हो? कभी सोचते दूसरे शहर में डेपुटेशन ले जाऊँ कभी कोई नाटक खेलने का विचार करते। अगर उनका वश चलता तो इस शहरके सारे बड़े-बड़े धनाढ्य पुरुषो को जहाज में भरकर काले पानी में देते। शहर में एक कुंवर अनिरूद्ध सिंह सज्जन उदार पुरुष रहते थे। लेकिन विट्ठलदास उनके द्वार तक जाकर केवल इसलिये लौट आये कि उन्हें वहाँ तबले की गमक सुनाई दी। उन्होने मन में सोचा, जो मनुष्य राग रंग में इतना लिप्त है वह इस काम में मेरी क्या सहायता करेगा? इस समय उसकी सहायता करना उनकी दृष्टि में सबसे बड़ा पुण्य और उनकी उपेक्षा करना सबसे बडा पाप था। वह इसी संकल्प विकल्प में पड़े हुए थे कि सुमन के पास चलूँ या न चलूँ। इतने में पंडित पद्मसिंह आाते हुए दिलाई दिये आगे चढ़ी हुई लाल और बदन मलिन था। ज्ञात होता था कि सारी राता जागे हैं। चिन्ता और ग्लानि की मूर्ति बने हुए थे। तीन महीनें से विट्ठलदास उनके पास नहीं गये थे, उनकी ओर से हृदय फट गया था। लेकिन शर्माजी की यह दशा देखते ही पिघल गये और प्रेम से हाथ मिलाकर बोले, भाई साहब उदास दिखाई देते हो, कुशल तो है? शर्मा—जी हाँ, सब कुशल ही है, इधर महीनो से आपकी भेंट नहीं हुई, मिलने को जी चाहता था, सुमन के विषय में क्या निश्चय किया? विट्ठल—उसी चिन्तामें तो रात-दिन पड़ा रहता हूँ। इतना बड़ा शहर है पर ३०) मासिक का प्रबन्ध नहीं हो सकता। मुझे ऐसा अनुमान होता है कि मुझे माँगना नही आता। कदाचित् मुझमें किसी के हृदय को आकर्षित करने की सामर्थ्य नही है। मैं दूसरों को दोष देता हूँ, पर वास्तव में दोष मेरा ही है। अभी तक केवल १०) का प्रबन्ध हो सका है! जितने रईस है सब के सब पाषाण हृदय। अजी रईसों की बात तो न्यारी रही, मि० प्रभाकर राव ने भी कोरा जवाब दिया। उनके लेखों को पढ़ो तो मालूम होता है कि देशानुराग और दया के सागर है, होली के जलसे के बाद महीनों तक आप पर विष की वर्षा करते रहे, लेकिन कल जो उनकी सेवा में गया तो बोले, क्या जातिका सबसे बड़ा ऋणी मैं ही हूँ, मेरे पास लेखनी है, उससे जाति की सेवा करता हूँ, जिसके पास धन हो, वह घन से सेवा करे। उनकी बातें सुनकर चकित रह गया। नया मकान बनवा रहे हैं, कोयले की कंपनी में हिस्से खरीदे है, लेकिन इस जातीय काम से साफ निकल गये। अजी, और लोग जरा सकुचाते तो है, उन्होने तो उल्टे मुझी को आड़े हाथ लिया। शर्माजी-आपको निश्चय है कि सुमनबाई ५०) पर विधवाश्रम में चली आवेगी? विट्ठल–हाँ मुझे निश्चय है, यह दूसरी बात है कि आश्रम कमेटी उसे लेना पसन्द न करे। तब कोई और प्रबन्ध करूँगा। शर्मा—अच्छा तो लीजिये, आपकी चिन्ताओं का अन्त किये देता हूँ में ५०) मासिक देने पर तैयार हूँ और ईश्वर ने चाहा तो आजन्म देता रहूँगा। विट्ठलदास ने विस्मय से शर्माजी की तरफ देखा और कृतज्ञतापूर्ण भाव से उनके गले लिपटकर बोले, भाई साहब तुम धन्य हो! इस समय तुमने वह काम किया है कि जी चाहता है, तुम्हारे पैरो पर गिरकर रोऊँ। तुमने हिन्दू जाति की लाज रख ली और सारे लखपतियो के मुँह में कालिख लगा दी। लेकिन इतना भारी बोझ कैसे सभालोगे? शर्मा—सब हो जायगा, ईश्वर कोई-न-कोई राह अवश्य निकालेंगे ही। विट्ठल-आजकल आमदनी अच्छी हो रही है क्या? शर्मा-आमदनी नहीं पत्थर हो रही है, घोड़ागाड़ी बेच दूँगा, ३०) की बचत यो हो जायगी, बिजली का खर्च तोड़ दूँगा १०) यों निकल आवेंगे, १०) और इधर-उधर से खीच खाँचकर निकाल लूँगा। विट्ठल-तुम्हारे ऊपर अकेले इतना बोझ डालते हुए मुझे कष्ट होता है, पर क्या करूँ, शहर के बड़े आदमियों से हारा हुआ हूँ। गाड़ी बेच दोगे तो कचहरी कैसे जाओगे? रोज किराये की गाड़ी करनी पड़ेगी। शर्मा- जी नही, किराये की गाड़ी की जरूरत न पड़ेगी! मेरे भतीजे ने एक सब्ज घोड़ा ले रक्खा है, उसी पर बैठकर चला जाया करूँगा। विट्ठल-अरे वही तो नही है, जो कभी-कभी शाम को चौक में घूमने निकला करता है? शर्मा-संभव है वही हो। विट्ठल-सूरत आपसे बहुत मिलती है, धारीदार सर्ज का कोट पहनता है, खूब हृष्ट-पुष्ट है, गोरा रंग, बड़ी बड़ी आँखे कसरती जवान है। शर्मा-जी हाँ, हुलिया तो आप ठीक बताते है। वही है। विट्ठल—आप उसे बाजार में घूमने से रोकते क्यों नहीं? शर्मा—मुझे क्या मालूम कहाँ घूमने जाता है। संभव है कभी-कभी बाजार की तरफ चला जाता हो, लेकिन लड़का सच्चरित्र है-इसलिये मैने कभी चिन्ता नहीं की। विट्ठल-यह आपसे बड़ी भूल हुई। पहले वह चाहे जितना सच्चरित्र हो, लेकिन आजकल उसके रंग अच्छे नही है; मैंने उसे एकबार नहीं, कई बार वहाँ देखा है, जहाँ न देखना चाहिये था। सुमन बाई के प्रेमजाल में पड़ा हुआ मालूम होता है। शर्माजी के होश उड़ गये। बोले, यह तो आपने बुरी खबर सुनाई। वह मेरे कुल का दीपक है, अगर वह कुपथ पर चला तो मेरी जान ही पर बन जायगी। मैं शरम के मारे भाईसाहब को मुँह न दिखा सकूँगा। यह कहते-कहते शर्माजी की आँखें सजल हो गई। फिर बोले, महाशय, उसे किसी तरह समझाइये। भाईसाहब के कानों में इस बात की भनक भी गई तो वह मेरा मुँह न देखेगें। विट्ठल-नहीं, उसे सीधे मार्गपर लाने के लिये उद्योग किया जायगा। मुझे आजतक मालूम ही न था कि वह आपका भतीजा है। मैं आज ही इस कामपर उतारू हो जाऊँगा और सुमन कलतक वहाँ से चली आई तो वह आप ही संभल जायगा। शर्मा-सुमन के चले आने से बाजार थोड़े ही खाली हो जायगा। किसी दूसरी के पंजे फँस जायगा। क्या करूँ, उसे घर भेज दूँ? विट्ठल-वहाँ अब वह रह चुका, पहले तो जायगा ही नहीं, और गया भी तो दूसरे ही दिन भागेगा। यौवनकाल की दुर्वासनाएँ बड़ी प्रबल होती है। कुछ नही यह सब इसी कुप्रथा की करामात है, जिसने नगर के सार्वजनिक स्थानों को अपना कार्यक्षेत्र बना रखा है। यह कितना बड़ा अत्याचार है कि ऐसे मनोविकार पैदा करने वाले दृश्यों को गुप्त रखने के बदले हम उनकी दुकान सजाते है और अपने भोले भाले सरल बालकों की कुप्रवृतियों को जगाते है। मालूम नहीं वह कुप्रथा कैसे चली। में तो समझता हूँ कि विषयी मुसलमान बादशाहों के समय में इसका जन्म हुआ होगा। जहाँ ग्रन्थालय, धर्म सभाएँ और सुधारक संस्थाओं के स्थान होने चाहिए, वहाँ हम रूप का बाजार सजाते है। यह कुवासनाओं को नेवता देना नहीं तो और क्या है? हम जान-बूझकर युवकों को गढ़े में ढकेलते है। शोक! शर्मा-आपने इस विषम कुछ आन्दोलन तो किया था। विट्ठल–हाँ, किया तो था लेकिन जिस प्रकार आप एक बार मौखिक सहानुभूति प्रकट करके मौन साध गये, उसी प्रकार अन्य सहायकों ने भी आना कानी की, तो भाई अकेला चना तो भाड़ नही फोड़ सकता? मेरे पास न धन है न ऐश्वर्य है, न उच्च उपाधियां है, मेरी कौन सुनता है? लोग समझते है, बक्की है। नगर में इतने सुयोग्य विद्वान् पुरुष चैन से सुख भोग कर रहे हैं कोई भूलकर भी मेरी नहीं सुनता। शर्मा जी शिथिल प्रकृति के मनुष्य ये। उन्हें कर्तव्य क्षेत्र में लाने के लिये किसी प्रबल उत्तेजना को आवश्यकता थी। मित्रो की वाह वाह जो प्राय:मनुष्य की सुप्तावस्था को भंग किया करती है उनके लिये काफी न थी। वह सोते नही थे, जागते थे। केवल आलस्य कारण पड़े हुए थे। इसलिये उन्हें जगाने के लिये चिल्लाकर पुकारने की इतनी जरूरत नही थी जितनी किसी विशेष बात की। यह कितनी अनोखी लेकिन यथार्थ बात है कि सोये हुए मनुष्य को जगाने की अपेक्षा जागते हुए मनुष्य को जगाना कठिन है। सोता हुआ आदमी अपना नाम सुनते ही चौंककर उठ बैठता है, जागता हुआ मनुष्य सोचता है कि यह किसकी अवाज है! उसे मुझसे क्या काम है? इससे मेरा काम न निकल सकेगा? जब इन प्रश्नो का संतोषजनक उत्तर उसे मिलता है, तो वह उठता है, नही तो पड़ा रहता है पद्मसिंह इन्हीं जागते हुए आलसियो में से थे। कई बार जातीय पुकारकी ध्वनि उनके कानों में आई थी किन्तु वे सुनकर भी न उठे थे। इस समय जो पुकार उनके कानों में पहुँच रही थी, उसने उन्हें बलात् उठा दिया। अपने भतीजे को जिसे वह पुत्र से भी बढ़कर प्यार करते थे, कुमार्ग से बचाने के लिये अपने भाई की अप्रसन्नता का निवारण करने के लिये वे सब कुछ कर सकते थे। जिस कुव्यवस्था का ऐसा भंयकर परिणाम हुआ उसके मूलोच्छेदन पर कटिबद्ध होने के लिये अन्य प्रमाणों की जरूरत न थी। बाल विधवा-विवाह के घोर शत्रुओं को भी जब तब उसका समर्थन करते देखा गया है। प्रत्यक्ष उदाहरण से प्रबल और कोई प्रमाण नहीं होता। शर्मा जी बोले यदि मैं आपके किसी काम आ सकूँ तो आपकी सहायता करने को तैयार हूँ। विट्ठलदास उल्लसित होकर बोले, भाई साहब, अगर तुम मेरा हाथ बटाओ तो मैं धरती और आकाश एक कर दूँगा लेकिन क्षमा करना, तुम्हारे संकल्प दृढ़ नहीं होते। अभी यों कहते हो, कल ही उदासीन हो जाओगे। ऐसे कामों मे धैर्य की जरूरत है। शर्माजी लज्जित होकर बोले, ईश्वर चाहेगा तो अबकी आपको इसकी शिकायत न रहेगी। विट्ठल—तब तो हमारा सफल होना निश्चित् है। शर्मा-यह तो ईश्वर के हाथ है। मुझे न तो बोलना आता है, न लिखना आता है, बस आप जिस राह पर लगा देगे, उसी पर आँख बन्द किये चला जाऊँगा। विट्ठल-अजी सब आ जायेगा, केवल उत्साह चाहिये। दृढ़ संकल्प हवा मे किले बना देता है, आपकी वक्तृताओं में तो वह प्रभाव होगा कि लोग सुनकर दंग हो जायेगे। हाँ, इतना स्मरण रखियेगा कि हिम्मत नहीं हारनी चाहिये। शर्मा-आप मुझे सँभाले रहियेगा। विट्ठल-अच्छा, तो अब मेरे उद्देश्य भी सुन लीजिये। मेरा पहला उद्देश्य है, वेश्याओं को सार्वजनिक स्थानों से हटाना और दूसरा, वेश्याओं के नाचने गाने की रस्म को मिटाना। आप मुझसे सहमत है या नहीं? शर्मा-क्या अब भी कोई संदेह है? विट्ठल-नाच के विषय में आपके वह विचार तो नही है? शर्मा-अब क्या एक घर जलाकर भी वही खेल खेलता रहूँगा? उन दिनो मुझे न जाने क्या हो गया था, मुझे अब यह निश्चय हो गया है कि मेरे उसी जलसे ने सुमनबाई को घर से निकाला! लेकिन यहाँ मुझे एक शंका होती है। आखिर हम लोगों ने भी तो शहरो ही में इतना जीवन व्यतीत किया है, हम लोग इन दुर्वासनाओं में क्यों नहीं पड़े? नाच भी शहर में आये दिन हुआ ही करते है, लेकिन उनका ऐसा भीषण परिणाम होते बहुत कम देखा गया है। इससे यही सिद्ध होता है कि इस विषय में मनुष्य का स्वभाव ही प्रधान है। आप इस आन्दोलन से स्वभाव तो नहीं बदल सकते। विठ्ठल-हमारा यह उद्देश्य ही नहीं, हम तो केवल उन दशाओं का संशोधन करना चाहते है जो दुर्बल स्वभाव के अनुकल है, और कुछ नहीं चाहते। कुछ मनुष्य जन्म ही से स्थूल होते हैं, उनके लिये खाने पीने की किसी विशेष वस्तु की जरूरत नहीं, कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं जो घी-दूध आदि का इच्छा पूर्वक सेवन करने से स्थूल हो जाते हैं और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सदैव दुबले रहते है, वह चाहे घी दूध के मटके ही में रख दिये जाँय तो भी मोटे नहीं हो सकते। हमारा प्रयोजन केवल दूसरी श्रेणी के मनुष्यों से है। हम और आप जैसे मनुष्य क्या दुर्व्यसन में पडेंगे, जिन्हें पेट के धन्धों से कभी छुट्टी ही नहीं मिली, जिन्हें कभी यह विश्वास ही नहीं हुआ कि प्रेम की मंडी में उनकी आवभगत होगी। वहाँ तो वह फँसते है जो धनी है, रूपवान् है, उदार है, रसिक है। स्त्रियों को अगर ईश्वर सुन्दरता दे तो धन से वंचित न रखे, धनहीन सुन्दर चतुर स्त्री पर दुर्व्यसन का मन्त्र शीघ्र ही चल जाता है। सुमन पार्क से लौटी तो उसे खेद होने लगा कि मैंने शर्माजी को वे जी दुखाने वाली बातें क्यों कही? उन्होने इतनी उदारता से मेरी सहायता की, जिसका मैंने यह बदला किया? वास्तव में मैंने अपनी दुर्बलता का अपराध उनके सिर मढा। संसार में घर-घर नाच गाना हुआ ही करता है, छोटे बड़े दीन दुखी सब देखते है कि और आनन्द उठाते है। यदि मैं अपनी कुचेष्टाओं के कारण आग में कूद पड़ी तो उसमें शर्माजी का या किसी और का क्या दोष? बाबू विट्ठलदास शहर के आदमियों के पास दौड़े, क्या वह उन सेठों के पास न गये होगे जो यहाँ आते है? लेकिन किसी ने उनकी मदद न की, क्यों? इसलिये न की कि वह नहीं चाहते है कि मैं यहाँ से मुक्त हो जाऊँ? मेरे चले जाने से उनको कामतृष्णा में विघ्न पड़ेगा, वह दयाहीन व्याघ्र के समान मेरे हृदय को घायल करके मेरे तड़पने का आनन्द उठाना चाहते है। केवल एक ही पुरुष है, जिसने मुझे इस अन्धकार से निकालने के लिये हाथ बढा़या, उसी का मैंने इतना अपमान किया। मुझे मनमें कितना कृतघ्न समझेंगे। वे मुझे देखते ही कैसे भागे। चाहिये तो यह था कि मैं लज्जा से वहीं गड़ जाती, लेकिन मैंने इस पापभय के लिये इतनी निर्लज्जता से उनका तिरस्कार किया! जो लोग अपने कलुषित भावों से मेरे जीवन को नष्ट कर रहे है, उनका मैं कितना आदर करती हूँ। लेकिन जब, व्याधा पक्षी को अपने जाल में फँसते नहीं देखता तो उसे उस पर कितना क्रोध आता है! बालक जब कोई अशुद्ध वस्तु छू लेता है तो वह अन्य बालकों को दौड़ दौड़कर छूना चाहता है, जिसमें वह भी अपवित्र हो जायें। क्या मैं भी हृदयशून्य व्याधा हूँ या अबोध बालक? किसी ग्रन्थकार से पूछिये कि वह एक निष्पक्ष समालोचक के कटुवाक्यों के सामने विचारहीन प्रशंसा का क्या मूल्य समझता है। सुमन को शर्माजी की यह घृणा अन्य प्रेमियों की रसिकता से अधिक प्रिय मालूम होती थी। रात भर वह इन्ही विचारों में डूबी रही। मन में निश्चय कर लिया कि प्रातःकाल विट्ठलदास के पास चलूँगी और उनसे कहूँगी कि मझे आश्रय दीजिये। मैं आपसे कोई सहायता नहीं चाहती, केवल एक सुरक्षित स्थान चाहती हूँ, चक्की, पिसूंगी, कपड़े सीऊँगी, और किसी तरह अपना निर्वाह कर लूँगी। सवेरा हुआ। वह उठी और विट्ठलदास के घर चलने की तैयारी करने लगी कि इतने में वह स्वयं आ पहुँचे। सुमन को ऐसा आनन्द हुआ जैसे किसी भक्त को आराध्यदेव के दर्शन से होता है। बोली, आइये महाशय! तो कल दिन भर आपकी राह देखती रही, इस समय आपके यहाँ जाने का विचार कर रही थी। विठ्ठलदास--कल कई कारणों से नहीं आ सका। सुमन--तो आपने मेरे रहने का कोई प्रबन्ध किया? विट्ठल--मुझसे तो कुछ नहीं हो सका लेकिन पद्मसिंहने लाज रख ली। उन्होने तुम्हारा प्रण पूरा कर दिया। वह अभी मेरे पास आये थे और वचन दे गये है कि तुम्हे ५०) मासिक आजन्म देते रहेंगे। सुमन के विस्मयपूर्ण नेत्र सजल हो गये। शर्माजीकी इस महती उदारता ने उसके अन्तःकरण को भक्ति, श्रद्धा और विमल प्रेम से प्लावित कर दिया। उसे अपने कटु वाक्यों पर अत्यत क्षोभ हुआ। बोली, शर्माजी दया और धर्म के सागर हैं। इस जीवन में उनसे उऋण नहीं हो सकती। ईश्वर उन्हें सदैव सुखी रक्खें। लेकिन मैंने उस समय जो कुछ कहा था, वह केवल परीक्षा के लिये था। मैं देखना चाहती थी कि सचमुच मुझे उबारना चाहते है या केवल धर्म का शिष्टाचार कर रहे हैं। अब मुझे विदित हो गया कि आप दोनों सज्जन देवरूप है। आप लोगों को वृथा कष्ट नहीं देना चाहती मैं सहानभूति की भूखी थी वह मुझे मिल गई। अब मैं अपने जीवन का भार आप लोगों पर नही डालूँगी। आप केवल मेरे रहने का कोई प्रबन्ध कर दें जहाँ मैं विघ्न बाधा से बची रह सकूँगी। विठ्ठलदास चकित हो गये। जातीय गौरव से आँखें चमक उठी। उन्होंने सोचा, हमारे देश की पतित स्त्रियों के विचार भी ऐसे उच्च होते है। बोले, सुमन तुम्हारे मुँह से ऐसे पवित्र शब्द सुनकर मुझे इस समय जो आनन्द हो रहा है, उसका वर्णन नही कर सकता। लेकिन रुपयों के बिना तुम्हारा निर्वाह कैसे होगा। सुमन-मै परिश्रम करूँगी। देश में लाखों दुखियाएँ है, उनका ईश्वर के सिवा और कौन सहायक है? अपनी निर्लज्जता का कर आपसे न लूँगी। विट्ठल-वे कष्ट तुमसे सहे जायेंगे? सुमन--पहले नहीं सहे जाते थे, लेकिन अब सब कुछ सह लूँगी। यहाँ आकर मझे मालूम हो गया कि निर्लज्जता सब कष्ट से दुसह है। और कष्टों से शरीर को दुःख होता है, इस कष्ट से आत्मा का संहार हो जाता है। मैं ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि उसने आप लोगों को मेरी रक्षा के लिये भेज दिया। विट्ठल-सुमन, तुम वास्तव में विदुषी हो। सुमन-तो मैं यहाँ से कब चलूँ? विठ्ठल-आज ही। अभी मैंने आश्रम की कमेटी में तुम्हारे रहने का प्रस्ताव नहीं किया है, लेकिन कोई हरज नही है, तुम वहाँ चलो, ठहरो। अगर कमेटी ने कछ आपत्ति की तो देखा जायगा। हाँ, इतना याद रखना कि अपने विषय में किसी से कुछ मत कहना, नहीं तो, विधवाओं में हलचल मच जायगी। सुमन---आप जैसा उचित समझे करें मैं तैयार हूँ। विठ्ठल-सन्ध्या समय चलना होगा। विट्ठलदास के जाने के थोड़ी ही देर बाद दो वेश्याएँ सुमन से मिलने आयीं। सुमन ने कह दिया, मेरे सिर में दर्द है। सुमन अपने ही हाथ से भोजन बनाती थी। पतित होकर भी वह खाना पान में विचार करती थी। आज उसने व्रत करने का निश्चय किया था। मुक्ति के दिन कैदियों को भी भोजन अच्छा नहीं लगता। दोपहरको धाडियों का गोल आ पहुँचा। सुमन ने उन्हें भी बहाना करके टाला। उसे अब उनकी सूरत से घृणा होती थी। सेठ बलभद्रदास के यहाँ से नागपुरी संतरे की एक टोकरी आयी, उसे सुमन ने तुरन्त लौटा दया। चिम्मनलाल ने चार बजे अपनी फिटिन सुमन के सैर करने को भेजा उसने उसको भी लौटा दिया। जिस प्रकार अन्धकार के बाद अरुण का उदय होते, ही पक्षी कलरव करने लगते है और बछड़े किलोलों में मग्न हो जाते है, उसी प्रकार सुमन के मन में भी क्रीड़ा करने की प्रबल इच्छा हुई। उसने सिगरेट की एक डिबिया मँगवाई और वारनिश की एक बोतल मँगाकर ताकपर रख दिया और एक कुर्सी का एक पाया तोड़कर कुर्सी छज्जे पर दीवार के सहारे रख दी। पाँच बजते बजते मुंशी अबुलवफा का आगमन हुआ। यह हजरत सिगरेट बहुत पीते थे। सुमन ने आज असाधारण रीति से उनकी आवभगत की और इधर-उधर की बातें करने के बाद बोली, आइये आज आपको वह सिगरेट पिलाऊँ कि आप भी याद करें। अबुलवफा-नेकी और पूछ पूछ। सुमन-देखिये, एक अंग्रेजी दूकान से खास आपकी खातिर मँगवाया है। यह लीजिये। अबुलवफा-तब तो मैं भी अपना शुमार खुश-नसीबों मे करूँगा। वाहरे मैं, वाहरे मेरे साजे जिगर की तासीर! अवुलवफा ने सिगरेट मुँह में दबाया। सुमन ने दियासलाई की डिबिया निकालकर एक सलाई रगड़ी। अवुलवफा ने सिगरेट को जलाने के लिए मुँह आगे बढ़ाया, लेकिन न मालूम कैसे आग सिगरेट में न लगकर उनकी दाढ़ी में लग गई। जैसे पुआल जलता है, उसी तरह एक क्षण में दाढ़ी आधी से ज्यादा जल गई। उन्होने सिगरेट फेंककर दोनो हाथों से दाढ़ी मलना शुरू किया। आग बुझ गई मगर दाढ़ी का सर्वनाश हो चुका था। आइने में लपक कर मुँह देखा दाढ़ी का भस्मावशेष उबाली हुई सुथनी के रेश की तरह मालूम-हुआ। सुमन ने लज्जित होकर कहा, मेरे हाथों में आग लगे। कहाँ से कहाँ मैंने दियासलाई जलाई। उसने बहुत रोका, पर हँसी ओंठ पर आ गई। अवुलवफा ऐसे खिसियाये हुए थे मानों अब वह अनाथ हो गये। सुमन की हँसी अखर गई। उस भोडी सूरत पर खेद और खिसियाहटमका अपूर्व दृश्य था। बोले, यह कबकी कसर निकाली? सुमन-मुन्शीजी, मैं सच कहती हूँ, यह दोनों आँखें फूट जाय अगर मैने जानबूझकर आग लगाई हो। आपसे बैर भी होता तो दाढ़ी बेचारी ने मेरा क्या बिगाड़ा था? अबुल--माशूकों की शेखी और शरारत अच्छी मालूम होती है, लेकिन इतनी नहीं कि मुँह जला दे। अगर तुमने आग से कहीं दाग दिया होता तो इससे अच्छा था। अब यह भुन्नास की सी सूरत, लेकर मैं किसे मुँह दिखाऊँगा। वल्लाह! आज तुमने मटियामेट कर दिया। सुमन--क्या करूँ? खुद पछता रही हूँ। अगर मेरे दाढ़ी होती तो आपको दे देती। क्यों, नकली दाढ़ियाँ भी तो मिलती है? अबुल-सुमन, जस्म पर निमक न छिड़को। अगर दूसरे ने यह हरकत की होती तो आज उसका खून पी जाता। सुमन--अरे, तो थोड़े में बाल ही जल गये या और कुछ महीने दो महीने में फिर निकल आवेंगे। जरा सी बात के लिये आप इतनी हाय-हाय मचा रहे है। अबुल-सुमन जलाओ मत, नहीं तो मेरी जबान से भी कुछ निकल जायगा। मैं इस वक्त आपे में नहीं हूँ। सुमन-नारायण, नारायण, जरासी दाढ़ीपर इतना जामे के बाहर हो गये। मान लीजिये मैंने जानकर ही दाढ़ी जला दी तो? आप मेरी आत्मा को, मेरे धर्म को, हृदय को रोज जलाते है, क्या उनका मूल्य आपकी दाढ़ी से भी कम है? मियाँ, आशिक बनना मुँह का नेवाला नहीं है। जाइये अपने घर की राह लीजिये, अब कभी यहाँ न आइयेगा मुझे ऐसे छिछोरे आदमियों की जरूरत नही है। अबुलवाफा ने क्रोध से सुमन की ओर देखा, तब जेब से रुमाल निकाला और जली हुई दाढ़ी को उसकी आढ़ में छिपा कर चुपके से चले गये। यह वही मनुष्य है, जिसे खुले बाजार एक वेश्या के साथ आमोद प्रमोद में लज्जा नहीं आती थी। अब सदन के आने का समय हुआ। सुमन आज मिलने के लिये बहुत उत्कंठित थी। आज वह अन्तिम मिलाप होगा। आज यह प्रेभाभिनय समाप्त हो जायगा। वह मोहिनी मूर्ति फिर देखने को न मिलेगी। उसके दर्शनों को नेत्र तरस-तरस रहेंगे। वह सरल प्रेम से भरी हुई मधुर बातें सुनने में न आवेगी। जीवन फिर प्रेम विहीन और नीरस हो जायगा। कुलुषित ही पर यह सच्चा था। भगवान्! मुझे यह वियोग सहने की शक्ति दीजिये। नहीं, इस समय सदन न आवे तो अच्छा है, उससे न मिलने में ही कल्याण है; कौन जाने उसके सामने मेरा संकल्प स्थिर रह सकेगा या नहीं, पर वह आ जाता तो एक बार दिल खोलकर उससे बातें कर लेती उसे इस कपट सागर मे डूबने से बचाने की चेष्टा करती। इतने में सुमन ने विट्ठलदास को एक किराये की गाड़ी में से उतरते देखा। उसका हृदय वेग से धड़कने लगा। एक क्षण में विठ्ठलदास ऊपर आ गये बोले, अरे अभी तुमने कुछ तैयारी नही की- सुमन-मैं तैयार हूँ। विठ्ठल-अभी विस्तरे तक नहीं बँधे। सुमन-यहाँ की कोई वस्तु साथ न ले जाऊँगी, यह वास्तव में मेरा 'पुनर्जन्म' हो रहा है। विठ्ठल-यह सामान क्या होगें? सुमन-आप इसे बेचकर किसी शुभ कार्य में लगा दीजियेगा। विठ्ठल-अच्छी बात है, मैं यहाँ ताला डाल दूँगा। तो अब उठो, गाड़ी मौजूद है। सुमन-दस बजे से पहले नहीं चल सकती। आज मुझे अपने प्रेमियों से विदा होना है। कुछ उनकी सुननी है कुछ अपनी कहनी है। आप तब तक छतपर जाकर बैठिये, मुझे तैयार ही समझिये। विठ्ठलदास को बुरा मालूम हुआ पर धैर्य से काम लिया। ऊपर जा के खुली हुई छत पर टहलने लगे। सात बज गये लेकिन सदन न आया। आठ बजे तक सुमन उसकी राह देखती रही, अन्तको वह निराश हो गई। जब से वह यहाँ आने लगा, आज ही उसने नागा किया। सुमन को ऐसा मालूम होता था मानों वह किसी निर्जन स्थान में खो गई है। हृदय में एक अत्यन्त तीव्र किन्तु सरल, वेदनापूर्ण, किन्तु मनोहारी आकांक्षा का उद्वेग हो रहा था। मन पूछता था, उसके न आनेका क्या कारण है? किसी अनिष्ट की आशंका ने उसे बेचैन कर दिया। आठ बजे सेठ चिम्मनलाल आये। सुमन उनकी गाड़ी देखते ही छज्जे पर जा बैठी। सेठ जी बहुत कठिनाई से ऊपर आए और हांफते हुए बोले, कहाँ हो देवी, आज बग्घी क्यों लौटा दी? क्या मुझसे कोई खता हुई। सुमन---यहीं छज्जेपर चले आइये, भीतर कुछ गरमी मालूम होती है। आज सिरमें दर्द था, सैर करने को जी नहीं चाहता था। चिम्मनलाल-हिरिया को मेरे यहाँ क्यों नही भेज दिया, हकीम साहब से कोई नुस्खा तैयार करा देता। उनके पास तेलों के अच्छे अच्छे नुस्खे है। यह कहते हुए सेठजी कुरसी पर बैठे, लेकिन तीन टाँग की कुरसी उलट गई, सेठजी का सिर नीचे हुआ और पैर ऊपर, और वह एक कपड़े की गाँठ के समान औधे मुँह लेट गये। केवल एकबार मुँह से 'अरे' निकला और फिर वह कुछ न बोले। जड़ ने चैतन्य को परास्त कर दिया। सुमन डरी कि चोट ज्यादा आ गई, लालटेन लाकर देखा तो हँसी न रुक सकी सेठजी ऐसे असाध्य पड़े थे, मानों पहाड़ पर से गिर पड़े है। पड़े-पड़े बोले-हाय राम कमर टूट गयी। जरा मेरे साईस को बुलवा दो, घर जाऊँगा। सुमन-चोट बहुत आ गई क्या? आपने भी तो कुरसी खींच ली, दीवार से टिककर बैठते तो कभी न गिरते। अच्छा, क्षमा कीजिये, मुझी से भूल हुई कि आपको सचेत न कर दिया। लेकिन आप जरा भी न सँभले, बस गिर ही पड़े। चिम्मन--मेरी तो कमर टूट गई और तुम्हें मसखरी सूझ रही है। सुमन-तो अब इसमे मेरा क्या वश है? अगर आप हलके होते तो उठाकर बैठा देती। जरा खुद ही जोर लगाइये, अभी उठ बैठियेगा। चिम्मन--अब मेरा घर पहुँचना मुश्किल है। हाय! किस बुरी साइत से चले थे, जीने पर से उतरने में पूरी सांसत हो जायगी। बाईजी, तुमने यह कब का वैर निकाला? सुमन-सेठजी, मैं बहुत लज्जित हूँ। चिम्मन-अजी रहने भी दो, झठ मूठ बाते बनाती हो। तुमने मुझे जानकर गिराया। सुमन क्या आपसे मुझे कोई वैर था? और आपसे वैर हो भी तो आपकी बेचारी कमर ने मेरा क्या बिगाड़ा था? चिम्मन-अब यहाँ आनेवाले पर लानत है। सुमन-सेठजी, आप इतनी जल्दी नाराज हो गये। मान लीजिये मैंने जानबूझकर ही आपको गिरा दिया, तो क्या हुआ? इतने में विट्ठलदास ऊपर से उतर आये। उन्हें देखते ही सेठजी चौंक पड़े। घड़ों पानी पड़ गया। विठ्ठलदास ने हँसी को रोककर पूछा, कहिये सेठजी, आप यहाँ कैसे आ फंसे? मुझे आपको यहाँ देखकर बड़ा आश्चर्य होता है। चिम्मन-इस घड़ी कुछ न पूछिये। फिर यहाँ आऊँ तो मुझपर लानत है। मुझे किमी तरह यहाँ से नीचे पहुँचाइये। विठ्ठलदास ने एक हाथ थामा, साईस ने आकर कमर पकड़ी। इस तरह लोगों ने उन्हें किसी तरह जीने से उतारा और लाकर गाड़ी में लिटा दिया। ऊपर आकर विट्ठलदास ने कहा, गाड़ीवाला अभी तक खड़ा है, दस बज गये। अब विलंब न करो। सुमन ने कहा अभी एक काम और करना है। पंडित दीनानाथ आते होगे। बस उनसे निपट लूँ तो चलूँ। आप थोड़ा सा और कष्ट कीजिये। विठ्ठलदास ऊपर जाकर बैठे ही थे कि पंण्डित दीनानाथ आ पहुँचे। बनारसी साफा सिर पर था, बदन पर रेशमी अवकन शोभायमान थी। काले किनारे की महीन धोती और कालो वार्निश के पम्प जूते उनके शरीर पर खूब फबते थे। सुमन ने कहा, आइये महाराज! चरण छूती है। दीनानाथ-आशीर्वाद, जवानी बढ़े, आँख के अंधे गाँठ के पूरे फंसे, सदा बढ़ती रहे। सुमन--कल आप कैसे नहीं आये, समाजियों को लिये रात तक आपकी राह देखती रही। दीनानाथ-कुछ न पूछो, कल एक रमझ में फंस गया। डाक्टर श्यामाचरण और प्रभाकर राव स्वराज्य को सभा में घसीट ले गये। वहाँ बकबक झकझक होती रही। मुझसे सबने व्याख्यान देने को कहा। मैंने कहा, मुझे कोई उल्लू समझा है क्या? पीछा छोड़ाकर भागा, इसी में देरी हो गई। सुमन-कई दिन हुए मैंने आपसे कहा था कि किवाडोंं में वार्निश लगवा दीजिये। आपने कहा, वार्निश कहीं मिलती ही नहीं। यह देखिये, आज मैंने एक बोतल वार्निश मँगा रखी है। कल जरूर लगवा दीजिये। पंडित दीनानाथ मसनद लगाये बैठे थे। उनके सिर ही पर वह ताक था, जिसपर वार्निश रक्खी हुई थी,। सुमन ने बोतल उठाई, लेकिन मालूम नहीं कैसे बोतल की पेंदी अलग हो गई और पंडितजी वार्निश से नहा उठे। ऐसा मालूम होता था, मानो शीरे की नाद में फिसल पड़े हो। वह चौककर उठ खड़े हुए और साफा उतारकर रूमाल से पोंछने लगे। सुमन ने कहा-मालूम नहीं बोतल टूटी थी क्या सारी वार्निश खराब हो गई। दीनानाथ--तुम्हे अपनी वार्निश की पड़ी है, यहाँ सारे कपड़े तर हो गये। अब घरतक पहुँचना मुश्किल है। सुमन-रात को कौन देखता है, चुपके से निकल जाइयेगा। दीना-अजी, रहने भी दो, सारे कपड़े सत्यानाश कर दिये, अब उपाय बता रही हो। अब यह धूल भी नही सकते। सुमन-तो क्या मैने जान बूझकर गिरा दिया? दीना-तुम्हारे मन का हाल कौन जाने? सुमन-अच्छा जाइये, जानकर ही गिरा दिया। दीना-अरे तो मैं कुछ कहता हूँ, जी चाहे और गिरा दो। सुमन-बहुत होगा अपने कपड़ों की कीमत ले लीजियेगा। दीना-क्यों खफा होती हो सरकार? मैं तो कह रहा हूँ, गिरा दिया अच्छा किया। सुमन-इस तरह कह रहे है, मानो मेरे साथ बड़ी रियायत कर रहें हैं। दीना--सुमन, क्यों लज्जित करती हो? सुमन--जरा से कपड़े खराब हो गये उसपर ऐसे जामे से बाहर हो गए, यही आपकी मुहब्बत है जिसकी कथा सुनते-सुनते मेरे कान पक गये। आज उसकी कलई खुल गई। जादू सिर पर चढ़ के बोला। आपने अच्छे समय पर मुझे सचेत कर दिया। अब कृपा करके घर जाइये यहाँ फिर न आइयेगा। मुझे आप जैसे मियाँ मिठ्ठओं की जरूरत नहीं। विट्ठलदास ऊपर बैठे हुए यह कौतुक देख रहे थे। समझ गये कि अब अभिनय समाप्त हो गया। नीचे उतर आये। दीनानाथ ने एकबार चौक कर उन्हें देखा और छडी उठाकर शीघ्रतापूर्वक नीचे चले गए। थोडी देर बाद सुमन ऊपर से उतरी। वह केवल एक उजली साड़ी पहने थी, हाथ मे चूड़ियाँ तक न थी। उसका मुख उदास था, लेकिन इसलिए नहीं कि यह भोग-विलास अब उससे छूट रहा है, वरन् इसलिए कि वह इस अग्निकुण्ड में गिरी क्यों थी। इस उदासीनता में मलिनता न थी, वरन्ए क प्रकार का संयम था, यह किसी मदिरा सेवी के मुख पर छानेवाली उदासी नहीं थी, बल्कि उसमें त्याग और विचार आभासित हो रहा था। विट्ठलदास ने मकान में ताला डाल दिया और गाड़ी के कोच बक्सपर जा बैठे। गाड़ी चली। बाजारों की दूकाने बन्द थी, लेकिन रास्ता चल रहा था। सुमन ने खिड़की से झांककर देखा। उसे आगे लालटेनोंं की एक सुन्दर माला दिखाई दी, लेकिन ज्यों ज्यों गाड़ी बढती थी, त्यों त्यों वह प्रकाशमाला भी आगे बढ़ती जाती थी। थोड़ी दूर पर लालटेने मिलती थी पर वह ज्योतिर्माला अभिलाषायों के सदृग दूर भागती जाती थी। गाड़ी वेग से जा रही थी। सुमन का भावी जीवनयान भी विचार सागर में वेग के साथ हिलता, डगमगाता, तारों के ज्योतिर्माल में उलझता चला जाता था। २३ सदन प्रात:काल घर गया तो अपनी चाची के हाथ में कंगन देखा। लज्जा से उसकी आँखे जमीन में गड़ गई। नाश्ता कर के जल्दी से बाहर निकल आया और सोचने लगा, यह कंगन इन्हे कैसे मिल गया। क्या यह सम्भव है कि सुमन ने उसे यहाँ भेज दिया हो? वह क्या जानती है कि कंगन किसका है? मैंने तो उसे अपना पता भी नहीं बताया। यह हो सकता है कि यह उसी नमूने का दूसरा कंगन हो, लेकिन इतनी जल्द वह तैयार नहीं हो सकता। सुमन ने अवश्य ही मेरा पता लगा लिया है और चाची के पास यह कंगन भेज दिया है। सदन ने बहुत विचार किया। किन्तु हर प्रकार से वह इसी परिणाम पर पहुँचता था। उसने फिर सोचा, अच्छा मान लिया जाय कि उसे मेरा पता मालूम हो गया तो क्या उसे यह उचित था कि वह मेरी दी हुई चीज को यहाँ भेज देती? यह तो एक प्रकार का विश्वासघात है। अगर सुमन ने मेरा पता लगा लिया है तब तो वह मुझे मन मेंं धूर्त, पाखंडी, जालिया समझती होगी! कंगन को चाची के पास भेजकर उसने यह भी साबित कर दिया कि वह मुझे चोर भी समझती है। आज सन्ध्या समय सदन को सुमन के पास जाने का साहस न हुआ। चोर दगाबाज बनकर उसके पास कैसे जाय? उसका चित्त खिन्न था। घरपर बैठना बुरा मालूम होता था। उसने यह सब सहा, पर सुमन के पास न जा सका। इसी भाँति एक सप्ताह बीत गया। सुमन से मिलने की उत्कंठा नित्य प्रबल होती जाती थी और शंकाए इस उत्कंठा के नीचे दबती जाती थी। सन्ध्या समय उसकी दशा उन्मत्तों की सी हो जाती। जैसे बीमारी के बाद मनुष्य का चित्त उदास रहता है, किसी से बाते करने को जी नही चाहता, उठना बैठना पहाड़ हो जाता है, जहाँ बैठता है वहीं का हो जाता है, वही दशा इस समय सदन की थी। अन्त को वह अधीर हो गया। आठवें दिन उसने घोड़ा कसाया और सुमन से मिलने चला। उसने निश्चय कर लिया था कि आज चलकर उससे अपना सारा कच्चा चिट्ठा बयान कर दूँगा। जिससे प्रेम हो गया, सुमन--जरा से कपड़े खराब हो गये उसपर ऐसे जामे से बाहर हो गए, यही आपकी मुहब्बत है जिसकी कथा सुनते-सुनते मेरे कान पक गये। आज उसकी कलई खुल गई। जादू सिरपर चढ़के बोला। आपने अच्छे समय पर मुझे सचेत कर दिया। अब कृपा करके घर जाइये यहाँ फिर न आइयेगा। मुझे आप जैसे मियाँ मिट्ठओं की जरूरत नहीं। विट्ठलदास ऊपर बैठे हुए यह कौतुक देख रहे थे। समझ गये कि अब अभिनय समाप्त हो गया। नीचे उतर आये। दीनानाथ ने एक बार चौक कर उन्हे देखा और छड़ी उठाकर शीघ्रतापूर्वक नीचे चले गए। थोड़ी देर बाद सुमन छत पर से उतरी। वह केवल एक उजली साड़ी पहने थी, हाथ में चूडियाँ तक न थी। उसका मुख उदास था, लेकिन इसलिए नहीं कि यह भोग-विलास अब उससे छूट रहा है, वरन् इसलिए कि वह इस अग्निकुण्ड में गिरी क्यों थी। इस उदासीनता में मलिनता न थी, वरन् एक प्रकार का संयम था, यह किसी मदिरा सेवी के मुखपर छानेवाली उदासी नही थी, बल्कि उसमें त्याग और विचार आभासित हो रहा था। विट्ठलदासने मकान में ताला डाल दिया और गाड़ी के कोच वक्सपर जा बैठे। गाड़ी चली। बाजारों की दूकानें बन्द थी, लेकिन रास्ता चल रहा था। सुमन ने खिडकी से झांककर देखा। उसे आगे लालटेनों की एक सुन्दर माला दिखाई दी, लेकिन ज्यों ज्यों गाड़ी बढ़ती थी, त्यो-त्यों वह प्रकाशमाला भी आगे बढ़ती जाती थी। थोड़ी दूर पर लालटेने मिलती थी पर वह ज्योतिर्माला अभिलाषाओ के सदृश दूर भागती जाती थी। गाड़ी वेगन से जा रही थी। सुमन का भावी जीवनयान भी विचार सागर में वेग के साथ हिलता, डगमगाता, तारों के ज्योतिर्मालनमें उलझता चला जाता था। २३ सदन प्रात:काल घर गया तो अपनी चाची के हाथ में कंगन देखा। लज्जा से उसकी आँखें जमीन मे गड़ गई। नाश्ता करके जल्दी से बाहर निकल आया और सोचने लगा, यह कंगन इन्हें कैसे मिल गया। क्या यह सम्भव है कि सुमन ने उसे यहाँ भेज दिया हो? वह क्या जानती है कि कंगन किसका है? मैंने तो उसे अपना पता भी नहीं बताया। यह हो सकता है कि यह उसी नमूने का दूसरा कंगन हो, लेकिन इतनी जल्द वह तैयार नहीं हो सकता। सुमन ने अवश्य ही मेरा पता लगा लिया है और चाची के पास यह कंगन भेज दिया है। सदन ने बहुत विचार किया। किन्तु हर प्रकार से वह इसी परिणाम पर पहुँचता था। उसने फिर सोचा, अच्छा मान लिया जाय कि उसे मेरा पता मालूम हो गया तो क्या उसे यह उचित था कि वह मेरी दी हुई चीज को यहाँ भेज देती? यह तो एक प्रकार का विश्वासघात है। अगर सुमन ने मेरा पता लगा लिया है तब तो वह मुझे मन में धूर्त, पाखंडी, जालिया समझती होगी! कंगन को चाची के पास भेजकर उसने यह भी साबित कर दिया कि वह मुझे चोर भी समझती है। आज सन्ध्या समय सदन को सुमन के पास जाने का साहस न हुआ। चोर दगाबाज बनकर उसके पास कैसे जाय? उसका चित्त खिन्न था। घर पर बैठना बुरा मालूम होता था। उसने यह सब सहा, पर सुमन के पास न जा सका। इसी भाँति एक सप्ताह बीत गया। सुमन से मिलने की उत्कंठा नित्य प्रबल होती जाती थी और शकाएं इस उत्कंठा के नीचे दबती जाती थी। सन्ध्या समय उसकी दशा उन्मत्तों की सी हो जाती। जैसे बीमारी के बाद मनुष्य का चित्त उदास रहता है, किसी से बातें करने को जी नहीं चाहता, उठना बैठना पहाड़ हो जाता है, जहाँ बैठता है वहीं का हो जाता है, वही दशा इस समय सदन की थी। अन्त को वह अधीर हो गया। आठवें दिन उसने घोड़ा कसाया और सुमन से मिलने चला। उसने निश्चय कर लिया था कि आज चलकर उससे अपना सारा कच्चा चिट्ठा बयान कर दूँगा। जिससे प्रेम हो गया, उससे अब छिपाना कैसा! हाथ जोड़ कर कहूँगा, सरकार बुरा हूँ तो, भला हूँ तो अब आपका सेवक हूँ। चाहे जो दण्ड दो, सिर तुम्हारे सामने झुका हुआ है। चोरी की, चाहे दगा किया, सब तुम्हारे प्रेम के निमित्त किया अब क्षमा करो। विषयवासना नीति, ज्ञान और संकोच किसी के रोके नहीं रुकती। नशे में हम सब बेसुध हो जाते है। वह व्याकुल होकर पाँच ही बजे निकल पड़ा और घूमता हुआ नदी के तटतर आ पहुँचा। शीतल, मन्द वायु उसके तपते हुए शरीर को अत्यन्त सुखद मालूम होती थी और जल की निर्मल श्याम सुवर्ण धारा में रह-रहकर उछलती हुई मछलियां ऐसी मालूम होती थी, मानों किसी सुन्दरी के चञ्चल नयन महीन घूंघट से चमकते हों। सदन घोड़े से उतरकर करार पर बैठ गया और इस मनोहर दृश्य को देखने में मग्न हो गया। अकस्मात् उसने एक जटाधारी साधु को पेड़ों की आड़ से अपनी तरफ आते देखा। उसके गले में रुद्राक्ष की माला थी और नेत्र लाल थे। ज्ञान और योग को प्रतिभा की जगह उसके मुख से एक प्रकार की सरलता और दया प्रकट होती थी। उसे अपने निकट देखकर सदन ने उठकर उसका सत्कार किया। साधु ने इस ढंग से उसका हाथ पकड़ लिया, मानो उससे परिचय है और बोला, सदन में कई दिन से तुमसे मिलना चाहता था। तुम्हारे हित की एक बात कहना चाहता हूँ। तुम सुमनबाई के पास जाना छोड़ दो, नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायगा। तुम नहीं जानते वह कौन है? प्रेम के नशे में तुम्हें उसके दूषण नही दिखाई देते। तुम समझते हो कि वह तुमसे प्रेम करती है। किन्तु यह तुम्हारी भूल है। जिसने अपने पति को त्याग दिया, वह दूसरों से क्या प्रेम निभा सकती है? तुम इस समय वहीं जा रहे हो। साधु का वचन मानो, घर लौट जाओ, इसी में तुम्हारा कल्याण है। यह कहकर वह महात्मा जिधर से आये थे उधर ही चल दिये और इससे पूर्व कि सदन उनसे कुछ जिज्ञासा करने के लिए सावधान हो सके वह आँखो से ओझल हो गये। सदन सोचने लगा, यह महात्मा कौन है? यह मुझे कैसे जानते है? मेरे गुप्त रहस्यों का इन्हें कैसे ज्ञान हुआ? कुछ उस स्थान की नीरवता, कुछ अपने चित्त की स्थिति, कुछ महात्मा के आकस्मिक आगमन और उनकी अन्तर्दृष्टि ने उनकी बातों को आकाशवाणी के तुल्य बना दिया। सदन के मन में किसी भावी अमंगल की आशंका उत्पन्न हो गई। उसे सुमन के पास जाने का साहस न हुआ। वह घोड़े पर बैठा और इस आश्चर्यजनक घटना की विवेचना करता घर की तरफ चल दिया। जब से सुभद्रा ने सदन पर अपने कंगन के विषय में सन्देह किया था तब से पद्मसिंह उससे रुष्ट हो गये थे। इसलिए सुभद्रा का यहाँ अब जी न लगता था। शर्माजी भी इसी फिक्र में थे कि सदन को किसी तरह यहाँ से घर भेज दूँ। अब सदन का चित्त भी यहाँ से उचाट हो रहा था। वह भी घर जाना चाहता था, लेकिन कोई इस विषय में मुँह खोल न सकता था, पर दूसरे ही दिन पंडित मदनसिंह के एक पत्र ने उन सबकी इच्छाएँ पूरी कर दी। उसमें लिखा था, सदन के विवाह की बातचीत हो रही है। सदन को बहू के साथ तुरन्त भेज दो। सुभद्रा यह सूचना पाकर बहुत प्रसन्न हुई। सोचने लगी, महीने दो महीने चहल-पहल रहेगी, गाना बजाना होगा, चैन से दिन कटेगें। इस उल्लास को मन में छिपा न सकी। शर्माजी उसकी निष्ठुरता देखकर और भी उदास हो गये। मन में कहा, इसे अपने आनन्द के आगे मेरा कुछ भी ध्यान नहीं है, एक या दो महीनों मे फिर मिलाप होगा, लेकिन यह कैसी खुश है? सदन ने भी चलने की तैयारी कर दी। शर्माजी ने सोचा था कि वह अवश्य हीलाहवाला करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस समय ८ बजे थे। २ बजे दिन को गाड़ी जाती थी। इसलिए शर्माजी कचहरी न गये। कई बार प्रेम से विवश होकर घर में गये। लेकिन सुभद्रा को उनसे बातचीत करने की फुरसत कहाँ? वह अपने गहने कपड़े और माँँग चोटी में मग्न थी। कुछ गहने खटाई में पड़े थे, कुछ महरी साफ कर रही थी। पानदान माँजा जा रहा था। पड़ोस की कई स्त्रियाँ बैठी हुई थी। सुभद्रा ने आज खुशी में खाना भी नहीं खाया। पूड़ियाँ बनाकर शर्माजी और सदन के लिये बाहर ही भेज दी। यहां तक कि एक बज गया। जीतन ने गाड़ी लाकर द्वारपर खड़ी कर दी। सदन ने अपने ट्रंक और बिस्तर आदि रख दिए। उस समय सुभद्रा को शर्माजी की याद आई, महरी से बोली, जरा देख तो कहाँ है, बुला ला। उसने आकर बाहर देखा। कमरे में झांका, नीचे जाकर देखा, शर्माजी का पता न था। सुभद्रा ताड़ गई। बोली, जबतक बह आवेगे, मैं न जाऊँगी। शर्माजी कहीं बाहर न गये थे। ऊपर छतपर जाकर बैठे थे। जब एक बज गया और सुभद्रा न निकली तब बह झुंझलाकर घर में गये और सुभद्रा से बोले, अभी तक तुम यहीं हो? एक बज गया! सुभद्रा को आँखों में आँँसू भर आये। चलते-चलते शर्माजी की यह रुवाई अखर गई। शर्माजी अपनी निष्ठुरता पर पछताये। सुभद्रा के आँसू पोछे, गले से लगाया और लाकर गाड़ी में बैठा दिया। स्टेशन पर पहुँचे, गाड़ी छूटने ही वाली थी, सदन दौड़कर गाड़ी में जा बैठा, सुभद्रा बैठने भी न पाई थी कि गाड़ी छूट गई। वह सिटकीपर खड़ी शर्माजीको ताकती रही और जबतक वह आँखो से ओझल न हुए यह खिड़की पर से न हटी। संध्या समय गाड़ी ठिकानेपर पहुँची। मदनसिंह पालकी और घोड़ा लिए स्टेशन पर मौजूद थे। सदन ने दौड़कर पिता के चरण स्पर्श किए। ज्यो-ज्यों गाँव निकट आता था, सदन की व्यग्रता बढ़ती जाती थी; जब गाँव आध मील रह गया और धान के खेत की मेडोंपर घोड़ो को दौड़ना कठिन जान पड़ा तो वह उतर पड़ा और बेग के साथ गाँव की तरफ चला। आज उसें अपना गाँव बहुत सुनसान मालूम होता था। सूर्यास्त हो गया था। किसान बैलों को हाँकते, खेतों में चले आते थे। सदन किसी से कुछ न बोला, सीधे अपने घर मे चला गया और माता के चरण छुए। माता ने छाती से लगाकर आशीर्वाद दिया। भामा—वे कहाँ रह गई? सदन—आती है, मैं सीधे खेतों में से चला आया। भामा-चाचा चाची से जी भर गया न? सदन—क्यों? भामा-वह तो चेहरा ही कहे देता है। सदन-—वाह, मैं मोटा हो गया हूँ। भामा--चल झूठे, चाची ने दानों को तरसा दिया होगा। सदन—चाची ऐसी नहीं है। यहाँ से मुझे बहुत आराम था वहाँ दूध अच्छा मिलता था। भामा-तो रुपये क्यों मांगते थे? सदन-—तुम्हारे प्रेम की थाह ले रहा था। इतने दिनमें तुमसे २५ रू, ही लिए न? चाचा से सात सौ ले चुका। चार सौ का तो एक घोड़ा ही लिया रेशमी कपड़े बनवाये, शहर रईस बना घूमता था। सबेरे चाची ताजा हलवा बना देती थी। उसपर सेर भर दूध, तीसरे पहर मेवे और मिठाइयाँ? मैंने वहाँ जो चैन किया वह कभी न भूलूंगा। मैंने भी सोचा कि अपनी कमाई में तो चैन कर चुका इस अवसरपर क्यों चूकूँ, सभी शौक पूरे कर लिए। भामा को ऐसा अनुमान हुआ कि सदन की बातों में कुछ निरालापन आ गया है। उनमें कुछ शहरीपन आ गया है। सदन ने अपने नागरिक जीवन का उस उत्साह से वर्णन किया जो युवाकाल का गुण हैं। सरला भामा का हृदय सुभद्रा की ओर से निर्मल हो गया। दूसरे दिन प्रात:काल गांव के मान्य पुरुष निमन्त्रित हुए और उनके सामने सदन का फलदान चढ़ गया। सदन की प्रेमलालसा इस समय ऐसी प्रबल हो रही थी कि विवाह का कड़ी धर्म बेड़ी को सामने लखकर भी वह चिन्तित न हुआ। उसे सुमन से जो प्रेम था, उसमें तृष्णा ही का आधिक्य था। सुमन उसके हृदय में रहकर भी उसके जीवन का आधार न बन सकती थी। सदन के पास यदि कुबेर का धन होता तो वह सुमन को अर्पण कर देता। वह अपने जीवन के सम्पूर्ण सुख, उसकी भेंट कर सकता था, किन्तु अपने दुख से, विपत्ति से, कठिनाइयों से नैराश्य से वह उसे दूर रखता था। उसके साथ वह सुख का आनन्द उठा सकता था, लेकिन दु:खका आनन्द नहीं उठा सकता था। सुमन पर उसे वह विश्वास कहाँ था जो प्रेम का प्राण है! अब वह कपट प्रेम के माया-जाल से मुक्त हो जायगा। अब उसे बहुरूप धरने की आवश्यकता नहीं। अब वह प्रेम को यथार्थ रूप में देखेगा और यथार्थ रूप में दिखावेगा। यहाँ उसे वह अमूल्य वस्तु मिलेगी जो सुमन के यहाँँ किसी प्रकार नहीं मिल सकती थी। इन विचारों ने सदन को इस नये प्रेम के लिए लालायित कर दिया। अब उसे केवल यही संशय था कि कही बधू रूपवती न हुई तो? रूप लावण्य प्राकृतिक गुण है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। स्वभाव एक उपाजित गुण है; उसमें शिक्षा और सत्संग से सुधार हो सकता है। सदन ने इस विषय में ससुराल नाई से पूछ ताछ करने की ठानी; उसे खूब भंग पिलाई, खूब मिठाइयाँँ खिलाईं। अपनी एक धोती उसको भेंट की। नाई ने नशे में आकर वधू की ऐसी लम्बी प्रशंसा की; उसके नखशिख का ऐसा चित्र खींचा कि सदनको इस विषय में कोई सन्देह न रहा। यह नखशिख सुमन से बहुत कुछ मिलता या। अतएव सदन नवेली दुलहिन का स्वागत करने के लिए और भी उत्सुक हो गया। २३ यह बात बिल्कुल तो सत्य नही है कि ईश्वर सबको किसी न किसी हीले से अन्न वस्त्र देता है। पंण्डित उमानाथ बिना किसी हीले ही के संसार का सुख भोग करते थे। उनकी आकाशी वृत्ति थी। उनके भैंस और गायें न थी, लेकिन घर में, घी-दूध की नदी बहती थी, वह खेती बारी न करते थे, लेकिन घर में अनाजकी खत्तियाँ भरी रहती थी। गाँव में कही मछली मरे, कही बकरा कटे, कही आम टूटे, कही भोज हो, उमानाथ का हिस्सा बिना माँगे आप ही आप पहुँँच जाता। अमोल बड़ा गाँव था। ढाई तीन हजार जन-संख्या थी। लेकिन समस्त गाँव मे उनकी सम्मति के बिना कोई काम न होता था। स्त्रियों को यदि गहने बनवाने होते तो वह उमानाथ से कहती। लड़के-लडकियों के विवाह उमानाथ की मार्फत तै होते। रेहननामे, बैनामे, दस्तावेज उमानाथ ही के परामर्शस लिखे जाते। मुआमिले मुकद्दमे उन्ही के द्वारा दायर होते और मजा यह था कि उनका यह दबाव और सम्मान उनकी सज्जनता के कारण नहीं था। गाँव वालो के साथ उनका व्यवहार शुष्क ओर रूखा होता था। वह वेलाग बात करते थे, लल्लोचप्पो करना न जानते थे, लेकिन उनके कटु वक्यों को लोग दूध के समान पीते थे। मालूम, नहीं उनके स्वभाव में क्या जादू था। कोई कहता था यह उनका एकबाल है, कोई कहता था इन्हे महावोरका इष्ट है। लेकिन हमारे विचार में यह उनके मानवस्वभाव के ज्ञान का फल था वह जानते थे कि कहाँ झुकना ओर कहाँ तनना चाहिए। गाँव वालो से तनने मे अपना काम सिद्ध होता, था अधिकारियो सें झुकने में ही। थीने और तहसील के अमले, चपरासी से नंलेकर तहसीलदार तक, सभी उनपर कृपादृष्टि रखते थे। तहसीलदार सहब के लिए वह वर्षफल बनाते, डिप्टी साहब को भावी उन्नति की सूचना देते। कानूनगो और कुर्कअमीन उनके द्वारपर बिना बुलाय मेहमान बने रहते। किसी को यन्त्र देते, किसी को भगवद्गीता सुनाते और जिन लोगों की श्रद्धा इन बातो पर न थी, उन्हें मीठे अचार और नवरत्नकी चटनी खिला कर प्रसन्न रखते। थानेदार साहब उन्हे अपना दाहिना हाथ समझते थे। जहाँ ऐसे उनकी दाल न गलती वहाँ पंण्डितजी की बदौलत पॉचों उँँगली घीमे हो जाती। भला ऐसे पुरुष की गाँव वाले क्यो न पूजा करते? उमानाथ को अपनी बहन गंगाजली से बहुत प्रेम था लेकिन गंगाजली को मैके आने के थोड़े ही दिनो पीछे ज्ञात हुआ कि भाई का प्रेम भावज की अवज्ञा के सामने नहीं ठहर सकता। उमानाथ बहिन को अपने घर लानेपर मन में बहुत पछताते। वे अपनी स्त्री को प्रसन्न रखने के लिए ऊपरी मन से से जो प्रेम था, उसमें तृष्णा हीन का आधिक्य था। सुमन उसके हृदय में रहकर भी उसके जीवन का आधार न बन सकती थी सदनके पास यदि कुबेर का घन होता तो वह सुमन को अर्पण कर देता। वह अपने जीवनके सम्पूर्णसुख,उसकी भेंट कर सकता था,किन्तु अपने दुखसे विपत्ति से कठिनाइयों से नैराश्य से वह उसे दूर रखता था। उसके साथ वह सुख का आनंद उठा सकता था लेकिन दुःख आनन्द नहीं उठा सकता था। सुमन पर उसे वह विश्वास कहाँ था जो प्रेम का प्राण है! अब वह कपट प्रेम के मायाजाल से मुक्त हो जायगा। अब उसे बहुरूप धरने की आवश्यकता नहीं। अब वह प्रेम को यथार्थ रूप में देवेगा यथार्थ रूप दिखावेगा । यहाँ उसे वह अमूल्य वस्तु मिलेगी जो सुमन के यहां किसी प्रकार नहीं मिल सकती थी। इन विचारों ने सदन को इस नये प्रेम के लिए लालायित कर दिया। अब उसे केवल यही संशय था कि कही वधू रूपवती न हुई तो? रूप लावण्य प्राकृतिक गुण है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। स्वभाव एक उपार्जित गुण है, उसमें शिक्षा और सत्संग से सुधार हो सकता है।सदन ने इस विषय में समुराल केनाई से पूछ ताछ करने की ठानी; उसे खूब भंग पिलाई खूब मिठाइयां खिलाई। अपनी एक धोती उसको भेट की।नाईने नशे में आकर बखूकी ऐसी लम्बी प्रशंसा की, उसके नखशिख का ऐसा चित्र खीचा कि सदन को इस विषयों को सन्देह न रहा यह नखशिख सुमनसे बहुत कुछ मिलता था। अतएव सदन नवेली दुलहिन का स्वागत करने के लिए और भी उत्सुक हो गया। २३ यह बात बिल्कुल तो सत्य नहीं है कि ईश्वर सबको किसी न किसी हीले से अन्न वस्त्र देता है। पण्डित उमानाथ बिना किसी हीलेही संसार का सुख भोग करते थे। उनकी आकाशी वृत्ति थी। उनके भैंस और गायें न थी,लेकिन घर में घी-दूध की नदी बहती थी, यह खेती बारी न करते थे, लेकिन घरमें अनाज की सत्तियाँ भरी रहती थी। गाँवमें कहीं मछली मरे, कहीबकरा कटे ,कही आम टूटे, कही भोज हो, उमानाथ का हिस्सा बिना माँगे आप ही आप पहुँच जाता। अमोल बड़ा गाँव था। ढाई तीन हजार जन संख्या थी। लेकिन समस्त गाँव में उनकी सम्मति के बिना कोई काम न होता था। स्त्रियों को यदि गहने बनवाने होते तो वह उमानाथ से कहती। लड़के-लड़कियों के विवाह उमानाथ की मार्फत तय होते। रेहननामे,बैनामे, दस्तावेज उमानाथ ही के परामर्श लिखे जाते। मुआमिले मुकद्दमे उन्ही के द्वारा दायर होते और मजा यह था कि उनका यह दबाव और सम्मान उनकी सज्जनता के कारण नहीं था। गांववालो के साथ उनका व्यवहार शुक ओर रूखा होता था। वह बेलाग बात करते थे, लल्लोचप्पो करना न जानते थे, लेकिन उनके कटु वाक्यों को लोग दूध के समान पीते थे। मालूम नहीं उनके स्वभाव में क्या जादू था। कोई कहता था यह उनका एकबाल है, कोई कहता था इन्हे महावीर का इष्ट है। लेकिन हमारे विचार में यह उनके मानव स्वभाव के ज्ञान का फल था। वह जानते थे कि कहाँ झुकना और कहाँ तनना चाहिए। गॉव बालों से तनने मे अपना काम सिद्ध होता था, अधिकारियों से झुकने में ही। थाने पर तहसीलके अमले चपरासी से लेकर तहसीलदार तक, सभी उनपर कृपादृष्टि रखते थे। तहसीलदार साहब के लिए वह वर्सफल बाते, डिप्टी साहब को भावी उन्नति की सूचना देते। कानून गो और कुर्क अमीन उनके द्वारपर बिना बुलाये मेहमान बने रहते। किसीको यन्त्र देते किसी को भगवद्गीता सुनाते और जिन लोगों की श्रद्धा इन बातों पर न थी, उन्हें मीठे अचार ओर नवरत्न की चटनी खिला कर प्रसन्न रखते। थानेदार साहब उन्हे अपना दाहिना हाथ समझते थे। जहां ऐसे उनको दाल न गलती वहाँ पण्डितजी की बदौलत पाँचो उंगली घी में हो जाती। भला ऐसे पुरुषकी गाँववाले क्यों न पूजा करते? उमानाथ को अपनी बहन गंगाजली से बहुत प्रेम था लेकिन गगांजली को मैके आने के थोड़े ही दिनों पीछे ज्ञात हुआ कि भाई का प्रेम म भावज की अवज्ञा के सामने नहीं ठहर सकता। उमानाथ बहिन को अपने घर लानेपर मन से बहुत पछताते। वे अपनी स्त्री को प्रसन्न रखने के लिए ऊपरी मनसे उसकी हाँ में हाँ मिला दिया करते। गंगाजली को साफ कपड़े पहनने का क्या अधिकार है? शान्ता का पालन पहले चाहे कितने ही लाड़ प्यार से हुआ हो, अब उसे उमानाथ की लड़कियों से बराबरी करने का क्या अधिकार है? उमानाथ, स्त्री की इन खेपपूर्ण बातों को सुनते और उनका अनुमोदन करते। गंगाजली को जब क्रोध आता तो वह उसे अपने भाई ही पर उतारती। वह समझती थी कि वे अपनी स्त्री को बढ़ावा देकर मेरी दुर्गति करा रहे है। वे अगर उसे डाँट देते तो मजाल थी कि वह यो मेरे पीछे पड़ जाती? उमानाथ को जब अवसर मिलता तो बह गंगाजली को एकान्त में समझा दिया करते। किन्तु एक तो जान्हवी उन्हें ऐसे अवसर मिलने ही न देती, दूसरे गंगाजली को भी उनकी सहानुभूति पर विश्वास न आता। इस प्रकार एक वर्ष बीत गया। गंगाजली चिन्ता, शोक और निशा से औषधियाँ सेवन कराई लेकिन जब कुछ लाभ न हुआ तो उन्हें चिन्ता हुई। एक रोज उनकी स्त्री किसी पड़ोसी के घर गई हुई थी। उमानाथ बहन के कमरे में गये। वह बेसुध पड़ी हुई थी, बिछावन चिथड़ा हो रहा था। साड़ी फटकर तारतार हो गई थी, शान्ता उसके पास बैठी हुई पंखा झल रही थी। यह करुणाजनक दृश्य देखकर उमानाथ पड़े यही बहन है। जिसकी सेवा के लिए दो दासियाँ लगी हुई थीं, आज उसकी यह दशा हो रही है! उन्हें अपनी दुर्बलता पर अत्यन्त ग्लानि उत्पन्न हुई। गंगाजली के सिरहाने बैठकर रोते हुए बोले, बहन यहां लाकर मन तुम्हें बड़ा कष्ट दिया है। नहीं जानता था कि उसका यह परिणाम होगा। आज किसी वैद्यक ले आता हूँ। ईश्वर चाहेगें तो तुम शीघ्र ही अच्छी हो जाओगी। इतने में जान्हवी भी आ गई, ये बातें उनके कान में पढ़ी। बोली, हाँ हाँ दौडों, वैद्य को बुनाओ, नहीं तो अनर्थ हो जायगा। अभी पिछले दिनों महीनों ज्वर आता रहा, तब बैद्य के पास न दौड़े। में भी ओढ़कर पड़ रहती तो तुम्हें मालूम होता कि इसे कुछ हुआ है, लेकिन में कैसे पढ़ रहती? घर की चक्की कौन पीसता? मेरे कर्म में क्या सुख भोगना वदा है? उमानाथ का उत्साह शान्त हो गया। वैद्य को बुलाने की हिम्मत न पड़ी। वे जानते थे कि वैद्य को बुलाया तो गंगाजली को जो दो-चार महीने जीते है, वह भी न जी सकेगी। गंगाजली की अवस्था दिनों दिन बिगड़ने लगी। यहाँ तक कि उसे ज्वरातिसार हो गया। जीने की आशा न रही। जिस उदर में सागू के पचाने की भी शक्ति न थी, वह जोकी रोटियाँ कैसे पचाता? निदान उसका जर्जर शरीर इन कष्टों को और अधिक न सह सका। छः मास बीमार रहकर वह दुखिया अकाल मृत्यु का ग्रास बन गई। शान्ता का अब संसार में कोई न था। सुमनके पास उसने दो पत्र लिखे; लेकिन वहाँ से कोई जवाब न गया। शान्ता ने समझा; बहन ने भी नाता तोड़ दिया। विपत्ति में कौन साथी होता है? जब तक गंगाजली जीती थी; शान्ता उसके अञ्चल में मुँँह छिपाकर रो लिया करती थी। अब यह अव-लम्बन भी न रहा। अन्धे के हाथ से लकड़ी जाती रही। शान्ता जब तब अपनी कोठरी के कोने में मुँँह छिपाकर रोती, लेकिन घर के कोने और माता के अञ्चल में बड़ा अन्तर है। एक शीतल जल का सागर है, दूसरा मरुभूमि। शान्ता को अब शान्ति नहीं मिलती। उसका हृदय अग्नि के सदृश दहकता रहता है, वह अपनी मामी और मामा को अपनी माता का घातक समझती है। जब गंगाजली जीती थी, तब शान्ता उसे कटु वाक्यों से बचाने के लिए यत्न करती रहती थी, वह अपनी मामी के इशारों पर दौड़ती थी, जिसमे वह माता को कुछ कह न बैठे। एक बार गंगाजली के हाथ से घी की हाँड़ी गिर पड़ी थी। शान्ता ने मामी से कहा था, यह मेरे हाथ से छूट पड़ी। इसपर उसने खूब गालियाँ खाई। वह जानती थी कि माता का हृदय व्यंग को नहीं सह सकता। लेकिन अब शान्ता को इसका भय नहीं है। वह निराधार होकर बलवती हो गई है। अब वह उतनी सहनशील नही है, उसे जल्द क्रोध आ जाता है। वह जली कटी बातों का बहुधा उत्तर भी दे देती है। उसने अपने हृदय को कड़ी से कड़ी यन्त्रण के लिए तैयार कर लिया है। मामा से वह दबती है, लेकिन मामी से नहीं दबती और ममेरी वहिनों को तो वह तुरकी वतुरकी जवाब देती है। अब शान्ता वह गाय है जो हत्या भय के बलपर दूसरे का खेत चरती है। इस तरह एक वर्ष और बीत गया। उमानाथ ने बहुत दौड़धूप की कि उसका विवाह कर दें, लेकिन जैसा सस्ता सौदा वह करना चाहते थे, वह-कही ठीक न हुआ। उन्होने थाने, तहसील में जोड़तोड़ लगाकर २००, का चन्दा करा लिया था। मगर इतने सस्ते वर कहाँ? जान्हवी का वश चलता तो वह शान्ता को किसी भिखारी के गले बाँधकर अपना पिण्ड छुड़ा लेती, लेकिन उमानाथ ने अबकी पहली बार उसका विरोध किया और सुयोग्य वर ढूंढते रहे। गंगाजली के बलिदान ने उनकी आत्मा को बलवान बना दिया। २४ सार्वजनिक संस्याएँ भी प्रतिभाशाली मनुष्यों की मुहताज होती है। यद्यपि विट्ठलदासके अनुयायियों की कमी न थी, लेकिन उनमें प्राय:सामान्य अवस्था के लोग थे। ऊँची श्रेणी के लोग उनसे दूर भागते थे। पद्मसिंह के सम्मिलित होते ही इस संस्था में जान पड़ गई। नदी की पतली बार उमड़ पडी। बड़े आदमियों मे उनकी चर्चा होने लगी। लोग उनपर कुछ-कुछ विश्वास करने लगे? पद्मसिंह अकेले न आये। बहुवा किसी काम को अच्छा समझकर भी हम उसमें हाथ लगाते हुए डरते है, नक्कू बन जाने का भय लगा रहता है। हम बड़े आदमियों के आ मिलने की राह देखा करते है। ज्योंही किसी ने रास्ता खोला, हमारी हिम्मत बँध जाती है, हमको हँसी का डर नही रहता। अकेले हम अपने घर में भी डरते हैं, दो होकर जंगलो में भी निर्भय रहते है। प्रोफेसर रमेशदत्त, लाला भगतराम और मिस्टर रुस्तम भाई गुप्तरूप से विट्ठलदासकी सहायता करते रहते थे। अब वह खुले पड़े। सहायकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ने लगी। विट्ठलदास सुधार के विषय में मृदुभाषी बनना अनुचित समझते थे, इसलिए उनकी बात रुचिकर न होती थी, मींठी नीद सोने वालों को उनका कठोर नाद अप्रिय लगता था। विट्ठलदास को इसकी चिन्ता न थी। पद्मसिंह धनी मनुष्य थे। उन्होंने बड़े उत्साह से वेश्याओं को शहर मुख्य स्थानों से निकालने के लिए आन्दोलन करना शुरू किया। म्युनिसिपैलिटी के अधिकारियों में दो चार सज्जन विट्ठलदास भक्त भी थे। किन्तु वे इस प्रस्ताव को कार्य रूप में लाने के लिए यथेष्ट साहस न रखते थे। समस्या इतनी जटिल थी कि उसकी कल्पना ही लोगों को भयभीत कर देती थी। वे सोचते थे कि इस प्रस्ताव को उठाने से न मालूम शहर में क्या हलचल मचे शहरके कितने ही रईस, कितने ही राज्यपदाधिकारी, कितने ही सौदागर इस प्रेम मंण्डी से सम्बन्ध रखते थे। कोई ग्राहक था, कोई पारखी, उन सबसे बैर मोल लेने का कौन साहस करता? म्युनिसिपैलिटीके अधिकारी उनके हाथों में कठपुतली के समान थे। पद्मसिंहने मेम्बरो से मिलमिलाकर उनका ध्यान इस प्रस्ताव की ओर आकर्षित किया। प्रभाकरराव की तीव्र लेखनी ने उनकी बडी सहायता की। पैम्फलेट निकाले गये और जनताको जागृत करनेके लिए व्याख्यानों का कम बाँधा गया। रमेशदत्त और पद्मसिंह इस विषय में निपुण थे। इसका भार उन्होंने अपने सिर ले लिया। अब आन्दोलन ने एक नियमित रूप धारण किया। पद्मसिंह ने यह प्रस्ताव उठा तो दिया, लेकिन वह इसपर जितना ही विचार करते थे, उतने ही अन्धकार में पड़ जाते थे। उन्हे यह विश्वास न होता था कि वेश्कयाओं निवसनसे आशातीत उपकार हो सकेगा। संभव है, उपकारके बदले अपकार हो। बुराइयो का मुख्य उपचार मनुष्य का सट्ठन है। इसके बिना कोई उपाय सफल नही हो सकता ।कभी-कभी वह सोचते-सोचते हताश हो जाते। लेकिन इस पक्ष के एक सभ्य बनकर वे आप सन्देह रखते हुए भी दूसरो पर इसे प्रकट न करते थे। जनताके सामने तो उन्हें सुधारक बनते हुए सकोच न होता था, लेकिन अपने मित्रों और सज्ज नोके सामने वह दृह न रह सकते। उनके सामने आना शर्माजी के लिए वही कठिन परीक्षा थी। कोई कहता, किस फेर में पड़े हो, विट्ठलदास के चक्कर में तुम भी आ गये? चैन से जीवन व्यतीत करो। इन सब झमेलो में क्यों व्यर्थ पड़ते हो? कोई कहता, यार मालूम होता है, तुम्हें किसी औरत ने चरका दिया है, तभी तुम वेश्याओं पीछे इस तरह पड़े हो? ऐसे मित्रों के सामने आदर्श और उपकारकी बातचीत करना अपनको बेवकूफ बनाना था। व्याख्यान देते हुए भी जब शर्मा जी कोई भावपूर्ण बात कहते करुणात्मक दृथ्य दिखाने की चेष्टा करते तो उन्हें शब्द नही मिलते थे, और शब्द मिलते तो उन्हें निकालते हुए शर्माजी को बड़ी लज्जा आती थी। यथार्य में बह इस रस में पगे नहीं थे। वह जब अपने भावशैथिल्यकी विवेचना करते तो उन्हें ज्ञात होता था कि मेरा हृदय प्रेम और अनुराग से खाली है। कोई व्याख्यान समाप्त कर चुकने पर शर्माजी को यह जानने की उतनी इच्छा नही होती थी कि श्रोताओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ा, जितनी इसकी कि व्याख्यान सुन्दर, सप्रमाण और ओजपूर्ण था या नहीं। लेकिन इन समस्याओं के होते हुए भी यह आन्दोलन दिनों-दिन बढ़ता जाता था। यह सफलता शमजी कें अनुराग और विश्वास में कुछ कम उत्साहवर्धक न थी। सदनसिंह के विवाह को अभी दो मास थे। घर की चिन्ताओं से मुक्त होकर शर्माजी अपनी पूरी शक्ति से इस आन्दोलन में प्रवृत्त हो गये। कचहरी के काम में उनका जी न लगता। वह भी वे प्रायः इन्हीं चर्चाओं में पड़े रहते। एक ही विषय पर लगातार सोचते विचारते रहने से उस विषय से प्रेम हो जाया करता है। धीरे-धीरे शर्माजी के हृदय में प्रेमका उदय होने लगा। लेकिन जब यह विवाह निकट आ गया तो शर्माजी का उत्साह कुछ क्षीण होने लगा। मन में यह समस्या उठी कि भैया यहाँ वेश्याओं के लिये अवश्य ही मुझे लिखेंगे उस समय में क्या कहूँगा? नाच बिना सभा सूनी रहेगी, दूर दूर: गाँवो से लोग नाच देखने आवेंगे नाच न देखकर उन्हें निराशा होगी, भाई साहब बुरा मानेंगे, ऐसी अवस्था में मेरा क्या कर्तव्य है? भाई साहब को इस कुप्रयासे रोकना चाहिए। लेकिन क्या में इस दुष्कर कार्य में सफल हो सकूँगा? बड़ो के सामने न्याय और सिद्धान्त की बातचीत असंगत-सी जान पड़ती है। भाई साहब के मन से बड़े बड़े हौसले है, इन हौसलों के पूरे होने में कुछ भी कसर रही तो उन्हे दुःख होगा। लेकिन कुछ भी हो, मेरा कर्तव्य यही है कि अपने सिद्धांत का पालन करें। यद्यपि उनके इस सिद्धान्त पालन से प्रसन्न होनेवालों की संख्या बहुत कम थी और अप्रसन्न होने वाले बहुत थे, तथापि शर्माजी ने इन्ही गिने-गिनाये मनुष्यों को प्रसन्न रखना उत्तम समझा। उन्होने निश्चय कर लिया कि नाच न ठीक करूंगा। अपने घर में ही सुधार न कर सका तो दूसरों को सुधारने की चेष्टा करना बड़ी भारी धूर्तता है। यह निश्चय करके शर्माजी बारात की सजावट सामान जुटाने लगे। वह ऐसे आनन्दोत्सवों में किफायत करना अनुचित समझते थे। इसके साथ ही वह अन्य सामग्रियों के बाहुल्य से नाच की कसर पूरी करना चाहते थे, जिसमें उनपर किफायत का अपराध न लगे। एक दिन विट्ठलदासने कहा, इन तैयारियो में आपने कितना खर्च किया? शर्मा—इसका हिसाब लौटने पर होगा। विट्ठलदास--तब भी दो हजार से कम तो न होगा। शर्मा—हाँ, शायद कछ इससे अधिक हो। मदन-अच्छा,यह बात है। भला किसी तरह लोगों की आखें तो खुली। मैं भी इस प्रयाको निन्द्य समझता हूँ, लेकिन नक्कू नहीं बनना चाहता। जब सब लोग छोड़ देगें तो मैं भी छोड़ दूँगा, मुझको ऐसी क्या पड़ी है कि सबके आगे चलूं। मेरे एक ही लड़का है, उसके विवाह में मन के सब हौसले पूरे करना चाहता हूँ। विवाह बाद में भी तुम्हारा मत स्वीकार कर लूँगा। इस समय मुझे अपने पुराने ढंगपर चलने दो, और यदि बहुत कष्ट न हो तो सवेरे की गाड़ी से चले जाओ और बीड़ा देकर उधर से ही अमोला चले जाना। तुमसे इसलिए कहता हूँ कि तुम्हें वहाँ लोग जानते हैं। दूसरे जायेंगे तो लुट जायेंगे। पद्मसिंह ने सिर झुका लिया और सोचने लगे। उन्हें चुप देखकर मदन सिंह ने तेवर बदलकर कहा, चुप क्यों हो, क्या जाना नही चाहते? पद्मसिंहने अत्यन्त दीन भाव से कहा—भैया, आप यदि मुझे क्षमा करें तो ....... मदन नहीं नहीं, मैं तुम्हें मजबूर नहीं करता, नहीं जाना चाहते तो मत जाओ। मुन्शी बैजनाथ, आपको कष्ट तो होगा, पर मेरी खातिर से आप ही जाइय। बैजनाथ---मुझे कोई उज्र नही है। मदन—उधर से ही अमोला चले जाइयेगा। आपका अनुग्रह होगा। बैजनाथ---आप इतमीनान रखें, मैं चला जाऊंगा। कुछ देर तीनों आदमी चुप बैठे रहे। मदनसिंह अपने भाई को कृतघ्न समझ रहे थे। बैजनाथ को चिन्ता हो रही थी कि मदनसिंह का पक्ष ग्रहण करने से पद्मसिंह बुरा तो न मान जायेंगे और पद्मसिंह अपने बड़े भाई की अप्रसन्नता भय से दबे हुए थे। सिर उठाने का साहस नहीं होता था। एक ओर भाई की अप्रसन्नता थी दूसरी ओर अपने सिद्धान्त और न्याय का बलिदान। एक ओर अन्धेरी घाटी थी, दूसरी ओर सीधी चट्टान, निकलने का कोई मार्ग न था। अन्त में उन्होने डरते-डरते कहा, भाई साहब, आपने मेरी भूले कितनी ही बार क्षमा की है, मेरी एक ढिठाई और क्षमा कीजिये। आप जब नाच के रिवाजको दूषित समझते है तो उसपर इतना जोर क्यों देते है? मदनसिंह झुझलाकर बोले, तुम तो ऐसी बाते करते हो मानो इस देश में पैदा ही नहीं हुए, जैसे किसी अन्य देश से आये हो! एक यही क्या, कितनी कुप्रथाएँ है, जिन्हे दूषित समझते हुए भी उनका पालन करना पड़ता है। गाली गाना कौन सी अच्छी बात है? दहेज लेना कौन सी अच्छी बात है? पर लोकरीति पर न चले तो लोग उँगलियाँ उठाते है। नाच न ले जाऊँ तो लोग यही कहेंगे कि कंँजूसी के मारे नहीं लाये। मर्यादा में बट्टा लगेगा। मेरे सिद्धान्त को कौन देखता है? पद्मसिंह बोले, अच्छा, अगर इसी रुपये को किसी दूसरी उचित रीति से खर्च कर दीजिये तब तो किसी को कंजूसी की शिकायत न रहेगी! आप दो डेरे ले जाना चाहते है। आजकल लग्न तेज है, तीन सौ से कम खर्च न पड़ेगा आप तीन सौ की जगह पाँच सौ रुपय के कम्बल लेकर अमोला के दीन दरिद्रो में बाँट दीजिये तो कैसा हो? कम से कम दो सौ मनुष्य आपको आाशीर्वाद देंगे और जबतक कम्बल का एक धागा भी रहेगा आपका यश गाते रहेंगे। यदि यह स्वीकार न हो तो अमोला में २००) की लागत से एक पक्का कुआँ बनवा दीजिये। इसी से चिरकालतक आपकी कीति बनी रहेगी। रूपयो का प्रबन्ध में कर दूँगा। मदनसिंह ने बदनामी का जो सहारा लिया था वह इन प्रस्तावो के सामने न ठहर सका। वह कोई उत्तर सोच रहे थे कि इतनमे बैजनाथ यद्यपि उन्हें पद्मसिंह के बिगड जाने का भय था तथापि इस बात में अपनी बुद्धिकी प्रकांडता दिखाने की इच्छा उस भय से अधिक बलवती थी इसलिए बोले, भैया, हर काम के लिए एक अवसर होता है, दान के अवसरपर दान होना चाहिए, नाचके अवसरपर नाच। बेजोड़ बात कभी भली नही लगती। और फिर शहर के जानकार आदमी हों तो एक बात भी है। देहात के उजड्ड जमींदारोके सामने आप कम्बल बाँटने लगेगे तो वह आपका मुँह देखेंगे और हँसेंगे। मदनसिंह निरुतर से हो गये थे। मुंशी बैजनाथ के इस कथन से खिल उठे। उनकी ओर कृतज्ञता से देखकर वोले, हाँ और क्या होगा? बसन्त में मलार गानेवाले को कौन अच्छा कहेगा? कुसमय की कोई बात अच्छी नहीं होती। इसी से तो मैं कहता हूँ कि आप सबेरे चले जाइये और दोनों डेरे ठीक कर आइये। पद्मसिंह ने सोचा, यह लोग तो अपने मन की करेगे ही, पर देखूँ किन युक्तियों से अपना पक्ष सिद्ध करते है। भैया को मुंशी बैजनाथ पर अधिक विश्वास है, इस बात से भी उन्हें बहुत दुख हुआ। अतएव वह नि:संकोच होकर बोले, तो यह कैसे मान लिया जाय कि विवाह आनन्दोत्सव ही का समय है? मैं तो समझता हूँ, दान और उपकार के लिए इससे उत्तम और कोई अवसर न होगा। विवाह एक धार्मिक व्रत है, एक आत्मिक प्रतिज्ञा है, जब हम गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते है, जब हमारे पैरो में धर्म की बेड़ी पड़ती है, जब हम सांसारिक कर्तव्य के सामने अपने सिर को झुका देते है, जब जीवन का भार और उसकी चिन्ताएँ हमारे सिरपर पड़ती है, तो ऐसे पवित्र संस्कार के अवसर पर हमको गाम्भीर्य से काम लेना चाहिए। यह कितनी निर्दयता है कि जिस समय हमारा आत्मीय युवक ऐसा कठिन व्रत धारण कर रहा हो उस समय हम आनन्दोत्सव मनाने बैठे। वह इस गुरुतर भार से दवा जाता हो और हम नाच-रंग में मस्त हो। अगर दुर्भाग्य से आज-कल यह उल्टी प्रथा चल पड़ी है तो क्या यह आवश्यक है कि हम भी उसी लकीपर चलें? शिक्षा का कम से कम इतना प्रभाव तो होना चाहिए कि धार्मिक विषयो में हम मूर्खों की प्रसन्नता को प्रधान न समझे। मदनसिंह फिर चिन्तासागर में डूबे। पद्मसिंह का कथन उन्हें सर्वथा-सत्य प्रतीत होता था, पर रिवाज के मामले न्याय, सत्य और सिद्वान्त सभी को सिर झुकाना पडता है। उन्हें संशय था कि मुन्शी बैजनाथ अब कुछ उत्तर न दे सकेंगे। लेकिन मुन्शीजी अभी हार नहीं मानना चाहते थे। वह बोले, भैया, तुम वकील हो, तुमसे बहस करने की लियाकत हममे कहाँ है? लेकिन जो बात सनातन से होती चली आई है, चाहे वह उचित हो या अनुचित उसके मिटाने से बदनामी अवश्य होती है। आखिर हमारे 'पूर्वज निरे जाहिल-जघाट तो थे नहीं, उन्होंने कुछ समझकर ही तो इस रस्म का प्रचार किया होगा। मदनसिंह को यह युक्ति न सूझी थी। बहुत प्रसन्न हुए। बैजनाथ की ओर सम्मानपूर्ण भाव से देख कर बोले, अवश्य। उन्होने जो प्रथाएँ चलाई है, उन सबमें कोई न कोई बात छिपी रहती है, चाहे वह आजकल हमारी समझ में न आवे। आजकल के नये विचारवाले लोग उन प्रथाओं के मिटाने में ही अपना गौरव समझते हैं। अपने सामने उन्हें कुछ समझते ही नहीं। वह यह नही देखते कि हमारे पास जो विद्या, ज्ञानविचार और आचरण है, वह सब उन्ही पूर्वजों की कमाई है। कोई कहता है, यज्ञोपवीत से क्या लाभ? कोई शिखा की जड़ काटने पर तुला हुआ है, कोई इसी धुन में है कि शूद्र और चाण्डाल सब क्षत्रिय हो जायें, कोई विधवाओं के विवाह का राग अलापता फिरता है और तो और कुछ ऐसे महाशय भी है जो जाति और वर्णकों भी मिटा देना चाहते हैं। तो भाई यह सब बातें हमारे मान की नहीं है। जो जिन्दा रहा तो देखूंगा कि यूरोप का पौधा यहाँ कैसे कैसे फल लाता है? हमारे पूर्वजों ने खेती को सबसे उत्तम कहा है, लेकिन आजकल यूरोप की देखा देखी लोग मिल और मशीनों के पीछे पड़े हुए है। मगर देख लेना, ऐसा कोई समय आवेगा कि यूरोपवाले स्वयं चेतेगें और मिलो को खोद खोदकर खेत बनावेंगे। स्वाधीन कृषक सामने मिलके मजदूरों की क्या हस्ती। वह भी कोई देश है, जहाँ चाह से खाने की वस्तुएँ आवे तो लोग भूखों मरे। जिन देशो में जीवन ऐसे उलटे नियमों पर चलाया जाता है, वह हमारे लिए आदर्श नहीं बन सकते। शिल्प और कलाकौशल का यह महल उसी समय तक है जब तक संसार में निर्बल असमर्थ जातियाँ वर्तमान है। उनके गले सस्ता माल महकर यूरोप वाले चैन करते है। पर ज्योंही ये जातियाँ चौकेगी, यूरोप की प्रभुता नष्ट हो जायगी। हम यह नहीं कहते कि यूरोपवालों से कुछ मत सीखो। नहीं, वह आज संसार के स्वामी है और उनमें बहुत से दिव्य गुण है। उनके गुणों को ले लो, दुर्गुणों को छोड़ दो। हमारे अपने रीतिरिवाज हमारी अवस्था के अनुकूल है। उनमे काट-छाँँट करने की जरूरत नहीं। मदनसिंह ने ये बातें कुछ गर्व से की, मानो कोई विद्वान पुरुष अपने निज के अनुभव प्रकट कर रहा है, पर यथार्थ में ये सुनी सुनाई बातें थी जिनका मर्म वह खुद भी न समझते थे। पद्मसिंह ने इन बातों को बड़ी धीरता के साथ सुना, पर उनका कुछ उत्तर न दिया। उत्तर देने से बात बढ़ जाने का भय था। कोई वाद जब विवाद का रूप धारण कर लेता है तो वह अपने लक्ष्य से दूर हो जाता है। वाद में नम्रता और विनय प्रवल युक्तियों मे भी अधिक प्रभाव डालती है। अतएव वह बोले,तो में ही चला जाऊँगा, मुन्शी बैजनाथ को क्यों कष्ट दीजियेगा। यह चले जायेंगे तो यहाँ बहुत-सा काम पड़ा रह जायगा। आइये, मुन्शी जी हम दोनों आदमी बाहर चले, मुझे आपसे अभी कुछ बात करनी है। मदनसिंह—तो यही क्यों नही करते? कहो तो मैं ही हट जाऊँ। पद्म—जी नहीं कोई ऐसी बात नही है पर ये बातें मै मुन्शी जी से अपनी शंका-समाधान करने के लिए कर रहा हूँँ। हाँँ, भाई साहब बतलाइये अमोला मे दर्शको की संख्या कितनी होगी? कोई एक हजार। अच्छा आपके विचार में कितने इनमें दरिद्र किसान होंगे, कितने जमींदार? बैजनाथ—ज्यादा किसान ही होगे, लेकिन जमीदार भी दो-तीन सौ से कम न होंगे। पद्म—अच्छा, आप यह मानते है कि दीन किसान नाच देखकर उतने प्रसन्न न होगे जितने धोती या कम्बल पाकर? बैजनाथ भी सशस्त्र थे। बोले, नहीं में यह नहीं मानता। अधिकतर ऐसे किसान होते है जो दान लेना कभी स्वीकार न करेगे, वह जलसा देखने आयेंगे और जलसा अच्छा न होगा तो निराश होकर लौट जायेंगे। पद्मसिंह चकराये। सुकराती प्रश्नों का जो क्रम उन्होंने मन में बाँँध रक्खा था वह बिगड़ गया। समझ गये कि मुन्शी जी सावघान है। अब कोई दूसरा दाव निकालना चाहिए। बोले आप यह मानते है कि बाजार में वही वस्तु दिखाई देती है जिसके ग्राहक होते है और ग्राहकों न्यूनाधिक होने पर वस्तु का न्यूनाधिक होना निर्भर है। बैजनाथ-—जी हां, इसमें कोई सन्देह नहीं। पद्मसिंह-—इस विचार से किसी वस्तु के ग्राहक ही मानों उसके बाजार में आने के कारण होते है। यदि कोई मॉंस न खाय तो बकरे की गर्दन पर छुडी़ क्यों चले। बैजनाथ समझ रहे थे कि यह मुझे किसी दूसरे पेंच में ला रहे है, लेकिन उन्होंने अभी तक उसका मर्म न समझा था। डरते हुए बोले, हाँ, बात तो यही है। पद्म-जब आप यह मानते है तो आपको यह भी मानना पड़ेगा कि जो लोग वेश्याओं को बुलाते है, उन्हे धन देकर उनके लिए सुख विलास की सामग्री जुटाते और उन्हें ठाट-बाट से जीवन व्यतीत करने योग्य बनाते है, वे उस अधिकार से कम पाप के भागी नहीं है जो बकरे की गर्दन पर छुरी चलाता है। यदि में वकीलों को ठाट के साथ टमटम दौड़ाते हुए न देखता तो क्या आज से वकील होता? बैजनाथ ने हंसकर कहा भैया, तुम घुमा फिराकर अपनी बात मनवा लेते हो, लेकिन बात जो कहते हो वह सच्ची है। पद्म-—ऐसी अवस्था में क्या यह समझना कठिन है कि सैकड़ों स्त्रियाँ जो हर रोज बाजार में झरोखों में बैठी दिखाई देती है, जिन्होंने अपनी लज्जा और सतीत्व को नष्ट कर दिया है, उनके जीवन का सर्वनाश करने वाले ही लोग है। वह हजारों परिवार जो आये दिन इस कुवासना की भंवर में पड़कर विलुप्त हो जाते है, ईश्वर के दरबार हमारा ही दामन पकड़ेगे। जिस प्रथा से इतनी बुराइयाँ उत्पन्न हो उसका त्याग करना क्या अनुचित है? मदनसिंह बड़े ध्यान से यह बातें सुन रहे थे। उन्होंने इतनी उच्च शिक्षा नहीं पाई थी जिससे मनुष्य विचार स्वातन्य की धुन में सामाजिक बन्धनों ११ और नैतिक सिद्धान्तों का शत्रु हो जाता है। नहीं, वह साधारण बुद्धि के मनुष्य थे। कायल होकर बतबढ़ाव करते रहना उनकी सामर्थ्य से बाहर था। मुस्कुराकर मुन्शी बैजनाथ से बोले, कहिये मुन्शीजी, अब क्या कहते है? है कोई निकलने का उपाय? बैजनाथ ने हँसकर कहा, मुझे तो रास्ता नहीं सूझता। मदन—अजी कुछ कठहुज्जती ही करो। बैजनाथ-कुछ दिनों वकालत पढ़ ली होती तो यह भी करता। यहाँ अब कोई जवाब ही नहीं सूझता। क्यों भैया पद्मसिंह, मान लो तुम मेरी जगह होते तो इस समय क्या जवाब देते? पद्मसिंह-(हँसकर) जवाब तो कुछ न कुछ जरूर ही देता, चाहे तुक मिलती या न मिलती। मदन—इतना तो मैं भी कहूँँगा कि ऐसे जलसो से मन अवश्य चंचल हो जाता है। जवानी में जब मैं किसी जलसो से लौटता तो महीनों तक उसी वेश्या के रंग-रूप हाव-भाव की चर्चा किया करता। बैजनाथ—भैया, पद्मसिंह के ही मन की होने दीजिये, लेकिन कम्बल अवश्य बँटवाइये। मदन-एक कुआँँ बनवा दिया जाय तो सदा के लिए नाम हो जायगा। इधर भाँवर पड़ी उधर मैंने कुएँँ की नींव डाली। २५ बरसात के दिन थे, घटा छाई हुई थी। पंण्डित उमानाथ चुनारगढ़ के निकट गंगा के तटपर खड़े नाव की बाट जोह रहे थे। वह कई गाँवो का चक्कर लगाते हुए आ रहे थे और सन्ध्या होने से पहले चुनार के पास एक गाँव में जाना चाहते थे। उन्हें पता मिला था कि उस गाँव में एक सुयोग्य वर है। उमानाथ आज ही अमोला लौट जाना चाहते थे, क्योंकि उनके गाँव में एक छोटी सी फौजदारी हो गई थी और थानेदार साहब कल तहकीकात करने आनेवाले थे। मगर अभी तक नाव उसी पार खड़ी थी। उमानाथ को मल्लाहों पर क्रोध आ रहा था। इससे अधिक क्रोध उन मुसाफिरों पर आ रहा था जो उस पार धीरे-धोरे नावपर बैठने आ रहे थे। उन्हें दौड़ते हुए आना चाहिए था, जिसमें उमानाथ को जल्द नाव मिल जाय। जब खड़े-खड़े बहुत देर हो गई तो उमानाथ ने जोर से चिल्लाकर मल्लाहों को पुकारा। लेकिन उनकी कण्ठ-घ्वनि को मल्लाहों के कान में पहुँचने की प्रबल आकांक्षा न थी। वह लहरों से खेलती हुई उन्हीं में समा गई। इतने में उमानाथ ने एक साधु को अपनी ओर आते देखा। सिरपर जटा, गले में रुद्राक्ष की माला, एक हाथ मे सुलफे की लम्बी चिलम, दूसरे हाथ में लोहे की छड़ी, पीठपर एक मृगछाला लपेटे हुए आकर नदी के तटपर खड़ा हो गया। वह भी उस पार जाना चाहता था। उमानाथ को ऐसी भावना हुई कि मैंने इस साधु को कहीं देखा है, पर याद नही पड़ता कि कहाँ। स्मृति पर एक परदा-सा पड़ा हुआ था। अकस्मात् साधु ने उमानाथ की ओर ताका और तुरन्त उन्हे प्रणाम करके बोला, महाराज घर पर तो सब कुशल है, यहाँ कैसे आना हुआ। उमानाथ के नेत्र पर से परदा हट गया। स्मृति जागृत हो गई। हम रूप बदल सकते है, शब्द को नहीं बदल सकते। यह गजाधर पांडे थे। जब से सुमन का विवाह हुआ था, उमानाथ कभी उसके पास नहीं गये थे। उसे मुँह दिखाने का साहस नहीं होता था। इस समय गजाधर को इस भेष में देखकर उमानाथ को आश्चर्य हुआ। उन्होनें समझा, कहीं मुझे फिर धोखा न हुआ हो। डरते हुए पूछा, शुभ नाम? साधु-पहले तो गजाधर पांडे था, अब गजानन्द हूँ। उमानाथ-ओहो तभी तो मे पहचान न पाता था। मुझे स्मरण होता था कि मैंने कहीं आपको देखा है, पर आपको इस भेष में देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। बाल बच्चे कहाँँ है। गजानन्द—अब उस मायाजाल से मुक्त हो गया। उमानाथ—सुमन कहाँ है? गजानन्द—दालमण्डी के एक कोठेपर। उमानाथ ने विस्मित होकर गजानन्द की ओर देखा तब लज्जा से उनका सिर झुक गया। एक क्षण के बाद उन्होंने फिर पूछा, यह कैसे हुआ, कुछ बात समझ में नहीं आती? गजानन्द—उसी प्रकार जैसे संसार में प्राय हुआ करता है। मेरी असज्जनता और निर्दयता, सुमन की चंचलता और विलास लालसा दोनों ने मिलकर हम दोनों का, सर्वनाश कर दिया। मैं अब उस समय की बातों को सोचता हूँ तो ऐसा मालूम होता है कि एक बड़े घर की बेटी से व्याह करने में मैंने बड़ी भूल की और इससे बड़ी भूल यह थी कि व्याह हो जाने पर उसका उचित आदर सम्मान नहीं किया। निर्धन था, इसलिए आवश्यक था कि मैं धन के अभाव को अपने प्रेम और भक्ति से पूरा करता। मैंने इसके विपरीत उससे निर्दयता का व्यवहार किया। उसे वस्त्र और भोजन का कष्ट दिया। वह चौका बरतन, चक्की चूल्हे में निपुण नहीं थी और न हो सकती थी, पर उससे यह सब काम लेता था और जरा भी देर हो जाती तो बिगड़ता था। अब मुझे मालूम होता है कि मैं ही उसके घर से निकलने का कारण हुआ, मैं उसकी सुन्दरता का मान न कर सका, इसलिए सुमन का भी मुझसे प्रेम नहीं हो सका। लेकिन वह मुझपर भक्ति अवश्य करती थी। पर उस समय में अन्धा हो रहा था। कंगाल मनुष्य धन पाकर जिस प्रकार फूल उठता है उसी तरह सुन्दर स्त्री पाकर वह संशय और भ्रम में आसक्त हो जाता है। मेरा भी यही हाल था। मुझे सुमन पर अविश्वास रहा करता था। और प्रत्यक्ष इस बात को न कहकर में अपने कठोर व्यवहार से उसके चित्त को दुखी किया करता था। महाशय, मैंने उसके साथ जो-जो अत्याचार किये उन्हें स्मरण करके आज मुझे अपनी क्रूरतापर इतना दु:ख होता कि जी चाहता है कि विष खा लूँ। उसी अत्याचार का अब प्रायश्चित कर रहा हूँ। उसके चले जानेके बाद दो-चार दिन तक तो मुझपर नशा रहा, पर जब नशा ठंडा हुआ तो मुझे बह घर काटने लगा। में फिर उस घर में न गया। एक मन्दिर में पुजारी बन गया। अपने हाथ से भोजन बनाने के कष्ट से बचा मन्दिर में दो बार सज्जन नित्य ही आ जाते है। उनके साथ रामायण आदि कथाएँ पढ़ा करता था। कभी कभी साधु महात्मा भी आ जाते। उनके पास सत्संग का सुअवसर मिल जाता। उनकी ज्ञान मर्म की बात सुनकर मेरा अज्ञान कुछ कुछ मिटने लगा। मैं आपसे सत्य ही कहता हूँ पुजारी बनते समय मेरे मन में भक्ति का भाव नाममात्र को भी न था। मैंने केवल निरुधमता का सुख और उत्तम भोजन का स्वाद लूटने के लिए पूजा-वृत्ति ग्रहण की थी, पर धर्म कथाओं के पढ़ने और सुनने से मन में भक्ति और प्रेम का उदय हुआ और ज्ञानियों के सत्संग से भक्ति ने वैराग्य का रूप धारण कर लिया। अब गाँव-गाँव घूमता हूँ और अपने से जहाँ तक हो सकता है दूसरों का कल्याण करता हूँ। आप क्या काशी से आ रहे है? उमानाथ——नहीं, मैं भी एक गाँव से आ रहा हूँ। सुमन की एक छोटी बहन है, उसी के लिए वर खोज रहा हूँ। गजानन्द——लेकिन अबकी सुयोग बर खोजियेगा। उमानाथ——सुयोग्य वरों की तो कमी नहीं है, पर उसके लिए मुझमे सामर्थ्य भी तो हो? सुमन के लिए क्या मैंने कुछ कम दौड़-धूप की थी? गजानन्द——सुयोग्य वर मिलने के लिए आपको कितने रुपयों की आवश्यकता है? उमानाथ——एक हजार तो दहेज ही माँगते है और सब खर्च अलग रहा। गजा०——आप विवाह तय कर लीजिये। एक हजार रुपये का प्रबन्ध ईश्वर चाहेगे तो मैं कर दूँगा। यह भेष धारण करके अब मुझे ज्ञात हो रहा है कि मैं प्राणियों का बहुत उपकार कर सकता हूँ। उमानाथ——दो–चार दिन में आपके ही घर पर आपसे मिलूंगा। नाव आ गई। दोनों नावपर बैठे। गजानन्द तो मल्लाहों से बात करने लगे, लेकिन उमानाथ चिन्तासागर में डूबे हुए थे। उनका मन कह रहा था कि सुमन का सर्वनाश मेरे ही कारण हुआ। २६ पंण्डित उमानाथ सदन सिंह का फलदान चढ़ा आये हैं। उन्होंने जान्हवी से गजानन्द की सहायता की चर्चा नहीं की थी। डरते थे कि कहीं वह इन रुपयों को अपनी लड़कियों के विवाह के लिए रख छोड़ने पर जिद्द न करने लगे। जान्हवी पर उनके उपदेश का कुछ असर न होता था, उसके सामने वह उसकी हाँ-में-हाँ मिलाने पर मजबूर हो जाते थे। उन्होंने एक हजार रुपये के दहेज पर विवाह ठीक किया था पर अब इस चिन्ता में पड़े हुए थे कि बरात के लिए खर्च का क्या प्रबन्ध होगा। कम से कम एक हजार रुपये की और जरूरत थी। इसके मिलने का उन्हें कोई उपाय न सूझता था। हाँ, उन्हें इस विचार से हर्ष होता था कि शान्ता का विवाह अच्छे घर में होगा, वह सुख से रहेगी और गंगाजली की आत्मा मेरे इस काम से प्रसन्न होगी। अन्तमें उन्होने सोचा, अभी विवाह को तीन महीने है। अगर उस समयतक रुपयों का प्रबन्ध हो गया तो भला ही है। नहीं तो बरात का झगड़ा ही तोड़ दूँगा। किसी न किसी बातपर बिगड़ जाऊँगा, बारात वाले आप ही नाराज होकर लौट जायेंगे। यही न होगा कि मेरी थोड़ी सी बदनामी होगी, पर विवाह तो हो जायगा, लड़की तो आराम से रहेगी। मैं यह झगड़ा ऐसी कुशलता से करूंगा कि सारा दोष बारातियों पर आवे। पंण्डित कृष्णचन्द्र को जेल खाने से छूटकर आये हुए एक सप्ताह बीत गया था, लेकिन अती तक विवाह के सम्बध में उमानाथ को बातचीत करने का अवसर ही न मिला था। वह कृष्णचन्द्र के सम्मुख जाते हुए लजाते थे। कृष्णचन्द्र के स्वभाव में अब एक बड़ा अन्तर दिखाई देता था। उनमें गम्भीरता की जगह एक उद्यण्डता आ गई थी और संकोच नाम को भी न रहा था। उनका शरीर क्षीण हो गया, पर उसमें एक अद्भुत शक्ति भरी हुई मालूम होती थी, वे रात को बारबार दीर्घ निश्वास लेकर हाय! हाय!' कहते सुनाई देते थे। आधी रात को चारों ओर नीरवता छाई हुई रहती थी, वे अपनी चारपाई पर करवटें बदल-बदलकर यह गीत गाया करते - अगिया लागी सुन्दर बन जरि गयो। कभी-कभी यह गीत गाते--- लकड़ी जल कोयला भई और कोयला जल भई राख। मैं पापिन ऐसी जली कि कोयला भई न राख! उनके नेत्रों में एक प्रकार की चञ्चलता दीख पड़ती थी। जान्हवी उनके सामने खड़ी न हो सकती, उसे उनसे भय लगता था। जाड़े के दिन में कृषकों की स्त्रियाँ हाट में काम करने जाया करती थी। कृष्णचन्द्र भी हाटकी ओर निकल जाते और वहाँ स्त्रियों से दिल्लगी किया करते। ससुरालके नाते उन्हे स्त्रियों से हँसने बोलनेका पद था, पर कृष्णचन्द्र की बातें ऐसी हास्यपूर्ण और उनकी चितवनें ऐसी कुचेष्टापूर्ण होती थी कि स्त्रियाँ लज्जा से मुँह छिपा लेती और आकर जान्हवी से उलाहने देती। वास्तवमें कृष्णचन्द्र कामसन्ताप से जले जाते थे। अमोला में कितने ही सुशिक्षित सज्जन ये। कृष्णचन्द्र उनके समाज में न बैठते। वे नित्य सन्ध्या समय नीच जाति के आदमियों के साथ चरस की दम लगाते दिखाई देते थे। उस समय मण्डली में बैठे हुए वे अपने जेल के अनुभव वर्णन किया करते। वहाँ उनके कंठ से अश्लील बातों की धारा बहने लगती थी। उमानाथ अपने गाँव में सर्वमान्य थे, वे बहनोई के इन दुष्कृत्यों को चेख-देखकर कट जाते और ईश्वर से मनाते कि किसी प्रकार ये यहाँ से चले जायँ। और तो और, शान्ता को भी अब अपने पिता के सामने आते हुए भय और संकोच होता था। गाँव की स्त्रियाँ जब जान्हवी से कृष्णचन्द्र की करतूतों की निन्दा करने लगतीं तो शान्ता को अत्यन्त दुःख होता था। उसकी समझमें न आता था कि पिताजी को क्या हो गया है। यह कैसे गम्भीर, कैसे २६ पंण्डित उमानाथ सदनसिंहका फलदान चढ़ा आये है। उन्होंने जान्हवी से गजानन्दकी सहायता की चर्चा नहीं की थी। डरते थे कि कहीं वह इन रुपयो को अपनी लड़कियों के विवाह लिए रख छोड़ने पर जिद्द न करने लगे। जान्हवी पर उनके उपदेशका कुछ असर न होता था, उसके सामने वह उसकी हाँ-में-हाँ मिलाने पर मजबूर हो जाते थे। उन्होंने एक हजार रुपये के दहेज पर विवाह ठीक किया था पर अब इस चिन्ता में पड़े हुए थे कि बरात लिए खर्चका क्या प्रबन्घ होगा। कम-से-कम एक हजार रुपये की और जरूरत थी। इसके मिलने का उन्हें कोई उपाय न सूझता था। हाँ, उन्हें इस विचार से हर्ष होता था कि शान्ता का विवाह अच्छे घर में होगा, वह सुख से रहेगी और गंगाजली की आत्मा मेरे इस काम से प्रसन्न होगी। अन्त में उन्होंने सोचा, अभी विवाह को तीन महीने है। अगर उस समय तक रुपयों का प्रबन्ध हो गया तो भला ही है। नहीं तो बरात का झगड़ा ही तोड दूँगा। किसी न किसी बातपर बिगड़ जाऊँगा, बारात वाले आाप ही नाराज होकर लौट जायेंगे। यहीं न होगा कि मेरी थोड़ी सी बदनामी होगी, पर विवाह तो हो जायगा, लड़की तो आराम से रहेगी। में यह झगड़ा ऐसी कुशलता से कहूंगा कि सारा दोष बारातियों पर आवे। पंण्डित कृष्णचन्द्र को जेलखाने से छूटकर आये हुए एक सप्ताह बीत गया था; लेकिन अतीत के विवाह के सम्बन्ध में उमानाथ को बातचीत करने का अवसर ही न मिला था। वह कृष्णचन्द्र के सम्मुख जाते हुए लजाते थे। कृष्णचन्द्र के स्वभाव में अब एक बड़ा अन्तर दिखाई देता था। उनमें गम्भीरता की जगह एक उद्यण्डता आ गई थी और संकोच नाम की भी न रहा था। उनका शरीर क्षीण हो गया, पर उसमें एक अद्भुत शक्ति भरी हुई मालूम होती थी,वे रातको बार-बार दीर्घ नि:श्वास लेकर 'हाय! हाय!' कहते सुनाई देते थे। आधी रात को चारो ओर नीरवता छाई हुई` रहती थी, वे अपनी चारपाईपर करवट बदल-बदलकर यह गीत गाया करते- अगिया लागी सुन्दर बन जरि गयो। कभी-कभी यह गीत गाते- लकड़ी जल कोयला भई और कोयला जल भई राख। मै पापिन ऐसी जली कि कोयला भई न राख। ⁠उनके नेत्रों में एक प्रकार की चंचलता दीख पड़ती थी। जान्हवी उनके सामने खड़ी न हो सकती, उसे उनसे भय लगता था। {{gap}जाड़ेके दिनमे कृषकों की स्त्रियाँ हाटमे काम करने जाया करती थी। कृष्णचन्द्र भी हाटकी ओर निकल जाते और वहां स्त्रियोसे दिल्लगी किया करते। ससुरालके नाते उन्हे स्त्रियोसे हँसने बोलनेका पद था, पर कृष्णचन्द्र की बातें ऐसी हास्यपूर्ण और उनकी चितवने ऐसी कुचेष्टापूर्ण होती थी कि स्त्रियाँ लज्जासे मुह छिपा लेती और आकर जान्हवी से उलाहने देती। वास्तव मे कृष्णचन्द्र कामसन्ताप से जले जाते थे। ⁠अमोलामे कितने ही सुशिक्षित सज्जन थे। कृष्णचन्द्र उनके समाजमें न बैठते। वे नित्य सन्ध्या समय नीच जाति के आदमियों के साथ चरस की दम लगाते दिखाई देते थे। उस समय मण्डलीमे बैठे हुए वे अपने जेलके अनुभव वर्णन किया करते। वहाँ उनके कंठसे अश्लील बातोकी धारा बहने लगती थी। ⁠उमानाथ़ अपने गॉव में सर्वमान्य थे, वे बहनोई के इन दुष्कृत्योको देख-देखकर कट जाते और ईश्वरसे मनाते कि किसी प्रकार ये यहाँसे चले जायँ। ⁠और तो और,शान्ताको भी अब अपने पिताके सामने आते हुए भय और संकोच होता था। गाँवकी स्त्रियाँ जब जान्हवी से कृष्णचन्द्र की करतूतों की निन्दा करनेंं लगती तो शान्ता को अत्यन्त दु:ख होता था। उसकी समझ में न आता था कि पिताजी को क्या हो गया है। यह कैसे गम्भीर, कैसे विचारशील, कैसे दयाशील, कैसे सच्चरित्र मनुष्य ये। यह काया-पलट कैसे हो गयी? शरीर तो वही है पर वह आत्मा कहाँ गई? इस तरह एक मास बीत गया। उमानाथ मन में झुझलाते कि इन्हीं की लड़को का विवाह होनेवाला है और ये ऐसे निश्चिन्त बैठे है तो मुझी को क्या पड़ी है कि व्यर्थ हैरानी में पड़ूँ। यह तो नहीं होता कि जाकर कही चार पैसे कमाने का उपाय करें, उलटे अपने साथ-साथ मुझे भी खराब कर रहे है। २७ एक रोज उमानाथ ने कृष्णचन्द्र के सहचरों को धमकाकर कहा अब तुम लोगों को उनके साथ बैठकर चरस पीते देखा तो तुम्हारी कुशल नहीं। एक-एक की बुरी तरह खबर लूंगा। उमानाथ का रोब सारे गाँव पर छाया हुआ था। वे सबके सब डर गये। दूसरे दिन जब कृष्णचन्द्र उनके पास गए तो उन्होंने कहा, महाराज, आप यहां न आया कीजिये। हमें पंण्डित उमानाथ के कोप में न डालिये। कहीं कोई मामला खड़ा कर दें तो हम बिना मारे ही मर जायें। कृष्णचन्द्र क्रोध में भरे हुए उमानाथ के पास आये और बोले, मालूम होता है, तुम्हें मेरा यहाँ रहना अखरने लगा। उमानाथ—आपका घर है, आप जब तक चाह रहेंपर में यह चाहता हूँ कि नीच आदमियों के साथ बैठकर आप मेरी और अपनी मर्यादा को भंग न करे। कृष्णचन्द्र—तो किसके साथ बैठे? यहाँ जितने भले आदमी है, उनमें कौन मेरे साथ बैठना चाहता है? सबके सब मुझे तुच्छ दृष्टि से देखते है। यह मेरे लिए असहय है। तुम इनमें से किसी को बता सकते हो जो पूर्ण धर्म का अवतार हो। सबके सब दगाबाज, दीन किसानों का रक्त चूसने वाले, व्यभिचारी है। मैं अपने को उनसे नीच नहीं समझता। मैं अपने किये का फल भोग आया हूं, वे अभी तक बचे हुए है। मुझमें और उनमें केवल इतना ही फर्क है। वह एक पाप को छिपाने के लिए और भी कितने पाप किया करते है। इस विचार से वह मुझसे बड़े पातकी है। ऐसे बगुला भक्तों के सामने में दीन बनकर नहीं जा सकता। मैं उनके साथ बैठता हूँ जो इस अवस्था में भी मेरा आदर करते है, जो अपने को मुझसे श्रेष्ठ नहीं समझते, जो कौए होकर हंस बनने की चेष्टा नहीं करते! अगर मेरे इस व्यवहार से तुम्हारी इज्जत में बट्टा लगता है तो में जबरदस्ती तुम्हारे घर नहीं रहना चाहता। उमानाथ—मेरा ईश्वर साक्षी है, मैंने इस नीयत से उन आदमियों को आपके साथ बैठने से नही मना किया था। आप जानते है कि मेरा सरकारी अधिकारियों से प्रायः संसर्ग रहता है, आपके इस व्यवहार से मुझे उनके सामने आँखे नीची करनी पड़ती है। कृष्ण—तो तुम उन अधिकारियों से कह दो कि कृष्णचन्द्र कितना ही गया गुजरा है तो भी उनसे अच्छा है। मैं भी कभी अधिकारी रहा। और अधिकारियों के आचार व्यवहार का कुछ ज्ञान रखता हूँ। वे सब चोर है। कमीने, चोर, पापी और अधमियों का उपदेश कृष्णचन्द्र नहीं लेना चाहता। उमानाथ—आपको अधिकारियों की कोई परवाह न हो, लेकिन मेरी तो जीविका उन्ही की कृपादृष्टि पर निर्भर है। मैं उनकी कैसे उपेक्षा कर सकता हूँ? आपन तो थानेदारी की है। क्या आप नहीं जानते कि यहाँ का थानेदार आपकी निगरानी करता है? वह आपको दुर्जनों के संग देखेगा तो अवश्य इसकी रिपोर्ट करेगा और आपके साथ मेरा भी सर्वनाश हो जायगा। ये लोग किसके मित्र होते है? कृष्ण—यहाँ का थानेदार कौन है? उमानाथ—यद मसऊद आलम। कृष्ण—अच्छा, वही, सारे जमाने का बेईमान, छटा हुआ बदमाश वह मेरे सामने हेड कान्स्टेबिल रह चुका है और एक बार मैंने ही उसे जेल से बचाया था। अबकी उसे यहां आने दो, ऐसी खबर लूँ कि वह भी याद करे। उमानाथ—अगर आपको यह उपद्रव करना है तो कृपा करके मुझे अपने साथ न समेटिये। आपका तो कुछ न बिगड़ेगा, मैं पिस जाऊँगा। कृष्ण—इसीलिए कि तुम इज्जतवाले हो और मेरा कोई ठिकाना नहीं। मित्र, क्यों मुँह खुलवाते हो? धर्म का स्वांग भरकर क्यों डींग मारते हो? थानेदारों की दलाली करके भी तुम्हें इज्जत का घमण्ड है? उमानाथ—में अधम पापी सही, पर आपके साथ मैंने जो सलूक किये उन्हें देखते हुए आपके मुँह से ये बातें न निकलनी चाहिए। कृष्ण—तुमने मेरे साथ वह सलूक किया कि मेरा घर चौपट कर दिया। सलूक का नाम लेते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? तुम्हारे सलूक का बखान यहाँ अच्छी तरह सुन चुका। तुमने मेरी स्त्री को मारा, मेरी एक लड़की को न जाने किस लम्पट के गले वाँध दिया और दूसरी लड़की से मजदूरिन की तरह काम ले रहे हो। मूर्ख स्त्री को झांसा देकर मुकदमा लड़ने के बहाने से सब रुपये उड़ा लिये और तब अपने घर लाकर उसकी दुर्गति की। आज अपने सलूक की शेखी बघारते हो। अभिमानी मनुष्य को कृतघ्नता से जितना दु:ख होता है उतना और किसी बात से नहीं होता। वह चाहे अपने उपकारों के लिए कृतज्ञता का भूखा न हो, चाहे उसने नेकी करले दरिया ही में डाल दी हो,पर उपकार का विचार करके उसको अत्यन्त गौरव का आनन्द प्राप्त होता है। उमानाथ ने सोचा, संसार कितना कुटिल ई। मैं इनके लिए महीनों कचहरी दरबार के चक्कर लगाता रहा, वकीलों की कैसी-सी खुशामदें की, कर्मचारियों के कैसे कैसे नखरे सहे, निज का सैकड़ों रुपया फूंक दिया, उसका यह यश मिल रहा है। तीन-तीन प्राणियों का बरसों पालन-पोषण किया, सुमन के विवाह के लिए महीनों खाक छानी और शान्ता के विवाह के लिए महीनों से घर घाट एक किये हैं, दौड़ते-दौड़ते पैरों में छाले पड़ गये, रुपये-पैसे की चिन्ता मे शरीर घुल गया और इसका यह फल !हा! कुटिल संसार में यहाँ भलाई करने में भी धब्बा लग जाता है। यह सोचकर उनकी आंखें डबडबा आई। बोले भाई साहब, मैंने जो कुछ किया, वह भला ही समझकर किया, पर मेरे हाथो में यश नही है। ईश्वर को यही इच्छा है कि मेरा किया-कराया मारा मिट्टी में मिल जाय तो यही सही। मैंने आपका सर्वस्व लूट लिया, खा-पी डाला अब जो सजा चाहे दीजिये, और क्या कहूँ? उमानाथ यह कहना चाहते थे कि अब तो जो कुछ हो गया वह हो गया; अब मेरा पिण्ड छोड़ो। शान्ता के विवाह का प्रबन्ध को, पर डरे कि इस समय क्रोध में कही यह सचमुच शान्ता को लेकर चले न जायें। इसलिए गम खा जाना ही उचित समझा। निर्बल क्रोध उदार हृदय से करुणा का भाव उत्पन्न कर देता है। किसी भिक्षुक गृह से गाली खाकर सज्जन मनुष्य चुप रहने के सिवा और क्या कर सकता है? उमानाथ की सहिष्णुता ने कृष्णचन्द्र को भी शान्त किया, पर दोनों से बातचीत न हो सकी। दोनों अपनी अपनी जगह पर विचार में डूबे-बैठे थे, जैसे दो कुत्ते लड़ने के बाद आमने-सामने बैठे रहते है। उमानाथ सोचते थे। कि बहुत अच्छा हुआ, जो मैं चुप साध गया, नहीं तो संसार मुझी को बदनाम करता। कृष्णचन्द्र सोचते थे कि मैंने बुरा किया, जो ये गड़े मुरदे उखाड़े। अनुचित क्रोध में सोई हुई आत्मा को जगाने का विशेष अनुराग होता है। कृष्णचन्द्र को अपना कर्तव्य दिखाई देने लगा। अनुचित क्रोध ने अकर्मण्यता की निद्रा भंग कर दी। सन्ध्या समय कृष्णचन्द्र ने उमानाथ से पूछा, शान्ता का विवाह तो तुमने ठीक किया है न? उमानाथ-—हाँ, चुनार में, पण्डित मदनसिंह लड़के से। कृष्ण—वह तो कोई बड़े आदमी मालूम होते है। कितना दहे ठहरा हैं। उमानाथ-—एक हजार। कृष्ण--इतना ही और ऊपर से लगेगा? उमा-हाँ और क्या? कृष्णचन्द्र स्तब्ध हो गय। पूछा, रुपयों का प्रबन्ध कैसे होगा? उमा—ईश्वर किसी तरह पार लगावेगे ही। एक हजार मेरे पास है, केवल एक हजार की और चिन्ता है। कृष्णचन्द्र ने अत्यन्त ग्लानिपूर्वक कहा, मेरी दशा तो तुम देख ही रहे। हो। इतना कहते कहते उनकी आँखो से आंसू टपक पड़े। उमा—आप निश्चिन्त रहिये मैं सब कुछ कर लूँगा। कृष्ण—परमात्मा तुम्हें इसका शुभ फल देंगे। भैया, मुझसे जो अविनय हुई है उसका तुम बुरा न मानना। अभी मैं आपे मे नही हूँ, इस कठिन यन्त्रणा ने मुझे पागल कर दिया है। उसने मेरी आत्माको पीस डाला है। मैं आत्माहीन मनुष्य हूँ। उस नरक में पड़कर यदि देवता भी राक्षस हो जायें तो आश्चर्य नहीं। मुझमें इतनी सामर्थ्र्य कहाँ थी कि मैं इतने भारी बोझ को सम्हालता। तुमने मुझे उबार दिया, मेरी नाव पार लगा दी, यह शोभा नहीं देता कि तुम्हारे ऊपर इतने बड़े कार्य का भार रखकर मैं आलसी बना बैठा रहूँ। मुझे भी आज्ञा दो कि कहीं चलकर चार पैसे कमाने का उपाय करूँ। मैं कल बनारस जाऊँगा। यो मेरे पहले के जानपहचान के तो कई आदमी है, पर उनके यहाँ नहीं ठहरना चाहता। सुमन का घर किस मुहल्ले में है। उमानाथ का मुख पीला पड़ गया। बोले, विवाह तक तो आप यही रहिये। फिर जहाँ इच्छा हो चले जाइयेगा। कृष्णचन्द्र—नहीं कल मुझे जाने दो, विवाह से एक सप्ताह पहले आ जाऊँगा। दो चार दिन सुमन के यहाँ ठहरकर कोई नौकरी ढूंढ लूँगा। किस मुहल्ले में रहती है? उमा—मुझे ठीक याद नहीं है, इधर बहुत दिनों से में उधर नहीं गया। शहरवालो का क्या ठिकाना? रोज घर बदला करते है। मालूम नहीं अब किस मुहल्ले मे हो। रात को भोजन के समय कृष्णचन्द्रने शान्ता से सुमन का पता पूछा। शान्ता उमानाथ के संकेत को न देख सकी, उसने पूरा पता बता दिया। २८ शहरकी म्युनिसिपैलिटी में कुल १८ सभासद थे। उनमें ८ मुसलमान थे और १० हिन्दू। सुशिक्षित मेम्बरों की संख्या अधिक थी, इसलिए शर्माजी को विश्वास था कि म्युनिसिपैलिटी में वेश्याओं को नगर से बाहर निकाल देने का प्रस्ताव स्वीकार हो जायगा। वे सब सभासदों से मिल चुके थे और इस विषय में उनकी शंकाओं का समाधान कर चुके थे, लेकिन मेम्बरों में कुछ ऐसे सज्जन भी थे जिनकी ओर से घोर विरोध होने का भय था। ये लोग बड़े व्यापारी, धनवान् और प्रभावशाली मनुष्य थे। इसलिए शर्माजी को यह भय भी थी कि कहीं शेष मेम्बर उनके दबाव में न आ जाएँ। हिन्दुओं मे विरोधीदल के नेता सेठ बलभद्रदास थे और मुसलमानों मे हाजी हाशिम। जबतक विट्ठलदास इस आन्दोलन के कर्ताधर्ता थे तबतक इन लोगों ने उसकी ओर कुछ ध्यान न दिया था, लेकिन जबसे पद्मसिंह और म्युनिसिपैलिटी के अन्य कई मेम्बर इस आन्दोलन मे सम्मिलित हो गये थे, तब से सेठजी और हाजी साहब के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। उन्हे मालूम हो गया था कि शीघ्र ही यह मन्तव्य सभा में उपस्थित होगा, इसलिए दोनों महाशय अपने पक्ष स्थिर करने में तत्पर हो रहे थे। पहले हाजी साहब ने मुसलमान मेम्बरों को एकत्र किया। हाजी साहब का जनतापर बड़ा प्रभाव था और वह शहर के समस्त मुसलमानों के नेता समझे जाते थे। शेष ७ मेम्बरों में मौलाना तेग अली एक इमामबाड़े के वली थे। मुन्शी अबुलवफा इत्र और तेल के कारखाने के मालिक थे। बड़े-बड़े शहरों में उनकी कई दूकानें थी। मुन्शी अबदुल्लतीफ एक बड़े जमीदार थे, लेकिन बहुधा शहर में रहते थे। कविता से प्रेम था और स्वयं अच्छे कवि थे। शाकिरबेग और शरीफहसन वकील थे। उनके सामाजिक सिद्धान्त बहुत उन्नत थे। सैयद शफकतअली पेन्शनर डिप्टी-कलक्टर थे। और साहब शोहरत खाँ प्रसिद्ध हकीम थे। ये दोनों महाशय सभा समाजो से प्राय: पृथक रहते थे, किन्तु उनमें उदारता और विचारशीलता की कमी न थी। दोनों धार्मिक प्रवृत्ति के मनुष्य थे। समाज में उनका बड़ा सम्मान था। हाजी हाशिम बोले, विरादरा ने वतन की यह नई चाल आप लोगो ने देखी? वल्लाह इनको सूझती खूब है! बगली घूसे मारना कोई इनसे सीख ख्वान से मोठे लुकमें खाते है, खुशबूदार खमीरे के कश लगाते हैं और उनके खासदान से मुअत्तर बीड़े उड़ाते है। बस, इसलाम की मजही कूबते इसलाह यहीं तक खत्म हो जाती है। अपने बुरे फेलों पर नादिम होना इंसानी खासा है। ये गुमराह करते पेशतर नहीं तो शराब का नशा उतरने के बाद जरूर अपनी हालत पर अफसोस करती है, लेकिन उस वक्त उनका पछताना वे सूद होता है। उनके गुजरानी को इसके सवा और कोई सूरत नहीं रहती कि वे अपनी लड़कियों से दूसरों को दामे मुहब्वत में फसाएं और इस तरह यह सिलसिलां हमेशा जारी रहता है। अगर उन लड़कियों की जायज तौरपर शादी हो सके तो, और इसके साथ ही उनकी परवरिश की सूरत भी निकल आये तो मेरे ख्याल में ज्यादा नही तो ७५ फीसदी तवायफें इसे खुशी से कबूल कर लें। हम चाहे खुद कितने ही गुनहगार हों, पर अपनी औलाद को हम ने और रास्तबाज देखने की तमन्ना रखते है। तवायफों को शहर से खारिज कर देने से उनकी इसलाह नहीं हो सकती। इस खयाल को सामने रखकर तो में इखराज की तहरी पर एतराज करने की जुरअत कर सकता हूँ। पर पोलिटिकल मफाद की बिनापर में उसकी मुखालिफत नहीं कर सकता। में किसी फेल को कौमी ख्याल से पसन्दीदा नहीं समझता जो इखलाकी तौरपर पसन्दीदा न हो। तेगअली--वन्दानवाज, संभलकर बातें कीजियें। ऐसा न हो कि आप पर कुफ्रका फतवा सादिर हो जाय। आजकल पोलिटिकल सफाद का जोर है, हक और इन्साफ का नाम न लीजिये। अगर आप मुदर्रिस है तो हिन्दू लड़कों को फेल कीजिये। तहसीलदार है तो हिन्दुओं पर टैक्स लगाये मजिस्ट्रेट है तो हिन्दुओं को सजाएँ दीजिये। सब इंस्पेक्टर पुलिस है तो, हिन्दुओं पर झूठे मुकदमें दायर कीजिये तहकीकात करने जाइये तो हिन्दुओं के बयान गलत लिखिये अगर आप चोर है तो किसी हिन्दू के घर डाका डालिये, अगर आपको हुस्न या इश्क का सब्त है तो किसी हिन्दू नाजनीन-को उड़ाइये तब आप कौम के सादिम, कौम के मुहसिन, कौमी किश्ती के नाखुदा सब कुछ हैं। हाजीहाशिम बुड़बुड़ाये, मुन्शी अबुलवफाके तेवरोंपर बल पड़ गये। तेगअलीकी तलवारने उन्हें घायल कर दिया। अबुलवफा कुछ कहना ही चाहते थे कि शाकिरबेग बोल उठे, भाई साहब, यह तान तजका मौका नहीं। हम अपने घर में बैठे हुए एक अमर के बारे में दोस्ताना मशाविरा कर रहे है। जवाने तेंज मसलेहत के हकमे जहरे कातिल है। मैं शाहिदान तन्नाज को निजाम तमद्दत में बिल्कुल बेकार या मायाए शर नहीं समझता। आप जब कोई मकान तामीर करते है तो उसमे बदरौर बनाना जरूरी ख्याल करते है। अगर बदरीर न हो तो चन्द दिनों में दीवारों की बुनियादे हिल जायें। इस फिरके को सोसाइटी का बदरौर समझना चाहिए और जिस तरह बदरीर मकान के नुमाया हिस्से में नहीं होती, बल्कि निगाह से पोशीदा एक गोशे में बनाई जाती है उसी तरह इस फिरके को शहर के पुरफिजा मुकामात से हटाकर किसी गोशे में आबाद करना चाहिए। मुन्शी अबुलवफा पहले के वाक्य सुनकर खुश हो गये थे, पर नाली की उपमापर उनका मुँह लटक गया। हाजीहाशिम ने नैराश्य से अब्दुल्लतीफी ओर देखा, जो अबतक चुपचाप बैठे हुए थे और बोले, जनाब, कुछ आप भी फरमाते है। दोस्ती के बहाव में आप भी तो नहीं बह गये? अब्दुल्लतीफ बोले, जनाब, रिन्दा को न इत्तहाद से दोस्ती न मुखालिफत से दुश्मनी। अपना मुशरिब तो सुलहेकुल है। मैं अभी यही है नहीं कर सका कि आलम वे दारी में हैं या ख्याव में। बड़े-बड़े आलमो को एक बे सिर-पैर की बात की ताईद में जमी और आसमान के कुलावे मिलाते देखता हूँ। क्योंकर बाबर कहें कि बेदार हूँ? साबुन, चमड़े और मिट्टी के तेल की दुकानों से आपको कोई शिकायत नहीं। कपड़े, बरतन आदवियात की दुकानें चीकमे है, आप उनको मुतलक वे मौका नहीं समझते। क्या आपकी निगाहों में हुस्न की इतनी भी वकअत नहीं? और क्या यह जरूरी है कि इसे किसी तग तारीक कूचे वद कर दिया जाय? क्या वह बागवाग कहलाने का मुश्तहक है। जहाँ सरोकी कतारें एक गोशे में हों, बेले और गुलाब के तख्ते दूसरे गोशे में और रविशो के दोनो तरफ नीम और कटहल के दरख्त हों, बस्तमे पीपल ठूठ और १२ किनारे बबूल की कलमें?—चील और कौए दोनों तरफ तख्तों पर बैठे अपना राग अलापते हों, और बुलबुले किसी गोशए तारीक में दर्द के तराने गाती हो। मैं इस तरहरीक की सख्त मुखालिफत करता हूँ। मैं उसे इस काबिल भी नहीं समझता कि उसपर साथ मतानत के साथ बहस की जाय। हाजी हाशिम मुस्कराये, अबुलवफा की आँखे खुशी से चमकने लगी। अन्य महाशयों ने दार्शनिक मुस्कान के साथ यह हास्यपूर्ण वक्तृता सुनी, पर तेगअली इतने सहनशील न थे। तीव्र भाव से बोले, क्यों गरीब परवर, अबकी बोर्ड में यह तजबीज क्यों न पेश की जाय कि म्युनिसिपैलिटी ऐन चोक में खास एहतमाम के साथ मीनाबाजार आरास्ता करे और जो हजरात इस बाजार की सैरको तशरीफ ले जाय उन्हें गवर्नमेन्ट की जानिब से खुशनूदी मिजाज का परवाना अदा किया जाय? मेरे ख्याल से इस तजबीज की ताइद करने वाले बहुत निकल आयेंगे और इस तजवीज के मुहर्रिरका नाम हमेशा के लिये जिन्दा हो जायगा। उसके वकालत के बाद उसके मजार पर उर्स होगे और वह अपने गोशये लहद में पड़ा हुआ हुस्न की बहार लूटेगा और दलजीर नजमे सुनेगा। मुन्शी अबदुल्लतीफ का मुँह लाल हो गया। हाजीहाशिम ने देखा कि बात बढ़ी जाती है, तो बोले, मैं अब तक सुना करता था कि उसूल भी कोई चीज है मगर आज मालूम हुआ कि वह महज एक वहम है। अभी बहुत दिन नहीं हुए कि आप ही लोग इस्लामी बजाएफका डेपुटेशन लेकर गए थे, मुसलमान कैदियों के मजहबी तसकीन की तजवीज कर रहे थे और अगर मेरा हाफिजा गलती नहीं करता तो आप ही लोग उन मौकों पर पेश नजर आते थे। मगर आज एकाएक यह इनकलाब नजर आता है। खैर आपका तलव्वुन आपको मुबारक रहे, बन्दा इतना सहज़ुलयकीन नहीं है। मैंने जिंदगी का यह उसूल बना लिया है कि बिरादरा ने वतन की हरएक तजबीज की मुखालिफत करूंगा, क्योंकि मुझे उससे किसी बेहबूदकी तवक्की नहीं है। अबुलवफा ने कहा, अलाहाजा मुझे रात को आफताब का यकीन हो सकता है, पर हिन्दुओं की नेकनीयत पर यकीन नहीं हो सकता। सैयद शफकत अली बोले, हाजी साहब, आपने हम लोगों को जमाना-साज और बेउसूल समझने में मतानत से काम नहीं लिया। हमारा उसूल जो तब था वह अब भी है और वही हमेशा रहेगा और वह है इसलामी वकार को कायम करना और हरएक जायज तरीके से बिरादरने मिल्लत के बेहबूदकी कोशिश करना। अगर हमारे फायदे में बिरादरा ने वतन का नुकसान हो तो हमको इसकी परवाह नहीं। मगर जिस तजबीज से उनके साथ हमको भी फायदा पहुँचता है और उनसे किसी तरह कम नही, उसकी मुखालिफत करना हमारे इमकान से बाहर है। हम मुखालिफत के लिये मुखालिफत नहीं कर सकते। रात अधिक जा चुकी थी। सभा समाप्त हो गई। इस वार्तालाप का कोई विशेष फल न निकला। लोग मन से जो पक्ष स्थिर करके घर से आये थे उसी पक्षपर डटे रहे। हाजी हाशिम को अपनी विजयका जो पूर्ण विश्वास था उसम सन्देह पड़ गया। २९ इस प्रस्ताव के विरोध में हिन्दू मेम्बरों को जब मुसलमानो के जलसे का हाल मालूम हुआ तो उनके कान खड़े हुए। उन्हे मुसलमानो से जो आश थी वह भंग हो गई। कुल दस हिन्दू थे। सेठ बलभद्रदास चेयरमैन थे। डाक्टर श्यामाचरण वाइस चेयरमैन। लाला चिम्मनलाल और दीनानाथ तिवारी व्यापारियों के नेता थे। पद्मसिंह और रुस्तमभाई वकील थे। रमेशदत्त कालेजके अध्यापक, लाला भगतराम ठेकेदार, प्रभाकरराव हिन्दी पत्र ‘जगत' के सपादक और कूंवर अनिरुद्ध बहादुर सिंह जिले के सबसे बड़े जमीदार थे। चौक की दूकानों मे अधिकांश बलभद्रदास और चिम्मनलाल की थी। चावल मंडी में दीनानाथ के कितने ही मकान थे, यह तीनों महाशय इस प्रस्ताव के विपक्षी थे। लाला भगतरामका काम चिम्मनलालकी आर्थिक सहायता से चलता था। इसलिये उनकी सम्मति भी उन्हींकी ओर थी। प्रभाकरराव, रमेशदत्त, रुस्तमभाई और पद्मसिंह इस प्रस्तावके पक्ष में थे। डाक्टर श्यामाचरण और कुंवर साहब के विषय में अभी तक कुछ निश्चय नहीं हो सका था। दोनों पक्ष उनसे सहायता की आशा रखते थे। उन्हीं पर दोनों पक्षों की हार-जीत निर्भर थी। पद्मसिंह अभी बारात से नहीं लौटे थे। बलभद्रदास ने इस अवसर को अपने पक्ष मे समर्थन के लिये उपयुक्त समझा और सब हिन्दू मेम्बरों को अपनी सुसज्जित बारहदरी मे निमंत्रित किया, इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि डाक्टर साहब और कुंवर महोदय की सहानुभूति अपने पक्ष में कर ले। प्रभाकरराव मुसलमानों के कट्टर विरोधी थे। वे लोग इस प्रस्ताव को हिन्दू मुसलिम विवाद का रंग देकर प्रभाकर राव को भो अपनी ओर खीचना चाहते थे। दीनानाथ तिवारी वोले, हमारे मुसलमान भाइयों ने तो इस विषय में बडी उदारता दिखाई पर इसमें एक गूढ़ रहस्य है। उन्होने 'एक पथ-दो काज' वाली चाल चली है। एक ओर तो समाज सुधार की नेकनामी हाथ आती है दूसरी ओर हिन्दूओं को हानि पहुंचाने का एक बहाना मिलता है। ऐसे अवसर से वे कब चूकने वाले थे। चिम्मनलाल-मुझे पालिटिक्स से कोई वास्ता नही है और न मैं इसके निकट जाता हूँ। लेकिन मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि हमारे मुसलिम भाइयों ने हमारी गरदन बुरी तरह पकड़ी है। चावलमंडी और चौकके अधिकांश मकान हिन्दुओं के है, यदि वोर्ड ने यह स्वीकार कर लिया तो हिन्दुओं का मटियामेट हो जायगा। छिपे छिपे चोट करना कोई मुसलमानों से सीख ले। अभी बहुत दिन नहीं बीते कि सूद की आड़ में हिन्दुओं पर आक्रमण किया गया था। जब वह चाल पट पड़ गयी तो यह नया उपाय सोचा। खेद है कि हमारे कुछ हिन्दू भाई उनके हाथों की कठपुतली बने हुए है। वे नहीं जानते कि अपने दुरुत्साह से अपनी जाति को कितनी हानि पहुचा रहे है। स्थानीय कौसिल में जब सूदका प्रस्ताव उपस्थित था तो प्रभाकरराव ने उसका घोर विरोध किया था। चिम्मनलाल ने उसका उल्लेख करके और वर्तमान विषय को आर्थिक दृष्टिकोण से दिखाकर प्रभाकरराव को नियम विरुद्ध करने की चेष्टा की। प्रभाकरराव ने विवश नेत्रों से रुस्तम भाई की ओर देखा, मानो उनसे कह रहे थे कि मुझे ये लोग ब्रह्म फाँस में डाल रहे है, आप किसी तरह मेरा उद्धार कीजिये। रुस्तम भाई बड़े निर्भीक, स्पष्टवादी पुरुष थे। वे चिम्मनलाल का उत्तर देने के लिये खड़े हो गये और बोले, मुझे यह देखकर शोक हो रहा है कि आप लोग एक सामाजिक प्रश्न को हिन्दू मुसलमानो के विवाद का स्वरूप दे रहे हैं। सूद के प्रश्न को भी यही रंग देने की चेष्टा की गई थी। ऐसे राष्ट्रीय विषयो को विवादग्रस्त बनाने से कुछ हिन्दू साहूकारों का भला हो जाता है, किन्तु इससे राष्ट्रीयता को जो चोट लगती है उसका अनुमान करना कठिन है। इसमे सन्देह नही कि इस प्रस्ताव के‌ स्वीकृत होने से हिन्दु साहूकारो को अधिक हानि पहुँचेगी, लेकिन, मुसलमानो-पर भी इसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा। चौक और दालमंडी मे मुसलमानों की दूकाने कम नहीं है। हमको प्रतिवाद या विरोध के धुन में अपने मुसलमान भाइयों की नीयत की सफाई पर सन्देह न करना चाहिये, उन्होने इस विषय‌ मे जो कुछ निश्चय किया है वह सार्वजनिक उपकार के विचार से किया है; अगर हिन्दुओं को इससे अधिक हानि हो रही है तो यह दूसरी बात है। मुझे विश्वास है कि मुसलमानों की इससे अधिक हानि होती तब भी उनका यही फैसला होता। अगर आप सच्चे हृदय से मानते है कि यह प्रस्ताव एक सामाजिक कुप्रथा के सुधार के लिये उठाया गया है तो आपको उसके स्वीकार करने में कोई बाधा न होनी चाहिये, चाहे धन की कितनी ही हानि हो। आचरण के सामने धन का कोई महत्व न होना चाहिये। प्रभाकरराव को धैर्य हुआ। बोले, बस यही मैं भी कहने वाला था, अगर थोड़ी सी आर्थिक हानि से एक कुप्रथा का सुधार हो रहा हो तो वह हानि प्रसन्नाता से उठा लेनी चाहिये। आपलोग जानते है कि हमारी गवर्नमेन्ट को चीन देश से अफीम का व्यापार करने में कितना लाभ था। १८ करोड़ से कुछ अधिक ही होगा। पर चीन में अफीम खाने की कुप्रथा मिटाने के लिये सरकार ने इतनी भीषण हानि उठाने में जरा भी आगा-पीछा नहीं किया। कुँवर अनिरुद्ध सिंह ने प्रभाकरराव की ओर देखते हुए पूछा, महाशय, है। स्वर्ग में पहुँचने के लिए आए कोई सीधा रास्ता नहीं है। वैतरणी का सामना अवश्य करना पड़ेगा। जो लोग समझते है किसी महात्मा के आशीर्वाद से कूद स्वर्ग में जा बैठेंगे वह उनसे अधिक हास्यास्पद है जो समझते है कि चीफ़ से वेश्याओं को निकाल देने से भारत के सब दुःख दर्द मिट जायेंगे और एक नवीन सूर्य का उदय हो जायगा। ३० जिस प्रकार कोई आलसी मनुष्य किसी के पुकारन की आवाज सुनकर जाग जाता है किन्तु इधर-उधर देख कर फिर निंद्रा में मग्न हो जाना है, उसी प्रकार पंडित कृष्णचन्द्र क्रोध और ग्लानि का आवेश शांत होने पर अपने कर्त्तव्यों को भूल गये। उन्होंने सोचा, मेरे यहाँ रहने से उमानाथ पर कौन-सा बोझ पड़ रहा है। आधा सेर आटा ही तो खाता हूँ या और कुछ। लेकिन उस दिन से उन्होंने नीच आदमियों के साथ बैठकर चरस पीना छोड़ दिया। इतनी-सी बात लिये चारों ओर मारे-मारे फिरना उन्हें अनुपयुक्त मालूम हुआ। अब वे प्रायः बरामदे में ही बैठे रहते और सामने से आनेजाने वाली रमणियों को घूरते। वे प्रत्येक विषय में उमानाथकी हाँ-में-हाँ मिलाते। भोजन करते समय सामने जितना आ जाता था का खा लेते, इच्छा रहनेपर भी कभी कुछ न माँगते। वे उनसे न कितनी ही बाते ठकुरसुहाती के लिये कहने। उनकी आत्मा शिव निर्बल हो गई थी। उमानाथ सान्ता के विवाह संबंध जब उनसे कुछ कहते तो वह बड़े सरल भाषा से उत्तर देते, भाई तुम चाहो जो करो तुम्हीं इसके मालिक हो। वह अपने मन को समझते, जब रुपये इनके लग रहे है तो सब काम इन्हीं के इच्छानुसार होने चाहिये। लेकिन उमानाथ अपने में बहनोई की कठोर बातें न भूले छालेपर मक्खन लगाने से एक क्षण के लिये कष्ट कम हो जाता है, किन्तु फिर ताप की वेदना होने लगती हैं। कृष्णचन्द्रकी आत्मग्लानि से भरी हुई बातें उमानाथ को शीघ्र भूल गई और उनके कृतघ्न शब्द कानो में गूंजने लगे। जब वह सोने गये तो जान्हवी ने पूछा, आज लालाजी (कृष्णचन्द्र) तुमसे क्या बिगड़ रहे थे। उमानाथ ने अन्यायपीडित नेत्रों से कहा, मेरा यश गा रहे थे। कह रहे थे, तुमने मुझे लूट लिया, मेरी स्त्री को मार डाला, मेरी एक लड़की को कुएँ में डाल दिया, दूसरी को दुःख दे रहे हो। 'तो तुम्हारे मुँह मे जीभ न थी? कहा होता क्या मैं किसी को नेवता देने गया था? कही तो ठिकाना न था, दरवाजे-दरवाजे ठोकरें खाती फिरती। बकरा जीसे गया, खानेवाले को स्वाद ही न मिला। यहाँ लाज ढोते-ढोते मर मिटे, उसका यह फल। इतने दिन थानेदारी की, लेकिन गंगाजली ने कभी भूलकर भी एक डिविया सेंदूर न भेजा। मेरे सामने कहा होता तो ऐसी ऐसी सुनाती कि दाँत खट्टे हो जाते। दो-दो पहाड़ सी‌‌ लड़कियाँ गलेपर सवार कर दी, उस पर बोलने को मरते है। इनके पीछे फकीर हो गये, उसका यह यश है? अबसे अपना पौरा लेकर क्यों नहीं कही जाते? काहे को पैर में मेहंदी लगाए बैठे है।' 'अब तो जाने को कहते है। सुमन का पता भी पूछा था।' 'तो क्या अब बेटी के सिर पड़ेंगे? वाह रे बेहया!' 'नहीं ऐसा क्या करेगे, शायद दो-एक दिन वहाँ ठहरेगे।' 'कहाँ की बात, इनसे अब कुछ न होगा। इनकी आँखो का पानी मर गया, जाके उसी के सिर पड़ेगें, मगर देख लेना वहाँ एक दिन भी निवाह न होगा।' अबतक उमानाथ ने सुमन के आत्मपतन की बात जान्हवी से छिपाई थी। वह जानते थे कि स्त्रियों के पेट मे बात नहीं पचती। यह किसी न किसी से अवश्य ही कह देगी और बात फैल जायेगी। जब जान्हवी के स्नेह व्यवहार से‌ वह प्रसन्न होते तो उन्हें उससे सुमन की कथा कहने की बड़ी तीव्र आकांक्षा होती। हृदयसागर में तरंगें उठने लगती, लेकिन परिणाम को सोचकर रुक जाते थे। आज कृष्णचन्द्र की कृतघ्नता और जान्हवी की स्नेहपूर्ण बातों ने उमानाथ को निशंक कर दिया, पेट में बात न रुक सकी। जैसे किसी नाली में स्त्रियाँ भी मुस्करा मुस्कराकर उनपर नयनों की कटार चला रही थी। जान्हवी उदास थी, वह मन में सोच रही थी कि यह वर मेरी चन्द्रा को मिलता तो अच्छा होता। सुभागी यह जानने के लिये उत्सुक थी कि समधी कौन है। कृष्णचन्द्र सदन के चरणों की पूजा कर रहे थे और मन में शंका कर रहे थे कि यह कौनसा उल्टा रिवाज है। मदनसिंह ध्यान से देख रहे थे कि थाल में कितने रुपये है। बारात जनवा से को चली। रसद का सामान बँटने लगा। चारों ओर कोलाहल होने लगा। कोई कहता था, मुझे घी कम मिला, कोई गोहार लगाता था कि मुझे उपले नहीं दिये गये। लाला बैजनाथ शराब के लिये जिद्द कर रहे थे। सामान बंट चुका तो लोगोने उपले जलाये और हाँडियाँ चढ़ाई। कुएँ से गैस का प्रकाश पीला पड़ गया। सदन मसनद लगाकर बैठा। महफिल सज गई। काशी के संगीत समाज ने श्यामकल्याणकी धुन छेड़ी। सहस्त्रों मनुष्य शामियाने के चारो ओर खड़े थे। कुछ लोग मिर्जई पहने, पगड़ी बाँधे फर्शपर बैठे थे, लोग एक दूसरे से पूछते थे कि डेरे कहाँ है। कोई इस छोलदारी मे झाँकता था, कोई उस छोलदारी में और कुतूहल से कहता था, कैसी बारात है कि एक डेरा भी नही, कहाँ के कंगले है। यह बड़ासा शामियाना काहे को खड़ा कर रक्खा है? मदनसिंह ये बाते सुन-सुनकर मनमें पद्मसिंहपर कुड़बुड़ा रहे थे और पद्मसिंह लज्जा और भय के मारे उनके सामने न आ सकते थे। इतने में लोगो ने शामियाने पर पत्थर फेंकना शुरु किया। लाला बैजनाथ उठकर छोलदारी में भागे। कुछ लोग उपद्रवकारियों को गालियाँ देने लगे। एक हलचलसी मच गयी। कोई इधर भागता, कोई उधर, कोई गाली बकता था, कोई मारपीट करने पर उतारू था। अकस्मात् एक दीर्घकाय पुरुष, सिर मुड़ाये, भस्म रमाये हाथ में एक त्रिशूल लिये आकर महफिल में खडा हो गया। उसके लाल नेत्र दीपक के समान जल रहे थे और मुख मण्डल में प्रतिभा की ज्योति स्फुटित हो रही थी। महफिल में सन्नाटा छा गया। सब लोग आंखें फाड़-फाड़कर महात्मा की ओर ताकने लगे। यह साधु कौन है? कहाँ से आ गया। साधु ने त्रिशूल ऊँचा किया और तिरस्कारपूर्ण स्वर से बोला हाँ शोक! यहाँ कोई नाच नहीं, कोई वेश्या नहीं, सब बाबा लोग उदास बैठे है। श्याम-कल्याण की धुन कैसी मनोहर है, पर कोई नहीं सुनता, किसी के कान नहीं, सब लोग वेश्या का नाच देखना चाहते है। या उन्हें नाच दिखाओ या अपने सर तुड़ाओ। चलो, मैं नाच दिखाऊँ। देवताओं का नाच देखना‌ चाहते हो? देखो सामने वृक्ष की पत्तियों पर निर्मल चन्द्र की किरणे कैसी नाच रही है। देखो तालाब में कमल के फूलपर पानी की बूंदे कैसी नाच रही है। जंगल में जाकर देखो मोर पंख फैलाये कैसा नाच रहा है। क्यों यह देवताओं का नाच पसन्द नहीं है? अच्छा चलो पिशाचों का नाच दिखाऊँ। तुम्हारा पड़ोसी दरिद्र किसान जमीदार के जूते खाकर कैसा नाच रहा है? तुम्हारे भाइयों के अनाथ बालक क्षुधा से बावले होकर कैसे नाच रहे है? अपने घर में देखो, तुम्हारी विधवा भावज की आंखों में शोक और वेदना के आंसू कैसे नाच रहे है? क्या यह नाचे देखना पसन्द नहीं? तो अपने मन में देखो, कपट और छल कैसा नाच रहा है? सारा संसार नृत्यशाला है उसमे लोग अपना-अपना नाच नाच रहे हैं। क्या यह देखने के लिये तुम्हारी आंखें नहीं है? आओ, मैं तुम्हें शंकर का तांडव नृत्य दिखाऊँ। किन्तु तुम वह नृत्य देखने योग्य नहीं हो। तुम्हारी काम तृष्णा को इस नाच का क्या आनन्द मिलेगा? हां! अज्ञानी मूर्तियों। हा। विषय भोग के सेवकों! तुम्हें नाच का नाम लेते लाज नहीं आती। अपना कल्याण चाहते हो तो इस रीति को मिटाओ। इस कुवासना को तजो, वेश्या-प्रेम का त्याग करो। सब लोग मूर्तिवत् बैठे महात्मा की उन्मत्त वाणी सुन रहे थे कि इतने में वह अदृश्य हो गये और सामने वाले आम के वृक्षों की आड़ से उनके मधुर गान की ध्वनि सुनाई देने लगी। धीरे-धीरे वह भी अन्धकार में विलीन हो गयी। जैसे रात्रि को चिन्तारूपी नाव निद्रासागर में विलीन हो जाती है। नेत्र ज्योतिहीन हो गये। बोले, महाराज ... .......और उनके मुख से कुछ न निकला। मदनसिंह ने गरज कर कहा स्पष्ट क्यों नही बोलते? यह बात सच है या झूठ? उमानाथ ने फिर उत्तर देना चाहा, किन्तु 'महाराज' के सिवा और कुछ न कह सके। मदनसिंह को अब कोई सन्देह न रहा। क्रोध की अग्नि प्रचंड हो गई। आँखों से ज्वाला निकलने लगी। शरीर काँपने लगा। उमानाथ की और आग्नेय दृष्टि से ताककर बोले, अब अपना कल्याण चाहते हो तो मेरे सामने से हट जाओ।, धूर्त्त दगाबाज, पाखण्डी कहीं का। तिलक लगाकर पंण्डित बना फिरता है, चांडाल में अब तेरे द्वारपर पानी न पीऊँगा। अपनी लड़की को यन्तर बनाकर गले मे पहन। यह कहकर मदनसिंह उठे और उस छोलदारी में चले गये जहाँ सदन पड़ा सो रहा था और जोर से चिल्लाकर कहारो को पुकारा! उनके जाने पर उमानाथ पद्मसिंह से बोले, महाराज, किसी प्रकार पंण्डितजी को मनाइये। मुझे कहीं मुँह दिखाने को जगह न रहेगी। सुमन का हाल तो आपने सुना ही होगा। उस अभागिन ने मेरे मुँह में कालिख लगा दी। ईश्वर की यही इच्छा थी, पर अब गड़े हुए मुरदे उखाड़ने से क्या लाभ होगा। आप ही न्याय कीजिये, मैं इस बात को छिपाने के सिवा और क्या करता? इस कन्या का विवाह करना ही था। वह बात छिपाये बिना कैसे बनता? आपसे सत्य कहता हूँ कि मुझे यह समाचार सबन्ध ठीक हो जाने के बाद मिला। पद्मसिंह ने चिंतित स्वर से कहा, भाई साहब के कान में बात न पड़ी होती तो यह सब कुछ न होता। देखिये मैं उनके पास जाता हूँ पर उनका राजी होना कठिन मालूम होता है। कहारों से चिल्लाकर कह रहे थे कि जल्द यहाँ से चलने की तैयारी करो। सदन भी अपने कपड़े समेट रहा था। उसके पिता ने सब हाल उससे कह दिया था। इतने में। पद्मसिंह ने आकर आग्रहपूर्वक कहा, भैया, इतनी जल्दी न कीजिये। जरा सोच समझकर काम कीजिए। धोखा तो हो ही गया, पर यों लौट चलने मे तो और भी जग हंसाई है। सदन ने चाचा की ओर अवहेलनाकी दृष्टिसे देखा, और मदनसिंह ने आशचर्य से। पद्मसिंह——दो चार आदमियों से पूछ देखिये क्या राय है। मदन——क्या कहते हो, क्या जानबूझकर जीती मक्खी निगल जाऊँ? पद्म——इसमें कम से कम जग हँसाई तो न होगी। मदन——तुम अभी लडके हो, ये बाते क्या जानो? जाओ, लौटने का सामान करो। इस वक्त की जग हँसाई अच्छी है। कुल में सदा के लिये कलंक तो न लगेगा। पद्म——लेकिन यह तो विचार कीजिये कि कन्या की क्या गति होगी। उसने क्या अपराध किया है? मदनसिंह ने झिड़ककर कहा, तुम हो निरे मूर्ख। चलकर डेरे लदाओ। कल को कोई बात पड़ जायगी तो तुम्हीं गालियाँ दोगे कि रुपए पर फिसल पड़े। संसार के व्यवहार में वकालत से काम नहीं चलता। पद्मसिंहने कातर नेत्रो से देखते हुए कहा, मुझे आपकी आज्ञा से इनकार नहीं है, लेकिन शोक है कि इस कन्या का जीवन नष्ट हो जायगा। मदन—— तुम खामख्वाह क्रोध दिलाते हो। लड़की का मैने ठीक़ा लिया है? जो कुछ उसके भाग्य में बदा होगा, वह होगा। मुझे इससे क्या प्रयोजन? पद्मसिंह ने नैराग्यपूर्ण भाव से कहा, सुमन का आना जाना बिलकुल बन्द है। इन लोगों ने उसे त्याग दिया है। मदन, मैंने तुम्हें कह दिया कि मुझे गुस्सा न दिलाबो। तुम्हें ऐसी १३ बात मुझसे से कहते हुए लज्जा नही आती? बड़े सुधारक की दुम बने हो। एक हरजाई की बहन से अपने बेटे का व्याह कर लूँ। छि:छि: तुम्हारी बुद्धि कैसी भ्रष्ट हो गई। पद्मसिंह ने लज्जित होकर सिर झुका लिया। उनका मन कह रहा था कि भैया इस समय जो कुछ कर रहे हो वही ऐसी अवस्था में मैं भी करता। लेकिन भयंकर परिणाम विचार करके उन्होंने एक बार फिर बोलने का साहस किया जैसे कोई परीक्षार्थी गजट में अपना नाम न पाकर निराश होते हुए भी शोधपत्र की ओर लपकता है, उसी प्रकार अपने को धोखा देकर पद्मसिहं भाई से दबते हुए बोले, सुमन बाई भी तो अब विधवाश्रम में चली गई है। पद्मसिंह सिर नीचे किये बात कर रहे थे। भाई से आँँखें मिलाने का हौसला न होता था। यह वाक्य मुँह से निकला ही था कि अकस्मात् मदनसिंह ने एक जोर से धक्का दिया कि वह लड़खड़ाकर गिर पड़े। चौककर सिर उठाया, मदनसिंह खड़े क्रोध से काँप रहे थे। तिरस्कार के वे कठोर शब्द जो उनके मुँह से निकलने वाले थे, पद्मसिंह को भूमिपर गिरते देखकर पश्चाताप से दब गये थे। मदनसिंहकी इस समय वही दशा थी जब क्रोध में मनुष्य अपनाही माँस काटने लगता है। यह आज जीवन में पहला अवसर था कि पद्मसिंह ने भाई के हाथों धक्का खाया। सारी बाल्यावस्था बीत गई, बड़े-बड़े उपद्रव किये, पर भाई ने कभी हाथ न उठाया। वह बच्चों के सदृश रोने लगे, सिसकते थे, हिचकियाँ लेते थे, पर हृदय में लेशमात्र को भी क्रोध न था। केवल यह दुख था कि जिसने सर्वदा प्यार किया, कभी कड़ी बात नहीं कही, उसे आज मेरे दुराग्रह से ऐसा दु:ख पहुँचा। यह हृदय में जलती हुई अग्नि की ज्वाला है, यह लज्जा, अपमान और आत्मग्लानि का प्रत्यक्ष स्वरुप है, यह हृदय में उमड़े हुए शोक सागर का उद्वेग है। सदन ने लपकर पद्मसिंह को उठाया और अपने पिता की ओर क्रोध से देखकर बोला, आप तो जैसे बावले हो गये है। इतने में कई आदमी आ गये और पूछने लगे, महराज, क्या बात हुई? बारात को लौटाने का हुकुम क्यों देते है? ऐसा कुछ करो कि दोनों ओर की मर्यादा बनी रहे, अब उनकी और आपकी इज्जत एक है। लेन-देन में कुछ कोर कसर हो तो तुम्हीं दब जाओ, नारायण ने तुम्हें क्या नहीं दिया है? इनके धन से थोडे ही धनी हो जाओगे? मदनसिंहने कुछ उत्तर नहीं दिया। महफिलमें खलबली पड़ गई। एक दूसरे से पूछता था, यह क्या बात है? छोलदारी के द्वार पर आदमियों की भीड़ बढ़ती ही जाती थी। महफिल में कन्या की ओर के भी कितने ही आदमी थे। वह उमानाथ से पूछने लगे, भैया, ये लोग क्यों बरात लौटाने पर उतारू हो रहे है? जब उमानाथ ने कोई संतोषजनक उत्तर न दिया तो से सबके सब आकर मदन सिंह से विनती करने लगे, महाराज, हमसे ऐसा क्या अपराध हुआ है। और जो दण्ड चाहे दीजिये पर बारात न लौटाइये नहीं तो गाँव बदनाम हो जायगा। मदनसिहं ने उनसे केवल इतना कहा, इसका कारण जाकर उमानाथ से पूछो, वहीं बतलायेगे। पंण्डित कृष्णचन्द्र ने जब से सदन को देखा था, आनन्द से फूले न समाते थे। विवाह का मुहूर्त निकट था, वह वर के आने की राह देख रहे थे कि इतने मे कई आदमियों ने आकर उन्हें यह खबर दी। उन्होंने पूछा क्यों लौट जाते है? क्या उमानाथ से कोई झगड़ा हो गया है? लोगों ने कहा, हमें यह नहीं मालूम, उमानाथ तो वही खड़े मना रहे है। कृष्णचन्द्र झल्लाये हुए बारात की ओर चले। बारात का लौटना क्या लड़कों का खेल है? यह कोई गुड्डे गुड्डों का ब्याह है क्या? अगर विवाह नहीं करना था तो यहां बारात क्यों लाये। देखता हूं, कौन बारात को फेर ले जाता है? खून की नदी बहा दूँगा। यही न होगा फांसी हो जायगी, पर इन्हें इसका मजा चखा दूँगा। कृष्णचन्द्र अपने साथियों से ऐसी ही बाते करते, कदम बढ़ाते हुए जनवा से मे पहुँचे और ललकारकर बोले, कहाँ है पंण्डित मदनसिंह? महाराज, जरा बाहर आइये। मदनसिंह यह ललकार सुनकर बाहर निकल आये और दृढ़ता के साथ बोले, कहिये, क्या कहना है? कृष्णचन्द्र-आप बारात क्यों लौटाए लिए जाते हैं? मदन-—अपना मन! हमें विवाह नहीं करना है। कृष्ण-—आपको विवाह करना होगा। यहाँ आकर आप ऐसे नहीं लौट सकते। मदन--आपको जो करना हो कीजिये। हम विवाह नहीं करेगे। कृष्ण-—कोई कारण? मदन-—कारण क्या आप नहीं जानते? कृष्ण—जानता तो आपसे क्यों पूछता? मदन- —तो पंडित उमानाथ से पूछिए? कृष्ण--मैं आपसे पूछता हूँ? मदन-—बात दबी रहने दीजिए। मैं आपको लज्जित नहीं करना चाहता। कृष्ण—अच्छा, समझा, मैं जेलखाने हो आया हूँ। यह उसका दण्ड है। धन्य है आपका न्याय! मदन—इस बातपर बारात नहीं लौट सकती थी। कृष्ण—तो उमानाथ से विवाह का कर देने में कुछ कसर हुई होगी। मद -—हम इतने नीच नहीं है। कृष्ण-फिर ऐसी कौनसी बात है? मदन- हम कहते है हमसे न पूछिए। कृष्ण-आपको बतलाना पड़ेगा। दरवाजे पर बारात लाकर उसे लौटा ले जाना क्या आपने लड़को का खेल समझा है? यहाँ खून की नदी बह जायगी। आप इस भरोसे में न रहियेगा। मदन-इसकी हमको चिन्ता नहीं है। हम यहाँ मर जायेंगे लेकिन आपकी लड़की से विवाह न करेगे। आपके यहाँ अपनी मर्य्यादा खोने नहीं आए हैं? कृष्ण-- तो क्या हम आपसे नीच है? मदन-—हाँ, आप हमसे नीच है। कृष्ण-इसका कोई प्रमाण? मदन–हाँ, है। कृष्ण–तो उसके बताने में आपको क्यो संकोच होता है? मदन--अच्छा, तो सुनिये, मुझे दोष न दीजियेगा, आपकी लड़की सुमन, जो इस कन्या की सगी बहन है, पतिता हो गई है। आप का जी चाहे तो उसे दालमंडी मे देख आइए। कृष्णचन्द्र ने अविश्वास की चेष्टा करके कहा, यह बिल्कुल झूठ है। पर क्षणमात्र मे उन्हें याद आ गया कि जब उन्होंने उमानाथ से सुमन का पता पूछा था तो उन्होंने टाल दिया था, कितने ही ऐसे कटाक्षों का अर्थ समझ में आ गया जो जान्हवी बात बात में उनपर करती रहती थी। विश्वास हो गया। उनका सिर लज्जा से झुक गया। वह अचेत होकर भूमिपर गिर पड़े! दोनो तरफ के सैकड़ों आदमी वहाँ खड़े थे लेकिन सबके सब सन्नाटे में आ गए, इस विषय में किसी को मुँह खोलने का साहस नहीं हुआ। आधी रात होते-होते डेरे-खेमे सब उखड़ गये। उस बगीचे मे फिर अन्धकार छा गया। गीदडो़ की सभा होने लनी और उल्लू बोलने लये। ३२ विठ्ठलदास ने सुमन को विधवाश्रम में गुप्त रीति से रखा था। प्रबन्ध-कारिणी सभा के किसी भी सदस्य को इत्तला न दी थी। आश्रम की विधवाओं से उसे विधवा बताया था। लेकिन अबुलवफा जैसे टोहियो से यह बात बहुत दिनों तक गुप्त न रही। उन्होंने हिरिया को ढूंढ निकाला और उससे सुमन का पता पूछा लिया। तब अपने अन्य रसिक मित्रो को भी इसकी सूचना दे दी। इसका यह परिणाम हुआ कि उन सज्जनो की आश्रम पर विशेष रीति-से कृपादृष्टि होने लगी। कभी सेठ चिम्मनलाल आते, कभी सेठ बलभद्रदास, कभी पंडित दीनानाथ विराजमान हो जाते। इन महानुभावो को अब आश्रम की सफाई और सजावट, उसकी आर्थिक दशा, उसके प्रबन्ध आदि कृष्णचन्द्र-आप बारात क्यों लौटाए लिए जाते हैं ? मदन—अपना मन ! हमें विवाह नही करना है । कृष्ण—आपको विवाह करना होगा । यहाँ आकर आप ऐसे नहीं लौट सकते। मदन—आपको जो करना हो कीजिये । हम विवाह नही करेंगे। कृष्ण- कोई कारण? मदन—कारण क्या आप नही जानते ? कृष्ण—जानता तो आपसे क्यों पूछता ? मदन—तो पंडित उमानाथ से पूछिए? कृष्ण—मैं आपसे पूछता हूं ? मदन-बात दबी रहने दीजिए। में आपको लज्जित नही करना चाहता । कृष्ण-अच्छा, समझा, मैं जेलखाने हो आया हूँ । यह उसका दण्ड है । धन्य है आपका न्याय ! मदन-इस बातपर बारात नही लौट सकती थी। कृष्ण-तो उमानाथसे विवाहका कर देनेमें कुछ कसर हुई होगी। मदन-हम इतने नीच नही हैं । कृष्ण—फिर ऐसी कौनसी बात है ? मदन- हम कहते है हममें न पूछिए । कृष्ण—आपको बतलाना पड़ेगा । दरवाजेपर बारात लाकर उसे लौटा ले जाना क्या आपने लड़कोका खेल समझा है ? यहाँ खूनकी नदी वह जायगी । आप इस भरोसेमें न रहियेगा । मदन—इसकी हमको चिन्ता नही है । हम यहाँ मर जायेंगे, लेकिन आपकी लडकीसे विचाह न करंगे । आपके यह अपनी मर्यादा खोने नहीं देगें। कृष्ण-तो क्या हम आपसे नीच है ? मदन-हाँ, आप हमसे नीच है । कृष्ण-इसका कोई प्रमाण ? मदन-हाँ, है । कृष्ण—तो उसके बताने मे आपको क्यो सकोच होता है ? मदन अच्छा, तो सुनिये,मुझे दोष न दीजियेगा, आपकी लड़की सुमन,जो इस कन्या की सगी बहन है,पतिता हो गई है । आपका जी चाहे तो उसे दालमंडी मे देख आइए। कृष्णचंद्र ने अविश्वासकी चेष्टा करके कहा,यह बिल्कुल झूठ है। पर क्षणमात्रमे उन्हे याद आ गया कि जब उन्होंने उमानाथ से सुमन का पता पूछा था तो उन्होंने टाल दिया था, कितने ही ऐसे कटाक्षों का अर्थ समझ में आ गया जो जान्हवी बात बातमें उनपर करती रहती थी। विश्वास हो गया। उनका सिर लज्जासे झुक गया । वह अचेत होकर भूमिपर गिर पड़े ! दोनों तरफ सैकड़ों आदमी वहीं खड़े थे लेकिन सबके सब सन्नाटेमें आ गए ,इस विषय में किसीको मुंह खोलनेका साहस नहीं हुआ । आधी रात होतेहोते डेरे-खेमे सब उखड़ गये । उस बगीचेमे फिर अन्धकार छा गया । गीदड़ोंकी सभा होने लनी और उल्लू बोलने लये । ३२ विठ्ठलदास ने सुमनको विधवाश्रम में गुप्त रीति से रखा था। प्रबन्ध-कारिणी सभा किसी भी सदस्य को इत्तला न दी थी। आश्रम की विधवाओसे उसे विधवा वताया था। लेकिन अबुलवफा जैसे टोहियोंसे यह बात बहुत दिनोंतक गुप्त न रही। उन्होंने हिरियाको ढूंढ़ निकाला और उससे सुमनका पता पूछा लिया। तब अपने अन्य रसिक मित्रों को भी इसकी सूचना दे दो। इसका यह परिणाम हुआ कि उन सज्जनों की आश्रमपर विशेष रीति से कृपादृष्टि होने लगी। कभी सेठ चिम्मनलाल आते,कभी सेठ बलभद्रदास,कभी पंडित दीनानाथ विराजमान हो जाते! इन महानुभावोंको अब आश्रम की सफाई और सजावट,उसकी आर्थिक दशा, उसके प्रबंध आदि मालूम होता है, वह अपने सद्व्यवहार से अपनी कालिमा को धोना चाहती है। सब काम करने को तैयार और प्रसन्न चित्त से। अन्य स्त्रियाँ सोती ही रहती है और वह उनके कमरों से झाड़ू दे जाती है। कई विधवाओं को सीना सिखाती है, कई उससे गाना सीखती है। सब प्रत्येक बात में उसी की राय लेती है। इस चहारदिवारी के भीतर अब उसी का राज्य है। मुझे कदापि ऐसी आशा न थी। यहाँ उसने कुछ पढ़ना भी शुरू कर दिया है। और भाई मनका हाल तो ईश्वर जानें, देखने में तो अब उसका बिलकुल कायापलट सा ही गया है। पद्म-नहीं, साहब, वह स्वभावकी बुरी स्त्री नहीं है। मेरे यहाँ महीनो आती रही थी। मेरे घर में उसकी बड़ी प्रशंसा किया करती थीं(यह कहते-कहते झेंंप गये), कुछ ऐसे कुसंस्कार ही हो गये जिन्होने उससे यह अभिनय कराये। सच पूछिये तो हमारे पापों का दण्ड उसे भोगना पड़ा। हाँ, कुछ उधर का समाचार भी मिला? सेठ बलभद्रदास ने और कोई चाल चली? विठटल हाँ- साहब, वे चुप बैठनेवाले आदमी नहीं है? आजकल खूब दौड़-धूप हो रही है। दो तीन दिन हुए हिन्दू मेम्बरों की एक सभा भी हुई थी। मैं तो जा न सका, पर विजय उन्हीं लोगों की रही। अब प्रधान के २ वोट मिलाकर उनके पास ६ वोट है और हमारे पास कुल ४ मुसलमानों के वोट मिलाकर बराबर हो जायगे। पद्म-—तो हमको कम से कम एक वोट मिलना चाहिए। है इसकी कोई आशा? विठटल— मुझे तों कोई आशा नहीं मालूम होती। पद्म-अवकाश हो तो चलिय, जरा डाक्टर साहब और लाला भगतराम के पास चले। विठ्ठल--हाँ, चलिये, मैं तैयार हूँ। ३३ यद्यपि डाक्टर साहब का बंगला निकट ही था, पर इन दोनों आदमियों ने एक किराये की गाड़ी की। डाक्टर साहब के यह पैदल जाना फैशन के विरुद्ध था। रास्ते में विट्ठलदास ने आज के सारे समाचार बढाबढ़ाकर बयान किये अगर अपनी चतुराईको खूब दर्शाया। पद्मसिंहने यह सुनकर चिन्तित भाव से कहा, तो अब हमको और सतर्क होने की जरूरत है। अन्त में आश्रम का सारा भार उन्ही लोगों पर पड़ेगा। बलभद्रदास अभी चाहे चुप रह जायें लेकिन इसकी कसर कभी न कभी निकालेगे अवश्य। विट्ठल---मैं क्या करूँ? मुझसे यह अत्याचार देखकर रहा नहीं जाता। शरीर में एक ज्वाला-सी उठने लगती है। कहने को ये लोग विद्वान्बु द्धिमान है, नीतिपरायण है, पर उनके ऐसे कर्म? अगर मुझमे कौशल से काम लेने की सामर्थ्य होती तो कमसे कम बलभद्रदास से लड़ने की नौबत न आती। पद्म---यह तो एक दिन होना ही था। यह भी मेरे ही कर्मो का फल है। देखूँ, अभी और क्या-क्या गुल खिलते है? जब से बारात वापस आई है मेरी विचित्र दशा हो गई है। न भूख है, न प्यास, रातभर करवटे बदला करता हूँ। यही चिन्ता लगी रहती है कि उस अभागिन कन्या का बेड़ा कैसे पार लगेगा। अगर कहीं आश्रम का भार सिरपर पड़ा तो जान ही पर बन जायगी। ऐसे अथाह दलदल में फंस गया हूँ कि ज्यों-ज्यों ऊपर उठना चाहता हूँ और नीचे दबा जाता हूँ। यही बात करते-करते डाक्टर साहब का बँगला आ गया। १० बजे थे। डाक्टर साहब अपने सुसज्जित कमरे मे बैठे हुए अपनी बड़ी लड़की मिस कांतिसे शतरंज खेल रहे थे। मेज पर दो टेरियर कुत्ते बैठे हुए बड़े ध्यान से शतरंज की चालो को देख रहे थे। और कभी-कभी जब उनकी समझ में खिलाड़ियो से कोई भूल हो जाती थी तो पजो से मोहरो को उलट पटल देते थे। मिस कांति उनकी इस शरारतपर हँसकर अंग्रेजी में कहती थीं, ‘यू नाटी!' मेज की बाई ओर एक आराम कुर्सीपर पर सैयद तेग अली साहब विराजमान थे और बीच-बीच में मिस कान्ति को चाल बताते थे। इतने में हमारे दोनों मित्र जा पहुँचे। डाक्टर साहब ने उठकर दोनों सज्जनों हाथ मिलाया। मिस कान्ति ने उनकी ओर दबी निगाहों से देखा और मेज पर से एक पत्र उठाकर पढ़ने लगीं। डाक्टर साहब ने अंग्रेजी में कहा, मैं आप लोगो से मिलकर बहुत प्रसन्न हुआ। आइये आप लोगों को मिस कांति से इन्ट्रोडयूस करा दूँ। परिचय हो जाने पर मिस कान्ति ने दोनों आदमियों से हाथ मिलाया और हंसती हुई वाली, बाबा अभी आप लोगों का जिक्र कर रहे थे। मैं आपसे मिलकर बहुत प्रसन्न हई। डाक्टर श्यामाचरण—मिस कान्ति अभी डलहौसी पहाड़ से आई है। इसका स्कूल जाड़े में बन्द हो जाता है। वहाँ शिक्षा का बहुत उत्तम प्रबन्ध है। यह अंगरेजों की लड़कियो के साथ वोर्डिंगहाउस में रहती है। लेडी प्रिंसिपल ने अबकी इसकी प्रशंसा की है। कांति जरा अपनी लेडी प्रिंसिपलकी चिटठी इन्हें दिखा दो। मिस्टर शर्मा, आप कान्तिकी अंगरेजी बात सुनकर दग रह जायेंगे (हंसते हुए) यह मुझे कितने की नये मुहाविरे सिखा सकती है। मिस कान्ति ने लजाते हुए अपना प्रशंसापत्र पद्मसिंह को दिखाया। उन्होने उसे पढ़कर कहा, आप लैटिन भी पढ़ती है? डाक्टर साहबने कहा, लैटिन में अबकी परीक्षा में इन्हे एक पदक मिला है। कल क्लब में कान्ति ने ऐसा अच्छा गेम दिखाया कि अंगरेज लेडियाँ दंग रह गई। हां, अबकी बार आप हिन्दू मेम्बरो के जलसे में नहीं थे? पद्म, मैं जरा मकान पर चला गया था। डाक्टर- आपही के प्रस्तावपर विचार किया गया। मैं तो उचित समझता हूँ कि अभी उसे बोर्ड में पेश करने में जल्दी न करे। अभी सफलता की बहुत कम आशा है। तेगअली बोले, जनाब, मुलसमान मेम्बरों की तरफ से तो आपको पूरी मदद मिलेगी। डॉक्टर—हों, लेकिन हिन्दू मेम्बरों में तो मतभेद है। पद्म-आपकी सहायता हो जाय तो सफलता में कोई संदेह न रहें। डाक्टर--मुझे इस प्रस्ताव से पूरी सहानुभूति है, लेकिन आप जानते है, मैं गवर्नमेन्ट का नामजद किया हुआ मेम्बर हूँ। जबतक यह न मालूम हो जाय कि गवर्नमेन्ट इस विषय को पसन्द करती है या नहीं, तबतक मैं ऐसे सामाजिक प्रश्न पर कोई राय नही दे सकता। विठ्ठलदासने तीव्र स्वर से कहा, जब मेम्बर होने से आपके विचार स्वातन्त्र्य मे बाधा पड़ती तो आपको इस्तीफा दे देना चाहिये। तीनों आदमियोने विट्ठलदास को उपेक्षा की दृष्टि से देखा। उनका यह कथन असंगत था। तेगअली ने व्यंग, भाव से कहा, इस्तीफा दे दे तो यह सम्मान कैसे हो? लाटसाहब के बराबर कुर्सीपर कैसे बैठे? आनरेबल कैंसे कहलावे? बडे-बड़े अंगरेजो से हाथ मिलाने का सौभाग्य से प्राप्त हो? सरकारी डिनर में बढ़-बढ़कर हाथ मारने का गौरव कैसे मिले? नैनीताल की सैर कैसे करे? अपनी वक्तृता का चमत्कार कैसे दिखावे? यह भी तो सोचिये। विट्ठलदास बहुत लज्जित हुए। पद्मसिंह पछताये कि विट्ठलदास के साथ नाहक आये। डॉक्टर साहब गम्भीर भाव से बोले, साधारण लोग समझते है कि इस लालच से लोग मेम्बरी के लिए दौड़ते है। वह यह नहीं समझते कि यह कितनी जिम्मेदारी का काम है। गरीब मेम्बरों को अपना कितना समय, कितना विचार, कितना धन, कितना परिश्रम इसके लिए अर्पण करना पड़ता है। इसके बदले उसे इस सन्तोष के सिवाय और क्या मिलता है कि मैं देश और जाति की सेवा कर रहा हूँ। ऐसा न हो तो कोई मेम्बरी की परवा न करे। तेगअली—जी हाँ, इसमे क्या शक है, जनाब ठीक फरमाते है, जिसके सिर यह अजीमुश्शान जिम्मेदारी पड़ती है उसका दिल जानता है। ११ बज गये थे। श्यामाचरण ने पद्यसिंंह से कहा, मेरे भोजन का समय आ गया, अब जाता हूँँ। आप सन्ध्या समय मुझसे मिलियेगा। पद्मसिंहने कहा, हाँ, हाँ, शौक से जाइये। उन्होने सोचा जब ये भोजन में जरासी देर हो जाने से इतने घबराते है तो दूसरो से क्या आशा की जाय? लोग जाति और देश के सेवक तो बनना चाहते है, पर जरासा भी कष्ट नहीं उठाना चाहते। लाला भगतराम धूप में तख्तेपर बैठे हुक्का पी रहे थे। उनकी छोटी लड़की गोद में बैठी हुई धुए को पकड़न के लिए बार बार हाथ बढ़ाती थी। सामने जमीनपर कई मिस्त्री और राजगीर बैठे हुए थे। भगतराम पद्मसिंह को देखते ही उठखड़े हुए और पालागन करके बोले, मैने शाम ही को सुना था कि आप आ गये, आज प्रातःकाल आनेवाला था, लेकिन कुछ ऐसा झंझट आ पड़ा कि अवकाश ही न मिला। यह ठेकेदारी का काम बड़े झगड़े का है। काम कराइये, अपने रुपये लगाइये, उसपर दूसरों की खुशामद कीजिये। आजकल इजिनियर साहब किसी बातपर ऐसे नाराज हो गए है कि मेरा कोई काम उन्हें पसन्द ही नही आता। एक पुल बनवाने का ठीका लिया था। उसे तीन बार गिरवा चुके हैं। कभी कहते, यह नहीं बना, कभी कहते, वह नहीं बना। नफा कहाँ से होगा, उलटे नुकसान होने की सम्भावना है। कोई सुननेवाला नहीं है। आपने सुन होगा, हिन्दू मेम्बरों का जलसा हो गया। पद्म—हाँ, सुना और सुनकर शोक हुआ। आपसे मुझे पूरी आशा थी। क्या आप इस सुधार को नहीं समझते? भगतराम—इसे केवल उपयोगी ही नहीं समझाता, बल्कि हृदय से इसकी सहायता करना चाहता हूँ पर मै अपनी रायका मालिक नहीं हूँ। मैंने अपने को स्वार्थ के हाथों में बेच दिया है। मुझे आप ग्रामोफोन का रेकार्ड समझिये, जो कुछ भर दिया जाता है वहीं कह सकता हूँ और कुछ नहीं। पद्मसिंह--लेकिन आप यह तो मानते है कि जाति के हितमे स्वार्थसे पार्थक्य होनी चाहिए। भगतराम-जी हाँ,इसे सिद्धन्तरूपसे मानता हूँ,पर इसे व्यवहार में लाने की शक्ति नहीं रखता। आप जानते होंगे, मेरा सारा कारबार सेठ चिम्मनलालकी मदद से चलता है। अगर उन्हे नाराज कर लूं तो यह सारा ठाट बिगड़ जाय। समाज में मेरी जो कुछ मान-मर्यादा है वह इसी ठाटबाट के कारण है।विद्या और बुद्धि है ही नहीं, केवल इसी स्वांग का भरोसा है। आज अगर कलई खुल जाय तो कोई बात भी न पूछे। दूध की मक्खी की तरह समाज से निकाल दिया जाऊँ। बतलाइये शहर में कौन है जो केवल मेरे विश्वासपर हजारों रुपये बिना सूद के दे देगा, और फिर केवल अपनी ही फिक्र तो नहीं है। कम से कम ३०० रु० मासिक के गृहस्थीका खर्च है जाति के लिए मैं स्वयं कष्ट झेलनके लिए तैयार हूं, पर अपने बच्चो को कैसे निरवलम्ब कर दूँ। हम जब अपने किसी कर्त्तव्य से मुँह मोड़ते है तो दोष से बचने के लिए तो ऐसी प्रबल युक्तियां निकालते है कि कोई मुँह न खोल सके। उस समय हम संकोच को छोड़कर अपने सम्बन्ध ऐसी-ऐसी बाते कह डालते है कि जिनके गुप्त रहने ही में हमारा कल्याण है। लाला भगतराम के हृदय में यही भाव काम कर रहा था। पद्मसिंह समझ गये कि इनसे कोई आशा नहीं। वोले, ऐसी अवस्था में आप पर कैसे जोर दे सकता हूँ। मुझे केवल एक वोट की फिक्र है, कोई उपाय बतलाइये, कैसे मिले? भगत-कुंवर साहब के यहाँ जाइये। ईश्वर चाहेगे तो उनका वोट आपको मिल जायगा। सेठ बलभद्रदास ने उनपर ३०००) की नालिश की है। कल उनको डिगरी भी हो गई। कुंवर साहब इस समय बलभद्रदास से तने हुए है, वश चले तो गोली मार दे। फंसाने का एक लटका आपको और बतायें देता हूँ। उन्हें किसी सभा की प्रधान बना दीजिये। बस उनकी नकेल आपके हाथ में हो जायेगी। पद्मसिहने हंसकर कहा, अच्छी बात है; उन्हीं के यहाँ चलता हूँ। दोपहर हो गया था, लेकिन पद्मसिंह को भूख प्यास न थी। बग्घीपर बैठकर चले। कुंवर साहब बरुना-किनारे एक बंगले में रहते थे। आध घंटे में जा पहुंचे। बंगले के हाते में न कोई सजावट थी, न सफाई। फूलपत्ती का नाम न था। बरामदे में कई कुत्ते जंजीर में बँधे खड़े थे। एक तरफ कई घोड़े बंधे हुए थे। कुंवर साहब को शिकार का बहुत शौक था। कभी-कभी काश्मीर तक का चक्कर लगाया करते थे। इस समय वह सामने कमरे में बैठे हुए सितार बजा रहे थे। दीवारो पर चीतो की खाले और हिरनो के सीग शोभा दे रहे थे। एक कोने में कई बन्दूकें और बरछियाँ रखी हुई थी; दूसरी ओर एक बड़ी मेजपर एक घड़ियाल बैठा था। पद्मसिंह कमरे में आये तो उसे देखकर एक बार चौंक पड़े। खालमें ऐसी सफाई से भूसा भरा गया था कि उसमें जानसी पड़ गयी थी। कुंवर साहब ने शर्माजी का बड़े प्रेम से स्वागत किया——आइये महाशय, आपके तो दर्शन दुर्लभ हो गये। घरसे कब आए? पझसिंह——कल आया हूँ। कुंवर——चेहर उतरा है, बीमार थे क्या? पद्म——जी नहीं बहुत अच्छी तरह हूँ। कुंवर——जुछ जलपान कीजियेगा? पद्म——नहीं क्षमा कीजिये, क्या सितार का अभ्यास हो रहा है? कुंवर——जी हाँ, मुझे तो अपना सितार ही पसन्द है। हारमोनियम और प्यानों सुनकर मुझे मतलीसी होने लगती है, इन अंगरेजी वाजों ने हमारे संगीत को चौपट कर दिया, इसकी चर्चा ही उठ गई। जो कुछ कसर रह गई थी, वह थिएटरों ने पूरी कर दी। बस, जिसे देखिए गजल और कौवाली की रट लगा रहा है। थोड़े दिनो में धनुविद्या की तरह इसका भी लोप हो जायगा। संगीत से हृदय में पवित्र भाव पैदा होते है। जब से गाने का प्रचार कम हुआ, हम लोग भावशून्य हो गए और इसका सबसे बुरा असर हमारे साहित्यपर पड़ा हैं। कितने शोक की बात है कि जिस देश में रामायण जैसे अमूल्य ग्रन्थ की रचना हुई, सूरसागर जैसा आनन्दमय काव्य रचा गया, उसी देश में अब साधारण उपन्यासों के लिए हमको अनुवादका आश्रय लेना पड़ता है। बंगाल और महाराष्ट्र में अभी गाने का कुछ प्रचार है, इसलिए वहाँ भावों का ऐसा शैथिल्य नहीं है। वहाँ रचना और कल्पना-शक्ति का ऐसा अभाव नहीं है। मैंने तो हिन्दी साहित्य का पढ़ना ही छोड़ दिया। अनुवादों को निकाल डालिये तो आपके नवीन हिन्दी साहित्य में हरिशचन्द्र के दो चार नाटकों और चन्द्रकान्ता सन्तति‌ के सिवा और कुछ रहता ही नहीं। संसार का कोई साहित्य इतना दरिद्र न होगा। उसपर तुर्रा यह है कि जिन महानुभावों ने दो-एक अंगरेजी ग्रन्थों के अनुवाद मराठी और बंगला अनवादों की सहायता से कर लिए वे अपनें को धुरन्धर साहित्यज्ञ समझने लगे है। एक महाशय ने कालिदास‌ के कई नाटकों के पद्यबद्ध अनुवाद किये है, लेकिन वे अपने को हिन्दी का कालिदास समझते है 'एक महाशय ने मिल के दो गन्थों का अनुवाद किया है और वह भी स्वतन्त्र नहीं, बल्कि गुजराती, मराठी आदि अनुवादो के सहारे से, पर वह अपने मन में ऐसे सन्तुष्ट है मानो उन्होंने हिन्दी साहित्य का उद्धार का दिया। मेरा तो यह निश्चय होता जाता है कि अनुवादो‌ं से हिन्दी का अपकार हो रहा है। मौलिकता को पनपने का अवसर नहीं मिलने पाता। पद्मसिंह को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कुँवर साहब का साहित्य से इतना परिचय है। वह समझते थे कि इन्हें पोलो और शिकार के सिवाय और किसी चीज से प्रेम न होगा। वह स्वयं हिन्दी-साहित्य से अपरिचित थे, पर कुँवर साहब के सामने अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते संकोच होता था। उन्होंने इस तरह मुस्कुराकर देखा मानो यह सब बाते इन्हें पहले ही से मालूम थी और बोले, आपने तो ऐसा प्रश्न उठाया जिसपर दोनों पक्षों की ओर से बहुत कुछ कहा जा सकता है, पर इस समय मैं आपकी। सेवा में किसी और ही काम से आया हूँ। मैंने सुना है कि हिन्दू मेम्बरो के जलसे मे आपने सेठों का पक्ष ग्रहण किया। कुँवर साहब ठठाकर हँसे। उनकी हँसी कमरे में गूँज उठी। पीतल की ढाल जो दीवार से लटक रही थी इस झनकार से थरथराने लगी। बोले, सच कहिये, आपने किससे सुना? पझसिंह इस समय हँसी का तात्पर्य न समझकर कुछ भौंचक से हो गये। उन्हें मालूम हुआ कि कुँवर साहब मुझे बनाना चाहते है। चिढ़कर बोले, सभी कह रहे है, किस-किसका नाम लूँ? कुँवर साहब ने फिर जोर से कहकहा मारा और हँसते हुए पूछा, और आपको विश्वास भी आ गया? पद्मसिंह को अब इसमें कोई सन्देह न रहा कि यह सब मुझे झेपाने का स्वाँग है, जोर देकर वोले, अविश्वास करने के लिए मेरे पास कोई कारण नहीं है। कुंवर——कारण यही है कि मेरे साथ घोर अन्याय होगा। मैंने अपनी समझ में अपनी सम्पूर्ण वाक्यशक्ति आपके प्रस्ताव के समर्थन से खर्च कर दी थी। यहाँ तक कि मैंने विरोध को गम्भीर विचार के लायक भी न सोचा। व्यंग्योक्ति ही से काम लिया। (कुछ याद करके) हां एक बात हो सकती है। समझ गया। (फिर कहकहा मारकर) अगर यह बात है मैं कहूँगा कि म्युनिसिपैलिटी बिलकुल बछिया के ताऊ लोगों ही से भरी हुई है। व्यंग्योक्ति तो आप समझते ही होंगे। बस, यह सारा कसूर उसी का है। किसी सज्जन ने उसका भाव न समझा। काशी के सुशिक्षित सम्मानित म्युनिसिपल कमिश्नरों में किसी ने भी एक साधारण-सी बात न समझी शोक! महाशोक!! महाशय, आपको बड़ा कष्ट हुआ। क्षमा कीजिये मैं इस प्रस्ताव का हृदय से अनुमोदन करता हूँ। पद्मसिंह भी मुस्कुराये कुँवर साहब की बातों पर विश्वास आया। बोले, अगर इन लोगों ने ऐसा धोखा खाया तो वास्तव में उनकी समझ बड़ी मोटी है। मगर प्रभाकर राव धोखे में आ जायें, यह समझ में नहीं आता, पर ऐसा मालूम होता है कि नित्य अनुवाद करते-करते उनकी बुद्धि भी गयब हो गई है। पद्मसिंह जब यहाँ से चले तो उनका मन ऐसा प्रसन्न था मानो वह किसी बड़े रमणीक स्थानकी सैर कर के आते हो। कुँवर साहब के प्रेम और उन्हें वशीभूत कर लिया था। ३७ सदन जब घर पर पहुँचा तो उसके मन की दशा उस मनुष्य की-सी थी जो बरसों की कमाई लिए, मन में सहस्रों मन्सूबे बाँधता, हर्ष से उल्लसित घर आये और यहाँ सन्दूक खोलने पर उसे मालूम हो कि थैली खाली पड़ी हैं। विचारों की स्वतन्त्रता विद्या संगति और अनुभवपर निर्भर होती है। सदन ने सभी गुणों से रहित था। यह उसके जीवन का वह समय था जब उसको अपने धार्मिक विचारों पर, अपनी सामाजिक रीतियों पर एक अभिमान-सा होता है। हमें उनमें कोई त्रुटि नहीं दिखाई देती, जबहम अपने धर्म के विरुद्ध कोई प्रमाण या दलील सुनने का साहस नहीं कर सकते, तब हममें क्या और क्यों का विकास नहीं होता। सदन को घर से निकल भागना स्वीकार होता, इसके बदले कि वह घर की स्त्रियों को गंगा नहलाने ले जाय। अगर स्त्रियो की हँसी की आवाज कभी मरदाने में जाती तो वह तेवर बदले घर में आता और अपनी माँ को आड़े हाथों लेता। सुभद्रा ने अपनी सास का शासन भी ऐसा कठोर न पाया था। आत्मपतन को वह दार्शनिक की उदार दृष्टि से नहीं, शुष्क योगी की दृष्टि से देखता था। उसने देखा था कि उसके गाँव में एक ठाकुर ने एक बेड़िन बैठा ली थी तो सारे गाँव ने उनके द्वारपर आना जाना छोड़ दिया था और इस तरह उसके पीछे पड़े थे कि उसे विवश होकर बेड़िन को घर से निकालना पड़ा। नि:सन्देह वह सुमन बाई पर जान देता था, लेकिन उसके लौकिक शास्त्र में यह प्रेम उतना अक्षम्य न था जितना सुमन की परछाई का उसके घर में आ जाना। उसने अब तक सुमन के यहाँ पान तक न खाया था। वह अपनी कुल-मर्यादा और सामाजिक प्रथा को अपनी आत्मा से कहीं बढ़कर महत्व की वस्तु समझता था। उस अपमान और निन्दा की कल्पना ही उसके लिए असहय थी जो कुलटा स्त्री से सम्बन्ध हो जाने के कारण उसके कुल पर ढाल जो दीवारसे लटक रही थी इस झनकारसे थरथराने लगी। बोले सचकहिये,आपने किससे सुना? पद्मसिह इस कुसमय हँसीका तात्पर्य न समझकर कुछ भौंचक से हो गये। उन्हें मालूम हुआ कि कुँअर साहब मुझे बनाना चाहते है। चिढकर बोले, सभी कह रहे है, किस-किसका नाम लू? कुँअर साहबने फिर जोरसे कहकहा मारा और हँसते हुए पूछा, और आपको विश्वास भी आ गया? पद्मसिंहको अब इसमें कोई सन्देह न रहा कि यह सब मुझे झेंपानेका स्वाँग है, जोर देकर बोले, अविश्वास करनेके लिए मेरे पास कोई कारण नही है। कुंअर-कारण यही है कि मेरे साथ घोर अन्याय होगा। मैने अपनी समझ में अपनी सम्पूर्ण वाक्यशक्ति आपके प्रस्तावके समर्थनमें खर्च कर दी थी। यहाँतक कि मैने विरोधको गम्भीर विचारके लायक भी न सोचा। व्यंग्योक्ति ही से काम लिया। (कुछ याद करके) हाँ एक बात हो सकती है। समझ गया। (फिर कहकहा मारकर) अगर यह बात है तो मैं कहुँगा कि म्युनिसिपैलिटी बिलकुल बछियाके ताऊ लोगो ही से भरी हुई हैं। व्यंग्योक्ति तो आप समझते ही होंगे । बस,यह सारा कसूर उसीका है। किसी सज्जन ने उसका भाव न समझा। काशीके सुशिक्षित सम्मानित म्युनिसिपल कमिश्नरों मे किसीने भी एक साधारण-सी बात न समझी। शोक! महाशोक!! महाशय, आपको बड़ा कष्ट हुआ। क्षमा कीजिये मैं इस प्रस्तावका हृदयसे अनुमोदन करता हूँ। पद्मसिह भी मुस्कुराये। कुँअर साहबकी बातों पर विश्वास आाया। बोले, अगर इन लोगों ने ऐसा धोखा खाया तो वास्तव मे उनकी समझ बड़ी मोटी है। मगर प्रभाकरराव धोखें में आ जायें, यह समझ में नहीं आता, पर ऐसा मालूम होता है कि नित्य अनुवाद करते-करते उनकी बुद्धि भी गायब हो गई है। पद्मसिहं जब यहाँ से चले तो उनका मन ऐसा प्रश्न या मानों वह सदन दालमंण्डी के सामने आकर ठिठक गया; उसकी प्रेमाकांक्षा मन्द हो गई। वह धीरे-धीरे एक ऐसे स्थान पर आया जहाँ से सुमन की अट्टालिका। साफ दिखाई देती थी। यहाँ से कातर नेत्रों से उस मकान के द्वार की ओर देखा। द्वार बन्द या ताला पड़ा हुआ था। सदन के हृदय से एक बोझा-सा उतर गया। उसे कुछ वैसा ही आनन्द हुआ जैसा उस मनुष्य को होता है जो पैसा न रहने पर भी लड़के की जिद से विवश होकर खिलौने की दूकान पर जाता है और उसे बन्द पाता है। लेकिन घर पहुँचकर सदन अपनी उदासीनता पर बहुत पछताया। वियोग को पीड़ा के साथ साथ उसकी व्यग्रता बढ़ती जाती थी। उसे किसी प्रकार का धैर्य न होता था। रात को जब सब लोग खा-पीकर सोये तो वह चुपके से उठा और दालमण्डी की ओर चला। जाड़े की रात थी, ठण्डी हवा चल रही थी, चन्द्रमा कुहरे की आड़ से झांकता था और किसी घबराये हुए मनुष्य के समान सवेग दौड़ता चला जाता था। सदन दालमण्डी तक बड़ी तेजी से आया, पर यहाँ आकर फिर उसके पैर बँध गये। हाथ-पैर की तरह उत्साह भी ठण्डा पड़ गया। उसे मालूम हुआ कि इस समय यहाँ मेरा आना अत्यन्त हास्यास्पद है। सुमन के यहाँ जाऊँ तो वह मुझे क्या समझेगी। उसके नौकर आराम से सो रहे होगें। वहाँ कौन मुझे पूछता है। उसे आश्चर्य होता था कि मैं यहाँ कैसे चला आया। मेरी बुद्धि उस समय कहाँ चली गई। अतएव वह लौट पड़ा। दूसरे दिन सन्ध्या समय वह फिर चला। मन से निश्चय कर लिया था कि अगर सुमन ने मुझे देख लिया और बुलाया तो जाऊँगा, नहीं तो सीधे अपने राह चला जाऊँगा। उसका मुझे बुलाना ही बतला देगा कि उसका हृदय मेरी तरफ से साफ है। नहीं तो इस घटना के बाद वह मुझे बुलाने ही क्यों लगी। जब और आगे बढ़कर उसने फिर सोचा, क्या वह मुझे बुलाने के लिये झरोखेपर बैठी होगी। उसे क्या मालूम है कि मैं यहाँ आ गया। यह नहीं, मुझे एक बार स्वयं उसके पास चलना चाहिये। सुमन मुझ से, कभी नाराज नहीं हो सकती और जो नाराज भी हो तो क्या अच्छादित हो जाती। वह जनवा से में पंण्डित पद्मसिंह की बात सुन-सुनकर अधीर हो रहा था। वह डरता था कि कहीं पिताजी उनकी बातों में न आ जाँय। उसको समझ में न आता कि चाचा साहब को क्या हो गया है? अगर यही बातें किसी दूसरे मनुष्य ने की होती तो वह अवश्य उसकी जबान पकड़ लेता। लेकिन अपने चाचा से वह बहुत दबता था। उसे उनका‌ प्रतिवाद करने की बड़ी प्रबल इच्छा हो रही थी; उसकी तार्किक शक्ति कभी इतनी सतेज न हुई थी, और यदि विवाद तर्क हीं तक रहता तो वह जरुर उनसे उलझ पड़ता। लेकिन मदनसिंह की उद्रता ने उसके प्रतिवाद उत्सुक्ता को सहानुभूति के रूप में परिणत कर दिया। इधर से निराश होकर सदन का लालसापूर्ण हृदय फिर सुमन की ओर लपका। विषय-वासना का चसका पड़ जान के बाद अब उसकी प्रेमकल्पना निराधार नहीं रह सकती थी। उसका हृदय एक बार प्रेमदीपक से आलोकित होकर अब अन्धकार में नहीं रहना चाहता था। वह पद्मसिंह के साथ ही काशी चला आया। किन्तु यहाँ आकर वह एक बड़ी दुविधा में पट गया। उसे समय होने लगा कि कही सुमन बाई को ये सब समाचार मालूम न हो गये हो। वह वहाँ स्वयं तो न रही होगी, लोगों ने उसे अवश्य ही त्याग दिया होगा, लेकिन उसे विवाह की सूचना जरूर दी होगी। ऐसा हुआ होगा तो कदाचित्व ह मुझसे सीधे मुँह बात भी न करेगी। सम्भव है वह मेरा तिरस्कार भी करे। लेकिन संध्या होते ही उसने कपड़े बदले, घोड़ा कसवाया और दालमंडी की ओर चला। प्रेम मिलाप की आनन्दपूर्ण कल्पना के सामने वे शंकाए निर्मूल हो गई। वह सोच रहा था कि सुमन मुझसे पहले क्या कहेगी, ओर में उसका उत्तर क्या दूँगा, कही उसे कुछ न मालूम हो और वह जाते ही प्रेम से मेरे गले लिपट जाय और कहे कि तुम बड़े निठुर हो। इस कल्पना ने उसकी प्रेमाग्नि को और भी भड़कया, उसने घोड़े को एट लगाई और एक क्षणमे दालमंण्डी के निकट आ पहुँचा, पर जिस प्रकार एक खिलाड़ी लड़का पाटशाला के द्वारपर आकर भीतर जाते हुए डरता है उसी प्रकार सदन दालमंण्डी के सामने आकर ठिठक गया; उसकी प्रेमाकांक्षा मन्द हो गई। वह धीरे-धीरे एक ऐसे स्थानपर आया जहां से सुमनकी अट्टालिका साफ दिखाई देती थी। यहाँ से कातर नेत्रों से उस मकानके द्वार की ओर देखा। द्वार बन्द था ताला पड़ा हुआ था । सदन के हृदयसे एक बोझा-सा उतर गया। उसे कुछ वैसा ही आनन्द हुआ जैसा उस मनुष्यको होता है जो पैसा न रहनेपर भी लड़के की जिद से विवश होकर खिलौने की दूकान पर जाता है और उसे बन्द पाता है । लेकिन घर पहुँचकर सदन अपनी उदासीनता पर बहुत पछताया। वियोग की पीड़ा के साथ साथ उसकी व्यग्रता बढ़ती जाती थी। उसे किसी प्रकार धैर्य न होता था। रातको जब सब लोग खा-पीकर सोये तो वह चुपके से उठा और दालमण्डी की ओर चला। जाड़े की रात थी, ठण्डी हवा चल रहो थी, चन्द्रमा कुहरे की आड़ से झांकता था और किसी घबराये हुए मनष्य के समान सवेग दौड़ता चला जाता था। सदन दालमण्डी तक बड़ी तेजी से आया,पर यहाँ आकर फिर उसके पैर बंध गये । हाथ-पैर की तरह उत्साह भी ठण्डा पड़ गया। उसे मालूम हुआ कि इस समय यहाँ मेरा आना अत्यन्त हास्यास्पद है। सुमनके यहाँ जाऊँ तो वह मुझे क्या समझेगी। उसके नौकर आराम से सो रहे होंगे। वहाँ कौन मुझे पूछता है। उसे आश्चर्य होता था कि मैं यहाँ कैसे चला आया!मेरी बुद्धि उस समय कहाँ चली गई। अतएव वह लौट पड़ा। दूसरे दिन सन्ध्या समय वह फिर चला। मनमे निश्चय कर लिया था कि अगर सुमनने मुझे देख लिया और बुलाया तो जाऊँगा, नहीं तो सीधे अपने राह चला जाऊंगा। उसका मुझे बुलाना ही बतला देगा कि उसका हृदय मेरी तरफ से साफ है। नहीं तो इस घटना के बाद वह मुझे बुलाने ही क्यों लगी। जछ और आगे बढ़कर उसने फिर सोचा,क्या वह मुझे बुलानेके लिये झरोखे पर बैठी होगी। उसे क्या मालूम है कि मैं यहाँ आ गया। यह नहीं,मुझे एक बार स्वयं उसके पास चलना चाहिये । सुमन मुझसे, कभी नाराज नहीं हो सकती और जो नाराज भी हो तो क्या मैं उसे मना नहीं सकता? मैं उसके सामने हाथ जोडूँगा उसके पैर पडूँगा और अपने आँँसुओं से उसके मनकी मैल धो दूँगा, वह मुझसे कितनी रुठे, लेकिन मेरे प्रेम का चिन्ह अपने हृदय से नहीं मिटा सकती। आह! वह अगर अपने कमल नेत्रों मे आँँसू भरे हुए मेरी ओर ताके तो मैं उसके लिये क्या न कर डालूँँगा? यदि उसे कोई चिंता हो तो मैं उस चिंंता को दूर करनेके लिये अपने प्राण तक समर्पण कर दूँगा। तो क्या वह इस अपराध को क्षमा न करेगी? लेकिन ज्योंही वह दालमंडी के सामने, पहुँचा, उसकी यह प्रेम कामनाएँ उसी प्रकार नष्ट हो गई जैसे अपने गाँव में सन्ध्या समय नीम के नीचे देवी की मूर्ति देखकर उसकी तर्कनाएँ नष्ट हो जाती थी। उसने सोचा, कहीं वह मुझे देखें और अपने मन में कहे, वह जा रहे है कुँँअर साहब, मानों सचमुच किसी रियासत के मालिक है। कैसा कपटी धूर्त है। यह सोचते ही उसके पैर बंध गये। आगे न जा सका। इसी प्रकार कई दिन बीत गये। रात और दिन में उसकी प्रेमकल्पनाएँ जो बालूकी दीवार खड़ी करती, वे सन्ध्या समय दालमंडी के सामने अविश्वास के एक ही झोके में गिर पड़ती था। एक दिन वह घूमते हुए कुईन्स पार्क जा निकला वहाँ एक शामियाना तना हुआ था और लोग बैठे हुए प्रोफेसर रमेशदत्त का प्रभावशाली व्याख्यान सुन रहे थे। सदन घोड़े से उतर पड़ा और व्याख्यान सुनने लगा। उसने मनमे निश्चय किया कि वास्तव में वेश्याओं से हमारी बड़ी हानि हो रही है ये समाज के लिये हलाहल के तुल्य है। मैं बहुत बचा, नहीं तो कहीं का न रहता। इन्हें अवश्य शहर से बाहर निकाल देना चाहिए। यदि ये बाजार में न होती तो मैं सुमन बाई के जाल मे कभी न फंसता। दूसरे दिन वह फिर कुईन्म पार्क की तरफ गया। आज यहाँ मुन्शी अबुलवफा का भावपूर्ण ललित व्याख्यान हो रहा था। सदन ने उसे भी ध्यान से सुना। उसने विचार किया, निस्संदेह वेश्याओ से हमारा उपकार होता है। सच तो है, ये न हो तो हमारे देवताओं की स्तुति करनेवाला भी कोई न रहे। यह भी ठीक ही कहा कि वेश्यागृह ही वह स्थान है जहाँ हिन्दू मुसलमान दिल खोलकर मिलते है, जहाँ द्वेष का वास नहीं है जहाँ जीवन संग्राम से विश्राम लेनेके लिये अपने हृदय शोक और दुःख भुलाने के लिये शरण लिया करते है। अवश्य ही उन्हें शहर से निकाल देना उन्ही पर नहीं, वरन् सारे समाज पर घोर अत्याचार होगा। कई दिन के बाद यह विचार फिर पलटा खा गया। यह क्रम बन्द न होता था। सदन में स्वच्छद विचार की योग्यता न थी। वह किसी विषय के दोष और गुण तौलने और परखने की सामर्थ्य न रखता था। अतएव प्रत्येक सबल युक्ति उसके विचारों को उलट-पलट देती हैं। उसने एक दिन पद्मसिह के व्याख्यान का नोटिस देखा। तीन ही बजे से चलने की तैयारी करने लगा और चार बजे बेनीबाग में जा पहुँचा। अभी वहाँ कोई आदमी न था, कुछ लोग फर्श बिछा रहे थे। वह घोड़े से उतर पड़ा और बिछाने में लोगों की मदद करने लगा। पाँच बजते बजते लोग आने लगे और आध घंटे मे वहाँ हजारों मनुष्य एकत्र हो गये। तब उसने एक फिटन पर पद्मसिंह को आते देखा। उसकी छाती धड़कने लगी। पहले रुस्तम भाई ने एक छोटी सी कविता पढ़ी, जो इस अवसर के लिये सैयद तेगअली ने रची थी। उसके बैठने पर लाला विट्ठलदास खड़े हुए। यद्यपि उनकी वक्तृता रूखी थी, न कही भाषण लालित्यका पता था, न कटाक्षोंका, पर लोग उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुनते रहे। उनके नि:स्वार्थ सार्वजनिक कृत्यों के कारण उनपर जनता की बडी श्रद्धा थी। उनकी रूखी बातों को लोग ऐसे चाव से सुनते थे जैसे प्यासा मनुष्य पानी पीता है। उनके पानी के सामने दूसरों का शर्बत फीका पड़ जाता था। अन्त में पद्मसिंह उठे। सदन के हृदय में गुदगुदी-सी होने लगी, मानों कोई असाधारण बात होने वाली है। व्याख्यान अत्यन्त रोचक और करुणारस से परिपूर्ण था भाषा की सरलता और सरसता मन को मोहती थी। बीच-बीच मे उनके शब्द ऐसे भावपूर्ण हो जाते कि सदन के रोएँ खडे हो जाते थे। वह कह रहे थे कि हमने वेश्याओं को शहर के बाहर रखने का प्रस्ताव इसलिए नहीं किया कि हमें उनसे घृणा है। हमे उनसे घृणा करने का कोई अधिकार नहीं है। यह उनके नहीं किया; तुमको तो मैंने अपनी प्रेम सपत्ति सौंप दी थी। क्या उसका तुम्हारी दृष्टि में कुछ भी मूल्य नहीं है?” सदन फिर चौक पड़ता और मन को उधर से हटाने की चेष्टा करता। उसने एक व्याख्यान में सुना था कि मनुष्य का जीवन अपने हाथों में है, वह अपने को जैसा चाहे बना सकता है, इसका मूल मन्त्र यही है कि बुरे, क्षुद्र, अश्लील विचार मन में न आन पावे, वह बलपूर्वक इन विचारों को हटाता रहे और उत्कृष्ट विचारों तथा भावों से हृदय को पवित्र रक्खे। सदन इस सिद्धांत को कभी न भूलता था। उस व्याख्यान में उसने यह भी सुना था कि जीवन को उच्च बनाने के लिये उच्च शिक्षा की आवश्यकता नहीं, केवल शुद्ध विचारों और पवित्र भावों की आवश्यकता है। सदन को इस कथन से बड़ा संतोष हुआ था इसलिये वह अपने विचारों को निर्मल रखने का यत्न करता रहता। हजारों मनुष्यों ने उस व्याख्यान में सुना था कि प्रत्येक कुविचार हमारे इस जीवन को न आने वाले जीवन को भी नीचे गिरा देता है। लेकिन औरों ने जो कुछ विज्ञ थे, सुना और भूल गये, सरल हृदय सदनने सुना और उसे गाँठ में बाँध लिया। जैसे कोई दरिद्र मनुष्य सोने की एक गिरी हुई चीज पा जाय और उसे अपने प्राण से सभी प्रिय समझे। सदन इस समय आत्म-सुधार की लहर मे बह रहा था। रास्ते में अगर उसकी दृष्टि किसी युवती पर पड़ जाती तो तुरन्त ही अपने को तिरस्कृत करता और मन को समझाता, क्या इस क्षणभर के नेत्र सुख के लिये तू अपने भविष्य जीवन का सर्वनाश किये डालता है। इस चेतावनी से उसके मन को शान्ति होती थी। एक दिन सदन को गंगास्नान के लिए जाते हुए चौक में वेश्याओं का एक जुलूस दिखाई दिया। नगर की सबसे नामी गिरामी वेश्या ने एक उर्म(धामिक जलसा) किया था। यह वेश्याएँ वहाँ से वापस आ रही थी। सदन इस दृश्य को देखकर चकित हो गया। सौंदर्य, सुवर्ण, और सौरभ का ऐसा चमत्कार उसने कभी न देखा था। रेशम, रंग और रमणीयता का ऐसा अनुपम दृश्य, श्रृंगार और जगमगाहट की ऐसी अद्भुत छटा उसके लिए बिलकुल नई थी, उसने मनको बहुत रोका, पर न रोक सका। उसने उन अलौकिक सौदर्य मूर्तियों को एक बार आँख भरकर देखा, जैसे कोई विद्यार्थी महीनों के कठिन परिश्रम के बाद परीक्षा से निवृत्त होकर अमोद प्रमोद मे लीन हो जाय। एक निगाह से मन तृप्त न हुआ तो उसने फिर निगाह दौड़ाई, यहाँ तक कि उसकी निगाहों उस तरफ जम गई और बह चलना भूल गया। मूर्ति के समान खड़ा रहा। जब जुलूस निकल गया तो उसे सुधि आई चौका, मन को तिरस्कृत करने लगा। तूने महीनों की कमाई एक क्षण में गंवाई? वाह! मैंने अपनी आत्मा का कितना पतन कर दिया? मुझमें कितनी निर्बलता है? लेकिन अन्त में उसने अपने को समझाया कि केवल इन्हें देखने ही से मैं पाप का भागी थोड़े ही हो सकता हूँ? मैने इन्हे पाप-दृष्टि से नहीं देखा। मेरा हृदय वासनाओं से पवित्र है। परमात्मा की सौंदर्य सृष्टि से पवित्र आनन्द उठाना हमारा कर्तव्य है। यह सोचते हुए वह आगे चला, पर उसकी आत्मा को संतोष न हुआ। मैं अपने ही को धोखा देना चाहता हूँ? यह स्वीकार कर लेने से क्या आपत्ति है कि मुझसे गल्ती हो गई, हाँ हुई और अवश्य हुई। मगर मन की वर्तमान अवस्था के अनुसार मैं उसे क्षम्य समझता हूँ। मैं योगी नहीं, सन्यासी नहीं, एक बुद्धिहीन मनुष्य हूँ। इतना ऊंचा आदर्श सामने रखकर मैं उसका पालन नहीं कर सकता। आह! सौंदर्य भी कैसी वस्तु है। लोग कहते हैं कि अधर्म से मुख की शोभा जाती रहती है। पर इन रमणियों का अधर्म उनकी शोभा को और भी बढ़ाता है। कहते है मुख सौदर्य का दर्पण है। पर यह बात भी मिथ्या ही जान पड़ती है। सदन ने फिर मन को सँभाला और उसे इस ओर से विरक्त करने के लिये इस विषय के दूसरे पहलू पर विचार करने लगा। हाँ वे स्त्रियाँ बहुत ही सुन्दर है, बहुत ही कोमल है, पर उन्होंने अपने इन स्वर्गीय गुणों का कैसा दुरुपयोग किया है। उन्होंने अपनी आत्मा को कितना गिरा दिया है। हां! केवल इन रेशमी वस्त्रों के लिये इन जगमगाते हुए आभूषणों के लिये‌ उन्होंने अपनी आत्माओं का विक्रय कर डाला है। वे आँखे जिनसे प्रेम की ज्योति निकलनी चाहिये थी, कपट कटाक्ष और कुचेष्टाओं से भरी हुई है। वे हृदय जिनमें विशुद्ध निर्मल प्रेम का स्रोत बहना चाहिये था, कितने दुर्गंध विशाक्त मलिनता से ढँके हुए है। कितनी अधोगति है। इन घृणात्मक विचारों सदन को कुछ शान्ति हुई। वह टहलता हुआ गंगातटकी ओर चला। इसी विचार में आज उसे देर हो गई थी। इसलिये वह उस घाट पर न गया। जहाँ वह नित्य नहाया करता था। वहाँ भीडभाड़ हो गई होगी। अतएव उस घाटपर गया जहाँ विधवाश्रम स्थित था। वहाँ एकात रहता था। दूर होने के कारण शहर के लोग वहाँ कम जाते थे। घाट के निकट पहुँचने पर सदन ने एक स्त्री को घाट की ओर से जाते देखा। तुरन्त पहचान गया। यह सुमन थी, पर यह कितनी बदली हुई। न वह लंबे लंबे केश, न वह कोमल गति, न वह हंसते हुए गुलाब के से होठ, न वह चंचल ज्योति से चमकती हुई आँख न वह बनाव सिंगार, न वह रनजटित आभूषणों की छटा, वह केवल सफेद साडी पहने हुए थी। उसकी चाल मे गंभीरता औीर मुख से नैराश्य और वैराग्य भाव झलकता था काव्य वही था, पर अलंकार विहीन, इसलिये सरल और मार्मिक। उसे देखते ही सदन ने प्रेम से विह्वल होकर कई पग बड़े वेग से चला पर उसका यह रूपांतर देखा तो ठिठक गया, मानो उसे पहचानने में भूल हुई, मानो वह सुमन नहीं कोई और स्त्री थी। उसका प्रेमोत्साह भंग हो गया। समझ में न आया कि यह कायापलट क्यों हो गई? उसने फिर सुमन की ओर देखा वह उसकी ओर ताक रही थी, पर उसकी दृष्टि में प्रेम की जगह एक प्रकार की चिंता थी, मानो वह उन पिछली बातों को भूल गई है, या भूलना चाहती हैं। मानो यह हृदय की दी हुई आग को उभारना नहीं चाहती। सदन को ऐसा अनुमान हुआ कि वह मुझे, धोखेबाज और स्वार्थी समझ रही है। उसने एक क्षण बाद फिर उसकी ओर देखा। यह निश्चय करने के लिये कि मेरा अनुमान भ्रांतिपूर्ण तो नहीं है। फिर दोनों की आँखें मिली पर मिलते ही हट गई। सदन को अपने अनुमान का निश्चय हो गया। निश्चय के साथ ही अभिमान का उदय हुआ। उसने अपने मन को धिक्कारा। अभी अभी मैंने अपने को इतना समझाया है और इतनी ही देर में फिर उन्हीं कुवासनाओं में पड़ गया। उसने फिर सुमन की तरफ नहीं देखा। वह सिर झुकाये उसके सामने से निकल गई। सदन ने देखा, उसके पैर काँप रहे थे, वह जगह से न हिला, कोई इशारा भी नहीं किया। अपने विचार में उसने सुमन पर सिद्ध कर दिया कि अगर तुम मुझसे एक कोस भागोगी तो मैं तुमसे सौ कोस भागने को प्रस्तुत हैं। पर उसे यह ध्यान न रहा कि मैं अपनी जगह पर मूर्तिवत् खड़ा हूँ। जिन भावों को उसने गुप्त रखना चाहा, स्वंय उन्ही भावों की मूर्ति बन गया। जब सुमन कुछ दूर निकल गई तो वह लौट पड़ा और उसके पीछे अपने को छिपाता हुआ चला। वह देखना चाहता था कि सुमन कहाँ जातीहै। विवेक ने वासना के आगे सिर झुका लिया। ३९ जिस दिन से बारात लौट गई, उसी दिन से कृष्णचन्द्र फिर घर से बाहर नहीं निकले। मन मारे हुए अपने कमरे में बैठे रहते। उन्हे अब किसी को अपना मुँह दिखाते लज्जा आती थी। दुश्चरित्रा सुमन ने उन्हे संसार की दृष्टि में चाहे कम गिराया हो, पर वे अपनी दृष्टि पे कहीं के न रहे। वे अपने अपमान को सहन न कर सकते थे। वे तीन चार साल कैद रहे, फिर भी अपनी आँखों में इतने नीचे नही गिरे थे। उन्हे इस विचार से संतोष हो गया था कि यह दंड भोग मेरे कुकर्म का फल है, इस कालिमा ने उनके आत्म-गौरव सर्वनाश कर दिया। वे अब नीच मनुष्यों के पास भी नहीं जाते थे, जिनके साथ बैठकर वह चरस की दम लगाया करते थे। वे जानते थे कि मैं उनसे भी नीचे गिर गया हूँ। उन्हें मालूम होता था कि सारे संसार में मेरी ही निन्दा हो रही है। लोग कहते होगें कि इसकी बेटी, यह ख्याल आते ही वह लज्जा और विषाद के सागर में निमग्न हो जाते। हाय! यदि मैं जानता कि वह यो मर्यादा का नाश करेगी तो मैंने उसका गला घोंट दिया होता। यह मैं जानता हूँ कि वह अभागिनी थी, किसी बड़े धनी कुल में रहने योग्य थी, भोग विलासपर जान देती थी। पर यह मैं न जानता था कि उसकी आत्मा इतनी निर्बल है। संसार में किसके दिन समान होते है? विपत्ति सभी पर आती है। बड़े-बड़े धनवानों की स्त्रियाँ अन्न वस्त्र को तरसती है पर कोई उनके मुखपर चिन्ता का चिन्ह भी नहीं देख सकता। वे रो रोकर दिन काटती है, कोई उनके आँसू नहीं देखता। वे किसी के सामने अपनी विपत्ति की कथा नहीं कहती। वे मर जाती है पर किसीका एहसान सिरपर नहीं लेती। वे देवियाँ है। वे कुल मर्यादा के लिये जीती है और उसकी रक्षा करती हुई मरती है, पर यह दुष्टा, यह अभागिनी.... और उसका पति कैसा कायर है कि उसने उसका सिर नहीं काट डाला। जिस समय उसने घर से बाहर पैर निकाला, उसने क्यों उसका गला नहीं दबा दिया? मालूम होता है वह भी नीच, दुराचारी नामर्द है। उसने अपनी कुलमर्यादा का अभिमान होता तो यह नौबत न आती। उसे अपने अपमान की लाज न होगी पर मुझे हैं और मैं सुमन को इसका दण्ड दूँगा। जिन हाथों से उसे पाला, खिलाया, उन्हीं हाथों से उसके गलेपर तलवार चलाऊँगा। यही आँखे कभी उसे खेलती देखकर प्रसन्न होती थी, अब उसे रक्त में लोटती देखकर तृप्त होगी। मिटी हुई मर्यादा पुनरुद्धार का इसके सिवाय कोई उपाय नहीं। संसार को मालूम हो जायगा कि कुल मर्य्यादा पर मरने वाले पापाचरण का क्या दंड देते है। यह निश्चय करके कृष्णचन्द्र अपने उद्देश्य को पूरा करने के साधनों पर विचार करने लगे। जेलखाने में उन्होंने अभियुक्तों से हत्याकांड के कितने ही मन्त्र सीखे थे। रात दिन उन्हीं बातों की चर्चाएंं रहती थी। उन्हें सबसे उत्तम साधन यही मालूम हुआ कि चलकर तलवार से उसको मारूँ और तब पुलिस में जाकर आप ही इसकी खबर दूँ मैजिस्ट्रेट के सामने मेरा जो बयान होगा उसे सुनकर लोगो को आँखें खुल जायगी। मन-ही-मन इस प्रस्ताव से पुलकित होकर वह उस बयान की रचना करने लगे। पहले कुछ सभ्य समाज की विलासिता की उल्लेख कहूँगा, तब पुलिस के हथकड़ी की कलई खोलूँगा, इसके पश्चात् वैवाहिक अत्याचारों का वर्णन करूँगा। दहेज प्रथा पर ऐसी चोट कहूँगा कि सुनकर लोग दंग रह जाय। पर पर सबसे महत्वशील वह भाग होगा जिसमे में दिखाऊँगा कि अपनी कुल मर्यादा के मिटाने वाले हम है। हम अपनी कायरता से, प्राण भय से, लोकनिन्दा के डर से, झूठे संतान प्रेम से अपनी बेहयाई से आत्मगौरव की हीनता से ऐसे पापा चरणों को छिपाते है, उन पर परदा डाल देते है। इसी का यह परिणाम है कि दुर्बल आत्माओं का साहस इतना बढ़ गया है। कृष्णचन्द्र ने यह संकल्प तो कर लिया पर अभी तक उन्होंने यह न सोचा कि शान्ता की क्या गति होगी। इस अपमान की लज्जा ने उनके हृदय में ओर किसी चिन्ता के लिये स्थान न रखा था। उनकी दशा उस मनुष्य की-सी थी जो अपने बालक को मृत्युशय्यापर छोड़कर अपने किसी शत्रु से वैर चुकाने के लिये उद्यत हो जाय, जो डोंगीपर बैठा हुआ पानी में एक सर्प देखकर उसे मारने के लिये झपटे और उसे यह सुधि न रहे कि इस झपट से डोगी डूब जायगी। संध्या का समय था। कृष्णचन्द्र ने आज हत्या मार्गपर चलने का निश्चय कर लिया था। इस समय उनका चित्त कुछ उदास था। यह वही उदासीनता थी जो किसी भयंकर काम के पहले चित्तपर आच्छादित हो जाया करती है। कई दिनों तक क्रोध के वेग से उत्तेजित और उन्मत्त रहने के बाद उनका मन इस समय जछ शिथिल हो गया था जैसे वायु कुछ समय तक वेग से चलने के बाद शान्त हो जाती है। चित्त की ऐसी अवस्था में यह उदासीनता बहुत ही उपयुक्त होती है। उदासीनता वैराग्य का एक सूक्ष्म स्वरूप है जो थोड़ी देर के लिए मनुष्य को अपने जीवनपर विचार करने की क्षमता प्रदान कर देती है, उस समय कि जब पूर्वस्मृतियाँ हृदयमे क्रीड़ा करने लगती है। कृष्णचन्द्र को वह दिन याद आ रहे थे जब उनका जीवन आनन्दमय था, जब वे नित्य सन्ध्या समय अपनी दोनों पुत्रियों को साथ लेकर सैर करने जाया करते थे। कभी सुमन को गोद उठाते, कभी शान्ता को जब वे लोटते तो गंगाजली किसी तरह ने प्रेम से दौड़कर दोनों लड़कियों को प्यार करने लगती थी। किसी आनन्द का अनुभव इतना सुखद नहीं होता जितना उनका स्मरण। वही जंगल और पहाड़ जो कभी आपको सुनसान और बीहड़ प्रतीत होते थे; वही नदियाँ और झील जिनके तट पर से आप आंँखें बन्द किये निकल जाते थे, कुछ समय के पीछे एक अत्यंत मनोरम, शान्तिमय रूप धारण करके आपके स्मृति-नेत्रो के सामने आती है और फिर आप उन्हीं दृश्यों को देखने की आकांक्षा करने लगते है। कृष्णचन्द्र उस भूत- कालिक जीवन का स्मरण करते-करते गद्गगद् हो गये। उनकी आँखों से आंँसू की बूंद टपक पड़ी। हाय! उस आनन्दमय जीवन का ऐसा विवादमय अन्त हो रहा है! मैं अपने ही हाथो से अपनी ही गोद की खिलाई हुई लड़की का वध करने को प्रस्तुत हो रहा हूँ! कृष्णचन्द्र को सुमन पर दया आई। वह बेचारी कुएँ में गिर पड़ी है। क्या मैं अपनी ही लड़की पर, जिसे में आँखों की पुतली समझता था, जिसे सुख से रखनके लिये मैंने कोई बात उठा नहीं रखी, इतना निर्दय हो जाऊँ कि उसपर पत्त्थर फेकूं? लेकिन यह दया का भाव कृष्णचन्द्र के हृदय में देर तक न रह सका। सुमन के पापाभिनय का सबसे घृणोत्पादक भाग यह था कि आज उसका दरवाजा सबके लिये खुला हुआ है। हिन्दू, मुसलमान सब वहाँ प्रवेश कर सकते है। यह ख्याल आते ही कृष्णचन्द्र का हृदय लज्जा और ग्लानि से भर गया। इतने में पंडित उमानाथ उनके पास आकर बैठ गये और बोले, मैं वकील के पास गया था। उनकी सलाह है कि मुकद्दमा दायर करना चाहिये। कृष्णचन्द्र ने चौंककर पूछा कैसा-मुकदमा? उमा---उन्ही लोगोंपर, जो द्वार से बारात लौटा ले गये। कृष्ण---इससे क्या होगा? उमा---इससे यह होगा कि या तो वह फिर कन्या से विवाह करेगे या हरजाना देंगे। कृष्ण—पर क्या और बदनामी न होगी? उमा—बदनामी जो कुछ होनी थी हो चुकी, अब किस बात का डर है? मैंने एक हजार रुपये तिलक में दिये चार पाँच सौ खिलाने पिलाने में खर्च किये, यह सब क्यों छोड़ दूँगा, यही रुपये किसी कंगाल कुलीन को दे दूँगा तो वह खुशी से विवाह करने पर तैयार हो जायगा। जरा इन शिक्षित महात्माओं की कलई तो खुलेगी! कृष्णचन्द्र ने लंबी सांस लेकर कहा, पहले मुझे विष दे दो, तब यह मुकद्दमा दायर करो। उमानाथने कुद्ध होकर कहा, आप क्यों इतना डरते है? कृष्णचन्द्र-मुकदमा दायर करने का निश्चय कर लिया है? उमा—हाँ, मैने निश्चय कर लिया है। कल सारे शहर के बड़े-बड़े वकील वैरिस्टर जमा थे। यह मुकद्दमा अपने ढंग का निराला है। उन लोगों ने बहुत कुछ देख-भालकर तब यह सलाह दी है। दो वकीलों को बयाना तक दे आया हूँ। कृष्णचन्द्र ने निराश होकर कहा, अच्छी बात है, दायर कर दो। उमा---आप इससे असन्तुष्ट क्यों है? कृष्ण---जब तुम आपही नहीं समझते तो मैं क्या बताऊँ? जो बात अभी दो चार गाँव में फैली है वह सारे शहर में फैल जायगी। सुमन अवश्य ही इजलास पर बुलाई जायगी, मेरा नाम गली-गली बिकेगा। उमा—अब इससे कहाँ तक डरूँ? मुझे भी अपनी दो लड़कियों का विवाह करना है। यह कलंक अपने माथे लगाकर उनके विवाह में क्यों बाधा डालूँ? कृष्ण-—तो तुम यह मुकदमा इसलिये दायर करते हो, जिसमें तुम्हारे नामपर कोई कंलक न रहे। उमानाथ ने सगर्व कहा, हाँ, अगर आप उसका यह अर्थ लगाते है तो यही सही। बारात मेरे द्वार से लौटी है, लोगों को भ्रम हो रहा है कि सुमन मेरी लड़की है। सारे शहर से मेरा ही नाम लिया जा रहा है। मेरा दावा दस हजार का होगा, अगर पाँच हजार की डिगरी हो गयी तो शान्ता का किसी उत्तम कुल में ठिकाना लग जायगा। आप जानते है, जूठी वस्तु को मिठास के लोभ से लोग खाते हैं। जब तक रुपये का लोभ न होगा शान्ता का विवाह कैसे होगा? एक प्रकार से मेरे कुल में भी कलंक लग गया। पहले वह अपनी वाणी से कह सकती थी। उसके मन ने कहा, जिसे पतिव्रत जैसा साधन मिल गया है उसे और किसी साधन की क्या आवश्यकता? इसमें सुख, सन्तोष और शान्ति सब कुछ है। आधी रात बीत चुकी थी। कृष्णचन्द्र घर से बाहर निकले। प्रकृति सुन्दरी किसी वृद्धा के समान कुहरे की मोटी चादर ओढे निद्रामें मग्न थी? आकाश में चन्द्रमा मुँह छिपाये हुए वेग से दौड़ा चला जाता था, मालूम नहीं कहाँ? कृष्णचन्द्र के मन मे एक तीव्र आकांक्षा उठी, शान्ता को कैसे देखूँ। संसार में यही एक वस्तु उनके आनन्दमय जीवन का चिह्न रह गई थी। नैराश्य के धने अन्धकार में यही एक ज्योति उनको अपने मन की ओर खींच रही थी। वह कुछ देर तक द्वार पर चुपचाप खड़े रहे तब एक लंबी साँस लेकर आगे बढ़े। उन्हें ऐसा मालूम हुआ मानो गंगाजली आकाश में बैठी। हुई उन्हें बुला रही है। कृष्णचन्द्र के मन में इस समय कोई इच्छा, कोई अभिलाषा, कोई चिन्ता न थी। संसार से उनका मन विरक्त हो गया था। वह चाहते थे कि किसी प्रकार जल्दी गंगातट पर पहुँचूँ और उसके अथाह जल में कूद पड़ूँ। उन्हें भय था कि कहीं मेरा साहस न छूट जाय। उन्होंने अपने संकल्प को उत्तेजित करने के लिये दौड़ना शुरू किया। लेकिन थोड़ी ही दूर चलकर वह फिर ठिठक गये और सोचने लगे। पानी में कूद पड़ना ऐसा क्या कठिन है, जहाँ भूमि से पैर उखड़े कि काम तमाम हुआ। यह स्मरण करके उनका हृदय एक बार काँप उठा, अकस्मात् यह बात उनके ध्यान में आई कि कहीं निकल क्यों न जाऊँ? जब यहाँ रहूँगा ही नहीं तो अपना अपमान कैसे सुनूँगा? लेकिन इस बात को उन्होंने मन में जमने न दिया। मोह की कपटलीला उन्हें घोखा न दे सकीं। यद्यपि वह धार्मिक प्रकृति के मनुष्य नहीं थे और अदृश्य के एक अव्यक्त भय से उनका हृदय काप रहा था, पर अपने संकल्प को दृढ़ रखने के लिये वह अपने मन को यह विश्वास दिला रहे थे कि परमात्मा बड़ा दयालु और करुणाशील है। आत्मा अपने को भूल गई थी। वह उस अपने ही घर में जाते डरता है। कृष्णचन्द्र इसी प्रकार आगे बढ़ते हुए कोई चार मील चले गये। ज्यों-ज्यो गंगा तट निकट होता जाता था, त्यों-त्यों उनके हृदय की गति बढ़ती जाती थी। भय से चित्त अस्थिर हुआ जाता था। लेकिन वे इस आन्तरिक निर्बलता को कुछ तो अपने वेग और कुछ तिरस्कार से हटाने की चेष्टा कर रहे थे। हाँ मैं कितना निर्लज्ज, आत्मशून्य हूँ। इतनी दुर्दशा होने पर भी मरने से डरता हूँ। अकस्मात् उन्हें किसी के गाने की ध्वनि सुनाई दी। ज्यों-ज्यों वे आगे बढते थे, त्यों-त्यों वह ध्वनि निकट आती जाती थी। गाने वाला उन्हीं की ओर चला आ रहा था। उस निस्तब्ध रात्रि में कृष्णचन्द्र को वह गाना अत्यंत मधुर मालूम हुआ। कान लगाकर सुनने लगे : हरिसों ठाकुर और न जनको। जेहि जेहि विधि सेवक सुख पावै तेहि विधि राखत तिनको॥ हरिसों ठाकुर और न जनको। भूखे को भोजन जु उदर को तृषा तोय पट तनको। लाग्यो फिरत सुरभी ज्यों सुत सग उचित गमन गृह वनको। हरिसो ठाकुर और न जनको॥ यद्यपि गान माधुर्य-रस पूर्ण न था, तथापि वह शास्त्रोक्त था इसलिये कृष्णचन्द्र को उसमें बहुत आनन्द प्राप्त हुआ। उन्हे इस शास्त्र का अच्छा ज्ञान था। इसने उनके विदग्ध हृदय को शान्ति प्रदान कर दी। गाना बन्द हो गया और एक क्षण के बाद कृष्णचन्द्र ने एक दीर्घकाय जटाधारी साधु को अपनी ओर आते देखा। साधु ने उनका नाम और स्थान पूछा। उसके भाव से ऐसा ज्ञात हुआ कि वह उनसे परिचित है। कृष्णचन्द्र आगे बढ़ना चाहते थे कि उसने कहा, इस समय आप इधर कहाँ जा रहे हैं? कृष्णचन्द्र——कुछ ऐसा ही काम आ पड़ा है। साधु—आधी रात को आपका गंगातट पर क्या काम हो सकता है? कृष्णचन्द्र ने रुष्ट होकर उत्तर दिया, आप तो आत्मज्ञानी है। आपको स्वयं जानना चाहिये। साधु——आत्मज्ञानी तो मैं नही हूंँ, केवल भिक्षुक हूँ, इस समय में आपको उधर न जाने दूँगा। कृष्णचन्द्र——आप अपनी राह जाइये। मेरे काम में विघ्न डालने का आपको क्या अधिकार है? साधु——अधिकार न होता तो मैं आपको रोकता ही नहीं। आप मुझसे परिचित नहीं है, पर मैं आपका धर्मपुत्र हूँ, मेरा नाम गजाधर पांडे हैं। कृष्णचन्द्र——ओ हो! आप गजाधर पांडे है। आपने यह भेष कब से धारण कर लिया? आपसे मिलने की मेरी बहुत इच्छा थी, मैं आपसे‌ बहुत कुछ पूछना चाहता था। गजाधर——मेरा स्थान गंगातटपर एक वृक्ष के नीचे है, चलिये वहाँ थोडी देर विश्राम कीजिये, मैं सारा वृत्तांत आपसे कह दूँगा। रास्ते में दोनों मनुष्यों में कुछ बातचीत न हुई। थोड़ी देर में वे उस वृक्ष के नीचे पहुँच गये, जहाँ एक मोटासा कन्दा जल रहा था। भूमि पर पुआल बिछा हुआ था और एक मृग चर्म, एक कमंडल और एक पुस्तकों का बस्ता उसपर रखा हुआ था। कृष्णचन्द्र आग तापते हुए बोले, आप साधु हो गये है, सत्य ही कहियेगा, सुमन की यह कुप्रवृत्ति कैसे हो गई? गजाधर अग्निके प्रकाश में कृष्णचन्द्र के मुख की ओर मर्मभेदी दृष्टि से देख रहे थे। उन्हें उनके मुखपर उनके हृदय के समस्त भाव अकिंत देख पड़ते थे। वह अब गजाधर न थे। सत्मग और विरक्ति ने उनके ज्ञान को विकसित कर दिया था। वह उस घटना पर जितना ही विचार करते थे। उतना ही उन्हें पश्चात्ताप होता था। इस प्रकार अनुतप्त होकर उनका हृदय सुमन की ओर से बहुत उदार हो गया था। कभी-कभी उनका जी चाहता था कि चलकर उसके चरणों पर सिर रख दूँ। गजाधर बोले, इसका कारण मेरा अन्याय था। यह सब मेरी, निर्दयता ओर अमानुषीय व्यवहार का फल है। वह सर्वगुण संपन्न थी, वह इस योग्य थी कि किसी बड़े घर की स्वामिनी बनती। मुझ जैसा दुष्ट दुरात्मा दुराचारी मनुष्य उसके योग्य न था। उस समय मेरी स्थूल दृष्टि उसके गुणों को न देख सकी। ऐसा कोई कष्ट न था जो उस देवी को मेरे साथ न झेलना पड़ा हो। पर उसने कभी मन मैला न किया। वह मेरा आदर करती थी। पर उसका यह व्यवहार देखकर मुझे उसपर संदेह होता था कि वह मेरे साथ कोई कौशल कर रही है। उसका संतोष, उसकी भक्ति, उसकी गभीरता मेरे लिये दुर्बोध थी। मैं समझता था, वह मुझसे कोई चाल चल रही है। अगर वह मुझसे छोटी-छोटी वस्तुओं के लिये झगड़ा करती, रोती, कोसती, ताने देती तो उसपर मुझे विश्वास होता। उसका ऊँचा आदर्श मेरे अविश्वास का कारण हुआ। मैं उसके सतीत्व पर संदेह करने लगा। अन्त को यह दशा हो गई कि एक दिन रात को एक सहेली के घरपर केवल जरा विलब हो जानेके कारण मैंने उसे घर से निकाल दिया। कृष्णचन्द्र बात काटकर बोले, तुम्हारी बुद्धि उस समय कहाँ गई थी? तुमको जरा भी ध्यान न रहा कि तुम अपनी इस निर्दयता से कितने बड़े कुल को कलंकित कर रहे हो? गजाधर——महाराज, अब मैं क्या बताऊँ कि मुझे क्या हो गया था? मैने फिर उसकी सुध न ली। पर उसका अन्तःकरण शुद्ध था? पापाचरण से उसे घृणा थी। अब वह विधवाश्रम मे रहती है और सब उससे प्रसन्न है। उसकी धर्मनिष्ठा देखकर लोग चकित हो जाते है। गजाधर की बात सुनकर कृष्णचन्द्र का हृदय सुमन की ओर से कुछ नरम पड़ गया। लेकिन वह जितना ही इधर नरम था उतना ही दूसरी ओर कठोर हो गया। जैसे साधारण गति से बहती हुई जलधारा सामने रुककर दूसरी ओर और भी वेग से बहने लगती है। उन्होंने गजाधर को सरोष नेत्रों से देखा, जैसे कोई भूखा सिंह अपने शिकार को देखता है। उन्हें निश्चय हो रहा था कि यही मनुष्य मेरे कुल को कलंकित करने वाला है। इतना हीं, उसने सुमन के साथ भी अन्याय किया है। उसे नाना प्रकार के कष्ट दिये हैं। क्या मैं उसे केवल इसलिये छोड़ दूँ कि वह अब अपने दुष्कृत्यों पर लज्जित है? लेकिन उसने यह बात मुझसे कह क्यों दी? कदाचित वह समझता है कि मैं उसका कुछ नही बिगाड़ सकता। यही बात है, नहीं तो वह मेरे सामने अपना अपराध इतनी निर्भयता से क्यों स्वीकार कृष्णचन्द्र ने गजाधर के मनोभावों को न समझा। वह क्षणभर आग की तरफ ताकते रहे, फिर कठोर स्वर से बोले, गजाधर, तुमने मेरे कुल को डुबा दिया। तुमने मुझे कही मुँह दिखाने योग्य न रखा। तुमने मेरी लड़की की जान ले ली, उसका सत्यानाश कर दिया, तिसपर भी तुम मेरे सामने इस तरह बैठे हो मानो कोई महात्मा हो। तुम्हें चिल्लूभर पानी में डूब मरना चाहिए। गजाघर जमीन की मिट्टी खुरच रहे थे। उन्होंने सिर उठाया। कृष्णचन्द्र फिर बोले, तुम दरिद्र थे, इसमें तुम्हारा दोष नहीं। तुम अगर अपनी स्त्री का उचित रीति से पालनपोषण नहीं कर सके तो इसलिये तुम्हें दोषी नहीं ठहराता। तुम उसके मनोभावों को नहीं जान सके, उसके सद्वविचारों का मर्म नहीं समझ सके, इसके लिए भी मैं तुम्हें दोषी नहीं ठहराता। तुम्हारा अपराध यह है कि तुमने उसे घर से निकाल दिया। तुमने उसे मार क्यों नहीं डाला? अगर तुमको उसके पातिव्रत पर सन्देह था‌। तो तुमने उसका सिर काट क्यों नहीं लिया? और यदि उतना साहस नहीं था, तो स्वयं क्यों न प्राण त्याग कर दिया? विष क्यों न खा लिया अगर तुमने उसके जीवन का अन्त कर दिया होता तो उसकी यह दुर्दशा न हुई होती, मेरे कुल में यह कलंक न लगता। तुम भी कहोगे कि मैं पुरुष हूँ। तुम्हारी इस कायरता पर, इस निर्लज्जता पर धिक्कार है! जो पुरुष इतना नीच है कि अपनी स्त्री को दूसरों से प्रेमालाप करते देखकर उसका रुधिर खौल नहीं उठता वह पशुओं से भी गया बीता है। गजाधर को अब मालूम हुआ कि सुमन को घर से निकालने की बात कहकर वह मानो ब्रह्मफाँस से फँस गये। वह मनसे पछताने लगे कि उदारता की धुन में मैं इतना असावधान क्यों हो गया। तिरस्कार की मात्रा भी उनकी आशा से अधिक हो गई। वे न समझे थे कि वह यह रूप धारण करेगा और उससे मेरे हृदयपर इतनी चोट लगेगी। अनुतप्त हृदय वह तिरस्कार चाहता है जिसमे सहानुभूति और सहृदयता हो, वह नहीं जो अपमानसूचक और क्रूरतापूर्ण हो। पका हुआ फोड़ा नश्तर का घाव चाहता है, पत्थर का आघात नहीं। गजाधर अपने पश्चात्ताप पर पछताये। उनका मन अपना पूर्वपक्ष समर्थन करने के लिये अधीर होने लगा। कृष्णचन्द्र ने गरजकर कहा, क्यों, तुमने उसे मार क्यों नहीं डाला? गजाधर ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, मेरा हृदय इतना कठोर नहीं था। कृष्ण——तो घर से क्यों निकाला? गजाधर——केवल इसलिये कि उस समय मुझे उससे गला छुड़ाने का और कोई उपाय न था। कृष्णचन्द्र ने मुँह चिढ़ाकर कहा, क्यों जहर खा सकते थे। गजाधर इस चोट से बिलबिलाकर बोले, व्यर्थ में जान देता? कृष्ण——व्यर्थ जान देना व्यर्थ जीने से अच्छा है? गजाधर——आप मेरे जीने को व्यर्थ नहीं कह सकते। आपसे पंडित उमानाथ ने न कहा होगा, पर मैंने इसी याचना-वृत्ति से उन्ह शान्ता के विवाह के लिए १५००J दिये है और इस समय भी उन्हीं के पास यह १०००) लिये जा रहा था, जिससे वह कही उसका विवाह कर दे। यह कहते कहते गजाधर चुप हो गये। उन्हे अनुभव हुआ कि इस बात का उल्लेख करके मैंने अपने ओछेपन का परिचय दिया। उन्होंने संकोच से सिर झुका लिया। कृष्णचन्द्र ने संदिग्ध स्वर से कहा, उन्होंने इस विषय में मुझसे कुछ नहीं कहा। गजाधर——यह कोई ऐसी बात भी नही थी कि वह आपसे कहते। मैंने भी तो पाप किये है, पर कभी इस शक्ति का अनुभव नहीं किया कुछ नहीं, यह सब इनके शब्दजाल है, इन्होंने अपनी कायरता को शब्दों के आडम्बर में छिपाया है, यह मिथ्या है, पाप से पाप ही उत्पन्न होगा, अगर पाप से पुण्य होता तो आज संसार में कोई पापी न रह जाता। यह सोचते हुए वे उठ बैठे, गजाधर भी आग के पास पड़े हुए थे। कृष्णचन्द्र चुपके से उठे और गंगा तट की ओर चले। उन्होने निश्चय कर लिया था कि अब इन वेदनाओं का अन्त ही करके छोड़ेगा। चन्द्रमा अस्त हो चुका था। कुहरा और भी सघन हो गया था। अन्धकार ने वृक्ष, पहाड़ और आकाश में कोई अन्तर न छोड़ा था। कृष्ण चन्द्र एक पगडंडी पर चल रहे थे, पर दृष्टि की अपेक्षा अनुमान से अधिक काम लेना पड़ता था। पत्थर के टुकडों और झाड़ियों से बचने में वह ऐसे लीन हो रहे थे कि अपनी अवस्था का ध्यान न था। करार के किनारे पहुँचकर उन्हें कुछ प्रकाश दिखाई दिया। वह नीचे उतरे। गंगा कुहरे की मोटी चादर ओढ़े पड़ी कराह रही थी। आस-पास के अन्धकार और गंगा में केवल प्रवाह का अन्तर था। यह प्रवाहित अन्धकार था। ऐसी उदासी छाई हुई थी जो मृत्यु के बाद घरों में छा जाती है। कृष्णचन्द्र नदी के किनारे खड़े थे। उन्होने विचार किया, हाय! अब मेरा अन्त कितना निकट है। एक पल में यह प्राण न जाने कहाँ चले जायेंगे। न जाने क्या गति होगी? संसार से आज नाता टूटता है। परमात्मन् अब तुम्हारी शरण आाता हूँ, मुझपर दया करो, ईश्वर मुझे सँभालो। इसके बाद उन्होंने एक क्षण अपने हृदय में बल का संचार किया। उन्हें मालूम हुआ कि मैं निर्भय हूँ। वह पानी में घुसे। पानी बहुत ठंडा था। कृष्णचन्द्र का सारा शरीर दहल उठा। वह घुसते हुए चले गये। गलेतक पानी में पहुँचकर एक बार फिर विराट तिमिर को देखा, यह संसार-प्रेम की अंतिम घड़ी थी, यह मनोबल की, आत्माभिमान की अंतिम परीक्षा थी। अब तक उन्होंने जो कुछ किया था यह केवल इसी परीक्षा की तैयारी थी। इच्छा और माया का अंतिम संग्राम था। माया ने अपनी संपूर्ण शक्ति से उसे अपनी ओर खींचा। सुमन विदुषी वेष में दृष्टिगोचर हुई, शान्ता शोक की मूर्ति बनी हुई सामने आई। अभी क्या बिगड़ा है क्यों न साधु हो जाऊँ? मैं ऐसा कौन बड़ा आदमी हूँ कि संसार मेरे नाम और मर्यादा की चर्चा करेगा? ऐसी न जाने कितनी कन्याएँ पाप के फन्दे में फंसती है। संसार किसकी परवाह करता है? मैं मूर्ख हूँ जो यह सोचता हूँ कि संसार मेरी हँसी उड़ावेगा। इच्छा-शक्ति ने कितना ही चाहा कि इस तर्क का प्रतिवाद करे पर वह निष्फल हुई। एक डुबकी की कसर थी। जीवन और मृत्यु में केवल एक पग का अन्तर था। पीछे का एक पग कितना सुलभ था कितना सरल! आगे का एक पग कितना कठिन था, कितना भयकारक। कृष्णचन्द्र ने पीछे लौटने के लिये कदम उठाया। माया ने अपनी विलक्षण शक्ति का चमत्कार दिखा दिया। वास्तव में वह संसार-प्रेम नहीं था यह अदृश्य का भय था। उस समय कृष्णचन्द्र को अनुभव हुआ कि अब मैं पीछे नहीं फिर सकता। वह धीरे-धीरे आप ही आप खिसकते जाते थे। उन्होंने जोर से चीत्कार किया, अपने शीत शिथिल पैरों को पीछे हटाने की प्रबल चेष्टा की, लेकिन कर्म की गति कि आगे ही को खिसके। अकस्मात् उनके कानों में गजाधर के पुकारने की आवाज आई। कृष्णचन्द्र ने चिल्लाकर उत्तर दिया, पर मुझसे पूरी बात भी न निकलने पाई थी कि हवा से झूझकर अन्धकार में लीन हो जाने वाले दीपक के सदृश लहरों में मग्न हो गये। शोक, लज्जा और चितातप्त हृदयका दाह शीतल जल में शान्त हो गया। गजाधर ने केवल यह शब्द सुने "मैं यहाँ डूबा जाता हूँ” और फिर लहरों की पैशाचिक क्रीड़ा-ध्वनि के सिवा और कुछ न सुनाई दिया। शोकाकुल गजाधर देरतक तटपर खड़े रहे। वही शब्द चारों ओर से उन्हें सुनाई देते थे। पास की पहाडियाँ और सामने की लहरे, और चारों ओर छाया हुआ दुर्भाग्य अन्धकार उन्हीं शब्दों से प्रतिध्वनित हो रहा था। ३९ प्रातःकाल यह शोक समाचार अमोला में फैल गया इने गिने सज्जनों को छोड़कर कोई भी उमानाथ के द्वार पर समवेदना प्रकट करने न आया! स्वाभाविक मृत्यु हुई होती तो संभवत: उनके शत्रु भी आकर चार आँसू बहा जाते, पर आत्मघात एक भयंकर समस्या है, यहां पुलिस का अधिकार है, इस अवसर पर मित्रदल ने भी शत्रुवत् व्यवहार किया। उमानाथ से गजाधर ने जिस समय समाचार कहा, उस समय वह कुएँ पर नहा रहे थे। उन्हें लेशमात्र भी दुख व कुतूहल नहीं हुआ। इसके प्रतिकूल उन्हें कृष्णचन्द्र पर क्रोध आया, पुलिस के हथकडों की शंका ने शोक को भी दबा दिया। उन्हें स्नान-ध्यान में उस दिन बड़ा विलंब हुआ। संदिग्ध चित्त को अपनी परिस्थिति के विचार से अवकाश नहीं मिलता। वह समय ज्ञान रहित हो जाता है। जान्हवी ने बड़ा हाहाकार मचाया। उसे रोते देखकर उसकी दोनों बेटियाँ भी रोने लगी। पास-पड़ोस की महिलाएं समझाने के लिये आ गई। उन्हें पुलिस का भय नहीं था पर वह आतंनाद शीघ्र ही समाप्त हो गया। कृष्णचन्द्र के गुण-दोष की विवेचना होने लगी। सर्व सम्मति ने स्थिर किया कि उनमें गुण की मात्रा दोष से बहुत अधिक थी। दोपहर को जब उमानाथ घर में शर्बत पीने आये और कृष्णचन्द्र के सम्बन्ध में कुछ अनुदारता का परिचय दिया तो जान्हवी ने उनकी ओर वक्र नेत्रो से देखकर कहा; कैसी तुच्छ बातें करते हो। उमानाथ लज्जित हो गये। जान्हवी अपने हार्दिक आनन्द का मुख अकेले उठा रही थी। इस भाव को वह इतना तुच्छ और नीच समझती थी कि उमानाथ भी उसे गुप्त रखना चाहती थी। सच्चा शोक शांता के सिवा और किसी को न हुआ। यद्यपि अपने पिता को यह सामर्थ्य हीन समझती थी, तथापि संसार में उसके जीवन का एक आधार मौजूद था। अपने पिता की हीनावस्था ही उसकी पितृभक्तिका कारण थी, अब वह सर्वथा निराधार हो गई। लेकिन नैराश्य ने उसके जीवन को उद्देश्यहीन नहीं होने दिया। उसका हृदय और भी कोमल हो गया। कृष्णचन्द्र ने चलते-चलते उसे जो शिक्षा दी थी, उसमें अब विलक्षण प्रेरणा शक्ति का प्रादुर्भाव हो गया था। आज से शान्ता सहिष्णुताकी मूर्ति बन गई। पावस की अंतिम बूंदो के सदृश मनुष्य की वाणी के अंतिम शब्द कभी निष्फल नहीं जाते। शान्ता अब मुँह से कोई ऐसा शब्द न निकालती, जिससे उसके पिता की आत्मा को दुख हो, उनके जीवनकाल में वह कभी-कभी उनकी अवहेलना किया करती थी, पर अब वह अनुदार विचारों को हृदय में भी न आने देती थी। उसे निश्चय था कि भौतिक शरीर से मुक्त आत्मा के लिये अन्तर और वाह्य में कोई भेद नहीं। यद्यपि अब वह जान्हवी को संतुष्ट रखने के निमित्त कोई बात उठा न रखती थी, तथापि जान्हवी उसे दिन मे दो-चार बार अवश्य ही उल्टी सीधी सुना देती। शान्ता को क्रोध आता, पर वह विष का घूंट पीकर रह जाती, एकान्त में भी न रोती। उसे भय था कि पिताजी की आत्मा मेरे रोनेसे दु:खी होगी। होली के दिन उमानाथ अपनी दोनों लड़कियो के लिये उत्तम साड़ियाँ लाये। जान्हवी ने ने भी रेशमी साड़ी निकाली, पर शान्ता को अपनी पुरानी धोती ही पहननी पड़ी। उसका हृदय दु:ख से विदीर्ण हो गया, पर उसका मुख जरा भी मलिन न हुआ। दोनो बहने मुँह फुलाये बैठी थी कि साड़ियाँ में गोट नहीं लगवाई गई और शान्ता प्रसन्न वदन घर का काम काज कर रही थी, यहाँ तक कि जान्हवी को भी उसपर दया आ गई। उसने अपनी एक पुरानी लेकिन रेशमी साड़ी निकालकर शान्ता को दे दी। शान्ता ने जरा भी मान न किया। उसे पहनकर फिर पकवान बनाने में मग्न हो गई। एक दिन शान्ता उमानाथ की धोती छँटनी भूल गई। दूसरे दिन प्रातःकाल उमानाथ नहाने चले तो धोती गीली पड़ी थी। वह तो कुछ न बोले, पर जान्हवी ने शान्ता को इतना कोसा कि वह रो पड़ी। रोती थी और धोती छाँटती थी। उमानाथ को यह देखकर दु:ख हुआ। उन्होंने मन में सोचा, हम केवल पेट की रोटियों के लिये इस अनाथ को इतना कष्ट दे रहे हैं? ईश्वर के यहाँ क्या जवाब देंगे? जान्हवी को तो उन्होंने कुछ न कहा पर निश्चय किया कि शीघ्र ही इस अत्याचार का अन्त करना चाहिये। मृतक संस्कारो से निवृत होकर उमानाथ आजकल मदनसिंह पर मुकद्दमा दायर करने का कार्यवाही में मग्न थे। वकीलो ने उन्हें विश्वास दिलाया था कि तुम्हारी अवश्य विजय होगी। पांच हजार रुपये मिल जाने से मेरा कितना कल्याण होगा, यह कल्याण कामना उमानाथ को आनन्दोन्मत्त कर देती थी, इस कल्पना ने उनकी शुभाकांक्षाओं को जागृत कर दिया था। नया कर बनाने के मन्सूबे होने लगे थे। उस घर का चित हृदयपट पर खिंच गया था। उसके लिये उर्पयुक्त स्थान की बातचीत शुरू हो गयी थी। इन आनन्दकल्पनाओं में शांता को सुधि ही न रही थी जान्हवी के इस अत्याचार ने उनको शान्ता की ओर आकर्षित किया। गजाधर के दिये हुए सहस्त्र रुपये जो उन्होंने मुकदमें के खर्च के लिये अलग रख दिये ये घरों मौजूद थे एक दिन जाहन्वी से उन्होंने इस विषय में कुछ बातचीत की। कही एक सुयोग्य वर मिलने की आशा थी। शान्ता ने यह बात सुनी। मुकद्दमे की बातचीत सुनकर भी उसे दुख होता था, पर वह उसमें दखल देना उचित समझती थी। लेकिन विवाह की बातचीत सुनकर वह चुप न रह सकी। एक प्रबल प्रेरक शक्ति ने उसकी लज्जा और संकोच को हटा दिया ज्योंही उमानाथ चले, वह जान्हवी के पास आकर बोली, मामा अभी तुमसे क्या कह रहे थे? जान्हवी ने असंतोष भाव से उत्तर दिया, कह क्या रहे थे, अपना दु:ख रो रहे थे। अभागिनी सुमन ने यह सब कुछ किया नहीं तो यह दोहरकम्मा क्यों करना पड़ता? अब न उतना उत्तम कुल ही मिलता है, न वैसा सुन्दर वर। थोडी दूर पर एक गांव है। वहीं एक वर देखने गये थे। शान्ता ने भूमि की ओर ताकते हुए उत्तर दिया, क्या मैं तुम्हें इतना कष्ट देती हूँ कि मुझे फेंकने की पड़ी हुई है? तुम मामा से कह दो कि मेरे लिए कष्ट न उठावें। जान्हवी-तुम उनकी प्यारी भांजी हो, उनसे तुम्हारा दुःख नहीं देना जाता। मैंने भी तो यही कहा था कि अभी रहने दो। जब मुकदमे का रुपया हाथ आ जाय तो निश्चिंत होकर करना पर वह मेरी बात माने तब तो? शांता-मुझे वहीं क्यों नहीं पहुँचा देते? जान्हवी ने विस्मित होकर पूछा, कहाँ? शान्ता ने सरल भाव से उत्तर दिया, चाहे चुनार, चाहे काशी। जान्हवी-—कैसे बच्चों की सी बात करती हो! अगर ऐसा ही होता तो रोना काहे का था? उन्हीं तुम्हे घर में रखना होता तो यह उपद्रव क्यों मचाते? शान्ता-बहू बनाकर न रक्खे लौण्डी बनाकर तो रखेंगे। जान्हवी ने निर्दयता से कहा, तो चली जाओ, तुम्हारे मामा से यह कभी न होगा कि तुम्हें सिर चढ़ाकर ले जाँय और वहाँ अपना अपमान करा के फिर तुम्हें ले आवे। वह तो उन लोगों का मुँह कुचलकर उनसे रुपये भरावेगें। शान्ता-—मामी, वे लोग चाहे कैसे हो अभिमानी हो, लेकिन मैं उनके द्वारपर जाकर खड़ी हो जाऊंगी तो उन्हें मुझपर दया आ ही जायगी। मुझे विश्वास है कि वह मुझे अपने द्वारपर से हटा न देगे। अपना बैरी भी द्वार पर आ जाय तो उसे भगाते संकोच होता है मैं तो फिर भी... जान्हवी अधीर हो गई। यह निर्लज्जता उससे न सही गई। बात काटकर बोली, चुप भी रहो, लाज हया तो जैसे तुम्हें छू नहीं गई। मान न मान में तेरा मेहमान। जो अपनी बात न पूछे बह चाहे धन्नासेठ ही क्यों न हो, उसकी ओर आँख उठाकर न देखे। अपनी तो यह टेक है। अब तो वे लोग यहाँ आकर नकघिसनी भी करे तो तुम्हारे मामा दूर ही से भगा देगे। शान्ता चुप हो गई। संसार चाहे जो कुछ समझता हो, वह अपने को विवाहिता ही समझती थी। एक विवाहिता कन्या का दूसरे घर में विवाह हो, यह उसे अत्यंत लज्जाजनक, असह्य प्रतीत होता था। बारात आने के एक मास पहले से वह सदन के रूप गुण की प्रशंसा सुन-सुनकर उसके हाथों बिक चुकी थी। उसने अपने द्वार पर, द्वारचार के समय, सदन को अपने पुरुष की भॉति देखा है, इस प्रकार नहीं मानो वह कोई अपरिचित मनुष्य है। अब किसी दूसरे पुरुष की कल्पना उसके सतीत्व पर कुठार के समान लगती थी। वह इतने दिनों तक सदन को अपना पति समझने बाद उसे हृदय से निकाल न सकती थी, चाहे वह उसकी बात पूछे या न पूछे, चाहे उसे अंगीकार करे या न करे।अगर द्वाराचार के बाद ही सदन उसके सामने आता तो वह उसी भाँति उससे मिलती मानो वह उसका पति हैं विवाह, भंवर या सेंदुर बंंधन नहीं, बंधन केवल मन का भाव है। शान्ता को अभी तक यह आशा थी कि कभी न कभी में पति घर अवश्य जाऊँगी, कभी न कभी स्वामी के चरणो में अवश्य ही आश्रय पाऊँगी, पर आज अपने विवाह की-या पुनर्विवाह की बात सुनकर उसका अनुरक्त हृदय काँप उठा। उसने निस्संकोच होकर जान्हवी से विनय की कि मुझे पति के घर भेज दो। यहीं तक उसकी सामर्थ्य थी। इसके सिवा वह और क्या करती? पर जान्हवी की निर्दयतापूर्ण उपेक्षा देखकर उसका धैर्य हाथ से जाता रहा। मन की चंचलता बढ़ने लगी। रात को जब सब सो गये तो उसने पद्मसिंह को एक विनय पत्र लिखना शुरू किया। यह उसका अंतिम साधन था। इसके निष्फल होने पर उसने कर्तव्य का निश्चय कर लिया था। पत्र शीघ्र ही समाप्त हो गया। उसने पहले ही से कल्पना में उसकी रचना कर ली थी। केवल लिखना बाकी था- “पूज्य धर्म पिता चरण-कमलों में सेविका शान्ता का प्रणाम स्वीकार हो। मैं बहुत दु:ख में हूँ। मुझपर दया करके अपने चरणों में आश्रय दीजिये। पिताजी गंगा में डूब गये। यहां आप लोगो पर मुकदमा चलाने का प्रस्ताव हो रहा है मेरे पुनर्विवाह की बातचीत हो रही है। शीघ्र सुधि लीजिये। एक सप्ताह तक आपकी राह देखूँगी। उसके बाद फिर आप अबला की पुकार न सुनेंगे।’’ इतने में जान्हवी की आँख खुली। मच्छरो नेंं सारे शरीर में कांटे चुभो दिये थें। खुजलाते हुए बोली, शान्ता! यह क्या कर रही है। "शान्ता ने निर्भय होकर कहा पत्र लिख रही हूँ।” "किसको?” "अपने श्वसुर को।” "चुल्लू भर पानी में डूब नहीं मरती?” "सातवे दिन मरुँगी।" जान्हवी ने कुछ उत्तर न दिया, फिर सो गई। शान्ता ने लिफाफे पर पता लिखा और उसे अपने कपड़ो की गठरी में रखकर लेट रही। ४० पद्मसिंह का पहला विवाह उस समय हुआ था जब वह कालेज में पढ़ते थे और एफ० ए० पास हुए तो वह एक पुत्र के पिता थे। पर बालिका वधू शिशुपालन का मर्म न जानती थी। बालक जन्म के समय तो हृष्ट पुष्ट था पर पीछे धीरे-धीरे क्षीण होने लगा था। यहाँ तक कि छठे महीने माता ओर शिशु दोनों ही चल बसे। पद्मसिंह ने निश्चय किया अब विवाह न करूँगा। मगर वकालत पास करने पर उन्हें फिर वैवाहिक बन्धन में फँसना पड़ा। सुभद्रा रानी वधू बनकर आई। इसे आज सात वर्ष हो गये। पहले दो तीन साल तक तो पद्मसिंह को सन्तान का ध्यान ही नहीं हुआ। यदि भामा इसकी चर्चा करती तो वह टाल जाते। कहते मुझे संतान की इच्छा नहीं। मुझसे यह बोझ न सँभलेगा। अभी तक सन्तान की आशा थी, इसलिये अधीर नहीं होते थे। लेकिन जब चौथा साल भी यों ही कट गया तो उन्हे कुछ निराशा होने लगी। मन में चिंता उपस्थित हुई, क्या सचमुच में निस्सन्तान ही रहूँँगा? ज्यों ज्यों दिन गुजरते थे यह चिंता बढ़ती जाती थी। अब उन्हे अपना जीवन कुछ शून्य सा मालूम होने लगा सुभद्रा से वह प्रेम न रहा, सुभद्रा ने इसे ताड़ लिया। उसे दु:ख तो हुआ, पर इसे अपने कर्मो का फल समझकर उसने संतोष किया। पद्मसिंह अपने को बहुत समझाते कि तुम्हें सन्तान लेकर क्या करना हैं? जन्म से लेकर पचीस वर्ष की आयु तक उसे जिलाओ, खिलाओ, पढ़ाओ तिसपर भी यह शंका ही लगी रहती है कि यह किसी ढंग की भी होगी या नहीं। सिकल उबर फेर दी। वह शान्ता के विषय मे इसी समय कुछ न कुछ निश्चय कर लेना चाहते थे। उन्हें भय था कि कहीं विलव होने से यह जोश ठण्डा न पड़ जाय। कुँवरसाहब के यहाँ ग्वालियर से एक जलतरंग बजानेवाला आया हुआ था। उसी का गाना सुनने के लिए आज उन्होंने अपने मित्रों को निमंत्रित किया था। पद्मसिंह वहाँ पहुँचे तो विट्ठलदास और प्रोफेसर रमेशदत्त में उच्चस्वर से विवाद हो रहा था और कुंवरसाहब, पंण्डित प्रभाकरराव तया सैयद तेगअली बैठे हुए बटेरो की इस लड़ाई का तमाशा देख रहे थे। शर्माजी को देखते ही कुँवरसाहब ने उनका स्वागत किया। बोले, आइये, आइये, देखिए यहाँ घोर संग्राम हो रहा है, किसी तरह इन्हें अलग कीजिये नहीं तो ये लड़ते-लड़ते मर जायेंगे। इतने में प्रोफेसर रमेशदत्त बोले, थियासोफिस्ट होना कोई गाली नहीं है। मैं थियासोफिस्ट हूँ और इसे सारा शहर जानता है। हमारे ही समाज के उद्योग का फल है कि आज अमेरिका, जर्मनी ,रूस इत्यादि देशों में आापको राम और कृष्ण के भक्त और गीता, उपनिषद् आदि सदग्रन्थों के प्रेमी दिखाई देने लगे है। हमारे समाज ने हिन्दू जाति का गौरव बैठा दिया है उसके महत्व को प्रसारित कर दिया है और उसे उस उच्चासन पर बिठा दिया है जिसे वह अपनी अकर्मण्यता के कारण कई शताब्दियों से छोड़ बैठी थी। यह हमारी परस कृतघ्नता होगी अगर हम उन लोगों का यश न स्वीकार करें, जिन्होंने अपने दीपक हमारे अन्धकार को दूर करके हमें वह रत्न दिखा दिये है जिन्हें देखने की हम सामर्थ्य न थी। वह दीपक व्लावेट्स्की का हो, या आल्कट का या किसी अन्य पुरुष का, हमें इससे कोई प्रयोजन नहीं। जिसने हमारा अन्धकार मिटाया हो उसका अनुग्रहीत होना हमारा कर्तव्य है, अगर आप इसे गुलामी कहते है तो यह आपका अन्याय है। विट्ठठलदास ने इस कथन को ऐसे उपेक्ष्य भाव से सुना मानो वह कोई निरर्थक बकवाद है और बोले, इसी का नाम गुलामी है, बल्कि गुलाम तो एक प्रकार से स्वतंत्र होता है, उसका अधिकार शरीर पर होता है, आत्मापर नहीं। आप लोगों ने तो अपनी आत्मा ही को बेच दिया है। आपकी अंगरेजी शिक्षा ने आपको ऐसा पददलित किया है कि जबतक यूरोप का कोई विद्वान किसी विषय के गुण दोष प्रकट न करे तब तक आप उस विषय की ओर से उदासीन रहते है। आप उपनिषदों का आदर इस लिये नहीं करते कि वह स्वयं आदरणीय है बल्कि इसलिये करते है कि व्लावेट्स्की और मैक्समूलर ने उनका आदर किया है। आप में अपनी बुद्धि से काम लेने की शक्ति का लोप हो गया है। अभी तक आप तान्त्रिक विद्या की बात भी न पूछते थे। अब जो यूरोपीय विद्वानों ने उसका रहस्य खोलना शुरू किया तो आपको अब तन्त्रों मे गुण दिखाई देते है। यह मानसिक गुलामी उस भौतिक गुलामी से कहीं गई गुजरी है। आप उपनिषदों को अग्रेंजी में पढ़ते है, गीता को जर्मन मे अर्जुन को अर्जुना कृष्ण को कृशना कहकर अपनी स्वभाषा ज्ञान का परिचय देते है। आपने इसी मानसिक दासत्व के कारण उस क्षेत्र में अपनी पराजय स्वीकार कर ली, जहाँ हम अपने पुरुष की प्रतिभा और प्रचण्ड़ता से चिरकाल तक अपनी विषय पताका फहरा सकते थे। रमेशदत्त इसका कुछ उत्तर देना ही चाहते थे कि कुंवर साहब बोल उठे मित्रों! अब मुझसे बिना बोले नहीं रहा जाता। लाला साहब, आप अपने इस ‘गुलामी' शब्द को वापस लीजिये। विठ्ठल-क्यों वापस लूँ? कुंवर -आपको इसके प्रयोग करने का अधिकार नहीं है। विट्ठल—मेरा आशय यह है कि हममे कोई भी दूसरों को गुलाम कहने का अधिकार नहीं रखता। अंधों के नगर में कौन किसको अन्धा कहेगा? हम सबके सब राजा हो या रंक, गुलाम है। हम अगर अपढ़ निर्धन गंवार है तो थोड़े गुलाम है, हम अपने राम का नाम लेते है।, अपनी धोती पगड़ी का व्यवहार करते है, अपनी बोली बोलते हैं, अपनी गाय पालते है और अपनी गंगा में नहाते है, और हम यदि विद्वान, उन्नत ऐश्वर्यवान है तो बहुत गुलाम है, जो विदेशी भाषा बोलते है, कुत्तें पालते हैं और अपने देशवासियों को नीच समझते हैं, सारी जाति इन्हीं दो भाग में विभक्त है। इसलिये कोई किसी को गुलाम नहीं कह सकता। गुलामी के मानसिक, आत्मिक, शारीरिक आादि विभाग करना भ्रंतिकारक है। गुलामी केवल आत्मिक होती है, और दशाएँ इसी के अन्तर्गत है? मोटर बंगले, पोलो और प्यानो यह एक एक वेड़ी के तुल्य है। जिसने इन बेडियों को नहीं पहना उसी को सच्ची स्वाधीनता का आनन्द प्राप्त हो सकता है, और आप जानते है वह कौन लोग हैं? वह दीन कृषक है जो अपने पसीने की कमाई खाते है, अपने जातीय भेष, भाषा और भावका आदर करते है और किसी के सामने सिर नहीं झुकाते। प्रभाकराव ने मुस्कराकर कहा, आपको कृपक बन जाना चाहिये। कुंवर तो अपने पूर्वजन्म कुकर्मो को कैसे भोगूँगा? बड़े दिन में मेवे की डालियाँ कैसे लगाऊँगा? सलामी के लिये खानसामा की खुशा मद कैसे करूँगा? उपाधि के लिये नैनीताल के चक्कर कैसे लगाऊँगा? डिनर पार्टी देकर लेडियों कुत्तों को कैसे गोद में उठाऊँगा? देवताओं को प्रसन्न और संतुष्ट करने के लिये देशहित के कार्यों में असम्मति कैसे दूँगा? यह सब मानव अध पतन की अन्तिम अवस्थाएँ हैं। उन्हें भोग किये बिना मेरी मुक्ति नहीं हो सकती। (पद्मसिंह से) कहिये शर्मा जी, आपका प्रस्ताव बोर्ड में कब आयेगा? आप आजकल कुछ उत्साहहीन से दीख पड़ते है। क्यों, इस प्रस्ताव को भी कहीं गति होगी जो हमारे अन्य सा सार्वजनिक कार्यों की हुआ करती है? इधर कुछ दिनों से वास्तव में पद्मसिंह का उत्साह कुछ क्षीण हो गया था। ज्यो-ज्यों उसके पास होने को आशा बढ़ती थी, उनका अविश्वास भी बढ़ता जाता था, विद्यार्थी की परीक्षा जबतक नहीं होती वह उसी की तैयारी में लगा रहता है, लेकिन परीक्षायें उत्तीर्ण हो जाने के बाद भावी जीवन-संग्राम की चिन्ता उसे हतोत्साह कर दिया करती है। उसे अनुभव होता है कि जिन साधनों से अबतक मैंने सफलताा प्राप्त की है वह इस नये, विस्तृत, अगम्य क्षेत्र में अनुपयुक्त है। वही दशा इस समय शर्मा जी की थी। अपना प्रस्ताव उन्हे कुछ व्यर्थ-सा मालूम होता था। व्यर्थ ही नहीं कभी कभी उन्हें उससे लाभ के बदले हानि होने का भय होता था। लेकिन वह अपने संदेहात्मक विचारों को प्रकट करनेका साहस न कर सकते थे; कुँवरसाहब की ओर विश्वासपूर्ण दृष्टि से देखकर बोले, जी नहीं, ऐसा तो नहीं है, हाँ आजकल फुर्सत न रहने से वह काम जरा धीमा पड़ गया है। कुँवर-—उसके पास होने में तो अब कोई बाधा नहीं है? पद्मसिंह ने तगअली की तरफ देखकर कहा मुसलमान मेम्बरों का ही भरोसा है। तेगअली ने मार्मिक भाव से कहा, उनपर एतमाद करना रेत पर दीवार बनाना है। आपको मालूम नहीं, वहाँ क्या चाले चली जा रही है? अजब नहीं है कि वह ऐन वक्त पर धोखा दे। पद्मसिंह- मुझे तो ऐसी आशा ही है। तेगअली यह आपकी शराफत है। वहाँ इस वक्त, उर्दू हिन्दी का झगड़ा, गोकशोका मसला, जुदागाना इन्तखाब, सूद का मुआविज कानून, इन सबों से मजहबी तास्सुव के भड़काने में मदद ली जा रही है। प्रभाकराव-—सेठ बलभद्रदास न आवेगे क्या, किसी तरह उन्हीं को समझाना चाहिये। कुँवर-—मैंने उन्हें निमन्त्रण ही नहीं दिया, क्योंकि मैं जानता था कि कदापि न आयेंगे। वह मतभेद को वैमनस्य समझते हैं। हमारे प्रायः सभी नेताओं का यही हाल है। यही एक विषय है, जिसमे उनकी सजीवता प्रकट होती है। आपका उनसे जरा भी मतभेद हुआ और वह आपके जानी दुश्मन हो गये, आपसे बोलना तो दूर रहा आपकी सूरत तक न देखेंगे, बल्कि अवसर पायेगे तो अधिकारियों से आपकी शिकायत करेगें अपने मित्रों की मंडली मे आपके रीति व्यवहार की आचार-विचार, आलोचना करेगें आप ब्राह्मण है तो आपको भिक्षुक कहेगे क्षत्रिय हैं तो आपको उजड्ड गंवार कहेगें। वैश्य हैं तो आपको बनिये, डण्डी तौल की पदवी मिलेगी और शूद्र है तब तो आप बने बनाये चाण्डाल हैं ही। आप अगर गाने से प्रेम रखते हैं तो आप दुराचारी है, आप सत्संगी है तो आपको तुरन्त ‘बछिया के ताऊ' की उपाधि मिल जायगी। यहाँ तक कि आापकी माता और स्त्री पर भी निन्दास्पद आक्षेप किये जायेंगे। हमारे यहाँ मतभेद महापाप है और उसका कोई प्रायश्चित्त नहीं। अहा!वह देखिये, डाक्टर श्यामाचरण की मोटर आ गयी। डाक्टर श्यामाचरण मोटर से उतरे और उपस्थित सज्जनों की ओर देखते हुए बोले, I am sorry. I was late. कुँवर साहब ने उनका स्वागत किया। औरों ने भी हाथ मिलाया और डाक्टरसाहब एक कुर्सी पर बैठकर बोले-When is the performance going to begin! कुँवर-डाक्टर साहब, आप भूलते है, यह काले आदमियों का समाज हैं। डाक्टर साहब ने हँसकर कहा, मुआफ कीजियेगा, मुझे याद न रहा कि आपके यहाँ म्लेच्छों की भाषा बोलना मना है। कुँवर—लेकिन देवताओं के समाज में तो आप कभी ऐसी भूल नहीं करते। डाक्टर--तो महाराज उसका कुछ प्रायश्चित करा लीजिये। कुँवर—इसका प्रायश्चित्त यहीं है कि आप मित्रों से अपनी मातृभाषा-का व्यवहार किया कीजिये। डाक्टर-आप राजा लोग हैं, आपसे यह प्रण निभ सकता है हमसे इसका पालन क्योंकर हो सकता है? अंग्रेजी तो हमारी Lingua Franca (सार्वदेशिक भाषा) हो रही है। कुँवर--उसे आपही लोगों ने तो यह गौरव प्रदान कर रखा है। फारस और काबुल के मूर्ख सिपाहियों और हिन्दू व्यापारियों के समागम से उर्दू जैसी भाषा का प्रादुर्भाव हो गया। अगर हमारे देश के भिन्न- भिन्न प्रांतों के विद्वज्जन परस्पर अपनी ही भाषा में सम्भाषण करते तो अब तक कभी एक सार्वदेशिक भाषा बन गई होती। जबतक आप जैसे विद्वान् लोग अंग्रेजी के भक्त बने रहेंगे, कभी एक सार्वदेशिक भाषा का जन्म न होगा। मगर यह काम कष्ट-साध्य है, इसे कौन करे? यहाँ तो लोगों को अंग्रेजी जैसी समुन्नत भाषा मिल गयी, सब उसी के हाथों बिक गये। मेरी समझ में नहीं आता कि अंग्रेजी भाषा बोलने और लिखने में लोग क्यो अपना गौरव समझते है? मैंने भी अंग्रेजी पढ़ी है। दो साल विलायत रह आया हूँ और आपके कितने ही अंग्रेजी के धुरंधर पंडितों से अच्छी अंगेजी लिख और बोल सकता हूँ पर मुझे उससे ऐसी घृणा होती है जैसे किसी अंगेज के उतारे कपड़े पहनने से। पद्मसिंह ने इन वादों मे कोई भाग न लिया। ज्योंही अवसर मिला, उन्होंने विट्ठलदास को बुलाया और उन्हें एकान्त में ले जाकर शान्ता का पत्र दिखाया। विट्ठलदास ने कहा, अब आप क्या करना चाहते है? पद्म-मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आता। जबसे यह पत्र मिला है, ऐसा मालूम होता है मानो नदी में बहा जाता हूँ। विट्ठल--कुछ न कुछ करना तो पड़ेगा। पद्म-—क्या करूँ? विट्ठल--शान्ता को बुला लाइये। पद्म-—सारे घर से नाता टूट जायगा। विट्ठल- टूट जाय। कर्तव्य के सामने किसी का क्या भय? पद्म—यह तो आप ठीक कहते है, पर मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं। भैया को मैं अप्रसन्न करने का साहस नहीं कर सकता। विट्ठल-- अपने यहाँ न रखिये, विधवाश्रम रख दीजिये, यह तो कठिन नहीं। पद्म-- हाँ, यह आपने अच्छा उपाय बताया। मुझे इतना भी न सूझा था। कठिनाई में मेरी बुद्धि जैसे चरने चली जाती है। विट्ठल— लेकिन जाना आपको पड़ेगा। पद्म—यह क्यों, आपके जाने से काम न चलेगा? विट्ठल—भला उमानाथ उसे मेरे साथ क्यों भेजने लगे? पद्म—इसमे उन्हें क्या आपत्ति हो सकती है! विट्ठल— आप तो कभी-कभी बच्चों की सी बात करने लगते है। शान्ता उनकी बेटी न सही, पर इस समय वह उसके पिता है। वह उसे एक अपिरिचित मनुष्य के साथ क्यों आने देगे? पद्म— भाई साहब नाराज न हो, मैं वास्तव में कुछ बौखला गया हूँ। लेकिन मेरे चलने में तो बड़ा उपद्रव खड़ा हो जायगा। भैया सुनेंगे तो वह मुझे मार ही डालेंगे। जनवासे मे उन्होंने जो धक्का लगाया था वह अभी तक मुझे याद है। विट्ठल—अच्छा, आाप न जाइये, मैं ही चला जाऊँँगा। लेकिन उमानाथ के नाम एक पत्र दे देने में तो आपको कोई बाधा नहीं? पद्म—आप कहेंगे कि वह निरा मिट्टी का लोदा है, पर मुझसे इतना साहस भी नहीं है। ऐसी युक्ति बताइये कि कोई अवसर पड़े तो मैं साफ निकल जाऊँँ। भाई साहब को मुझपर दोषारोपण का मौका न मिले। विट्ठलदास ने झुंझलाकर उत्तर दिया, मुझे ऐसी युक्ति नहीं सूझती। भलेमानुस,आप भी अपने को मनुष्य कहेगे। कहाँ तो वह धुँँआधार व्याख्यान देते है, ऐसे उच्च भावों से भरा हुआ मानो मुक्तात्मा है और कहाँ यह भीरुता। पद्मसिंह ने लज्जित होकर कहा, इस समय जो चाहे कह लीजिये, पर इस काम का सारा भार आपके ऊपर रहेगा। विठ्ठल—अच्छा, एक तार तो दे दीजियेगा, या इतना भी न होगा? पद्म—(उछलकर) हाँ, मैं तार दे दूँँगा। मैं तो जानता था कि आप कोई राह निकालेंगे! अगर कभी बात आ पड़ी तो मैं कह दूँगा कि मैने तार नहीं दिया, किसी ने मेरे नाम से दे दिया होगा। मगर एक ही क्षण में उनका विचार पलट गया। अपनी आत्मभीरुता पर लज्जा आई। मन में सोचा, भाई साहब ऐसे मूर्ख नहीं है कि इस धर्म — कार्य के लिये मुझसे अप्रसन्न हो और यदि हो भी जायँ तो मुझे इसकी चिन्ता न करनी चाहिये। विट्ठल — तो आज ही तार दे दीजिये। पद्म — लेकिन यह सरासर जालसाजी होगी। विट्ठल — हाँ, होगी तो, आप ही समझिये। पद्म — मैं ही चलूँँ तो कैसा हो? विट्ठल — बहुत ही उत्तम, सारा काम ही बन जाय। पद्म — अच्छी बात है, मैं और आप दोनों चले। विट्ठल — तो कब? पद्म — बस, आज तार देता हूँ कि हम लोग शान्ता को विदा कराने आ रहे है, परसो सन्ध्या की गाड़ी से चले चले। विट्ठल — निश्चय हो गया? पद्म — हाँ निश्चय हो गया। आप मेरा कान पकड़कर ले जाइयेगा। विट्ठलदास ने अपने सरल-हदय मित्र की ओर प्रशंसा की दृष्टि से देखा और दोनो मनुष्य जलतरंग सुनने जा बैठे, जिसकी मनोहर ध्वनि आकाश में गूँज रही थी। ४१ जब हम स्वास्थ्यलाभ करने के लिये किसी पहाड़पर जाते है तो इस बात का विशेष यत्न करते है कि हमसे कोई कुपथ्य न हो। नियमितरूपसे व्यायाम करते है, आरोग्य का उद्देश्य सदैव हमारे सामने रहता है। सुमन विधवाश्रम में आत्मिक स्वास्थ्यलाभ करने गई थी और अभीष्ट को एक क्षण के लिये भी न भूलती थी। वह अपनी अन्य बहनो की सेवा में तत्पर रहती और धार्मिक पुस्तके पढ़ती। देवोपासना, स्नानादि में उसके व्यथित हृदय को शान्ति मिलती थी। विट्ठलदास ने अमोला के समाचार उससे छिपा रखे थे, लेकिन जब जायगी। उसे मुँँह दिखाने की अपेक्षा गंगाकी गोद में मग्न हो जाना कितान सहज था। अकस्मात् उसने देखा कि कोई आदमी उसकी तरफ चला आ रहा है। अभी कुछ-कुछ अंधेरा था, पर सुमन को इतना मालूम हो गया कि कोई साधु है। सुमन की उँगुली में एक अँगूठी थी। उसने उसे साधु को दान करने का निश्चय किया, लेकिन वह ज्यों ही समीप आया, सुमने भय, घृणा और लज्जा से अपना मुँँह छिपा लिया। यह गजाधर थे। सुमन खड़ी थी और गजाघर उसके पैरो पर गिर पड़े और रुद्ध कण्ठ से बोले, मेरे अपराध क्षमा करो। सुमन पीछे हट गई, उसको आँँखो के सामने अपने अपमान का दृश्य खिंंच गया। घाव हरा हो गया। उसके जी में आया कि इसे फटकारूँ, कहूँ कि तुम मेरे पिता के घातक, मेरे जीवन के नाश करने वाले हो, पर कुछ गजाधर की अनुकम्पापूर्ण उदारता, कुछ उसका साधु वेश और कुछ विराग भावने, जो प्राणघातका संकल्प कर लेने के बाद उदित हो जाता है, उसे द्रवित कर दिया। उसके नयन सजल हो गये, करुण स्वर से बोली, तुम्हारा कोई अपराध नहीं है, जो कुछ हुआ वह सब मेरे कर्मों का फल था। गजाधर—नहीं सुमन, ऐसा मत कहो, यह सब मेरी मूर्खता और अज्ञानताका फल है। मैंने सोचा था कि उसका प्रायश्चित कर सकूंंगा, पर अपने अत्याचारका भीषण परिणाम देखकर मुझे विदित हो रहा है कि उसका प्राश्चित नहीं हो सकता। मैंने इन्ही आँँखो से तुम्हारे पूज्य पिता को गगा में लुप्त होते देखा है। सुमन ने उत्सुक भाव से पूछा, क्या तुमने पिताजी को डूबते देखा है। गजाधर-सुमन, डूबते देखा। मैं रातो को अकेला जा रहा था, मार्ग में वह मुझे मिल गये। मुझे अर्द्ध रात्रि के समय उन्हें गगाकी ओर जाते देखकर संदेह हुआ। उन्हें अपने स्थान पर लाया और उनके हृदय को शान्त करनेकी चेष्टा की। फिर यह समझकर कि मेरा मनोरथ पूरा हो गया, मैं सो गया। थोड़ी देर में जब उठा तो उन्हे वहाँ न देखा। तुरन्त गंगातटकी ओर दौड़ा। उस समय मैंने सुना कि वह मुझे पुकार रहे है, पर जब तक मैं यह निश्चय कर सकूँ कि वह कहाँ है उन्हें निर्दयी लहरो ने ग्रस लिया! यह दुर्लभ आत्मा मेरी आँखों के सामने स्वर्ग धाम को सिवारी। तब तक मुझे मालूम न था कि मेरा पाप इतना घोरतम है वह अक्षम्य है, अदंडय है। मालूम नहीं, ईश्वर के यहाँ मेरी क्या गति होगी? गजाधर की आत्मवेदना ने सुमन के हृदय पर वही काम किया, जो साबुन मैल के साथ करता है। उसने जमे हुए मालिन्य को काटकर ऊपर कर दिया। वह सचित भाव ऊपर आ गये जिन्हे वह गुप्त रखना चाहती थी। बोली, परमात्मा ने तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान कर दी है। तुम अपनी सुकीर्ति से चाहे कुछ कर भी लो, पर मेरी क्या गति होगी, मैं तो दोनों लोको से गई। हाय! मेरी विलास-तृष्णा ने मुझे कहीं का न रखा। अब क्या छिपाऊँ, तुम्हारे दारिद्रय और इससे अधिक तुम्हारे प्रेमविहीन व्यवहार ने मुझमे असतोषका अकुर जमा दिया और चारों ओर पाप जीवन की मान मर्यादा, सुख विलास देखकर इस अकुर ने बढते-बढ़ते भटकटैय के सदृश सारे हृदय को छा लिया। उस समय एक फफोलेको फोड़ने लिये जरासी ठेस भी बहुत थी। तुम्हारी नम्रता, तुम्हारा प्रेम, तुम्हारी सहानुभूति, तुम्हारी उदारता उस फफोलेपर फहेका काम देती, पर तुमने उसे मसल दिया, मे पीड़ा से व्याकुल, सशाहीन हो गई। तुम्हारे उस पाशविक पैशाचिक व्यवहार का जब स्मरण होता है तो हृदय में एक ज्वाला सी दहकने लगती है और अन्त.करण से तुम्हारे प्रति शाप निकल आता है। यह मेरा अंतिम समय है, एक क्षण में यह पापमय शरीर गंगामे डूब जायगा, पिताजी की शरण में पहुँच जाऊँगी, इसलिये ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि तुम्हारे अपराधो को क्षमा करे। गजाधर ने चिंतित स्वर मे कहा, सुमन, यदि प्राण देने से पापों का प्रायश्चित्त हो जाता तो में अबतक कभी प्राण दे चुका होता। सुमन—कम से कम दुखो का तो अन्त हो जायगा। गजाधर—हाँ, तुम्हारे दुखो का अन्त हो सकता है, पर उनके दुखों का अन्त न होगा जो तुम्हारे दुखों में दुखी हो रहे हैं। तुम्हारे माता पिता शरीर के बन्धन से मुक्त हो गये है, लेकिन उनकी आत्माएँ अपनी बिदेहावस्था में तुम्हारे पास विचर रही है। वह अभी तुम्हारे मुख से सुखी और दुःख से दुखी होगे। सोच लो कि प्राणघात करके उनको दुख पहुँचाओगी या अपना पुनरुद्धार करके उन्हें सुख और शान्ति दोगी। पश्चात्ताप अंतिम चेतावनी है। जो हमें आत्म-सुधार के निमित्त ईश्वर की ओर से मिलती है। यदि इसका अभिप्राय न समझकर हम शोकावस्था में अपने प्राणों का अन्त कर दे तो मानो हमने आत्मोद्घार की इस अंतिम प्रेरणा को भी निष्फल कर दिया। यह भो सोचो कि तुम्हारे न रहने से उस अवला शान्ता की क्या गति होगी, जिसने अभी संसार के ऊँँच नीच का कुछ अनुभव नहीं किया है, तुम्हारे सिवा उसका संसार में कौन है? उमानाथ का हाल तुम जानती ही हो, वह उसका निर्वाह नहीं कर सकते।उनमें दया है, पर लोभ उससे अधिक है। कभी न कभी वह उससे अवश्य ही अपना गला छुड़ा लेगे। उस समय वह किसकी होकर रहेगी। सुमन को गजाधर के इस कथन में सच्ची समवेदना की झलक दिखाई दी। उसने उनकी ओर नीचतासूचक दृष्टी से देखकर कहा, शान्ता से मिलने की अपेक्षा मुझे प्राण देना सहज प्रतीत होता है। कई दिन हुए उसने पद्मसिंह के पास एक पत्र भेजा था। उमानाथ उसका कहीं और विवाह करना चाहते है। वह इसे स्वीकार नहीं करती। गजाधर-देव हैं! सुमन-शर्मा जी बेचारे और क्या करते है? उन्होंने निश्चय किया है कि उसे बुलाकर आश्रम में रमे। अगर उनके भाई मान जायेगे तब तो अच्छा ही है, नहीं तो उन दुखिया को न जाने कितने दिनों तन आश्रम में रहना पड़ेगा। वह कल यहाँँ आ जायगी। उसके सम्मुख जाने का भय, उससे आँँख मिलने की लज्जा मुझे मार डालती है। जब वह तिरस्का की आँँखो से मुझे देखेगी, उस समय में क्या करूँगी? और जो कहीं उसने घुणा वश मुझसे गले मिलने मे संकोच किया, तब तो मैं उसी क्षण विष खा लूँँगी। इस दुर्गति से तो प्राण दे देना अच्छा है। गजाधार ने सुमन को श्रद्धाभाव से देखा, उन्हें अनुभव हुआ कि ऐसी अवस्था में भी वही करता जो सुमन करना चाहती है। बोले, सुमन तुम्हारे यह विचार यथार्थ है, पर तुम्हारे हृदय पर चाहे जो कुछ बीते, शान्ता के हित के लिये ततुम्हें सब कुछ सहना पड़ेगा। तुमसे उसका जितना कल्याण हो सकता है उतना अन्य किसी से नहीं हो सकता।अबतक तुम अपने लिये जीती थीं, अब दूसरो के लिये जीओ। यह कह गजाधर जिधर से आये थे उधर ही चले गय। सुमन गंगाजी के तटपर देरतक खड़ी उनकी बातों पर विचार करती रही, फिर स्नान करके आश्रम की ओर चली, जैसे कोई मनुष्य समर से परास्त होकर घर की ओर जाता है। ४२ शान्ता ने पत्र तो भेजा, पर उसको उत्तर आने की कोई आशा न थी। तीन दिन बीत गये, उसका नैराश्य दिनों दिन बढ़ता जाता था। अगर कुछ अनुकूल उत्तर न आया तो उमानाथ अवश्य ही उसका विवाह कर देगे, यह सोचकर शान्ता का हृदय थरथराने लगता था। वह दिन में कई बार देवी के चबूतरेपर जाती और नाना प्रकार की मनौतियाँ करती। कभी शिवजी के मन्दिर में जाती और उनसे अपनी मनोकामना कहती। सदन एक क्षण के लिये भी उसके ध्यान से न उतरता। वह उसकी मूर्ति को हृदय ने त्रोके सामने बैठाकर उससे कर जोड़कर कहती, प्राणनाथ, मुझे क्यों नहीं अपनाते? लोक निन्दा के भय से। हाय, मेरी जान इतनी सस्ती है कि इन दामों विके। तुम मुझे त्याग रहे हो, आग में झोक रहे हो, केवल इस अपराध के लिये कि मैं सुमन की बहन हूँ। यही न्याय है। कहीं तुम मुझे मिल जाते, मैं तुम्हें पकड़ पाती, फिर देखती कि मुझसे कैसे भागते हो? तुम पत्थर नहीं हो कि मेरे आँसुओं से न पसीजते। तुम अपनी आँखों से एक बार मेरी दशा देख लेते तो फिर तुमसे न रहा जाता। हाँ, तुमसे कदापि न रहा जाता। तुम्हारा विशाल हृदय करुणा शून्य नहीं हो सकता। क्या करूँ तुम्हें अपने चित्तकी दशा कैसे दिखाऊँ। चौथे दिन प्रात काल पद्मसिंह का पत्र मिला। शान्ता भयभीत हो गई। उसको प्रेमाभिलापाएँ शिथिल पड़ गई। अपनी भावी दशा की शंकाओं ने चित्त को अशान्त कर दिया। लेकिन उमानाथ फूले न समाये। बाजे का प्रबन्ध किया। सवारियाँ एकत्रित की, गाँव भर में निमन्त्रण भेजे, मेहमानों के लिये चौपाल में फर्श आदि बिछवा दिये। गाँवे के लोग चकित थे, यह कैसा गौना है? विवाह तो हुआ ही नहीं गौना कैसा? वह समझते थे कि उमानाथ ने कोई न कोई चाल खेली है। एक ही धूर्त है। निर्दिष्ट समय पर उमानाथ स्टेशन गये और बाजे बजवाते हुए मेहमानों को अपने घर लाये। चौपाल में उन्हें ठहराया। केवल तीन आदमी थे। पद्मसिंह विट्ठलदास और एक नौकर। दूसरे दिन सन्ध्या समय विदाई का मुहूर्त था, तीसरा पहर हो गया किन्तु उमानाथ घर में गाँव की कोई स्त्री नहीं दिखाई देती। वह बार-बार अन्दर आते है, तेवर बदलते हैं, दीवारो को धमकाकर कहते है, में एफ-एक की देख लूँगा। जान्हवी से बिगड़कर कहते है कि मैं सबकी खबर लूँगा। लेकिन वह धमकियाँ जो कभी नबरदारों को कंपायामान कर दिया करती थी, आज किसी पर असर नहीं करती। बिरादरी अनुचित दबाव नहीं मानती है घमण्डियों का सिर नीचा करने के लिये वह ऐसे ही अवसरों की ताक में रहती है। सन्ध्या हुई। कहा रोने पालकी द्वारपर लगा दी। जान्हवी और शान्ता गले मिलकर खूब रोई। शान्ता का हृदय प्रेम से परिपूर्ण था, इस पर उसे जो जो कष्ट उठाने पड़े थे वह इस समय भूल गये थे। इन लोगों से फिर भेट न होगी इस घर के अब फिर दर्शन न होंगे, इनसे सदैव के लिये नाता टूटता है, यह सोचकर उसका हृदय विदीर्ण हुआ जाता था। जान्हवी का हृदय भी दया से भरा हुआ था। इस माता-पिता विहीन बालिका को हमने बहुत कष्ट दिये यह सोचकर वह अपने आँसुओंको न रोक सकती थी। दोनों के हृदय में सच्चे, निर्मल, कोमल भावो की तरंगे उठ रही थी। उमानाथ घर में आये तो शान्ता उनके पैरो से लिपट गई और विनय करती हुई कहने लगी, तुम्हीं मेरे पिता हो, अपनी बेटी को भूल न जाना, मेरी बहनों को गहने-कपड़े देना, होली और तीज में उन्हें बुलाना, पर मैं तुम्हारे दो अक्षरो के पत्र को ही अपना धन्यभाग्य समझूँगी। उमानाथ ने उसको संबोधन करते हुए कहा, बेटी, जैसी मेरी और दो बेटियाँ हैं। वैसी हो तुम भी हो, परमात्मा तुम्हें सदा सुखी रखे। यह कह कर रोने लगे। सन्ध्या का समय था, मुन्नी गाय घर में आई तो शान्ता उसके गले लिपटकर रोने लगी। उसने तीन-चार वर्ष उस गाय की सेवा की थी। अब वह किसे भूसी लेकर दौड़गी? किसके गले में काले डोरे में कौड़ियाँ गूथकर पहनावेगी? मुन्नी सिर झुकाये उसके हाथो को चाटती थी। उसका वियोग दुख उसकी आँखों से झलक रहा था। जान्हवी ने शान्ता को लाकर पालकी में बैठा दिया, कहारोने पालकी उठाई। शान्ता को ऐसा मालूम हुआ कि मानों वह अथाह सागर मे वहीं जा रही है। गाँव की स्त्रियाँ अपने द्वारों पर खड़ी पालकी को देखती थी और रोती थीं। उमानाथ स्टेशन तक पहुँचाने आये। चलते समय अपनी पगड़ी उताकर उन्होंने पद्मसिंह पौरो पर रख दी। पद्मसिंह ने उनको गले से लगा लिया। जब गाड़ी चली तो पद्मसिंह ने विट्लदास से कहा, अब इस अभिनयका सबसे कठिन भाग आ गया। बिट्ठल——मैं नहीं समझा। पद्म——क्या शान्ता से कुछ कहे सुने बिना ही उसे आश्रम में पहुँचा दीजियेगा। उसे पहले उसके लिये तैयार करना चाहिये। विट्ठल——हाँ, यह आपने ठीक सोचा, तो जाकर कह दूँ? पद्म——जरा सोच तो लीजिये, क्या कहियेगा? अभी तो वह यह समझ रही है कि ससुराल में जा रही हूँ। वियोग के दु:ख मे यह आशा उसे सँभाले हुए है। लेकिन जब उसे हमारा कौशल ज्ञात हो जायगा तो उसे कितना दुःख होगा? मुझे पछतावा हो रहा है कि मैंने पहले ही वे बाते क्यों न कह दी? विट्ठल——तो अब कहने में क्या बिगड़ा जाता है? मिर्जापुर में गाड़ी देर तक ठहरेगी, मैं जाकर उसे समझा दूँगा। पद्म——मुझसे बड़ी भूल हुई। विट्ठल——तो उस भूलपर पछताने से अगर काम चल जाय तो जी भरकर पछता लीजिये। पद्म——आपके पास पेन्सिल हो तो लाइये, एक पत्र लिखकर सब समाचार प्रकट कर दूँ। विट्ठल——नहीं तार दे दीजिये, यह और भी उत्तम होगा। आप विचित्र जीव है, सीधी-सी बात में भी इतना आगा पीछा करने लगते है। पद्म—— समस्या ही ऐसी आ पड़ी है, मैं क्या करुँ? एक बात मेरे ध्यान में आती है, मुगलसराय में देर तक रुकना पड़ेगा, बस वही उसके पास जाकर सब वृत्तांत कह दूँगा। विट्ठल——यह आप बहुत दूर की कौड़ी लाये, इसलिये बुद्धिमानों ने कहा है कि कोई काम बिना भली भाँति सोचे नहीं करना चाहिये। आपकी बुद्धि ठिका ने पर पहुँचती है, लेकिन बहुत चक्कर खाकर। यही बात आपको पहले न सूझी। शान्ता डचौढे दरजे के जनाने कमरे में बैठी हुई थी। वहाँ दो ईसाई लेडियाँ ओर बैठी थी। वे शान्ता को देखकर अग्रेजी में बाते करने लगी। "मालूम होता है यह कोई नवविवाहिता स्त्री है।” "हाँ, किसी ऊँचे कुलकी है। ससुराल जा रही है।” "ऐसी रो रही है मानों कोई ढकेले लिये जाता हो।” “पतिकी अभीतक सूरत न देखी होगी, प्रेम कैसे हो सकता है। भय से उसका हृदय काँप रहा होगा।” "यह इनके यहाँ अत्यत निकृष्ट रिवाज है। बेचारी कन्या एक अनजान घर में भेज दी जाती है, जहाँ कोई उसका अपना नहीं होता।” "यह सब पाशविक कालकी प्रथा है, जब स्त्रियों को बलात् उठा ले जाते थे।" "क्यो बाईजी, (शान्ता से) ससुराल जा रही हो?” शान्ता ने धीरे से सिर हिलाया। "तुम इतनी रूपवती हो, तुम्हारा पति भी तुम्हारे जोड़ का है?" शान्ता ने गंभीरता से उत्तर दिया, पति की सुन्दरता नहीं देखी जाती। "यदि वह काला-कलूटा हो तो?” शान्ता ने गर्व से उत्तर दिया, हमारे लिये वह देवतुल्य है, चाहे कैसा ही हो। अच्छा, मान लो तुम्हारे ही सामने दो मनुष्य लाये जायें, एक रूपवान हो, दूसरा कुरूप, तो तुम किसे पसन्द करोगी? शान्ता ने दृढता से उत्तर दिया, जिसे हमारे माता-पिता पसन्द करें। शान्ता समझ रही थी कि यह दोनों हमारी विवाह-प्रथा पर आक्षेप कर रही है। थोडी देर के बाद उसने उनसे पूछा, मैंने सुना है आप लोग अपना पति खुद चुन लेती है? "हाँ, हम इस विषय में स्वतन्त्र है।" "आप अपने को माँ-बाप से बुद्धिमान समझती है?" वेश्याओं का नाच कराने के लिये एक भारी टैक्स लगाया जाय, और ऐसे जलसे किसी हालत में खुले स्थानों में न हो। प्रोफेसर रमेशदत्त ने उसका समर्थन किया। मैयद शफकतअली (प० डिप्टो० कले) ने कहा——इस तज-वोज में मुझे पूरा इत्तफाक है, लेकिन बगैर मुनासिब तरमीम के मैं इस तसलीम नहीं कर सकता। मेरी राय है कि रिज्योलूशन के पहले हिस्से में यह अल्फाज बढ़ा दिये जायें——वइस्तसनाय उनके जो नौ माह के अन्दर या तो अपनी निकाह कर ले, या कोई हुनर सीख ले, जिससे बह जायज तरीके पर जिन्दगी बसर कर सके। कुँवर अनिरुद्ध सिंह बोले, मुझे इस तरमीम से पूरी सहानुभूति है। हमें वेश्याओं का पतित समझने का कोई अधिकार नहीं है, यह हमारी परम घप्टता है। हम रात-दिन जो रिश्वते लेते हैं, सूद खाते है, दीनों का ‘रक्त चूसते है, असहायों का गला काटते हैं, कदापि इस योग्य नहीं है कि समाज के किसी अगको नीच या तुच्छ समझे। सबसे नीच हम है, सबसे पापी, दुराचारी, अन्यायी हम है जो अपने काे शिक्षित, सभ्य, उदार, सच्चा समझते है। हमारे शिक्षित भाइयों ही की बदौलत दालमण्डी आवाद है, चाैक में चहल-पहल है, चकलों में रौनक है। यह मीना-बाजार हम लोगों ही ने सजाया है, ये चिड़ियाँ हम लोगों ने ही फँसाई है, ये कठपुतलियाँ हमने बनाई है। जिस समाज से अत्याचारी जमीदार, रिश्वती राज्य-कर्मचारी, अन्यायी महाजन, स्वार्थी बन्धु अदर और सम्मान के पात्र हो, वहाँ दालमण्डी क्यों न आबाद हो? हराम का धन हरामकारी के सिवा और कहाँ जा सकता है? जिस दिन नजराना, रिश्वत और सूद-दर-सूदका अन्त होगा, उसी दिन दालमण्डी उजड़ जायगी, वे चिड़ियाँ उड़ जायेंगी-पहले नहीं। मुलय प्रस्ताव इस तरमीम के बिना नश्तरका वह घाव है जिसपर मरहम नहीं। मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता। प्रभाकर राव ने कहा, मेरी समझमें नहीं आता कि इस तरमीमका रिज्योल्यूशन से क्या संबध है? इसको आप अलग दूसरे प्रस्ताव के रूप में पेश कर सकते है। सुधार के लिए आप जो कुछ कर सके वह सर्वथा प्रशस-नीय है, लेकिन यह काम बस्ती से हटाकर भी उतना हो आसान है जितना शहर के भीतर, बल्कि वहाँ वह सुविधा अधिक हो जायगी। अबुलवफा ने कहा, मुझे इस तरमीम से पूरा इत्तफाक है। अब्दुल्लतीफ बोले, बिला तरमीम के मे रिज्योल्यूशन को कभी कबूल नहीं कर सकता। दीनानाथ तिवारी ने भी तरमीम पर जोर दिया। पद्मसिंह बोले, इस प्रस्ताव से हमारा उद्देश्य वेश्याओं को कष्ट देना नहीं वरन् उन्हें सुमार्ग पर लाना है, इसलिये मुझे इस तरमीम के स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। सैयद तेगअली ने फरमया, तरमीम से असल तजबीज का मशा फौत हो जान का खौफ है। आप गोया एक मकान का सदर दरवाजा बन्द करके पीछे की तरफ़ दूसरा दरवाजा बना रहे हैं। यह गैरमुमकिन है कि वे औरतें जो अब तक ऐश और बेतकल्लुफीकी जिन्दगी बसर करती थी, मेहनत और मजदूरी की जिन्दगी बसर करने पर राजी हो जायें। वह इस तरमीम से नाजायज फायदा उठायेगी, कोई अपने वालाखाने पर सिगरकी एक मशीन रखकर अपना बचाव कर लेगी, कोई मोजे की एक मशीन रख लेगी, कोई पान की दुकान खोल लेगी, कोई‌ अपने बालाखाने पर सेव और अनार के खोनचे सजा देगी। नकली निकाह और फरजी शादियों का बाजार गर्म हो जायगा और इस परदे की आड़ में पहले से भी ज्यादा हरामकारी होने लगेगी। इस तरमीम को मजूरकरना इंसानी खसलतसे बेइल्मीका इजहार करना है। हकीम शोहरतखां ने कहा, मुझ सैयद तेगअलीके खयालात बेजा मालूम होते हैं। पहले इन खवीस हस्तियों को शहरबदर कर देना चाहिये। इसके बाद अगर वह जायज तरीके पर जिन्दगी बसर करना चाहे तो काफी इतमीनान के बाद उन्हें इम्तहानन शहर में आकर आबाद होने की इजाजत देनी चाहिये। शहर का दरवाजा बन्द नहीं है, जो चाहे यहाँ आबाद हो सकता है। मुझे कामिल यकीन है कि तरमीम से इस तजबीज का मक-सद गायब हो जायगा। शरीफहसन वकील बोले, इसमें कोई शक नहीं कि पंडित पद्मसिंह एक बहुत ही नेक और रहीम बुजुर्ग हैं, लेकिन इस तरमीम को कबूल करके उन्होंने असल मकसट पर निगाह रखने के बजाय हरदिलअजीज बनने को कोशिश की है। इसमें तो यही बेहतर था कि यह तजवीज पेश हो न की जाती। सैयद शफकतअली साहब ने अगर ज्यादा गौर से काम लिया होता तो वह कभी यह तरमीम पेश न करते। शाकिर वेगने कहा, कम्प्रोमाइज मुलकी मुआमिलात में चाहे कितना ही काबिल तारीफ हो, लेकिन इखला को बुराइयों पर सिर्फ परदा पड़ जाता है। सभापति सेठ बलभद्रदासने रिज्योल्यूशनके पहले भाग पर राय ली। ९ सम्मतियाँ अनुकूल थी, ८ प्रतिकूल। प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। फिर तरमीम पर राय ली गयी, ८ आदमी उसके अनुकूल थे, ८ प्रतिकूल, तरमीम भी पास हो गयी। सभापति ने उसके अनुकूल राय दी। डाक्टर शयामाचरण ने किसी तरफ राय नहीं दी। प्रोफेसर रमेशदत्त और स्तमभाई और प्रभाकरराव ने तरमीम के स्वीकृत हो जाने में अपनी हार समझी और पद्मसिंह को ओर इस भाव से देखा, मानों उन्होंने विश्वासघात किया है। कुँवर साहब के विषय में उन्होंने स्थिर किया कि यह केवल बातूनी, शक्की और सिद्धातहीन मनुष्य है। अबुलवफा और उनके मित्र गण ऐसे प्रसन्न थे मानों उन्हीं की जीत हुई है। उनका यों पुलकित होना प्रभाकरराव और उनके मित्रों के हृदय में कांटे की तरह गढ़ता था। प्रस्ताव के दूसरे भागपर सम्मति ली गई। प्रभाकरराव और उनके मित्रों ने इस बार उसका विरोध किया। वह पद्मसिंह को विश्वासघातक का दण्ड देना चाहते थे। यह प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया। अबुलवंफा आर उनके मित्र बगले बजाने लगे। अब प्रस्ताव के तीसरे भाग की बारी आई। कुँवर अनिरुद्धसिंह ने उसका समर्थन किया। हकीम शोहरतखा, सैयद शफकत अली, शरीफहसन और शाकिर बेंगने भी उसका अनुमोदन किया। लेकिन प्रभाकर-राव और उनके मित्रों ने उसका भी विरोध किया। तरमीम के पास हो जाने के बाद उन्हें इस संबंध में अन्य सभी उद्योग निष्फल मालूम होते थे। वह उन लोगों में थे जो या तो सब लेगे या कुछ न लेगे। प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया। कुछ रात गये सभा समाप्त हुई। जिन्हें हार की शंका थी वह हँसते हुए निकले, जिन्हें जीत का निश्चय था, उनके चेहरोपर उदासी छाई हुई थी। चलते समय कुँवर साहब ने मिस्टर रुस्तम भाई से कहा, यह आप-लोगों ने क्या कर दिया? रुस्तमभाई ने व्यंग भाव से उत्तर दिया, जो अपने किया वहीं हमने किया। आपने घड़े में छेद कर दिया, हमने उसे पटक दिया। परिणाम दोनों का एक ही है। सब लोग चले गये। अन्धेरा गहरा हो गया। चौकीदार और माली भी फाटक बन्द करके चल दिये, लेकिन पद्मसिंह वहीं घास पर निरुत्साह और चिंता की मूर्ति बने हुए बैठे थे। ४४ पद्मसिंह की आत्मा किसी भॉंति इस तरमीम के स्वीकार करने में अपनी भूल स्वीकार न करती थी। उन्हें कदापि यह आशा न थी कि उनके मित्र गण एक गौण बात पर उनका इतना विरोध करेगे। उन्हें प्रस्ताव-के एक अंश के अस्वीकृत हो जाने का खेद न था, खेद यह था कि इसका दोष उनके सिर मढ़ा जाता था, हालांकि उन्हें यह संपूर्णत अपने सहकारियों को असहिष्णुता और अदूरदर्शिता प्रतीत होती थी। इस तरमीम को वह गौण ही समझते थे। इसके दुरुपयोगकी जो शंकाएँ की गयी थीं उन पर पद्मसिंह को विश्वास न था। वह अविश्वास इस प्रस्ताव की सारी जिम्मेदारी उन्हीं के सिर डाल देता था। उन्हें अब यह निश्चय होता जाता था कि वर्तमान सामाजिक दशा के होते हुए इस प्रस्ताव से जो आशाएँ की गई थीं उनके पूरे होने की कोई सभावना नहीं है। वह कभी-कभी पछताते थे कि मैंने व्यर्थ ही यह झगङा अपने सिरलिया। उन्हें आश्चर्य होता था कि मैं कैसे इस काँटे दार झाड़ी में उलझा और यदि इस भावी असफलताका भार इस तरमीम के सिर जा पङता तो वे एक बड़ी भारी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते, पर यह उन्हें दुईशा मात्र प्रतीत होती थी। अब सारी बदनामी उन्हीं पर आवेगी, विरोधी दल उनकी हँसी उड़ावेयगा, उनकी उद्दंडता पर टिप्पणियाँ करेगा और यह सारी निन्टा उन्हें अकेले सहनी पड़ेगी, कोई उनका मित्र नहीं, कोई उन्हें तसल्ली देने वाला नहीं। विटठलदास से आशा थी कि वह उनके साथ न्याय करेंगे, उनके रूठे हुए मित्रों को मना लावेगे, लेकिन विट्ठल-दास ने उल्टे उन्हीं को अपराधी ठहराया। वह बोले, आपने इस तरमीम को स्वीकार करके सारा गुड गोबर कर दिया, बरसो की मेहनतपर पानी फेर दिया। केवल कुँवर अनिरूद्ध सिंह वह मनुष्य थे जो पद्म सिंह के व्यथित हृदय को ढाढस देते थे और उनसे सहानुभूति रखते थे। पूरे महीने भर पद्मसिंह कचहरी न जा सके। बस, अकेले बैठे हुए इसी घटना की आलोचना किया करते है उनके विचारो में एक विचित्र निपक्षता आ गई थी। मित्रों के वैमनस्य से उन्हें जो दु:ख होता था, उस पर ध्यान देकर वह यह सोचते कि जब ऐसे सुशिक्षित, विचारशील पुरूष एक जरासी बातपर अपने निश्चित सिद्धांतो के प्रतिकूल व्यवहार करते है तो इस देश का कल्याण होने कि कोई आशा नहीं। माना कि मैंने तरमीम को स्वीकार करने में भूल की, लेकिन मेरी भूलने उन्हें क्यों अपनें मार्ग से विचलित कर दिया? पद्मसिंह को इस मानसिक कष्ट की अवस्थामें पहली बार अनुभव हुआ कि एक अबला स्त्री, चित्त को सावधान करने की कितनी शक्ति रखती है। अगर संसार में कोई प्राणी था जो सपूर्णतः उनकी अवस्था को समझता था तो वह सुभद्रा थी। वह उस तरमीम को उससे कही अधिक आवश्यक समझती थी, जितना वे स्वयं समझते थे। वह उनके सहकारियों की उनसे कही अधिक तीव्र समालोचना करती। उसकी बातों से पद्मसिंह को बड़ी शांति होती थी। यद्यपि वह समझते थे कि सुभद्रा में ऐसे गहन विषय के समझने और तौलने की सामर्थ्य नहीं और यह जो कुछ कहती है वह केवल मेरी ही बातों की प्रतिध्वनि है तथापि इस ज्ञान से उनके आनन्द में कोई विघ्न न पड़ता था। लेकिन महीना पूरा भी न हो पाया था कि प्रभाकरराव ने अपने पत्र में इस प्रस्ताव के संबंध में एक लेखमाला निकालनी आरंभ कर दी। उसमें पद्मसिंह पर ऐसी ऐसी मार्मिक चोट करने लगे कि उन्हें पढ़कर वह तिलमिला जाते थे। एक लेख में उन्होने पद्मसिंहके पूर्व चरित्र और इस तरमीम से घनिष्ट संबंध दिखाया। एक दूसरे लेख मे उनके आचरण पर आक्षेप करते हुए लिखा, वह वर्तमानकाल के देश-सेवक है जो देशको भूल जायें, पर अपने को कभी नही भूलते, जो देशसेवा की आड़ मे अपना स्वार्थ साधन करते है। जाति के नवयुवक कुएँ मे गिरते हो तो गिरे, काशी के हाजी की कृपा बनी रहनी चाहिये। पद्मसिंह को इस अनुदारता और मिथ्या द्वेष पर जितना क्रोध आता था उतनाही आश्चर्य होता था। असज्जनता इस सीमा तक जा सकती है यह अनुभव उन्हें आज ही हुआ। यह सभ्यता और शालीनता के ठेकेदार बनते है, लेकिन उनकी आत्मा ऐसी मलिन है। और किसी मे इतना साहस नहीं कि इसका प्रतिवाद करे? सन्ध्या का समय था। वह लेख चारपाईपर पड़ा हुआ था। पद्मसिंह सामने मेजपर बैठे हुए इस लेख का उत्तर लिखने की चेष्टा कर रहे थे, पर कुछ लिखते न बनता था कि सुभद्रा ने आकर कहा, गरमी में यहाँ क्यों बैठे हो? चलो बाहर बैठो। पद्म--प्रभाकरराव ने मुझे आज खूब गालियाँ दी है, उन्हीं का जवाब लिख रहा हूँ। सुभद्रा -वह तुम्हारे पीछे इस तरह क्यों पड़ा हुआ है? यह कहकर सुभद्रा वह लेख पढ़ने लगी और पाँच मिनट में उसने उसे आद्योपान्त पढ़ डाला। पद्म--कैसा लेख है? सुभद्रा—यह लेख थोड़े ही है, यह तो खुली हुई गालियाँ हैं। मैं समझती थी कि गालियों की लड़ाई स्त्रियों में ही होती है, लेकिन देखती हूँ तो पुरुष हम लोगो में भी बढ़े हुए है। ये विद्वान् भी होगे? पद्म-हाँ, विद्वान् क्यों नहीं है, दुनिया भर की किताबे चाटे बैठे है। सुभद्रा-और उस पर यह हाल। पद्म—मैं इसका उत्तर लिख रहा हूँ, ऐसी खबर लूँगा कि वह भी याद करें कि किसीसे पाला पड़ा था। सुभद्रा-—मगर गालियों का क्या उत्तर होगा? पद्म -गालियाँ। सुभद्रा—नहीं, गालियों का उत्तर मौन है। गालियों का उत्तर गाली तो मूर्ख भी देते हैं, फिर उनमें और तुममें अन्तर ही क्या है? पद्मसिंह ने सुभद्रा को श्रद्धापूर्ण नेत्रों से देखा। उसकी बात उनके मन से बैठ गई। कभी-कभी हमें उन लोगों से भी शिक्षा मिलती है, जिन्हें हम अभिमान वश अज्ञानी समझते है। पद्म-- तो मौन धारण कर लूँ? सुभद्रा--मेरी तो यही सलाह है। उसे जो जी में आये बकने दो। कभी-न-कभी वह अवश्य लज्जित होगा। बस वही इन गालियों का दंड होगा। पद्म-—यह लज्जित कभी न होगा, ये लोग लज्जित होना जानते ही नहीं। अभी मैं उनके पास जाऊँ तो मेरा बड़ा आदर करेगा, हंस-हंसकर बोलेगा, लेकिन सन्ध्या होते ही फिर उन पर गालियों का नशा चढ़ जाएगा। सुभद्रा -तो उसका उद्यम गया दूसरों पर आक्षेप करना ही है। पद्म—नहीं, उद्यम तो यह नहीं है लेकिन संपादक लोग अपने ग्राहक बढ़ाने के लिये इस प्रकार को कोई न कोई फुलझड़ी छोड़ते रहते हैं। ऐसे आक्षेपपूर्ण लेखों से पत्रों की बिक्री बढ़ जाती है, जनता को ऐसे झगड़ों में आनन्द प्राप्त होता है और संपादक लोग अपने महत्व को भूलकर जनता के इस विवाद-प्रेम से लाभ उठाने लगते हैं। गुरुपद को छोड़कर जनता के कलह-प्रेम का आवाहन करने लगते हैं। कोई-कोई संपादक तो यहाॅं तक कहते है कि अपने ग्राहकों को प्रसन्न रखना हमारा कर्तव्य है। हम उनका खाते है तो उन्हीं का गावेगें। सुभद्रा--तब तो ये लोग केवल पैसे के गुलाम है। इनपर क्रोध करने की जगह दया करनी चाहिये। पद्मसिंह मेज से उठ आये। उत्तर लिखने का विचार छोड़ दिया। वह सुभद्रा को ऐसी विचारशीला कभी न समझते थे, उन्हें अनुभव हुआ कि यद्यपि मैने बहुत विद्या पढ़ी है, पर इसके हृदय की उदारता को मैं नहीं पहुँचता। यह अशिक्षित होकर भी मुझसे कहीं उच्च विचार रखती है। उन्हें आज ज्ञात हुआ कि स्त्री सन्तान-हीन होकर भी पुरुष के लिए शान्ति, आनन्द का एक अविरल स्रोत है। सुभद्रा के प्रति उनके हृदय में एक नया प्रेम जाग्रत हो गया। एक लहर उठी जिसने बरसों के जमे हुए मालिन्य को काटकर बहा दिया। उन्होंने विमल, विशुद्धभाव से उसे देखा। सुभद्रा उसका आशय समझ गई और उसका हृदय आनन्द से विहृल गद्गगद् हो गया। ४५ सदन जब सुमन को देखकर लौटा तो उसकी दशा उस दरिद मनुष्य की-सी थी, जिसका वर्षों का धन चोरों ने हर लिया हो। वह सोचता था, सुमन मुझसे बोली क्यों नहीं, उसने मेरी ओर ताका क्यों नहीं? क्या वह मुझे इतना नीच समझती है? नहीं, वह अपने पूर्व चरित्रपर लज्जित है और मुझे भूल जाना चाहती है। संभव है, निकाल देता, पर गुमनाम लेखों का छापना नियम विरुद्ध है, इसी से मजबूर था। शुभ नाम? सदन ने अपना नाम बताया। उसका क्रोध कुछ शान्त हो चला था। प्रभाकर-आप तो शर्माजी के परम भक्त मालूम होते है। सदन--में उनका भतीजा हूँ। प्रभाकर-ओह, तब तो आप अपनही है। कहिये, शर्माजी अच्छे तो है? वे तो दिखाई ही नहीं दिये। सदन—अभी तक तो अच्छे हैं, पर आपके लेखों का यही तार रहा तो ईश्वर ही जाने उनकी क्या गति होगी। आप उनके मित्र होकर इतना द्वेष कैसे करने लगे? प्रभाकर--द्रेष? राम राम! आप क्या कहते है? मुझे उनसे लेशमात्र भी द्वेष नहीं है। आप हम संपादकों के कर्तव्य को नहीं जानते। हम पब्लिक के सामने अपना हृदय खोलकर रखना अपना धर्म समझते हैं। अपने मनोभावों को गुप्त रखना हमारे नीत-शास्त्र में पाप है। हम न किसी के मित्र न है न किसी के शत्रु। हम अपने जन्म के मित्रों को एक क्षण में त्याग देते है और जन्म के शत्रुओं से एक क्षण में गले मिल जाते हैं। हम सार्वजनिक विषय में किसी की भूलों की क्षमा नहीं, करते, इसलिए कि हमारे क्षमा करने से उनका प्रभाव और भी हानिकारक हो जाता हैं। पद्मसिंह मेरे परममित्र है और मैं उनका हृदय से आदर करता हूँ। मुझे उनपर आक्षेप करते हुए हार्दिक वेदना होती है। परसों तक मेरा उनसे केवल सिद्धान्त का विरोध था, लेकिन परसों ही मुझे ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे विदित होता है कि उस तरमीम के स्वीकार करने में उनका कुछ और ही उद्देश्य था। आपसे कहने में कोई हानि नहीं है कि उन्होंने कई महीने हुए सुमन बाई नाम की बेश्या को गुप्त रीति से विधवा आश्रम में प्रवृष्ट करा दिया और लगभग एक मास से उसकी छोटी बहन को भी आश्रम में ही ठहरा रक्खा है। मैं अब भी चाहता हूँ कि मुझे गलत खबर मिली हो, लेकिन मैं शीघ्र ही किसी और नीयत से नहीं तो उनका प्रतिवाद कराने के ही लिए इस खबर को प्रकाशित कर दूँगा? सदन—यह खबर आपको कहाँँ से मिली? प्रभाकर—इसे मैं नहीं बता सकता, लेकिन आप शर्माजी से कह दीजियेगा कि यदि उनपर यह मिथ्या दोषारोपण हो तो मुझे सूचित कर दे। मुझे यह मालूम हुआ है कि इस प्रस्ताव के बोर्ड आने से पहले शर्माजी हाजी हाशिम के यहाँँ नित्य जाते थे। ऐसी अवस्था मे आप स्वयं देख सकते है कि मैं उनकी नीयत को कहाँ तक निस्पृह समझ सकता था? सदन का क्रोध शान्त हो गया। प्रभाकरराव की बातों ने उसे वशीभूत कर लिया, वह मनमे उनका आदर करने लगा और कुछ इधर-उधर की बाते करके घर लौट आया। उसे अब सबसे बड़ी चिन्ता यह थी कि क्या शान्ता सचमुच आश्रम में लाई गई है? रात्रि को भोजन करते समय उसने बहुत चाहा कि शर्मा जी से इस विषय मे कुछ बातचीत करे, पर साहस न हुआ। सुमन को तो विधवा-आश्रम में जाते उसने देखा ही था, लेकिन अब उसे कई बातों का स्मरण करके जिनका तात्पर्य अबतक उसकी समझ में न आया, था, शान्ता के लाये जाने का सन्देह भी होने लगा। वह रातभर विकल रहा। शान्ता आश्रम में क्यो आई है? चाचा ने उसे क्यों यहाँ बुलाया है? क्या उमानाथ ने उसे अपने घर में नहीं रखना चाहा? इसी प्रकार के प्रश्न उसके मन में उठते रहे। प्रात काल वह विधवा-आश्रम वाले घाट की ओर चला कि अगर सुमन से भेंट हो जाय तो उससे सारी बात पूछूँ। उसे वहाँ बैठे थोड़ी ही देर हुई थी कि सुमन आती हुई दिखाई दी। उसके पीछे एक और सुन्दरी चली आती थी। उसका मुखचन्द्र घूँघट से छिपा हुआ था। सदन को देखते ही सुमन ठिठक गई। वह इधर कई दिनों से सदन से मिलना चाहती थी। यद्यपि पहले उसने मन में निश्चय कर लिया था कि सदन से कभी न बोलूँगी, पर शान्ता के उद्धार का उसे इसके सिवा कोई अन्य उपाय न सूझता था? उसने लजाते हुए सदनसे कहा, सदनसिंह आज बड़े भाग्य से तुम्हारे दर्शन हुए। तुमने तो इधर आना ही छोड़ दिया। कुशलसे तो हो? सदन झेंपता हुआ बोला, हाँ, सब कुशल है। सुमन—दुबले बहुत मालूम होते हो, बीमार थे क्या? सदन—नहीं, बहुत अच्छी तरह हूँ। मुझे मौत कहाँ? हम बहुधा अपनी झेंप मिटाने और दूसरोंकी सहानुभूति प्राप्त करने के लिए कृत्रिम भावों की आड़ लिया करते हैं। सुमन—चुप रहो, कैसा अशकुन मुँहसे निकालते हो। मैं मरने की मनाती तो एक बात थी, जिसके कारण यह सब हो रहा है। इस रामलीला की कैकेयी मैं ही हूँ। आप भी डूबी ओर दूसरों को भी अपने साथ ले डूबी। खड़े कबतक रहोगे, बैठ जाओ। मुझे आज तुमसे बहुत सी बातें करनी हैं। मुझे क्षमा करना, अब तुम्हें भैया कहूँगी। अब मेरा तुमसे भाई बहनका नाता है। मैं तुम्हारी बड़ी साली हूँ, अगर कोई कड़ी बात मुँह से निकल जाय तो बुरा मत मानना। मेरा हाल तो तुम्हें मालूम ही होगा। तुम्हारे चाचा ने मेरा उद्धार किया और अब मैं विधवा आश्रम में पड़ी अपने दिनो को रोती हूँ और सदा रोऊँगी। इधर एक महीनेसे मेरी अभागिनी बहन भी यहीं आ गई है, उमानाथके घर उसका निर्वाह न हो सका। शर्माजी को परमात्मा चिरजीवी करें, वह स्वयं अमोला गए और इसे ले आए। लेकिन यहाँ लाकर उन्होंने भी इसकी सुधि न ली। मैं तुमसे पूछती हूँ, भला यह कहाँ की नीति है कि एक भाई चोरी करे और दूसरा पकड़ा जाय। अब तुमसे कोई बात छिपी नहीं है, अपने खोटे नसीब से, दिनों के फेर से, पूर्वजन्म के पापों से मुक्त अभागिनी ने धर्मका मार्ग छोड़ दिया। उसका दण्ड मुझे मिलना चाहिए था और वह मिला। लेकिन इस बेचारी ने क्या अपराध किया था कि जिसके लिए तुम लोगों ने इसे त्याग दिया? इसका उत्तर तुम्हें देना पड़ेगा! देखो, अपने बड़ों की आड़ मत लेना, यह कायर मनु्ष्य की चाल है। सच्चे हृदय से बताओ, यह अन्याय था या नहीं? और तुमने कैसे ऐसा घोर अन्याय होने दिया है। क्या तुम्हें एक अबला बालिका का जीवन नष्ट करते हुए तनिक भी दया न आई? यदि शान्ता यहाँ न होती तो कदाचित् सदन अपने मन के भावों को प्रकट करने का साहस कर जाता। वह इस अन्याय को स्वीकार कर लेता। लेकिन शान्ता के सामने वह एकाएक अपनी हार मानने के लिए तैयार न हो सका। इसके साथ ही अपनी कुल मर्यादा की शरण लेते हुए भी उसे संकोच होता था। वह ऐसा कोई वाक्य मुँह से न निकालना चाहता था, जिससे शान्ता को दुख हो, न कोई ऐसी बात कह सकता था, जो झूठी आशा उत्पन्न करे। उसकी उड़ती हुई दृष्टि ने जो शान्ता पर पड़ी थी, उसे बड़े संकट में डाल दिया था, उसकी दशा उस बालक की सी थी, जो किसी मेहमान की लाई हुई मिठाई को ललचायी हुई आँखों से देखता है, लेकिन माता के भय से निकालकर खा नहीं सकता। बोला, बाईजी, आपने पहले ही मेरा मुँह बन्द कर दिया है, इसलिए मैं कैसे करें कि जो कुछ मेरे बड़ों ने किया, मैं उनके सिर दोष रखकर अपना गला नहीं छुड़ाना चाहता। उस समय लोक-लज्जा से से भी डरता था। इतना तो आप भी मानेगी कि संसार में रहकर संसार की चाल चलनी पड़ती है। मैं इस अन्याय को स्वीकार करता हूँ। लेकिन यह अन्याय हमने नहीं किया, वरन् उस समाज ने किया है, जिसमें हम लोग रहते है। सुमन—भैया, तुम पढ़े लिखे मनुष्य हो, मैं तुमसे बातों में नहीं जीत सकती, जो तुम्हें उचित जान पड़े वह करो। अन्याय अन्याय हो है, चाहे कोई एक आदमी करे या सारी जाति करे। दूसके भय से किसी पर अन्याय नहीं करना चाहिए। शान्ता यहाँ खड़ी है, इसलिए मैं उसके भेद नहीं खोलना चाहती, लेकिन इतना अवश्य करेंगी कि तुम्हें दूसरी जगह धन, सम्मान, रूप, गुण सब मिल जाय पर यह प्रेम न मिलेगा। अगर तुम्हारे जैसा इसका हृदय भी होता तो यह आज अपनी नई ससुराल में आनन्द से बैठी होती, लेकिन केवल तुम्हारे प्रेम नें उसे यहाँ खीचा। तुम उसे जिस तरह चाहे रखो, वह तुम्हारे ही नाम पर आजन्म बैठी रहे। सदन ने देखा कि शान्ता की आँखो से जल बहकर उसके पैरों पर गिर रहा है। उसका सरल प्रेम-तृषित हृदय शोक से भर गया। अत्यन्त करुण स्वर से बोला, मेरी समझ में नहीं आता कि क्या करूँ? ईश्वर साक्षी है। कि दुःख से मेरा कलेजा फटा जाता है। सुमन-तुम पुरुष हो, परमात्मा ने तुम्हें सब शक्ति दी है। सदन- मुझसे जो कुछ कहिये करने को तैयार हूँ। सुमन-वचन देते हो? सदन—मेरे चित्त को जो दशा हो रहो है वह ईश्वर ही जानते होंगे, मुँह से क्या कहूँ। सुमन—मरदों को बातों पर विश्वास नहीं आता। यह कहकर मुस्कुराई। सदन ने लज्जित होकर कहा, अगर अपने वश की बात होती तो अपना हृदय निकालकर आपको दिखाता। यह कहकर उसने दबी हुई आँखो से शान्ता की ओर ताका। सुमन-—अच्छा, तो आप इसी गंगा नदी के किनारे शान्ता का हाथ पकड़कर कहिए कि तुम मेरी स्त्री हो और मैं तुम्हारा पुरुष हैं, मैं तुम्हारा पालन करुँगा। सदन के आत्मिक बल ने जवाब दे दिया। वह बगले झाँकने लगा, मानो अपना मुँह छिपाने के लिए कोई स्थान खोज रहा है। उसे ऐसा जान पडा कि गंगा मुझे छिपाने के लिए बढ़ी चली आती है। उसने डूबते हुए मनुष्य की भाँति आकाश की ओर देखा और लज्जा से आँखे नीची किए रुक-रुककर बोला, सुमन, मुझे इसके लिए सोचने का अवसर दो। सुमन ने नम्रता से कहा, हाँ सोचकर निश्चय कर लो, मैं तुम्हे धर्म संकट में नहीं डालना चाहती। यह कहकर वह शान्ता से बोली, देख तेरा पति तेरे सामने खड़ा है। मुझसे जो कुछ कहते बना उससे कहा, पर वह नहीं पसीजता। वह अब सदा के लिए तेरे हाथ से जाता है। अगर तेरा प्रेम सत्य है और उसमें कुछ बल है तो उसे रोक ले, उससे प्रेम वरदान ले लें। यह कहकर सुमन गंगा की ओर चली। शान्ता भी धीरे-धीरे उसी के पीछे चली गई। उसका प्रेम मान के नीचे दब गया। जिसके नामपर वह यावज्जीवन दुःख झेलने का निश्चय कर चुकी थी, जिसके चरणों पर वह कल्पना में अपने को अर्पण कर चुकी थी, उसी से वह इस समय तन बैठी। उसने उसकी अवस्था को न देखा, उसकी कठिनाइयों का विचार न किया, उसकी पराधीनता पर ध्यान न दिया। इस समय वह यदि सदन के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती तो उसका अभीष्ट सिद्ध हो जाता पर उसने विनय के स्थानपर मान करना उचित उमझा। सदन एक क्षण वहाँ खड़ा रहा और बाद को पछताता हुआ घर को चला। ४६ सदन को ऐसी गलानि हो रही थी, मानो उसने कोई बड़ा पाप किया हो। वह बार-बार अपने शब्दों पर विचार करता और यही निश्चय करता कि मैं बड़ा निर्दयी हूँ। प्रेमाभिलाषा ने उसे उन्मत्त कर दिया था। वह सोचता, मुझे संसार का इतना भय क्यों है? संसार मुझे क्या दे देता है? क्या केवल झूठी बदनामी के भय से मैं उस रत्न को त्याग दूँ, जो मालूम नहीं मेरे पूर्व जन्म की कितनी ही तपस्याओं का फल है? अगर अपने धर्म का पालन करने के लिए मेरे बन्धुगण मुझे छोड़ दे तो क्या हानि है? लोकनिन्दा का भय इसलिए है कि वह हमें बुरे कामों से बचाती है। अगर वह कर्त्तव्य मार्ग में बाधक हो तो उससे डरना कायरता है। यदि हम किसी निरापराध पर झूठ अभियोग लगावे, तो संसार हमको बदनाम नहीं करता, वह इस अकर्म में हमारी सहायता करता है, हमको गवाह और वकील देता है। हम किसी का धन दबा बैठे, किसी की जायदाद हड़प ले, तो संसार हमको कोई दण्ड नहीं देता, देता भी है तो बहुत ही कम, लेकिन ऐसे कुकर्मों के लिए वह हमें बदनाम करता है, हमारे माथे पर सदा के लिए कलंक का टीका लगा देता है। नहीं, लोकनिन्दा का भय मुझसे कर दिया। उसे अपने माता-पिता पर, अपने चाचा पर, संसार पर और अपने आपपर क्रोध आता। अभी थोड़े ही दिन पहले वह स्वयं फिटन पर सैर करने निकलता था, लेकिन अब किसी फिटन को आते देखकर उसका रक्त खौलने लगता था। वह किसी फैशनेबुल मनुष्य को पैदल चलते पाता तो अदबदाकर, उससे कन्धा मिलाकर चलता और मन में सोचता कि यह जर भी नाक-भौं सिकोड़े तो इसकी खबर लूँ। बहुधा वह कोचवानों के चिल्लाने की परवाह न करता। सबसे छेड़कर लड़ना चाहता था। ये लोग गाड़ियों पर सैर करते हैं, कोट-पतलून डालकर बनठन कर हवा खाने जाते हैं और मेरा कहीं ठिकाना नहीं। घर पर जमींदारी होने के कारण सदन के सामने जीविका का प्रश्न कभी न आया था। इसीलिए उसने शिक्षा की ओर विशेष ध्यान न दिया था, पर अकस्मात् जो यह प्रश्न उसके सामने आ गया, तो उसे मालूम होने लगा कि इस विषय में मैं असमर्थ हूँ। यद्यपि उसने अंग्रेजी न पढ़ी थी, पर इधर उसने हिन्दी भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वह शिक्षित समाज को मातृभाषा में अश्रद्धा रखने के कारण देश और जाति का विरोधी समझता था। उसे अपने सच्चरित्र होने पर भी घमण्ड था। जबसे उसके लेख “जगत” में प्रकाशित हुए थे वह अंग्रेजी पढ़े-लिखे आदमियों को अनादर की दृष्टि से देखने लगा था। यह सबके सब स्वार्थ-सेवी हैं, इन्होंने केवल दोनों का गला दबाने के लिए, केवल अपना पेट पालने के लिए अंगरेजी पढ़ी है, यह सबके सब फैशन के गुलाम हैं, जिनकी शिक्षा ने उन्हें अंगरेजो का मुँह चिढ़ाना सिखा दिया है, जिनमें दया नहीं, धर्म नहीं, निज भाषा से प्रेम नहीं, चरित्र नहीं, आत्मबल नहीं, वे भी कुछ आदमी है। ऐसे ही विचार उसके मन में आया करते थे लेकिन अब जो जीविका की समस्या उसके सामने आई तो उसे ज्ञात हुआ कि मैं इनके साथ अन्याय कर रहा था। ये दया के पात्र हैं। मैं भाषा का पंण्डित न सही, पर बहुतों से अच्छी भाषा जानता हूँ, मेरा चरित्र उच्च न सही, पर बहुतों से अच्छा है, मेरे विचार उच्च न हों, पर ऐसे नीच नहीं, लेकिन मेरे लिए सब दरवाजे बन्द हैं। मैं या तो कही चपरासी हो सकता हूँ या बहुत होगा तो कान्सटेबिल हो जाऊँगा। बस, यही मेरी सामर्थ्य है। यह हमारे साथ कितना बड़ा अन्याय है, हम कैसे ही चरित्रवान् हों, कितने ही बुद्धिमान् हों, कितने ही विचारशील हों, पर अग्रेजी भाषा का ज्ञान न होने से उनका कुछ मूल्य नहीं। हमसे अधम और कौन होगा जो इस अन्याय को चुपचाप सहते हैं। नहीं, बल्कि उस पर गर्व करते हैं। नहीं, मुझे नौकरी करने का विचार मन से निकाल डालना चाहिए। सदन की दशा इस समय उस मनुष्य की सी थी जो रात को जंगल में भटकता हुआ अन्धेरी रात में झुँझलाता है। इसी निराशा और चिन्ता की दशा में एक दिन वह टहलता हुआ, नदी के किनारे उस स्थान पर जा पहुँचा जहाँ बहुत सी नावे लगी हुई थी। नदी में छोटी-छोटी नावे इधर-उधर इठलाती फिरती थी। किसी-किसी नौका में सुरीली ताने सुनाई देती थी। कई किश्तियों पर से मल्लाह लोग बोरे उतार रहे थे। सदन एक नाव पर जा बैठा। संध्या समय की शान्तिदायिनी छटा और गंगातट के मनोरम काव्यमय दृश्य ने उसे वशीभूत कर लिया। वह सोचने लगा, यह कैसा आनन्दमय जीवन है, ईश्वर मुझे भी ऐसा ही एक झोपड़ा दे देता, तो मैं उसीपर सन्तोष करता, यही नदी तट पर विचरता लहरों पर चलता और आनन्द के राग गाता। शान्ता झोपड़ा के द्वारपर खड़ी मेरी राह देखती। कभी-कभी हम दोनों नाव पर बैठकर गंगा की सैर करते। उसकी रसिक कल्पना ने उस सरल सुखमय-जीवन का ऐसा सुन्दर चित्र खींचा, उस आनन्दमय स्वप्न के देखने में वह ऐसा मग्न हुआ कि उसका चित्त ब्याकुल हो गया। वहाँ की प्रत्येक वस्तु उस समय सुख, शान्ति और आनन्द के रंग में डूबी हुई थी। वह उठा और एक मल्लाह से बोला, क्यों जी चौधरी यहाँ कोई नाव बिकाऊ भी है? मल्लाह बैठा हुक्का पी रहा था। सदन को देखते ही उठ खड़ा हुआ और उसे कई नावे दिखाई। सदन ने एक नई किश्ती पसन्द की, मोल-तोल होने लगा, कितने ही और मल्लाह एकत्र हो गये। अन्त में ३००) में नाव पक्की हो गई, यह भी तै हो गया कि जिसकी नाव है वही उसे चलाने के लिए नौकर होगा। सदन घर को ओर चला तो ऐसा प्रसन्न था मानों अब उसे जीवन में किसी वस्तु की अभिलाषा नहीं है, मानों उसने किसी बड़े भारी संग्राम में विजय पायी है। सारी रात उसकी आँखो में नींद नहीं आई। वहीं नाव जो पाल खोले क्षितिज की ओर से चली आती थी उसके नेत्रों के सामने नाचती रही, वही दृश्य उसे दिखाई देते रहे। उसकी कल्पना ने तटपर एक सुन्दर, हरि-भरि लताओं से सजा हुआ झोपड़ा बनाया और शान्ता की मनोहारिणी मूर्ति आकर उसमें बैठी। झोपड़ा प्रकाशमान हो गया। यहाँ तक कि आनन्द-कल्पना धीरे-धीरे नदी के किनारे एक सुन्दर भवन बनाया, उसमें एक वाटिका लगवाई और सदन उसकी कुञ्जों में शान्ता के साथ बिहार करने लगा। एक ओर नदी की कलकल ध्वनि थी, दूसरी ओर पक्षियों का कलरव गान। हमें जिससे प्रेम होता है उसे हम सदा एक ही अवस्था में देखते है, हम उसे जिस अवस्था में स्मरण करते है, उसी समय के भाव उसी समय के वस्त्राभूषण हमारे हृदय पर अंकित हो जाते है। सदन शान्ता को उसी अवस्था में देखता था, जब वह एक सादी साड़ी पहने सिर झुकाये गंगातट पर खड़ी थो, वह चित्र उसकी आँखों से न उतरता था। सदन को इस समय ऐसा मालूम होता था कि इस व्यवसाय में लाभ ही लाभ है, हानि की सम्भावना ही उसके ध्यान से बाहर थी। सबसे विचित्र बात यह थी कि अबतक उसने यह न सोचा था कि रुपये कहाँ से आवेगे? प्रातःकाल होते ही उसे चिन्ता हुई कि रुपयों का क्या प्रबन्ध करूँ? किससे माँगू और कौन देगा? माँगू किस बहाने से? चाचा से कहूँ? नहीं उनके पास आजकल रुपये में होगे। महीनों से कचहरी नहीं जाते और दादा से माँगना तो पत्थर से तेल निकालना है। क्या कहूँ? यदि इस समय न गया तो चौधरी अपने मन से क्या कहेगा? वह छत पर इधर-उधर टहलने लगा। अभिलाषाओं का वह विशाल भवन, अभी थोड़ी देरप हले उसकी कल्पना ने जिसका निर्माण किया था देखते-देखते गिरने लगा। युवाकाल को आशा पुआल की आग है जिसके जलने और बुझने में देर नहीं लगती। अकस्मात् सदन को एक उपाय सूझा गया। वह जो रसे खिलखिलाकर हँसा, जैसे कोई अपने शत्रु को भूमिपर गिराकर बेहँसी की हँसी हँसता है। वाह! मैं भी कैसा मूर्ख हूँ। मेरे सन्दूक में मोहनमाला रखी हुई है। ३००J से अधिक की होगी। क्यों न उसे बेच डालूँ? ‘जब कोई माँगेगा, देखा जायगा। कौन माँगता है और किसी ने माँगा भी तो साफ साफ कह दूँगा कि बेचकर खा गया। जो कुछ करना होगा, कर लेगा और अगर उस समय तक हाथ में कुछ रुपये आ गये तो निकालकर फेक दूँगा। उसने आकर सन्दूक से माला निकाली और सोचने लगा कि इसे कैसे बेचूँ। बाजार में कोई गहना बेचना अपनी इज्जत बेचने से कम अपमान की बात नहीं है, इसी चिन्ता में बैठा था कि जीतन कहार कमरे में झाड़ देने आया। सदन को मलिन देखकर बोला, भैया, आज उदास हो, आँखे चढ़ी हुई है, रात को सोये नहीं क्या? सदन ने कहा, आज नींद नहीं आई। सिर पर एक चिन्ता सवार है। जीतन—ऐसी कौन सी चिन्ता है? में भी सुनूँ। सदन-- तुमसे कहूँ तो तुम अभी सारे घर में दोहाई मचाते फिरोगे। जीतन-भैया, तुम्हीं लोगों की गुलामी में उमिर बीत गई। ऐसा पेट का हलका होता तो एक दिन न चलता। इससे निसाखातिर रहो। जिस प्रकार एक निर्धन किन्तु शीलवान मनुष्य के मुँह से बड़ी कठिनता, बड़ी विवशता और बहुत लज्जा के साथ 'नहीं' शब्द निकलता है, उसी प्रकार सदन के मुँह से निकला, मेरे पास एक मोहनमाला है, इसे कहीं बेच दो, मुझे रुपयों का काम है। जीतन—तो यह कौन बड़ा काम है, इसके लिए क्यों चिन्ता करते हो? मुदा रुपये क्या करोगे? मलकिन से क्यों नही माँग लेते हो? वह कभी नाहीं नहीं करेगी। हाँ, मालिक से कहोगे तो न मिलेगा। इस घर मे मालिक कुछ नहीं है, जो है वह मलकिन है। सदन-- में घर में किसी से नहीं माँगना चाहता। जीतन ने माला लेकर देखी, उसे हाथों से तौला और शाम तक उसे बेच लाने की बात कहकर चला गया, मगर बाजार न जाकर वह सीधे अपनी कोठरी में गया, दोनो किवाड़ बन्द कर लिए और अपनी खाट के नीचे की भूमि खोदने लगा। थोड़ी देर में मिट्टी की एक हाँड़ी निकल आयी। यही उसकी सारे जन्म की कमाई थी, सारे जीवन की किफायत, कंजूसी, काट कपट, बेईमानी, दलाली, गोलमाल, इसी हाँडी के अन्दर इन रुपयों के रूप में संचित थी। कदाचित् इसी कारण रुपयों के मुँहपर कालिमा भी लग गयी थी। लेकिन जन्मभर के पापों का कितना संक्षिप्त फल था! कितने सस्ते बिकते है! जीतन ने रुपये गिनकर २०), २०J की ढेरियाँ लगाईं। कुल १७ ढेरियाँ हुईं। तब उसने तराजू पर माले को रुपयों से तौला। वह २५) रुपिये भर से कुछ अधिक थी। सोने की दर बजार में चढ़ी हुई थी, पर उसने एक रुपये भरके २५) ही लगाये। फिर रुपयों की २५-२५ की ठेरियाँ बनाई। १३ ढेरियाँ हुईं और १५) बच रहे। उसके कुल रुपये माला के मूल्य से २८५J कम थे। उसने मन में कहा, अब यह चीज हाथ से नहीं जाने पायगी। कह दूँगा माना १३ ही भर थी। १५) और बच जायेंगे। चलो मालारानी, तुम इस दरबे में आराम से बैठो। हाँडी फिर, धरती के नीचे चली गई, पापों का आकार और भी सूक्ष्म हो गया। जीतन इस समय उछला पड़ता था। उसने बात-की-बात में २८५) पर हाथ मारा था। ऐसा सुअवसर उसे कभी नहीं मिला था। उसने सोचा, आज अवश्य किसी भले आदमी का मुँह देखकर उठा था। बिगड़ी हुई आँखो के सदृश बिगड़े हुए ईमान में ज्योति प्रवेश नहीं करती। १० बजे जीतन ने ३२५) लाकर सदन के हाथों में दिये। सदन को मानो पड़ा हुआ धन मिला। रुपये देखकर जीतन ने नि:स्वार्थभाव से मुँह फेरा। सदन ने ५) निकाल कर उसकी ओर बढ़ाये और बोला यह लो तमाखू पीना। जीतन ने ऐसा मुँह बनाया, जैसे कोई वैष्णव मदिरा देखकर मुँह बनाता है, और बोला भैया, तुम्हारा दिया तो खाता ही हूँ, यह कहाँ पचेगा? सदन—नहीं नही मैं खुशी से देता हूँ। ले लो, कोई हरज नहीं है। जीतन-—नहीं भैया, यह न होगा, ऐसा करता तो अबतक चार पैसे का आदमी हो गया होता, नारायण तुम्हें बनाये रखें। सदन को विश्वास हो गया कि यह बड़ा सच्चा आदमी है। इसके साथ अच्छा सलूक, करूँगा। सन्ध्या समय सदन की नाव गंगा की लहरों पर इस भाँति चल रही थी जैसे आकाश में मेघ चलते हैं। लेकिन उसके चेहरे पर आनन्द-विकास की जगह भविष्य की शंका झलक रही थी, जैसे कोई विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद चिन्ता में ग्रस्त हो जाता है। उसे अनुभव होता है कि वह बाँध जो संसार रूपी नदी की बाढ़ से मुझे बचाये हुए था, टूट गया है और में अथाह सागर में खड़ा हूँ। सदन सोच रहा था कि मैंने नाव तो नदी में डाल दी, लेकिन यह पार भी लगेगी? उसे अब मालूम हो रहा था कि वह पानी गहरा है, वहा तेज है और जीवन यात्रा इतनी सरल नहीं है, जितनी मैं समझता था। लहर यदि मीठे स्वरों में गाती है तो भयंकर ध्वनि से गरजती भी है, हवा अगर लहरों को थपकियाँ देती है, तो कभी कभी उन्हे उछाल भी देती है। ४७ प्रभाकरराव का क्रोध बहुत कुछ तो सदन के लेखों से ही शांत हो गया था और जब पद्मसिंह ने सदन के आग्रह से सुमन का पूरा वृतान्त उसे लिख भेजा, तो वह सावधान हो गए। म्युनिसिपैलिटी में प्रस्ताव को पास हुए लगभग तीन मास बीत गये; पर उसकी तरमीम के विषय में तेगअली ने जो शंकाएँ प्रकट की थी वह निर्मल प्रतीत हुई। न दालमण्डी के कोठों पर दुकानें ही सजी और न वेश्याओें ने निकाह-बंधन से ही कोई विशेष प्रेम प्रकट किया। हाँ, कई कोठे खाली हो गये। उन वेश्याओं ने भावी निर्वासन के भय से दूसरी जगह रहने का प्रबन्ध कर लिया। किसी कानून का विरोध करने के लिए उससे अधिक संगठन की आवश्यकता होती है जितनी उसके जारी करने के लिए। प्रभाकरराव का क्रोध शान्त होने का यह एक और कारण था। पद्मसिंह ने इस प्रस्ताव को वेश्याओं के प्रति घृणा से प्रेरित होकर हाथ में लिया था, पर अब इस विषय पर विचार करते करते उनकी घृणा बहुत कुछ दया और क्षमा का रूप धारण कर चुकी थी। इन्हीं भावों ने उन्हें तरमीम से सहमत होने पर बाध्य किया था। सोचते, यह बेचारी अबलाएँ अपनी इन्द्रियों के सुखभोग में अपना सर्वस्वनाश कर रही है। विलास प्रेम की लालसा ने उनकी आँखें बन्द कर रखी है। इस अवस्था में उनके साथ दया और प्रेम की आवश्यकता है। इस अत्याचार से उनकी सुधारक शक्तियाँ और भी निर्बल हो जायेंगी और जिन आात्माओं का हम उपदेश से, प्रेम से, ज्ञान से, शिक्षा से उद्धार कर सकते हैं वे सदा के लिए हमारे हाथ से निकल जायेगी। हम लोग जो स्वयं माया-मोह के अन्धकार में पड़े हुए हैं, उन्हें दण्ड देने का कोई अधिकार नहीं रखते। उनके कर्म ही उन्हें क्या कम दण्ड दे रहे है कि हम यह अत्याचार करके उनके जीवन को और भी दुःखमय बना दे? हमारे मन के विचार कर्म के पथदर्शक होते हैं। पद्मसिंह ने झिझक और संकोच को त्यागकर कर्म क्षेत्र में पैर रखा। वहीं पद्मसिंह जो सुमन के सामने से भाग खड़े हुए थे अब दिन दोपहर दालमंडी के कोठों पर बैठे दिखाई देने लगे, उन्हें अब लोकनिन्दा का भय न था, मुझे लोग क्या कहेंगे इसकी चिन्ता न थी। उनकी आत्मा बलवान हो गई थी, हदय में सच्ची सेवा का भाव जाग्रत हो गया था। कच्चा फल पत्थर मारने से भी नहीं गिरता, किन्तु पककर वह आप ही आप धरती की ओर आकर्षित हो जाता है। पद्मसिंह के अन्तःकरण में सेवा का—प्रेम का भाव परिपक्व हो गया था। विट्ठलदास इस विषय में उनसे पृथक हो गए। उन्हें जन्म की वेश्याओं के सुधार पर विश्वास न था। सैयद शफकतअली भी जो इस तरमीम के जन्मदाता थे, उनसे कन्नी काट गए और कुँवर साहब को तो अपने साहित्य, संगीत और सत्सगसे ही अवकाश न मिलता था, केवल साधु गजाधर ने इस कार्य में पद्मसिंह का हाथ बटाया। उस सदुद्योगी पुरुष मे सेवा का भाव पूर्णरूप से उदय हो चुका था। ४८ एक महीना बीत गया। सदन ने अपने इस नये धंधे की चर्चा घर मे किसी से न की। वह नित्य सवेरे उठकर गंगास्नान के बहाने चला जाता। वहाँ से दस बजे घर आता। भोजन करके फिर चल देता और तब का गया गया घड़ी रात गये घर लौटता। अब उसकी नाव घाट पर की सब नावों से अधिक सजी हुई, दर्शनीय थी। उस पर दो तीन मोढ़े रखे रहते थे और एक जाजिम बिछी रहती थी। इसलिए शहर के कितने ही रसिक, विनोदी मनुष्य उस पर सैर किया करते थे, सदन किराये के विषय मे खुद बातचीत न करता। यह काम उसका नौकर झीगुर मल्लाह किया करता था। वह स्वंय कभी तो तटपर बैठा रहता और कभी नाव पर जा बैठता था। वह अपने को बहुत समझाता कि काम करने में क्या शर्म? मैंने कोई बुरा काम तो नहीं किया है, किसी का गुलाम तो नहीं हूँ कोई आँख तो नहीं दिखा सकता। लेकिन जब वह किसी भले आदमी को अपनी नाव की ओर आते देखता तो आप ही आप उसके कदम पीछे हट जाते और लज्जा से आँखे झुक जाती। वह एक जमीदार का पुत्र था और एक वकील का भतीजा। उस उच्च पद से उतरकर मल्लाह का उद्यम करने में उसे स्वभावतः लज्जा आती थी, जो तर्क से किसी भाँति न हटती। इस संकोच से उसकी बहुत हानि होती थी। जिस काम के लिए वह सुगमता से एक रुपया ले सकता था, उसी के लिए उसे आधे में ही राजी होना पड़ता था। ऊँची दूकान पकवान फीके होने पर भी बाजार मे श्रेष्ठ होती है। यहाँ तो पकवान अच्छे थे, केवल एक चतुर सजीले दुकानदार की कमी थी। सदन इस बात को समझता था, पर संकोच वश कुछ कह न सकता था। तिसपर भी इस विषय में चुप रहना ही उचित समझने थे। वह पहले में ही उसकी खातिर करते थे, अब कुछ आदर भी करने लगे और सुभद्रा तो उसे लडके के समान मानने लगी। एक दिन रात के समय सदन अपने झोपड़े में बैठा हुआ नदी की तरफ देख रहा था। आज न जाने क्यों नाव के आने में देर हो रही थी। समान लैम्प जल रहा था। सदन के हाथ में एक समाचारपत्र था, पर उसका ध्यान पढ़ने में न लगता था। नाव के न आने से उसे किसी अनिप्ट की शंका हो रही थी। उसने पत्र रख दिया और बाहर निकलकर तटपर आया। रेतपर चाँदनी की सुनहरी चादर बिछी हुई थी और चाँद की किरणों नदी के हिलते हुए जलपर ऐसी मालूम होती थी जैसे किसी झरने से निर्मल जल की धारा क्रमश: चौड़ी होती हुई निकलती है। झोपड़े के सामने चबूतरे पर कई मल्लाह बैठे हुए बातें कर रहे थे कि अकस्मात् सदन ने दो सत्रयों को शहर की ओर से आते देखा। उनमे से एक ने मल्लाहो से पूछा, हमें उस पार जाना है, नाव ले चलोगे? सदन ने शब्द पहचाने। यह सुमन बाई थी। उसके हृदय में एक गुदगुदी-सी आई; आँखो में एक नशा-सा आ गया। लपककर चबूतरे के पास आया और सुमन से बोला, बाईजी, तुम यहाँ कहाँ? सुमन ने ध्यान से सदन को देखा, मानों उसे पहचानती ही नहीं। उसके साथ वाली स्त्रीने घुंँघट निकाल लिया और लालटेन के प्रकाश से कई पग हटकर अन्धेरे में चली गयी। सुमन ने आश्चर्यसे कहा, कौन? सदन? मुल्लाहो ने उठकर घेर लिया, लेकिन सदन ने कहा, तुम लोग इस समय यहाँ से चले जाओ। ये हमारे घरकी स्त्रियाँ है, आज यही रहेंगी। इसके बाद वह सुमन से बोला, बाईजी कुशल-समाचार कहिये। क्या क्या माजरा है? सुमन--सब कुशल ही है, भाग्य में जो कुछ लिखा है वही भोग रही हैं। आज का पत्र तुमने अभी न पढ़ा होगा, प्रभाकरराव ने न जाने क्या छाप दिया कि आश्रम में हलचल मच गई। हम दोनों बहने वहाँ एक दिन भी और रह जाती तो आश्रम बिलकुल खाली हो जाता। वहॉं से निकल आने में कुशल थी। अब इतनी कृपा करो कि हमे उस पार ले जाने के लिए एक नाव ठीक कर दो। वहाँ से हम एक्का करके मुगलसराय चली जायँगी। अमोला के लिए कोई-न-कोई गाड़ी मिल ही जायगी। यहाँ से रात को कोई गाड़ी नहीं जाती। सदन— अब तो तुम अपने घर ही पहुंँच गई, अमोला क्यो जाओगी। तुम लोगो को कष्ट तो बहुत हुआ, पर इस समय तुम्हारे आने से मुझे जितना आनन्द हुआ, यह वर्णन नहीं कर सकता। मैं स्वयं कई दिन से तुम्हारे पास आने का इरादा कर रहा था, लेकिन काम से छुट्टी ही नहीं मिलती। से तीन-चार महीने से मल्लाह का काम करने लगा हूँ। यह तुम्हारा झोपड़ा है, चलो अन्दर चलो। सुमन झोपड़े में चली गई, लेकिन शान्ता वही अन्धेरे में चुपचाप सिर झुकाये रो रही थी। जबसे उसने सदन सिंह मुँह से यह बाते सुनी थी, उस दुखिया ने रो-रोकर दिन काटे थे। उसे बार-बार अपने मान करने पर पछतावा होता था। वह सोचती, यदि मैं उस समय उनके पैरों पर गिर पड़ती तो उन्हें मुझ पर अवश्य दया आ जाती। सदन की सूरत उसकी आँखों में फिरती और उसकी बाते उसके कानों में गूँजती। बातें कठोर थी लेकिन शान्ता को वह प्रेम-करुणा से भरी हुई प्रतीत होती थी। उसने अपने मन को समझा लिया था कि यह सब मेरे कुदिन का फल है, सदन का कोई अपराध नहीं। वह वास्तव में विवश है। अपदी माता-पिता की आज्ञा का पालन करना उनका धर्म है। यह मेरी नीचता है कि मैं उन्हें धर्म के मार्ग से फेरना चाहती हूँ। हाँ! मैंने अपने स्वामी से मान किया, मैंने अपने आराध्यदेव का निरादर किया, मैंने अपने कुटिल स्वार्थ के वश होकर उनका अपमान किया। ज्यों-ज्यों दिन बीतते थे, शान्ता की आत्मग्लानि बढ़ती जाती थी। इस शोक, चिन्ता और विरह-पीड़ा से वह रमणी इस प्रकार सूख गयी थी, जैसे जेठ के महीने में नदी सूख जाती है। उसका हृदय कुछ हलका हुआ। सुमन ने यदि उसे गालियाँ दी होती तो और भी बोध होता। वह अपने को इस तिरस्कार के सर्वथा योग्य समझता था। उसने ठंडे पानी का कटोरा सुमन को दिया और स्वयं पंखा झलने लगा। सुमनने शान्ता के मुँहपर पानी के कई छींटे दिये। इसपर भी जब शान्ता ने आँखें न खोली, तब सदन बोला, जाकर डाक्टर को बुला लाऊँ न? सुमन-नहीं, घबराओ मत। ठंढक पहुँचते ही होश आ जायगा। डाक्टर के पास इसकी दवा नहीं है। सदन को कुछ तसल्ली हुई बोला, सुमन, चाहे तुम समझो कि मैं बात बना रहा हूँ, लेकिन मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि उसी मनहूस घडी़ से मेरी आत्मा को कभी गति नहीं मिली। सो बार बार अपनी मूर्खता पर पछताता था कई बार इरादा किया कि चलकर अपना अपराध क्षमा कराऊँ, लेकिन यही विचार उठता कि किस बूते पर जाऊँ? घर वालों से सहायता की कोई आशा न थी, और मुझे तो तुम जानती ही हो कि सदा कोतल घोड़ा बना रहा। बस इसी चिन्ता में डूबा रहता था कि किसी प्रकार चार पैसे पैदा करूँ और अपनी झोपड़ी अलग बनाऊँ। महीनों नौकरी की खोज में मारा मारा फिरा, कही ठिकाना न लगा। अन्त को मैने गंगामाता की शरण ली और अब ईश्वर की दया से मेरी नाव चल निकली है, अब मुझे किसी के सहारे या मदद की आवश्यकता नहीं है। यह झोपड़ी बना ली है, और विचार है कि कुछ रुपये और आ जायँ तो उस पार किसी गाँव में एक मकान बनवा लूँ। क्यों, इनकी तबीयत कुछ संँभली हुई मालूम होती है? सुमन का क्रोध कुछ शान्त हुआ। बोली, हाँ अब कोई भय नहीं हैं, केवल मूर्च्छा थी। आँखे बंद हो गई और ओठों का नीलापन जाता रहा। सदन को ऐसा आनन्द हुआ कि यदि वहांँ ईश्वर की कोई मूर्ति होती तो उसके पैरो पर सिर रख देता। बोला, सुमन मेरे साथ जो उपकार किया है उसको मैं सदा याद करता रहूंँगा। अगर और कोई बात हो जाती तो इस लाश साथ मेरी लाश भी निकलती है सुमन--यह कैसी बात मुँह से निकालते हो। परमात्मा चाहेंगे तो दो-तीन महिलाएँ तैयारियाँ कर रही थी और और कई अन्य देवियों का अपने घरों पर पत्र भेजे थे। केवल वही चुपचाप बैठी थी, जिनका कोई ठिकाना नहीं, पर वह भी सुमन से मुँह चुराती फिरती थीं। अपमान न सह सकी। उसने शान्ता से सलाह की। शान्ता बड़ी दुविधा में पड़ी पद्मसिंह की आज्ञा के बिना वह आश्रम से निकलना अनुचित समझती थी। केवल यही नहीं कि आशा का एक पतला सूत उसे यहाँ बाँधे हुए था बल्कि इसे वह धर्म का बन्धन समझती थी, वह सोचती थी, जब मैंने अपना सर्वस्व पद्मसिंह के हाथों में रख दिया, तब अब स्वेच्छा पथ पर चलेगा। मुझे कोई अधिकार नहीं है। लेकिन जब सुमन ने निश्चित दिया कि तुम रहती हो तो रहो पर मैं किसी भाँति यहाँ न रहूँगी। शान्ता को वहीं रहना असम्भव-सा प्रतीत होने लगा। जंगल में भटके हुए उस मनुष्य की भांति जो किसी दूसरे को देखकर उसके साथ भेजे इसलिए हो लेता है कि एकसे दो हो जायेंगे शान्ता अपनी बहन के साथ चलने को तैयार हो गई। सुमन ने पूछा-और जो पद्मसिंह नाराज हों? शान्ता--उन्हे एक पत्र द्वारा समाचार लिख दूँगी। सुमन--और जो सदनसिंह बिगड़े? शान्ता-—जो दण्ड देंगे सह लूँगी। सुमन--खूब सोच लो, ऐसा न हो कि पीछे पछताना पड़े। शान्ता--रहना मुझे यहीं चाहिए पर तुम्हारे बिना मुझसे रहा न जायगा। हाँ, यह बता दो कि कहाँ चलोगी? सुमन--तुम्हें अमोला पहुँचा दूँगी। शान्ता--और तुम? सुमन--मेरे नारायण मालिक है। कहीं तीर्थ यात्रा करने चली जाऊँगी। दोनों बहनों में बहुत देर बातें हुई। फिर दोनों मिलकर रोई। ज्योंहि आठ बजे विट्ठलदास भोजन करने के लिए अपने घर आज आठ और भोजन गए दोनों बहनें सबकी आँख बचाकर चल खड़ी हुई। रातभर किसी को खबर न हुई। सबेरे चौकीदार ने आकर विट्ठल से यह समाचार कह। वह घबराये और लपके हुए सुमन के कमरे में गये। सब चीजें पड़ी हुई थीं केवल दोनों बहनों का पता न था। बेचारे बड़ी चिंता में पड़े। पद्मसिंह को कैसे मुँह दिखाऊँगा? उन्हें उस समय सुमन पर क्रोध आया । यह सब उसी की करतूत है, वही शान्ता को बहकाकर ले गये हैं। एकाएक उन्हे सुमन की चारपाईपर एक पत्र पड़ा हुआ दिखाई दिया। लपककर उठा लिया और पढ़ने लगे। यह पत्र सुमन ने चलते समय लिखकर रख दिया था। इसे पढ़कर विट्ठलदास को कुछ धैर्य हुआ। लेकिन इसके साथ ही उन्हें यह दुःख हुआ कि सुमनके कारण मुझे नीचा देखना पड़ा। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि मैं अपने धमकी देनेवालों को नीचा दिखाऊँगा, पर यह अवसर उनके हाथसे निकल गया, अब लोगो समझगे कि मैं डर गया,यह सोचकर उन्हें बहुत दुःख हुआ। आखिर वह कमरे से निकले। दरवाजे बन्द कराये और सीधे पद्मसिंह के घर पहुंँचे । शर्माजीने यह समाचार सुना तो सन्नाटे में आ गये। बोले, अब क्या होगा ? विठ्ठल— वे अमोला पहुँच गई होगी। शर्मा— हाँ, सम्भव है। विट्ठल— सुमन इतनी दूर सफर तो मजे में कर सकती है। शर्मा— हाँ, ऐसी नासमझ तो नहीं है। विट्ठल— सुमन तो अमोला गयी न होगी। शर्मा— हांँ, कौन जाने, दोनों कही डूब मरी हों। विट्ठल— एक तार भेजकर पूछ क्यों न लीजिए। शर्मा— कौन मुंह लेकर पूछूं? जब मुझसे इतना भी न हो सका कि शांता की रक्षा करता, तो अब उसके विषय में कुछ पूछ-ताछ करना मेरे लिए लज्जाजनक है। मुझे आपके ऊपर विश्वास था। अगर जानता कि आप ऐसी लापरवाही करेंगे तो उसे मैंने अपने ही घर में रखा होता। बिट्ठल-आप तो ऐसी बाते कह रहे है, मानों मैने जान बूझकर उन्हें निकाल दिया हो। शर्मा-आप उन्हें तसल्ली देते रहते तो वह कभी न जाती। आपने मुझसे भी अब कहा है, जब अवसर हाथ से निकल गया। विट्ठल- आप सारी जिम्मेदारी मुझी पर डालना चाहते हैं। पद्म-और किस पर डालूँ? आश्रम के संरक्षक आपही हैं या कोई और? विट्ठल- शान्ता के वहाँ रहते तीन महीने से अधिक हो गये, आप कभी भूलकर भी आश्रम की ओर गये? अगर आप कभी-कभी वहाँ जाकर उसका कुशल समाचार पूछते रहते तो उसे धैर्य रहता। जब आपने उसकी कभी बात तक न पूछी तो वह किस आधार पर वहाँ पड़ी रहती? मैं अपने दायित्व को स्वीकार करता हूँ, पर आप भी दोष से नहीं बच सकते। पद्मसिंह आजकल विट्ठलदास से चिढ़े हुए थे। उन्होंने उन्हीं के अनुरोधसे वेश्या-सुधार के काम में हाथ डाला था, पर अन्त में जब काम करने का अवसर पड़ा तो वह साफ निकल गये। उधर विट्ठलदास भी वेश्याओं के प्रति उनकी सहानुभूति देखकर उन्हें संदिग्ध दृष्टि से देखते थे। वे इस समय अपने-अपने हृदय की बात न कहकर एक दूसरे पर दोषारोपण करने की चेष्टा कर रहे थे। पद्मसिंह उन्हें खूब आड़े हाथों लेना चाहते थे, पर यह प्रत्युत्तर पाकर उन्हें चुप हो जाना पड़ा। बोले- हाँ, इतना दोष मेरा अवश्य है। विट्ठल नहीं, आपको दोष देना मेरा आशय नहीं हैं। दोष सब मेरा ही है। आपने जब उन्हें मेरे सुपुर्द कर दिया तो आपका निश्चिन्त हो जाना स्वाभाविक ही था। शर्मा—नहीं वास्तव में यह सब मेरी कायरता और आलस्य का फल है। आप उन्हें जबर्दस्ती नहीं रोक सकते थे। पद्मसिंह ने अपना दोष स्वीकार करके बाजी पलट दी थी। हम आप झुककर दूसरे को झुका सकते है, पर तनकर किसी को झुकाना कठिन है। विट्ठलनाथ—शायद सदनसिंह को कुछ मालूम हो। जरा उन्हें बुलाइए। शर्मा—वह तो रात से ही गायब है। उसने गंगा के किनारे एक झोपड़ा बनवा लिया है, कई मल्लाह लगा लिये है और एक नाव चलाता है। शायद रात वही रह गया। विट्ठल-सम्भव है, दोनो बहने वही पहुँच गई हो, कहिए तो जाऊँ? शर्मा—अजी नहीं, आप किस भ्रम में है। वह इतना लिबरल नहीं है। उनके साये से भागता है। अकस्मात् सदन ने उनके कमरे मे प्रवेश किया। पद्मसिंह ने पूछा, तुम रात कहाँ रह गये? सारी रात तुम्हारी राह देखी। सदनसिंह ने धरती की ओर ताकते हुए कहा, मैं स्वयं लज्जित हूँ। ऐसा काम पड़ गया कि मुझे विवश होकर रुकना पड़ा। इतना समय भी न मिला कि आकर कह जाता। मैंने आपसे शर्म के मारे कभी चर्चा नहीं की, लेकिन इधर कई महीने से मैंने एक नाव चलाना शुरू किया है। वही नदी के किनारे एक झोपड़ा बनवा लिया है मेरा विचार है कि इस काम को जमकर करूँ। इसलिए आपसे उस झोपड़े में रहने की आज्ञा चाहता हूँ। शर्मा—इसकी चर्चा तो लाला भगतराम ने एक बार मुझसे की, लेकिन खेद यह है कि तुमने अब तक मुझसे इसे छिपाया, नहीं तो मैं भी कुछ सहायता करता। खैर, मैं इसे बुरा नहीं समझता, बल्कि तुम्हें इस अवस्था मे देखकर मुझे बड़ा आनन्द हो रहा है, लेकिन मैं यह कभी न मानूँगा कि तुम अपना घर रहते हुए अपनी हाँडी अलग चढाओ। क्या एक नाव का और प्रबन्ध हो तो अधिक लाभ हो सकता है? सदन-—जी हाँ, में स्वयं इसी फिक्र में हूँ। लेकिन इसके लिए मेरा घाटपर रहना जरूरी है। शर्मा- भाई, यह शर्त तुम बुरी लगाते हो। शहर मे रहकर तुम मुझसे अलग रहो, यह मुझे पसन्द नहीं। इसमे चाहे कुछ हानि भी हो, लेकिन मैं न मानूँगा। सदन——नहीं चाचा, आप मेरी यह प्रार्थना स्वीकार कीजिये; मैं बहुत मजबूर होकर आपसे यह कह रहा हूँ। शर्मा——ऐसी क्या बात है जो तुम्हे मजबूर करती है? तुम्हें जो संकोच हो वह साफ साफ क्यों नहीं कहते? सदन——मेरे इस घरमे रहने से आपकी बदनामी होगी। मैंने अब अपने उस कर्तव्य के पालन करने का संकल्प कर लिया हूँ, जिसे में कुछ दिनों तक अपने अज्ञान और कुछ समयतक अपनी कायरता और निन्दा के भयसे टालता आता था। में आपका लड़का हूँ। जब मुझे कोई कष्ट होगा, आपका आश्रय लूँगा, कोई जरूरत पड़ेगी तो आपको सुनाऊँगा, लेकिन रहूँगा अलग अीर मुझे विश्वास है कि आप मेरे प्रस्ताव को पसन्द करेंगे। विट्ठलदास भी बात की तह तक पहुँच गये। पूछा, कल सुमन और शान्ता से तो तुम्हारी मुलाकात नहीं हुई? सदन के चेहरे पर लज्जा की लालिमा छा गई, जैसे किसी रमणी के मूँख पर से घूँघट हट जाय। दबी जबान से बोला, जी हाँ। पद्मसिंह बडे धर्म संकट में पड़े। न ‘हाँ’ कह सकते थे, न ‘नहीं' कहते बनता था। अब तक वह शान्ता के सम्बन्ध में अपने को निर्दोष समझते थे। उन्होंने इस अन्याय का सारा भार अपने भाई के सिर डाल दिया था और सदन तो उनके विचार में काठ का पुतला था। लेकिन अब इस जाल मे फंसकर वह भाग निकलने की चेष्टा करते थे। संसार का भय तो उन्हे नहीं था, भय था कि कही भैया यह न समझ ले कि यह सब मेरे सहारे से हुआ है, मैंने ही सदन को बिगाड़ा हूँ। कही यह सन्देह उनके मन में उत्पन्न हो गया तो फिर वह कभी मुझे क्षमा न करेगें। पद्मसिंह कई मिनट तक इसी उलझन में पड़े रहे। अन्त में वह बोले, सदन, यह समस्या इतनी कठिन है कि मैं अपने भरोसे पर कुछ नहीं कर सकता। भैया की राय लिए बिना 'हाँ' या 'नहीं’ कैसे कहूँ? तुम मेरे सिद्धान्त को जानते हो। मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूँ और प्रसन्न हूँ कि ईश्वर ने तुम्हें सद्बुद्धि दी। लेकिन मै भाई साहब की इच्छा को सर्वोपरि समझता हूँ। यह हो सकता है कि दोनों बहनों के अलग रहने का प्रबन्ध कर दिया जाय जिसमे उन्हें कोई कष्ट न हो। बस यही तक। इसके आगे मेरी कुछ सामर्थ्य नहीं है। भाई साहब की जो इच्छा हो वही करो। सदन——क्या आपको मालूम नहीं, कि वह क्या उत्तर देगे? पद्म——हाँ, यह भी मालूम है। सदन——तो उनसे पूछना व्यर्थ है। माता-पिता की आज्ञा से में अपनी जान दे सकता हूँ, जो उन्हीं की दी हुई है, लेकिन किसी निरपराध की गर्दन पर तलवार नहीं चला सकता। पद्म——तुम्हें इसमें क्या आपत्ति है कि दोनों बहनें एक अलग मकान में ठहरा दी जायँ। सदन ने गर्म होकर कहा, ऐसा तो मैं तब करूँगा, जब मुझे छिपाना हो। में कोई पाप करने नहीं जा रहा हूँ, जो उसे छिपाऊँ। यह मेरे जीवन-का परम कर्त्तव्य है उसे गत रखने की आवश्यकता नहीं है। अब तक विवाह के जो संस्कार नहीं पूरे हुए है वह कल गंगा के किनारे पूरे किये जायँगे। यदि आप वहाँ आने की कृपा करेगे तो मैं अपना सौभाग्य समझूँगा, नहीं तो ईश्वरके दरबार में गवाहो के बिना भी प्रतिज्ञा हो जाती है। यह कहता हुआ सदन उठा और घर में चला गया। सुभद्रा ने कहा, वहाँ, खूब गायब होते हो, सारी रात जी लगा रहा। कहाँ रह गए थे? सदन ने रात का सारा वत्तान्त चाची से कहा। चाची से बातचीत करने में उसे वह झिझक न होती थी जो शर्मा जी से होती थी। सुभद्रा ने उसके साहस की बड़ी प्रशसा की। बोली, माँ बाप के डर से कोई अपनी व्याहता को थोड़े ही छोड़ देता है। दुनिया हँसेगी तो हँसा करे। उसके डर से अपने घर के प्राणी की जान ले ले? तुम्हारी अम्मा से डरती हूँ, नहीं तो उसे यही रखती। सदन ने कहा, मुझे अम्मा दादा की परवाह नहीं है। सुभद्रा——बहुत परवाह तो की। इतने दिनों तक बेचारी को घुला शर्मा--वहाँ लच्छेदार बातों और तीव्र समालोचनाओें के सिवा और क्या रखा है? ५० सदन सिंह का विवाह संस्कार हो गया? झोपड़ा खूब सजाया गया था। वही मंडप का काम दे रहा था, लेकिन कोई भीड़ भाड़ न थी। पद्मसिंह उसी दिन घर चले गये और मदनसिंह से सब समाचार कहा। वह यह सुनते ही आग हो गये, बोले, मैं उस छोकरे का सिर काट लूँगा, वह अपने को समझता क्या है? भामा ने कहा, मैं आज ही जाती हूँ उसे समझाकर अपने साथ लिवा लाऊँगी। अभी नादान लड़का है। उस कुटनी सुमन की बातों मे आ गया है। मेरा कहना वह कभी न टालेगा। लेकिन मदनसिंह ने भामा को डाँटा और धमका कर कहा, अगर तुमने उधर जाने का नाम लिया तो मैं अपना और तुम्हारा गला एक साथ ही घोंट दूंँगा। वह आग में कूदता है कूदने दो। ऐसा दूध पीता नादान बच्चा नहीं है। यह सब उसकी जिद्द है। बच्चू को भीख मगाकर न छोड़ूँ तो कहना। सोचते होगे दादा मर जायेंगे तो आनन्द करेगा। मुंँह घो रखें, यह कोई जायदाद नहीं है। यह मेरी अपनी कमाई है। सब-की-सब कृष्णार्पण कर दूँगा। एक फूटी कौड़ी तो मिलेगी ही नहीं। गाँव में चारो ओर बतकहाव होने लगा। लाला बैजनाथ को निश्चय हो गया कि संसार से धर्म उठ गया। जब लोग ऐसे-ऐसे नीच कर्म करने लगे तो धर्म कहांँ रहा? न हुई नवाबी, नहीं तो आज बचूकी धज्जियाँ उड़ जाती। अब देखें कौन मुँह लेकर गाँव में आते है। पद्मसिंह रात को बहुत देरतक भाई के साथ बैठे रहे, लेकिन ज्योंही वह सदन का कुछ जिक्र छेड़ते, मदनसिंह उनकी ओर ऐसी आग्नेय दृष्टिय देखते कि उन्हें बोलने की हिम्मत न पड़ती। अन्त में जब वह सोने चले तो पद्मसिंह ने हताश होकर कहा, भैया, सदन आपसे अलग रहे तब भी आपका लड़का ही कहलावेगा। वह जो कुछ नेक बद करेगा उसकी बदनमी हम सब पर आवेगी। जो लोग इस अवस्था को भलीभाँति जानते है, वह चाहे हम लोगों को निर्दोष समझे, लेकिन जनता सदन में और हम में कोई भेद नहीं कर सकती, तो इससे क्या फायदा कि साँप भी न मरे और लाठी भी टूट जाय। एक ओर दो बुराइयाँ है, बदनामी भी होती है और लड़का भी हाथ से जाता है। दूसरी ओर एक ही बुराई है, बदनामी होगी, लेकिन लड़का अपने हाथ में रहेगा। इसलिए मुझे तो यही उचित जान पड़ता है। कि हमलोग सदन को समझाने और यदि वह किसी तरह न माने तो ..... मदनसिंह ने बात काटकर कहा, तो उस चुड़ैल से उसका विवाह ठान दे? क्यों यही न कहना चाहते हो? यह मुझसे न होगा। एकबार नहीं, हजार बार नहीं। यह कहकर वह चुप हो गये। एक क्षण के बाद पद्मसिंह को लांछित कर के बोले, आश्चर्य यह है कि यह सब कुछ तुम्हारे सामने हुआ और तुम्हें जरा भी खबर न हुई। उसने नाव ली, झोपड़ा बनाया, दोनों चुड़ैलो से साँठ गाँठ की और तुम आँखे बन्द किये बैठे रहे। मैंने तो उसे तुम्हारे ही भरोसे भेजा था। यह क्या जानता था कि तुम कान में तेल डाले बैठे रहते हो। अगर तुमने जरा भी चतुराई से काम लिया होता तो यह नौबत न आती। तुमने इन बातों की सूचना तक मुझे न दी नहीं तो मैं स्वयं जाकर उसे किसी उपाय से बचा लाता। अब जब सारी गोटियाँ पिट गई, सारा खेल बिगड़ गया तो चले हो वहाँ से मुझसे सलाह लेने। मैं साफ-साफ कहता हूँ कि तुम्हारी आनाकानी से मुझे तुम्हारे ऊपर भी सन्देह होता है। तुमने जान-बूझकर उसे आग मे गिरने दिया। मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुराईयाँ की थी, उनका तुमने बदला लिया खैर; कल प्रात काल एक दान-पत्र लिख दो। तीन पाई जो मौरूसी जमीन है। उसे छोड़कर में अपनी सब जायदाद कृष्णार्पण करता हूँ। यहाँ न लिख सको तो वहाँ से लिखकर भेज देना। मैं दस्तखत कर दूँगा और उसकी रजिस्ट्री हो जायगी। यह कहकर मदनसिंह सोने चले गये। लेकिन पद्मसिंह के मर्म-स्थान पर ऐसा बार कर गये कि वह रातभर तड़पते रहे। जिस अपराघ से बचने के लिए उन्होंने अपने सिद्धान्तों की भी परवाह न की और अपन सहवर्गियों में बदनाम हुए, वह अपराध लग ही गया। इतना ही नहीं, भाई के हृदय उनकी ओर से मैल पड़ गई। अब उन्हें अपनी भूल दिखाई दे रही थी। निस्संदेह अगर उन्होंने बुद्धिमानी से काम लिया होता तो यह नौवत न आती। लेकिन इस वेदना में इस विचार से कुछ सन्तोष होता था कि जो कुछ हुआ सो हुआ एक अबला का उद्धार तो हो गया। प्रातःकल जब वह घर से चलने लगें तो भामा रोती हुई आई और बोली, भैया, इनका हठ तो देख रहे हो, लड़के की जान ही लेने पर उतारू है, लेकिन तुम जरा सोच-समझकर काम करना। भूल चूक तो बड़े बड़ो से हो जाती है, वह बेचारा तो अभी नादान लड़का है। तुम उसकी ओर से मन न मोटा करना। उसे किसी की टेढ़ी निगाह भी सहन नहीं है। ऐसा न हो, कहीं देश विदेश की राह ले तो तो मैं कही की न रहूँ, उसकी सुध लेते रहना। खाने पीने की तकलीफ न होने पाये। यहाँ रहता था तो एक भैंस का दूध पी जाता था, उसे दाल में घी अच्छा नहीं लगता, लेकिन में उससे छिपाकर लोदे के लोदे दाल में डाल देती थी। अब इतना सेवा जतन कौन करेगा। न जाने बेचारा कैसे होगा? यहाँ घर पर कोई खानेवाला नहीं, वहाँ वह इन्हीं चीजों के लिए तरसता होगा। क्यों भैया, क्या अपने हाथ से नाव चलाता है। पद्म--नहीं, दो मल्लाह रख लिए है। भामा--तब भी दिनभर दौड़-धूप तो करनी ही पड़ती होगी। मजूर बिना देख-भाले थोड़े ही काम करते है मेरा तो यहाँ कुछ बस नहीं है, उसे तुम्हें सौंपती हैं। उसे अनाथ समझकर खोज खबर लेते रहना। मेरा रोंआ रोंआ तुम्हे आशीर्वाद देगा। अबकी कार्तिक-स्नान उसे जरूर से देखने जाऊँगी। कह देना, तुम्हरी अम्माँ तुम्हे बहुत याद करती थी, बहुत रोती थीं। यह सुनकर उसे ढाढस हो जायगा। उसका जी बड़ा कच्चा है। मुझे याद करके रोज रोता होगा। यह थोड़े से रुपये है, लेते जाओ, उसके पास भिजवा देना। पद्म--इसकी क्या जरूरत है? मैं तो वहाँ हूँ ही मेरे देखते उसे किसी बात की तकलीफ न होने पावेगी। भामा--नहीं भैया, लेते जाओ, क्या हुआ। इस हाँडी में थोडा सा घी है, यह भी भेजवा देना। बाजारू घी घर के घी को कहाँ पाता है, न वह सुगन्ध न वह स्वाद। उसे अमावट की चटनी बहुत अच्छी लगती है, मैं थोड़ी सी अमावट भी रखे देती हूँ। मीठे-मीठे आम चुनकर रस निकाला था। समझाकर कह देना, बेटा, कोई चिन्ता मत करो। जब तक तुम्हारी माँ जीती है, तुमको कोई कष्ट न होने पावेगा। मेरे तो वही एक अन्धे की लकड़ी है। अच्छा है तो, बुरा है तो, अपना ही है। संसार की लाज से आँखो से चाहे दूर कर दूँ, लेकिन मन से थोड़े ही दूर कर सकती हूँ। ५१ जैसे सुन्दर भाव के समावेश से कविता में जान पड़ जाती है और सुन्दर रंगो से चित्रों में उसी प्रकार दोनों बहनो के आने से झोपड़े में जान आ गई है। अन्धी आँखों में पुतलियाँ पड़ गई है। मुरझायी हुई कली शान्ता अब खिलकर अनुपम शोभा दिखा रही है। सूखी हुई नदी उमड़ पड़ी है। जैसे जेठ वैसाख की तपन की मारी हुई गाय सावन में निखर जाती है और खेतों में किलोलें करने लगती है, उसी प्रकार विरह की सताई हुई रमणी अब निखर गई है, प्रेम में मग्न है। नित्यप्रति प्रातःकाल इस झोपड़े से दो तारे निकलते है और जाकर गंगा में डूब जाते है? उनमें से एक बहुत दिव्य और द्रुतगामी है, दूसरा मध्यम और मन्द। एक नदी में थिरकता है, नाचता है, दूसरा अपने वृत्त से बाहर नहीं निकलता। प्रभात की सुनहरी किरणों मे इन तारों का प्रकाश मन्द नहीं होता, वे और भी जममगा उठते हैं। शान्ता गाती है, सुमन खाना पकाती है, शान्ता अपने केशों को सँवारती है, सुमन कपड़े सीती है, शान्ता भूखे मनुष्य के समान भोजन के थालपरट्ट पड़ती है सुमन किसी रोगी के सदृश सोचती है कि मैं अच्छी हूँगी या नहीं। सदन के स्वभाव में भी अब कायापलट हो गया है। वह प्रेम का आनन्द भोग करने में तन्मय हो रहा है। वह अब दिन चढ़े उठता है, घण्टों नहाता है, बाल संवारता है, कपड़े बदलता है, मुगन्ध मलता है। नौ बजे से पहले वह अपनी बैठक में नहीं आता और आता भी है तो जमकर बैठता नहीं, उसका मन कहीं और रहता है। एक-एक पल में भीतर जाता है और अगर बाहर किसी से बात करने में देर हो जाती है, तो उकताने लगता है। शान्ता ने उस पर वशीकरण मन्त्र डाल दिया है। सुमन घर का सारा काम भी करती है और बाहर का भी। वह घड़ी रात रहे उठती है और स्नान-पूजा के बाद सदन के लिए जलपान बनाती है। फिर नदी के किनारे आकर नाव खुलवाती है। नौ बजे भोजन बनाने बैठ जाती है। ग्यारह बजेतक यहाँ से छुट्टी पाकर वह कोई-न-कोई काम करने लगती है। नौ बजे रात को जब सब लोग सोने चले जाते है, तो वह पढ़ने बैठ जाती है, तुलसी की विनय पत्रिका और रामायण से उसे बहुत प्रेम है। कभी भक्तमाल पढ़ती है, कभी विवेकानन्द के व्याख्यान और कभी रामतीर्थ लेख। वह विदुषी स्त्रियों के जीवनचरित्रों को बड़े चाव से पढ़ती है। मीरा पर उसे असीम श्रद्धा है। वह बहुधा धार्मिक ग्रन्य ही पढ़ती है। लेकिन जानकी अपेक्षा भक्ति में उसे अधिक शांति मिलती है। मल्लाहों की स्त्रियों में उसका बड़ा आदर है, वह उनके झगड़े चुकाती है, किसी के बच्चे के लिए कुर्ता टोपी सीती है, किसी के लिए अर्जन या घुट्टी बनाती है। उनमें कोई बीमार पड़ता है तो उसके घर जाती है और दवा दारू की फिक्र करती है वह अपनी गिरी दिवाल को फिरसे उठा रही है। उस बस्ती के सभी नर-नारी उसकी प्रशंसा करते है और उसका यश गाते है। हाँ, अगर आदर नहीं है तो अपने घर में। सुमन इस तरह जी तोड़कर घर का सारा बोझ सँभाले हुए हैं, लेकिन मदन के मुँह से कृतज्ञता का एक शब्द भी नहीं निकलता। शान्ता भी उसके इस परिश्रम का कुछ मूल्य नहीं समझती। दोनों के दोनों उसकी ओर से निश्चिन्त है, मानो वह घर की लौंडी है और चक्की में जुते रहना ही उसका धर्म है। कभी-कभी उसके सिर में दर्द होने लगता है, कभी दौड़ धूप से बुखार चढ़ आता है, तब भी वह घर का सारा काम रीत्यानुसार करती रहती है। वह कभी-कभी एकान्त में अपनी इस दीन दशा पर घंण्टो रोती रहती है, पर कोई ढाढ़स देने वाला, कोई आँसू पोंछने वाला नहीं। सुमन स्वभाव से ही मानिनी, सगर्वा स्त्री थी। वह जहाँ कही रही थी रानी बनकर रही थी। अपने पति घर वह सब कष्ट झेलकर भी रानी थी। विलास नगर में वह जबतक रही उसी का सिक्का चलता रहा, आश्रम में वह सेवा-धर्म पालन करके सर्वमान्य बनी हुई थी। इसलिए अब यहाँ इस हीनावस्था में रहना उसे असहय था। अगर सदन कभी-कभी उसकी प्रशंसा कर दिया करता, कभी उससे सलाह लिया करता, उसे अपने घर की स्वामिनी समझा करता या शान्ता उसके पास बैठकर उसकी हाँ में हाँ मिलाती, उसका मन बहलाती तो सुमन इससे भी अधिक परिश्रम करती और प्रसन्नचित्त रहती। लेकिन उन दोनो प्रमियों को अपनी तरग में और कुछ न सूझता था। निशाना मारते समय दृष्टि केवल एक ही वस्तु पर रहती है। प्रेमासक्त मनुष्य का भी यही हाल होता है। लेकिन शान्ता और सदन की यह उदासीनता प्रेमलिप्सा के ही कारण थी, इसमें सन्देह है। सदन इस प्रकार सुमन से बचता था, जैसे हम कुप्ट रोगी से बचते है, उस पर दया करते हुए भी उसके समीप जाने की हिम्मत नहीं रखते। शान्ता उस पर अविश्वास करती थी, उसके रूपलावण्य से डरती थी। कुशल यही थी कि सदन स्वयं सुमन से आँखे चुराता था, नहीं तो शान्ता इससे जल ही जाती। अतएव दोनो चाहते थे कि यह आस्तीन का साँप आँखो से दूर हो जाय, लेकिन संकोच वश वह आपस में भी इस विषय को छेड़ने से डरते थे। सुमन पर यह रहस्य शनैं• शनै• खुलता जाता था। एक बार जीतन कहार शर्मा जी के यहाँ से सदन के लिए कुछ सौगात लाया था। इसके पहले भी वह कई बार आया था, लेकिन उसे देखते ही सुमन छिप जाया करती थी। अबकी जीतन की निगाह उस पर पड़ गई। सदन के स्वभाव में भी अब कायापलट हो गया है। वह प्रेम का आनन्द भोग करने में तन्मय हो रहा है। वह अब दिन चढ़े उठता है, घण्टो नहाता है, बाल सँवारता है, कपडे बदलता है, सुगन्ध मलता है। नौ बजेसे पहले वह अपनी बैठक में नही आता और आता भी है तो जमकर बैठता नही, उसका मन कही और रहता है। एक-एक पलमें भीतर जाता है और अगर बाहर किसी से बात करनेमें देर हो जाती है, तो उकताने लगता है। शान्ताने उसपर वशीकरण मन्त्र डाल दिया है। सुमन घरका सारा काम भी करती है और बाहरका भी वह घडी रात रहे उठती है और स्नान-पूजाके बाद सदनके लिए जलपान बनाती है। फिर नदीके किनारे आकर नाव खुलवाती है। नौ बजे भोजन बनाने बैठ जाती है। ग्यारह बजे तक यहाँ से छुट्टी पाकर वह कोई-न-कोई काम करने लगती है। नौ बजे रात को जब सब लोग सोने चले जाते है, तो वह पढ़ने बैठ जाती है, तुलसी की विनय पत्रिका और रामायण से उसे बहुत प्रेम है। कभी भक्तमाल पढ़ती है, कभी विवेकानन्द के व्याख्यान और कभी रामतीर्थ लेख। वह विदुषी स्त्रियों के जीवनचरित्रों को बडे चावसे पढ़ती है। मीरापर उसे असीम श्रद्धा है। वह बहुधा धार्मिक ग्रन्थ ही पढ़ती है। लेकिन ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिमे उसे अधिक शांति मिलती है। मल्लाहों की स्त्रियों में उसका बडा आदर है, वह उनके झगड़े चुकाती है, किसीके बच्चे के लिए कुर्सी टोपी सीती है, किसीके लिए अञ्जन या घुट्टी बनाती है। उनमें कोई बीमार पड़ता है तो उसके घर जाती है और दवा दारूकी फिक्र करती है। वह अपनी गिरी दिवाल को फिरसे उठा रही है। उस बस्ती के सभी नर-नारी उसकी प्रशंसा करते है और उसका यश गाते है। हाँ, अगर आदर नही है तो अपने घर में। सुमन इस तरह जी तोड़कर घरका सारा बोझ संभाले हुए है,लेकिन सदनके मुहसे कृतज्ञता का एक शब्द भी नही निकलता। शान्ता भी उसके इस परिश्रम का कुछ मूल्य नही समझती। दोनों के दोनों उसकी ओर से निश्चिन्त है, मानो वह घर की लड़ी है और चक्की में जुते रहना ही उसका धर्म है। कभी-कभी उसके सिर में दर्द होने लगता है,कभी दौड़ धूप से बुखार चढ़ आता है, तब भी वह घर का सारा काम रीत्यानुसार करती रहती है। वह कभी-कभी एकान्तमे अपनी इस दीन दशापर घण्टो रोती रहती है, पर कोई ढाढस देनेवाला, कोई आँसू पोंछने वाला नहीं। सुमन स्वभाव से ही मानिनी, सगर्वा स्त्री थी। वह जहाँ कही रही थी रानी बनकर रही थी। अपने पति के घर वह सब कष्ट झेलकर भी रानी थी। विलास नगर मे वह जबतक रही उसी का सिक्का चलता रहा, आश्रम में वह सेवा-धर्म पालन करके सर्वमान्य बनी हुई थी। इसलिए अब यहाँ इस हीनावस्था मे रहना उसे असहय था। अगर सदन कभी-कभी उसकी प्रशंसा कर दिया करता, कभी उससे सलाह लिया करता, उसे अपने घर की स्वामिनी समझा करता या शान्ता उसके पास बैठकर उसकी हाँ में हाँ मिलाती, उसका मन बहलाती तो सुमन इससे भी अधिक परिश्रम करती और प्रसन्नचित्त रहती। लेकिन उन दोनों प्रेमियों को अपनी तरंग में और कुछ न सूझता था। निशाना मारते समय दृष्टि केवल एक ही वस्तुपरक रहती है। प्रेमासक्त मनुष्य का भी यही हाल होता है। लेकिन शान्ता और सदन की यह उदासीनता प्रेमलिप्साके ही कारण थी, इसमे सन्देह है। सदन इस प्रकार सुमन से बचता था, जैसे हम कुष्ठ रोगी से बचते है, उस पर दया करते हुए भी उसके समीप जानेकी हिम्मत नही रखते। शान्ता उसपर अविश्वास करती थी, उसके रूपलावण्य से डरती थी। कुशल यही थी कि सदन स्वयं सुमन से आँखे चुराता था, नही तो शान्ता इससे जल ही जाती। अतएव दोनों चाहते थे कि यह आस्तीन का सांप आँखो से दूर हो जाय, लेकिन संकोचवश वह आपस में भी इस विषय को छेड़ने से डरते थे। सुमनपर यह रहस्य शनैः शनैः खुलता जाता था। एक बार जीतन कहार शर्माजी के यहाँ से सदन के लिए कुछ सौगात लाया था। इसके पहले भी वह कई बार आया था, लेकिन उसे देखते ही सुमन छिप जाया करती थी। अबकी जीतन की निगाह उसपर पड़ गई। फिर क्या था, उसके पेट में चूहे दौड़ने लगे। वह पत्थर खाकर पचा सकता था, पर कोई बात पचाने की शक्ति उसमे न थी। मल्लाहों के चौधरी के पास चिलम पीने के बहाने गया और सारी रामकहानी सुना आया। अरे! यह तो कस्त्रीन है, खसम ने घर से निकाल दिया तो हमारे यहाँ खाना पकाने लगी, वहाँ से निकाली गई तो चीकमे हरजाईपन करने लगी, अब देखता हूँ तो यहाँ विराजमान है। चौधरी सन्नाटे में आ गया, मल्लाहिनों में भी इशारेबाजियाँ होने लगी। उस दिन से कोई मल्लाह सदन के घर का पानी न पीता, उनकी स्त्रियों ने सुमन के पास आना जाना छोड़ दिया। इसी तरह एक बार लाला भगतराम ईटों की लदाई का हिसाब करने आये। प्यार से मालूम हुई तो मल्लाह से पानी लाने को कहा। मल्लाह कुएँ से पानी लाया। सदन के घर में बैठे हुए बाहर से पानी मँगाकर पीना सदन की छाती में छुरी मारने से कम न था। अन्त में दूसरा साल जाते जाते यहाँ तक नौवत पहुँची कि सदन जरा-जरा सी बात पर सुमन से झुँझला जाता और चाहे कोई लागू बात न कहे, पर उसके मन के भाव झलक ही पड़ते थे। सुमन को मालूम हो रहा था कि अब मेरा निर्वाह यहाँ न होगा। उसने समझा था कि यही बहन-बहनोई के साथ जीवन समाप्त हो जायगा। उनकी सेवा करुँगी, एक टुकड़ा खाऊँगी और एक कोने में पड़ी रहूँगी। इसके अतिरिक्त जीवन में अब उसे कोई लालसा नहीं थी। लेकिन हा शोक! यह तख्ता भी उसके पैरो के नीचे से सरक गया और अब यह निर्दयी लहरों की गोद में थी। लेकिन सुमन को अपनी परिस्थिति पर दु:ख चाहे कितना ही हुआ हो, उसे सदन या शान्ता से कोई शिकायत न थी। कुछ तो धार्मिक प्रेम और कुछ अपनी अवस्था के वास्तविक ज्ञान से उसे अत्यन्त नम्र विनीत बना दिया था। वह बहुत सोचती कि कहाँ जाऊँ, जहाँ अपनी जान-पहचान का कोई आदमी न हो लेकिन उसे ऐसा कोई ठिकाना न दिखाई देता। अभी तक उसकी निर्बल आत्मा कोई अवलम्ब चाहती थी। बिना किसी सहारे के संसार मे रहने का विचार करके उसका कलेजा काँपने लगता था। वह अकेली असहाय, संसार-संग्राम में आने का साहस न कर सकती थी। जिस संग्राम में बड़े-बड़े कुशल, धर्मशील, दृढ संकल्प मनुष्य मुँह की खाते हैं, वहाँ मेरी क्या गति होगी। कौन मेरी रक्षा करेगा? कौन मुझे सँभालेगा? निरादर होने पर भी यह शंका उसे यहाँ से निकलने न देती थी। एक दिन सदन दस बजे कही से घूमकर आया और बोला, भोजन में अभी कितनी देर है, जल्दी करो। मुझे पंण्डित उमानाथ से मिलने जाना है। चाचा के यहाँ आये हुए है। शान्ता ने पूछा, वह यहाँ कैसे आये? सदन--अब यह मुझे क्या मालूम? अभी जीतन आकर कह गया है कि वह आये हुए है और आज ही चले जायेंगे। यहाँ आना चाहते थे, लेकिन (सुमन की ओर इशारा करके) किसी कारण से नहीं आए। शान्ता--तो जरा बैठ जाओ, यहाँ अभी घण्टों की देर है। सुमन ने झुँझलाकर कहा, देर क्या है, सब कुछ तो तैयार है। आसन बिछा दो, पानी रख दो, मैं थाली परसती हूँ। शान्ता--अरे, तो जरा ठहर ही जायेंगे तो क्या होगा? कोई डाक गाड़ी छूटी जाती है? कच्चा-पक्का खाने का क्या काम? सदन--मेरी समझ नहीं आता कि दिनभर क्या होता रहता है! जरा-सा भोजन बनाने में इतनी देर हो जाती है। सदन जब भोजन करके चला गया, तब सुमन ने शान्ता से पूछा, क्यों शान्ता, सच बता, तुझे मेरा यहाँ रहना अच्छा नहीं लगता? तेरे मन में जो कुछ हैं वह मैं जानती हूँ, लेकिन तू जब तक अपने मुँह से मुझे दुत्कार न देगी, मैं जाने का नाम न लूँगी। मेरे लिए कही ठिकाना नहीं है। शान्ता--बहन, कैसी बात कहती हो, तुम रहती हो तो घर संभला हुआ है, नहीं तो मेरे किए क्या होता? सुमन--यह मुँह देखी बात मत करो, मैं ऐसी नादान नही हूँ। मैं तुम दोनों आदमियों को अपनी ओर से कुछ खिंचा हुआ पाती हूँ। शान्ता-तुम देखती हो, तुम्हारी आँखो की क्या बात है, वह तो मन तक की बात देख लेती है। सुमन-आँखे सीधी करके बोली, क्या जो कुछ मैं कहती हूँ, झूठ है? शान्ता—जब तुम जानती हो तो पूछती क्यों हो? सुमन-इसलिए कि सब कुछ देख कर आँखो पर विश्वास नहीं आता। संसार मुझे चाहे कितना ही नीच समझे, मुझे उससे कोई शिकायत नहीं है, वह मेरे मन का हाल नहीं जानता, लेकिन तुम सब कुछ देखते हुए भी मुझे नीच समझती हो, इसका आश्चर्य है। मैं तुम्हारे साथ लगभग दो वर्ष से हूँ, इतने दिनों में तुम्हें मेरे चरित्र का परिचय अच्छी तरह हो गया होगा। शान्ता-नहीं बहन, मैं परमात्मा से कहती हूँ, यह बात नही हैं। हमारे ऊपर इतना बड़ा कलंक मत लगाओ। तुमने मेरे साथ जो उपकार किये है, वह मैं कभी न भूलूँगी। लेकिन बात यह है कि उनकी बदनामी हो रही है। लोग मनमानी बातें उड़ाया करते है। वह (सदनसिंह) कहते थे कि सुभद्रा जी यहाँ आने को तैयार थी, लेकिन तुम्हारे रहने की बात सुनकर नहीं आई और बहन बुरा न मानना, जब संसार में यही प्रथा चल रही है तो हम लोग क्या कर सकते है। सुमन ने विवाद न किया। उसे आज्ञा मिल गई। अब केवल एक रुकावट थी। शान्ता थोड़े ही दिनों में बच्चे की माँ बनने वाली थी। सुमन ने अपने मन को समझाया; इस समय छोड़कर चली जाऊँगी तो इसे कष्ट होगा। कुछ दिन और सह लूँ, जहाँ इतने दिन काटे हैं, महीने दो महीने और सही। मेरे ही कारण यह इस विपत्ति में फँसे हुए है। ऐसी अवस्था में इन्हें छोड़कर जाना मेरा धर्म नहीं है। सुमन का यहाँ एक-एक दिन एक-एक साल की तरह कटता था, लेकिन सब्र किये पड़ी हुई थी। पापहीन पक्षी पिंजरबद्ध रहने में ही अपना कुशल समझता है। ५२ पंडित पद्मसिंह के चार-पांच मास के सदुपयोग का यह फल हुआ कि २०-२५ वेश्याओं ने अपनी लड़कियों को अनाथालय में भेजना स्वीकार कर लिया। तीन वेश्याओं ने अपनी सारी सम्पत्ति अनाथालय के निमित्त अर्पण कर दो, पाँच वेश्याएँ निकाह करने पर राजी हो गई। सच्ची हिताकांक्षा कभी निष्फल नहीं होती। अगर समाज को विश्वास हो जाय कि आप उसके सच्चे सेवक हैं, आप उनका उद्धार करना चाहने है, आप निःस्वार्थ है तो वह आपके पीछे चलने को तैयार हो जाता है। लेकिन यह विश्वास सच्चे सेवाभावके बिना कभी प्राप्त नहीं होता। जब तक अन्त करण दिव्य और उज्ज्वल न हो, वह प्रकाश का प्रतिबिम्ब दूसरी पर नहीं डाल सकता। पद्मसिंह में सेवाभाव का उदय हो गया था। हममें कितने ही ऐसे सज्जन है जिनके मस्तिष्क से राष्ट्र की कोई सेवा करने का विचार उत्पन्न होता है, लेकिन बहुधा वह विचार ख्याति लाभ की आकाक्षा से प्रेरित होता है। हम वह काम करना चाहते हैं जिसमे हमारा नाम प्राणिमात्र की जिव्हा पर हो, कोई ऐसा लेख अथवा ग्रन्थ लिखना चाहते है, जिसकी लोग मुक्त कण्ठ से प्रशसा करे, और प्रायः हमारे इस स्वार्थ प्रेम का कुछ न कुछ बदला भी हमको मिल जाता है, लेकिन जनता के हृदय में हम घर नहीं कर सकते। कोई मनुष्य चाहे वह कितने ही दुःख में हो, उस व्यक्ति के सामने अपना शोक प्रकट नहीं करना चाहता जिसे वह अपना सच्चा मित्र न समझता हो। पद्मसिंह को अब दालमण्डी में जाने को बहुत अवसर मिलता था और वह वेश्याओं के जीवनका जितना ही अनुभव करते थे उतना ही उन्हें दु:ख होता था। ऐसी-ऐसी सुकोमल रमणियों को भोगविलास के लिए अपना सर्वस्व गँवाते देखकर उनका हृदय करुणा से विव्हल हो जाता था, उनकी आँखो से आँसू निकल पड़ते थे। उन्हें अवगत हो रहा था कि यह स्त्रियाँ विचारशून्य नहीं, भावशून्य नहीं, बुद्धिहीन नहीं, लेकिन मायाके हाथों- में पड़कर उनकी सारी सद्वृतियाँ उल्टे मार्गपर जा रही है, तृष्णाने उनकी आत्माओं को निर्बल, निश्चेष्ट बना दिया है। पद्मसिंह इस माया-जाल को तोड़ना चाहते थे, वह उन भूली हुई आत्माओं को सचेत किया चाहते थे, वह उनको इस अज्ञानावस्था से मुक्त किया चाहते थे, पर माया जाल इतना दृढ़ था और अज्ञानबन्धन इतना पुष्ट तथा निद्रा इतनी गहरी थी कि पहले छः महीनो में उससे अधिक सफलता न हो सकी, जिसका ऊपर वर्णन किया जा चुका है। शराब के नशे में मनुष्य की जो दशा हो जाती है वही दशा इन वेश्याओं की हो गयी थी। उधर प्रभाकरराव और उनके मित्रों ने उस प्रस्ताव के शेष भागों के फिर बोर्ड में उपस्थित किया। उन्होंने केवल पद्मसिंह से द्वेष हो जाने के कारण उन मन्तव्यों का विरोध किया था, पर अब पद्मसिंह का वेश्यानुराग देखकर वह उन्हीं के बनाये हुए हथियारों से उनपर आघात कर बैठे। पझसिंह उस दिन बोर्ड नहीं गये, डाक्टर श्यामाचरण नैनीताल गये हुए थे, अतएव ने दोनों मन्तव्य निर्विघ्न पास हो गये। बोर्ड की ओर से अलईपुर के निकट वेश्याओं के लिये मकान बनाये जा रहे थे। लाला भगतराम दत्तचित्त होकर काम कर रहे थे। कुछ कच्चे घर थे, कुछ पक्के, कुछ दुमजल, एक छोटा-सा बाजार, एक छोटा-सा औपवालय और एक पाठशाला भी बनाई जा रही थी। हाजी हाविम ने एक मसजिद बनवानी आरभ की थी और सेठ चिम्मनलाल की ओर से एक मन्दिर बन रहा था। दीनानाथ तिवारी ने एक बाग की नीबडाल दी थी। आशा तो थी कि नियत समय के अन्दर भगतराम काम समाप्त कर देगें, मिस्टर दत्त और पंडित प्रभाकरराव तथा मिस्टर शाकिर बेग उन्हें चैन न लेने देते थे। लेकिन काम बहुत था, और बहुत जल्दी करने पर भी एक साल लग गया। बस इसी की देर थी। दूसरे ही दिन वेश्याओं को दालमण्डी छोड़कर इन नये मकानो में आबाद होने का नोटिस दे दिया गया। लोगों को शंका थी कि वेश्याओं की ओर से इसका विरोध होगा पर उन्हें यह देखकर आमोदपूर्ण आश्चर्य हुआ कि वेश्याओं ने प्रसन्नतापूर्वक इस आज्ञा का पालन किया। सारी दालमण्डी एक दिन में खाली हो गई। जहाँ निशिबासर एक श्री-सी बरसती थी वहाँ सन्ध्या होते सन्नाटा छा गया? महबूब जान एक धनसम्पन्न वेश्या थी। उसने अपना सर्वस्व अनाथालय के लिये दान कर दिया था। सन्ध्या समय सब वेश्याएँ उसके मकान पर एकत्रित हुई, वहाँ एक महती सभा हुई। शाहजादी ने कहा, बहनों, आज हमारी जिंदगी का एक नया दौर शुरू होता है। खुदाताला हमारे इरादे में बरकत दे और हमे नेक रास्ते पर ले जाय। हमने बहुत दिन बे-शर्मी और जिल्लतकी जिन्दगी बसर की, बहुत दिन शैतान की कद में रही। बहुत दिनों तक अपनी रूह (आत्मा) और ईमान का खून किया और बहुत दिनों तक मस्ती और ऐश परस्ती में भूली रही। इस दालमण्डी की जमीन हमारे गुनाहो से सियाह हो रही है। आज खुदाबंद करीम ने हमारी हालत पर रहम करके कदगुनाहसे निजात् (मुक्ति) दी है, इसके लिये हमे उसका शुक्र करना चाहिये। इसमें शक नहीं, कि हमारी कुछ बहनों को यहाँ से जलावतन होने का कलंक होता होगा, और इसमें भी शक नहीं है कि उन्हें आनेवाले दिन तारीक नजर आते होंगे। उन बहनो से मेरा यही इल्तमास है कि खुदाने रिज्क (जीविका) का दरवाजा किसी पर बन्द नहीं किया है। आपके पास वह हुनर है कि उसके कदरदाँ हमेशा रहेगें। लेकिन अगर हमको आइन्दा तकलीफें भी हों तो हमको साबिर व शाकिर (शान्त) रहना चाहिये। हमे आइन्दा जितनी ही तकलीफें होगी उतना ही हमारे गुनाहों का बोझ हलका होगा। मैं फिर खुदा से दुआ करती हूँ कि वह हमारे दिलों को अपनी रौशनी से रौशन करे और हमें राहे नेक पर लाने की तौफीक (सामर्थ) दे। रामभोली बाई बोली, हमे पंण्डित पद्मसिंह शर्मा को हृदय से धन्यबाद देना चाहिये, जिन्होंने हमको धर्म मार्ग दिखाया है। उन्हे परमात्मा सद सुखी रखे। जहराजान बोलो, मैं अपनी बहनों से यही कहना चाहती हूँ कि वह आइन्दा से हलाल हराम का ख्याल रखें। गाना बजाना हमारे लिये हलाल है। इसी हुनर में कमाल हासिल करो। बदकार रईसों की शुरूवत (कासातुरता) का खिलौना बनना छोड़ना चाहिये। बहुत दिनों तक की इच्छा न होती थी। अकस्मात् कुत्तों के भूँकने से किसी नये आदमी के गाँव आने की सूचना दी। मदनसिंह की छाती धड़कने लगी। कही सदन तो नहीं आ रहा है। किताब बन्द करके उठे तो पद्मसिंह को आते देखा। पद्मसिंहने उनके चरण छूए फिर दोनो भाइयों में बातचीत होने लगी । मदन-—सब कुशल हैं? पद्म-—जी हाँ, ईश्वर की दया है। मदन-भला उस बेईमान की भी कुछ खोज-खबर मिली है? पद्म-—जी हाँ, अच्छी तरह है। दसवें-पाँचवें मेरे यहाँ आया करता है। में कभी-कभी हाल-चाल पुछवा लेता हूँ। कोई चिन्ता की बात नहीं है। मदन-—भला वह पापी कभी हम लोगों की भी चर्चा करता है या बिल्कुल मरा समझ लिया? क्या यहाँ आने की कसम खा ली है। क्या हमलोग मर जायँगे तभी आवेगा? अगर उसकी यही इच्छा है तो हम लोग कहीं चले जायें। अपना घर द्वार ले अपना घर संभाले। सुनता हूँ, वहाँ मकान बनवा रहा है। वह तो वहाँ रहेगा और यहाँ कौन रहेगा। यह मकान जिसके लिये छोड़े देता है। पद्म-—जी नहीं, मकान वकान कहीं नहीं बनवाता, यह आपसे किसी ने झूठ कह दिया। हाँ, चूने की कल खड़ी कर ली है और यह भी मालूम हुआ है कि नदी पार थोड़ी सी जमीन भी लेना चाहता है। मदन--तो उमसे कह देना, पहले आकर इस घर में आग लगा जाय तब वहाँ जगह जमीन ले। पद्म--यह आप क्या कहते हैं, वह केवल आप लोगों की अप्रसन्नता के भय से नहीं आता। आज उसे मालूम हो जाय कि आपने उसे क्षमा कर दिया तो सिर के बल दौड़ा आवे। मेरे पास आता है तो घण्टों आप ही की बातें करता रहता है। आपकी इच्छा हो तो कल ही चला आवे। मदन--नहीं, मैं उसे बुलाता नहीं। हम उसके कोन होते है जो यहाँ आयेगा। लेकिन यहाँ आवे तो कह देना जरा पीठ मजबूत कर रखें। उसे देखते ही मेरे सिरपर शैतान सवार हो जायगा और मैं ठण्डा लेकर पिल पडूँगा। मूर्ख मुझसे रूठने चला है। तब नहीं रूठा था जब पूजा के समय पोयी पर राल टपक़ाता था। खाने की थाली के पास पेशाब करता था। उसके मारे कपड़े साफ न रहने पाते थे उजले कपड़ों को तरस के रह जाता था। मुझे साफ कपड़े पहने देखता तो बदन में धूल मिट्टी लपेटे आकर सिरपर सवार हो जाता! तब क्यों नहीं रूठा था। आज रूठने चला है। अबकी पाऊँ तो ऐसी कनेठी दूँ की छठी का दूध याद आ जायगा। दोनों भाई घर गये। भामा बैठी गाय को भूसा खिला रही थी और सदन की दोनों बहने खाना पकाती थी। भामा देवर को देखते ही खड़ी हो गई और बोली, भला तुम्हारे दर्शन तो हुए। चार पगपर रहते हो और इतना भी नहीं होता कि महिने में एक बार तो जाकर देख आवे--घरवाले मरे कि जीते है। कहो, कुशल से तो रहे? पद्म--हाँ, सब तुम्हारा आशीर्वाद है। कहो, खाना क्या बन रहा हैं? मुझे इस वक्त खीर, हलुवा और मलाई खिलाओ तो वह सुख संवाद सुनाऊँ कि फड़क जाओ। पोता मुबारक हो। भामा के मलिन मुखपर आनन्द की लालिमा छा गई और आँखो की पुतलियाँ पुष्प के समान खिल उठी। बोली, चलो, घी-शक्कर के मटके में डूबा दूँ, जितना खाते बने खाओ। मदनसिंह ने मुँह बनाकर कहा, यह तो तुमने बुरी खबर सुनाई। क्या ईश्वर के दरबार में उल्टा न्याय होता है? मेरा बेटा छिन जाय और उसे बेटा मिल जाय। अब वह एक से दो हो गया, मैं उससे कैसे जीत सकूँगा। हारना पड़ा। वह मुझे अवश्य खींच ले जाएगा। मेरे तो कदम अभी से उखड़ गये। सचमुच ईश्वर के यहाँ बुराई करनेपर भलाई होती है। उल्टी बात है कि नहीं। लेकिन अब मुझे चिन्ता नहीं है। सदन जहाँ चाहे जाय, ईश्वर ने हमारी सुन ली। कै दिन का हुआ है? पद्म--आज चौथा दिन है, मुझे छुट्टी नहीं मिली नहीं तो पहले ही दिन आता। मदन--क्या हुआ छठी तक पहुँच जायग, घूमधाम से छठी मनायेगे। बस कल चलो। भामा फूली न समाती थी। हृदय पुलकित हो रहा था। जी चाहता था कि किसे क्या दे दूँ? क्या लुटा दूँ? जी चाहता था घर में सोहर उठे, दरवाजे पर शहनाई बजे, पडोसिने बुलाई जायँ। गाने बजाने की मंगल ध्वनि से गाँव गूँज उठे। उसे ऐसा ज्ञात हो रहा था, मानो आज संसार में कोई असाधारण बात हो गई है, मानो सारा संसार सन्तानहीन है और एक में ही पुत्र पौत्रवती हूँ। एक मजदूर ने आकर कहा, भीजी एक साधु द्वारपर आये है। भामा ने तुरन्त इतनी जिन्स भेज दी जो चार साधुओं के खाने से भी न चुकती। ज्यों ही लोग भोजन कर चुके, भामा अपनी दोनों लड़कियों के साथ मोल लेकर बैठ गई और आधी राततक गाती रही। ५५ जिस प्रकार कोई मनुष्य लोभ के वश होकर आभूषण चुरा लेता है, पर विवेक होनेपर उसे देखने में भी उसे लज्जा आती है, उसी प्रकार सदन भी सुमन से बचता फिरता था। इतना ही नहीं, वह उसे नीची दृष्टि से देखता था और उसकी उपेक्षा करता था। दिन भर काम करने के बाद सया को उसे अपना यह व्यवसाय बहुत अखरता, विशेष करके चूने के काम में उसे बड़ा परिश्रम करना पड़ता था। वह सोचता, इसी सुमन के कारण से यो घर से निकाला गया हैं। इसी ने मुझे यह वनवास दे रखा है। कैसे आराम से घरपर रहता था। न कोई चिन्ता थी ने कोई झंझट चैन से खाता था और मौज करता था। इसी ने मेरे सिर यह मुसीबत ढा दी। प्रेम की पहली उमंग में उसने उसका बनाया हुआ भोजन सा लिया था, पर अब उसे बड़ा पछतावा होता था। वह चाहता था कि किसी प्रकार इससे गला छूट जाय। यह वही सदन है जो सुमन पर जान देता था, उसकी मुस्कानपर, मधुर बातोपर, कृपाकटाक्षपर अपना जीवनतक न्यौछावर करनेको तैयार था। पर सुमन आज उसकी दृष्टिमे इतनी गिर गयी है। वह स्वयं अनुभव करके भी भूल जाता था कि मानव प्रकृति कितनी चंचल है। सदनने इधर वर्षों से लिखना-पढना छोड़ दिया था और जबसे चूनेकी कल ली, तो वह दैनिक पत्र भी पढनेका अवकाश न पाता था। अब वह सझता था कि यह उन लोगोका काम है, जिन्हें कोई काम नही है, जो सारे दिन पड़े मक्खियाँ मारा करते है । लेकिन उसे बालोंको सँवारने हारमोनियम बजानेके लिये न मालूम कैसे अवकाश मिल जाता था। कभी-कभी पिछली बातोका स्मरण करके वह मनसे कहता है, मै उस समय कैसा मुर्ख था,इसी सुमनके पीछे लट्टू हो रहा था? वह अब अपने चरित्रपर घण्मड करता था। नदी के तटपर वह नित्य स्त्रियों को देखा करता था, पर कभी उसके मनमे कुभाव न पैदा होते थे। सदन इसे अपना चरित्रबल समझता था। लेकिन जब गांभणी शान्ताके प्रसूतका समय निकट आया,और वह बहुधा अपने कमरे में बन्द, मलीन, शिथिल पड़ी रहने लगी तो, सदन को मालूम हुआ कि मैं बहुत धोखे में था। जिसे मै चरित्रबल समझता था। वह वास्तवमे मेरे तृष्णाओं के सन्तुष्ट होने का फलमात्र था। अब वह कामपर से लौटता तो शान्ता मधुर मुस्कान के साथ उसका स्वागत न करती, वह अपनी चारपाई पर पडी रहती। कभी उसके सिर में दर्द होता, कभी शरीर में,कभी ताप चढ़ आता, कभी मतली होने लगती, उसका मुखचन्द्र कान्तिहीन हो गया था, मालूम होता था शरीर में रक्त ही नही है। सदन को उसकी यह दशा देखकर दुःख होता, वह घण्टों उसके पास बैठ कर उसका दिल बहलाता रहता, लेकिन उसके चेहरे से मालूम होता था कि उसे वहाँ बैठना अखर रहा है। वह किसी-न-किसी ‌बहाने से जल्द ही उठ जाता। उसकी विलासतृष्णाने मन को फिर चंचल करना शुरू किया, कुवासनाएँ उठने लगी। वह युवती मल्लाहिनों से हँसी करता, थी । स्वयं इस कल्पित बारातका दूल्हा बना हुआ सदन यहाँ से जाति सेवाका संकल्प करके उठा और नीचे उतर आया। वह अपने विचारों में ऐसा लीन हो रहा था कि किसी से कुछ न बोला। थोड़े ही दूर चला था कि उसे सुन्दर वाईके भवनके सामने बहुत से मनुष्य दिखाई दिये। उसने एक आदमी में पूछा, यह कैसा जमघट है? मालूम हुआ कि आज कुंवर अनिरुद्धसिंह यहाँ एक "कृषि सहायक सभा" खोलनेवाले है। सभा का उद्देश्य होगा, किसानों को जमीदारों के अत्याचार से बचाना। सदनके मन में अभी-अभी कृषकों के प्रति जो सहानुभूति प्रकट हुई थी वह मन्द पड़ गई। वह जमीदार था और कृषकों पर दया करना चाहता था, पर उसे मंजूर न था कि कोई उसे दवायें और किसानों को भड़काकर जमींदारो के विरुद्ध खड़ा कर दे। उसने मन से कहा, यह लोग जमींदारो सत्वों को मिटाना चाहते है। देवभाव से हो प्रेरित होकर इन लोगो ने यह संस्था खोलने का विचार किया है, तो हम लोगोंको भी सतर्क हो जाना चाहिये,हमको अपनी रक्षा करनी चाहिये। मानव प्रकृति को दबाव से कितनी घृणा है। सदनने यहांँ ठहरना व्यर्थ समझा। नौ बज गये थे। वह घरको लौटा। ५६ संध्याका समय है। आकाशपर लालिमा छाई हुई है और मन्द-वायु गंगाकी लहरोंपर क्रीड़ा कर रही है,उन्हें गुदगुदा रही है। वह अपने करुण नेंत्रोसे मुस्कराती है और कभी-कभी खिलखिलाकर हंँस पड़ती है,तब उसके मोती के दाँत चमक उठते है सदनका रमणीय झोपड़ा आज फूलों और लताओं से सजा हुआ है। दरवाजे पर मल्लाहो की भीड़ है। अन्दर उनकी स्त्रियांँ बैठी सोहर गा रही है। आंँगनमें भट्ठी खुदी हुई है और बड़े-बड़े हण्डे चढ़े हुए है। आज सदनके नवजात छठी है,यह उसीका उत्सव है। लेकिन सदन बहुत उदास दिखाई देता है। वह सामनेके चबूतरे पर बैठा हुआ गंगा की ओर देख रहा है। उसके हृदय में भी विचार की लहरे उठ रही है। ना! वह लोग न आवेगे। आना होता तो आज छः दिन बीत गये, आ न जाते? यदि मैं जानता कि वे न आवेगे तो मैं चचा से भी यह समाचार न कहता। उन्होंने मुझे मरा हुआ समझ लिया है, वह मुझसे कोई सरोकार नहीं रखना चाहते, मै जीऊँ-या मरूँ, उन्हें परवाह नहीं है। लोग ऐसे अवसर पर अपने शत्रुओं के घर भी जाते, है, प्रेम से न आते, दिखावे के ही लिये आते, व्यवहार के तौर-पर आते, मुझे मालूम तो हो जाता कि संसार में मेरा कोई है। अच्छा न आवे, इस काम से छुट्टी मिली तो एक बार मैं स्वयं जाऊँगा और सदा के लिये निपटारा कर आऊँगा। लड़का कितना सुन्दर है, कैसे लाल-लाल ओठ है, बिल्कुल मुझी को पड़ा है, हाँ, आँखे शान्ता की है। मेरी ओर कैसे ध्यान से युक-टुक ताकता था। दादा को तो मैं नहीं कहता, लेकिन अम्मा उसे देखे तो एक बार गोद में अवश्य ही ले ले। एकाएक सदन के मन में यह विचार हुआ, अगर मैं मर जाऊँ तो क्या हो? इस बालक का पालन कौन करेगा? कोई नहीं, नहीं, मैं मर जाऊँ तो दादा को अवश्य उसपर दया आवेगी। वह उतने निर्दय नहीं हो सकते। जरा देखें, सेविंग बैंक में मेरे कितने रुपये है। अभी एक हजार भी पूरे नहीं। ज्यादा नहीं, अगर ५०) महीना भी जमा करता जाऊँ तो सालभर में ६००J हो जायेगे। ज्योंही दो हजार पूरे हो जायेगें घर बनवाना शुरू कर दूँगा। दो कमरे सामने, पाँच कमरे भीतर, दरवाजे पर मेहराबदार सायवान पटावके ऊपर दो कमरे हों तो मकान अच्छा हो। कुरसी ऊँची रहने से घर की शोभा बढ़ जाती है। मैं कम-से कम पाँच फटकी कुरसी दूँगा। सदन इन्हीं कल्पनाओं का आनन्द ले रहा था। चारों ओर अन्धेरा छाने लगा था कि इतने में उसने सड़क की ओर से एक गाड़ी आती देखी। उसकी दोनों लालटेने बिल्ली की आँखी की तरह चमक रही थीं। कौन आ रहा है?, चाचा साहब के सिवा और कौन होगा? मेरा और है ही कौन? इतने में गाड़ी निकट आ गई और उसमें से मदनसिंह उतरे। इस गाड़ी के पीछे एक और गाड़ी थी। सुभद्रा और भामा उसमें उतरी। सदन को दोनों बहने भी थीं। जीतन कोचबक्स पर से उतरकर लालटेन दिखाने लगा। सदन इतने आदमियों को उतरते देखकर समझ गया कि घर के लोग आ गये पर वह उनसे मिलने के लिये नहीं दौड़ा। वह समय बीत चुका था जब वह उन्हें मनाने जाता। अब उसके मान करने का समय आ गया था। वह चबूतरे पर से उठकर झोपड़े में चला गया, मानों उसने किसी को देखा ही नहीं। उसने उनमें कहा, ये लोग समझते होगे कि इनके बिना में बेहाल हुआ जाता हूँ, पर उन्हे जैसे मेरी परवाह नहीं, उसी प्रकार में भी इनकी परवाह नहीं करता। सदन झोपड़े में जाकर ताक रहा था कि देखें यह लोग क्या करते है। इतने में उसने जीतन को दरवाजे पर आकर पुकारते हुए देखा। कई मललह इधर-उधर से दौड़े। सदन बाहर निकल आया और दूर से ही अपनी माता को प्रणाम करके एक किनारे खड़ा हो गया। मदनसिंह बोले, तुम तो इस तरह खड़े हो मानों हमें पहचानते ही नहीं। मेरे न सहीं, पर माता के चरण छूकर आशीर्वाद तो ले लो। सदन-मेरे छू लेने से आपका धर्म बिगड़ जायेगा। मदनसिंह ने भाई की ओर देखकर कहा देखते हो इसकी बात। मैं तो तुमसे कहता था कि लोगों को भूल गया होगा, लेकिन तुम खींच लाये। अपने माता पिता को द्वारपर खड़े देखकर भी इसे दया नहीं आती। भामा ने आगे बढ़कर कहा, बेटा सदन! दादा के चरण छुओ, तुम बुद्धिमान होकर ऐसी बातें करते हो! सदन अधिक मान न कर सका। आँखों में आँसू भरे पिता के चरणों पर गिर पड़ा। मदनसिंह भी रोने लगे। इसके बाद वह माता चरणों पर गिरा। भामा ने उठा कर छाती से लगा लिया और आशीर्वाद दिया। प्रेम, भक्ति और क्षमा कैसा मनोहर, कैसा दिव्य, कैसा आानन्दमय दृश्य है माता पिता का हृदय प्रेम से पुलकित हो रहा है और पुत्र के हृदय सागर में भक्ति की तरंगे उठ रही है। इसी प्रेम और भक्ति की निर्मल ज्योति से हदय को अँधेरी कोठरियाँ प्रकाश पूर्ण हो गई है। मिथ्या भिमान और लोकलज्जा या भयरूपी कीट पतंग वहाँ से निकल गये है। अब वहाँ न्याय, प्रेम और सव्यवहार का निवास है। आनन्द के मारे सदन के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। वह अब मल्लाहों को कोई-न-कोई काम करने का हुक्म देकर दिखा रहा है कि मेरा यहाँ कितना रोब है। कोई चारपाई निकालने जाता है, कोई बाजार दौड़ा जाता है। मदनसिंह फूले नहीं समाते और अपने भाई के कानों मे कहते हैं, सदन तो बड़ा चतुर निकला। मैं तो समझता था, किसी तरह पड़ा दिन काट रहा होगा, पर यहाँ तो बड़ा ठाठ है। इधर भामा और सुभद्रा भीतर गईं। भामा चारो ओर चकित होकर देखती थी। कैसी सफाई है! सब चीजे ठिकाने से रखी हुई है। इसकी बहन गुणवान मालूम होती है। वह सौरीगृह में गई तो शान्ता ने अपनी दोनों सासो के चरण स्पर्श किये। भामाने बालक को गोद में ले लिया। उसे ऐसा मालूम हुआ मानों वह कृष्ण का ही अवतार है। उसकी आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे। थोड़ी देर में उसने मदनसिंह से आकर कहा, और जो कुछ हो पर तुमने बहू बड़ी रूपवती पाई है। गुलाब का फूल है और बालक तो साक्षात भगवान का अवतार ही है। मदन--ऐसी तेजस्वी न होता तो मदनसिंह को खीच कैसे लाता? भामा--बहू बड़ी सुशील मालूम होती है। सदन-—तभी तो उसके पीछे माँ बाप को त्याग दिया था। सब लोग अपनी अपनी धुन मे मगन थे, पर किसी को सुधि न थी कि अभागिनी सुमन कहाँ है। सुमन गंगा तटपर सन्ध्या करने गई थी। जब वह लौटी तो उसे झोपड़े के द्बार पर गाड़ियाँ खड़ी दिखाई दी। दरवाजे पर कई आदमी बैठे थे। पद्मसिंह को पहचाना समझ गई कि सदन के माता-पिता आ गये। वह आगे न बढ़ सकी। उसके पैरो में बेड़ी-सी पड़ गई। उसे मालूम हो गया कि अब यहाँ मेरे लिये स्थान नहीं, है, अब यहाँ से मेरा नाता टूटता है। वह मूर्तिवत खड़ी सोचने लगी कि कहाँ जाऊँँ? इधर एक मास से शान्ता और सुमन में बहुत मनमुटाव हो गया था। वही शान्ता तो विधवा आश्रम में दया और शान्ति की मूर्ति बनी हुई थी, अब सुमन को जलाने और रुलाने पर तत्पर रहती थी। उम्मेदवारी के दिनो में हम जितने विनयशील और कर्तव्यपरायण होते है, उतने ही अगरजगह पाने पर बने रहे तो हम देवतुल्य हो जायँ। उस समय शान्ता को सहानुभूति की जरूरत थी, प्रेम की आकांक्षा ने उसके चित्त को उदार, कोमल, नम्र बना दिया था, पर अब अपना प्रेमरत्न पाकर किसी दरिद्र से घनी हो जाने वाले मनुष्य की भाँति उसका हृदय कठोर हो गया था। उसे यह भय खाये जाता था कि सदन कही सुमन के जाल में न फँस जाय। सुमन के पूजा पाठ, श्रद्धा-भक्ति का उसकी दृष्टि में कुछ भी मूल्य न था। वह इसे पाखण्ड समझती थी। सुमन सिर में तेल मलने या साफ कपड़ा पहनने के लिये तरस जाती थी, शान्ता इसे समझती थी। वह सुमन के आचार व्यवहार की बड़ी तीव्र दृष्टि से देखती रहती थी। सदन से जो कुछ कहना होता सुमन शान्ता से कहती, यहाँ तक कि शान्ता भोजन के समय भी रसोई में किसी न किसी बहाने आ बैठती थी। वह अपने प्रसवकाल से पहले सुमन को किसी भाँति वहाँ से टालना चाहती थी, सौरीगृह हमे बन्द होकर बह सुमन की देख-भाल न कर सकेगी। उसे और सब कष्ट सहना मंजूर था, पर यह दाह न सही जाती थी। लेकिन सुमन सब कुछ देखते हुए भी न देखती थी, सब कुछ सुनते हुए भी कुछ न सुनती थी। नदी में डूबते हुए मनुष्य के समान वह इस तिनके के सहारे को भी छोड़ न सकती थी। वह अपना जीवन मार्ग स्थिर न कर सकती थी, पर इस समय सदन के माता पिता को यहाँ देखकर उसे यह सहारा छोड़ना पड़ा, इच्छा शक्ति जो कुछ न कर सकती थी वह अवस्था में कर दिखाया। वह पाँव दबाती हुई, धीरे-धीरे झोपड़े के पिछवाड़े आई और कान लगाकर सुनने लगी कि देखूँ यह लोग मेरी कुछ चर्चा तो नहीं कर रहे है? आधे घण्टे तक वह इसी प्रकार खड़ी रही। भामा और सुभद्रा इधर-उधर की बात कर रही थी। अन्त मे भामा ने कहा, क्या अब इसकी बहन यहाँ नहीं रहती? सुभद्रा — रहती क्यों नहीं, वह कही जाने वाली है? भामा—दिखाई नहीं देती। सुभद्रा—किसी काम से गई होगी। घर का सारा काम तो वही सभाले हुए है। भामा—आवे तो कह देना कि कही बाहर लेट रहे। सदन उसी का बनाया खाता होगा। शान्ता सौरीगृह से बोली, नहीं अभी तक तो मैं ही बनाती रही हूँ, आज कल वह अपने हाथ से बना लेते है। भामा—तब भी घड़ा बरतन तो वह छूती ही रही होगी। यह घड़ा फेकवा दो, बरतन फिर से धुल जायँगे। सुभद्रा—बाहर कहाँ सोने की जगह है? भामा—हो चाहे न हो, लेकिन यहाँँ से उसे सोने न दूँँगी। वैसी स्त्री का क्या विश्वास? सुभद्रा—नहीं दीदी, वह अब वैसी नहीं है। वह बड़े नेम धरम से रहती है। भामा—चलो, वह बड़ी ने नेम-धरम से रहने वाली है। सात घाट का पानी पीके आज नेमवाली बनी है। देवता की मूरत टूटकर फिर नहीं जुड़ती। वह अब देवी बन जाय तब भी मैं उसका विश्वास न करूँ। सुमन इससे ज्यादा न सुन सकी। उसे ऐसा मालूम हुआ मानो किसी ने लोहा लाल करके उसके हृदय में चुभा दिया। उल्टे पाँँव लौटी और उसी अन्धकार में एक ओर चल पड़ी। अन्धेरा खूब छाया था, रास्ता भी अच्छी तरह न सूझता था, पर सुमन गिरती-पड़ती चली जाती थी, मालूम नहीं कहाँ, किधर? वह अपने होश में न थी। लाठी खाकर घबराये हुए कुत्ते के समान वह मूर्छावास्था में लुढ़कती जा रही थी। सँभलना चाहती थी, पर सँभल न सकती थी। यहाँ तक कि उसके पैरों में एक बड़ा-सा काटा चुभ गया। वह पैर पकड़कर बैठ गई। चलने की शक्ति न रही। उसने बेहोशी के बाद होश में आने वाले मनुष्य के समान इधर-उधर चौंककर देखा। चारों ओर सन्नाटा था, गहरा अन्धकार छाया हुआ था, केवल सियार अपना राग अलाप रहे थे। यहाँ मैं अकेली हूँ, यह सोचकर सुमन के रोए खड़े हो गये। अकेलापन किसे कहते हैं, यह उसे आज मालूम हुआ। लेकिन यह जानते हुए भी कि यहाँ कोई नहीं है। मैं ही अकेली हूँ। उसे अपने चारों ओर नीचे ऊपर नाना प्रकार के जीव आकाश में चलते हुए दिखाई देते थे। यहाँ तक कि उसने घबड़ाकर आँखे बन्द कर लीं। निर्धनता कल्पना को अत्यंत रचनाशील बना देती है। सुमन सोचने लगी, मैं कैसी अभागिनी हूँ। और तो और अपनी सगी बहन भी अब मेरी सूरत नहीं देखना चाहती। उसे कितना अपनाना चाहा, पर वह अपनी न हुई। मेरे सिर कलंक का टीका लग गया और वह अब धोने से नहीं धुल सकता। मैं उसको या किसी को दोष क्यों दूँ? यह सब मेरे कर्मों का फल है। आह! एड़ी में कैसी पीड़ा हो रही है। यह काँटा कैसे निकलेगा? भीतर उसका एक टुकड़ा टूट गया कैसा टपक रहा है। नहीं, मैं किसीको दोष नहीं दे सकती। बुरे कर्म तो मैंने किये, उनका फल कौन भोगेगा? विलास लालसा ने मेरी यह दुर्गति की। मैं कैसी आन्धि हो गई थी, केवल इन्द्रियों के सुखभोग के लिये अपनी आत्मा का नाश कर बैठी। मुझे कष्ट अवश्य था। मैं गहने को तरसती थी, अच्छे भोजन को तरसती थी, प्रेम को तरसती थी, उस समय मुझे अपना जीवन दुखमय दिखाई देता था, पर वह अवस्था भी तो मेरे पूर्व जन्म के कर्मो का ही फल था और क्या ऐसी स्त्रियाँ नहीं हैं जो उससे कही अधिक कष्ट झेलकर भी अपनी आत्मा की रक्षा करती है? दमयन्ती पर कैसे-कैसे दु:ख पड़े, सीता को रामचन्द्र ने घर से निकाल दिया और वह बरसो जंगलो में नाना प्रकार के क्लेष उठाती रही, सावित्री ने कैसे-कैसे दुःख सहे पर वह धर्म पर दृढ़ रही। उतनी, दूर क्यो जाऊँ-मेरे ही पड़ोस में कितनी स्त्रियाँ रो-रोकर दिन काट रही थी। अमोला में वह बेचारी अहिरिन कैसी विपित्ति झेल रही थी। उसका पति पर देश से बरसों न आता था, बेचारी उपवास करके पड़ी रहती थी। हाय, इसी सुन्दरता ने मेरी मिट्टी खराब की। मेरे सौन्दर्य के अभिमान ने मुझे यह दिन दिखाया। हा प्रभो! तुम सुन्दरता देकर मन को चंचल क्यों बना देते हो? मैने सुन्दर स्त्रियों को प्राय: चंचल ही पाया। कदाचित् ईश्वर इस युक्ति से हमारी आत्मा की परीक्षा करते है, अथवा जीवन-मार्ग में सुन्दरतारूपी बाधा डालकर हमारी आत्मा को बलवान, पुष्ट बनाना चाहते है। सुन्दरतारूपी आग में आत्मा को डालकर उसे चमकाना चाहते है। पर हा! अज्ञानवश हमें कुछ नहीं सूझता, यह आग हमें जला डालती है, यह बाधा हमें विचलित कर देती है! यह कैसे बन्द हो, न जाने किस चीज का काँटा था। जो कोई आके मुझे पकड़ ले तो यहाँ चिलाऊँगी तो कौन सुनेगा? कुछ नहीं, यह न विलास प्रेम का दोष हैं, न सुन्दरता का दोष है, यह सब मेरे अज्ञान का दोष है। भगवन्। मुझे ज्ञान दो। तुम्हीं अब मेरा उद्धार कर सकते हो। मैंने भूल की कि विधवाश्रम में गई। सदन के साथ रहकर भी मैंने भूल की। मनुष्यों से अपने उद्धार की आशा रखना व्यर्थ है। ये आप ही मेरी तरह अज्ञानता में पड़े हुए है। ये मेरा उद्धार क्या करेगे? मैं उसी की शरण में जाऊँगी। लेकिन कैसे जाऊँ? कौन-सा मार्ग हे, दो साल से धर्मग्रन्थों को पढ़ती हूँ, पर कुछ समझ में नहीं आता। ईश्वर, तुम्हें कैसे पाऊँ? मुझे इस अन्धकार से निकालो। तुम दिव्य हो, ज्ञानमय हो, तुम्हारे प्रकाश में संभव है यह अन्धकार विच्छिन्न हो जाय। यह पत्तियाँ क्यों खडखड़ा रही है? कोई जानवर तो नहीं आता! नहीं, कोई अवश्य आता है। सुमन खड़ी हो गई, उसका चित्त दृढ था। वह निर्भय हो गई थी। सुमन बहुत देर तक इन्ही विचारो में मग्न रही। इससे उसके हृदय को शान्ति न होती थी। आज तक उसने इस प्रकार कभी आत्म-विचार नहीं किया था। इस संकट में पड़कर उसकी सदिच्छा जाग्रत हो गई थी। रात बीत चुकी थी। वसन्त की शीतल वायु चलने लगी। सुमन ने साड़ी समेट ली और घुटनो पर सिर रख लिया। उसे वह दिन याद आया, जब इसी ऋतु में, इसी समय, वह अपने पति के द्वारपर बैठी हुई सोच रही थी कि कहाँ जाऊँ? उस समय वह विलास की आग मे जल रही थी। आज भक्ति की शीतल छाया ने उसे आश्रय दिया था। एकाएक उसकी आँखे झनक गई। उसने देखा कि स्वामी गजानन्द मृगचर्म धारण किये उसके सामने खड़े दयापूर्ण नेत्रो से उसकी ओर ताक रहे है। सुमन उनके चरणोंपर गिर पड़ी और दीन भावसे बोली, स्वामी। मेरा उद्धार कीजिये। सुमन ने देखा कि स्वामी जी ने उसके सिरपर दया से हाथ फेरा और कहा, ईश्वरन मुझे इसीलिये तुम्हारे पास भेजा है, बोलो, क्या चाहती हो, धन? सुमन-नहीं, महाराज, धन की इच्छा नहीं। स्वामी-सम्मान? सुमन-नहीं महाराज, सम्मान की भी इच्छा नहीं। स्वामी-भोग-विलास? सुमन-महाराज, इसका नाम न लीजिये, मुझे ज्ञान दीजिये। स्वामी-अच्छा तो सुनो, सत्ययुग में मनुष्य की मुक्ति ज्ञान से होती थी, नेत्रों में सत्य से, द्वापर में भक्ति से, पर इस कलियुग में इसका केवल एक ही मार्ग है, और वह है सेवा। इमी मार्गपर चलो और तुम्हार उद्धार होगा। जो लोग तुमसे भी दीन, दुःखी, दलित है, उनकी शरण में जाओ और उनका आशीर्वाद तुम्हारा उद्धार करेगा। कलियुग में परमात्मा इसी दु:ख सागर में वास करते है। सुमन की आँखे खुल गई। उसने इधर-उधर देखा उसे निश्चय था कि मैं जागती थी। इतनी जल्दी स्वामीजी कहाँ अदृश्य हो गये। अकस्मात् उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि सामने पेड़ो के नीचे स्वामीजी लालटेन लिये खड़े है। वह उठकर उनकी ओर चली। उसने अनुमान किया था कि वह वृक्ष समूह १०० गज के अन्तर पर होगा, पर वह सौ के बदले दो सौ, तीन सौ, चार सौ गज चली गई और वह वृक्षपुंंज और उनके नीचे स्वामीजी लालटेन लिये हुए उतनी ही दूर खड़े थे। सुमन को भ्रम हुआ, मैं सो तो नही रही हूँ? यह कोई स्वप्न तो नहीं है? इतना चलनेपर भी वह उतनी ही दूर है। उसने जोरसे चिल्लाकर कहा--महाराज आती हूँ, आप जरा ठहर जाइये। उसके कानो में शब्द सुनाई दिये, चली आओ मे खड़ा हूँ। सुमन फिर चली, पर दो सौ कदम चलने पर वह थककर बैठ गई। वह वृक्ष समूह और स्वामीजी ज्यो-के-त्यों सामने सौ गजकी दूरी पर खड़े थे। भय से सुमन के रोएँ खड़े हो गये। उसकी छाती धड़कने लगी और पैर थरथर काँपने लगे। उसने चिल्लाना चाहा, पर आवाज न निकली। सुमन ने सावधान होकर विचार करना चाहा कि यह क्या रहस्य है, में कोई प्रेत लीला तो नहीं देख रही हैं, लेकिन कोई अज्ञात शक्ति उसे उधर खीचे लिये जाती थी, मानो इच्छा-शक्ति मन को छोड़कर उसी रहस्यके पीछे दौड़ी जाती है। सुमन फिर चली। अब वह शहर के निकट आ गई थी। उसने देखा कि स्वामीजी एक छोटी सी झोपड़ी में चले गये और वृक्ष-समूह अदृश्य हो गया। सुमनने समझा, यही उनकी कुटी है। उसे बड़ा धीरज हुआ। अब स्वामीजी से अवश्य भेट होगी। उन्ही से यह रहस्य खुलेगा। उसने कुटी के द्वारपर जाकर कहा, स्वामीजी, मैं हूँ सुमन दिखाई दिया। उसके अन्तःकरण में एक अद्भुत श्रद्धा और भक्तिकाभाव उदय हुआ। उसने सोचा, इनकी आत्मा में कितनी दया और प्रेम है। हाय! मेने ऐसे नर-रत्न का तिरस्कार किया। इनकी सेवामें रहती तो मेरा जीवन सफल हो गया होता। बोली, महराज आप मेरे लिये ईश्वर रूप है, आपके ही द्वारा मेरा उद्धार हो सकता है। मैं अपना तनमन आपकी सेवा में अर्पण करती हूँ। यही प्रतिज्ञा एक बार मैंने की थी, पर अज्ञानतावश उसका पालन न कर सकी। वह प्रतिज्ञा मेरे हृदय से न निकली थी। आज में सच्चे मन से यह प्रतिज्ञा करती हूंँ। आपने मेरी बाँह पकड़ी थी, अब यद्यपि मैं पतित हो गई हूँ, पर आप ही अपनी उदारता से मुझे क्षमादान दीजिये और मुझे सन्मार्गपर ले जाइये। गजानन्द को इस समय सुमन के चेहरे पर प्रेम और पवित्रता की छटा दिखाई दी। वह व्याकुल हो गये। वह भाव, जिन्हें उन्होने बरसो से दबा रक्खा था, जाग्रत होने लगे। सुख और आनन्दी नवीन भावनाएँ उत्पन्न होने लगी। उन्हें अपना जीवन शुष्क, नीरम, आनन्द विहीन जान पड़ने लगा। वह कल्पनाओ से भयभीत हो गये। उन्हें शंका हुई कि यदि मेरे मन मे यह विचार ठहर गये तो मेरा संयम वैराग्य और सेवा-व्रत इसके प्रवाह में तृण के समान बह जायेंगे। वह बोल उठे, तुन्हें मालूम है कि यहांँ एक अनाथालय खोला गया है? सुमन--हांँ, इसकी कुछ चर्चा सुनी तो थी। गजानन्द-—इस अनाथालय में विशेषकर वही कन्याये है जिन्हें वेश्याओंने हमें सौंपा है। कोई ५० कन्याएँ होगी। सुमन--यह आपके ही उपदेश का फल है। गजानन्द--नहीं, ऐसा नहीं। इसका सपूर्ण श्रेय पंडित पद्मसिंह को है, मैं तो केवल उनका सेवक हूँ। इस अनाथालय के लिये एक पवित्र आत्मा की आवयकता है और तुम्ही वह आत्मा हो। मैंने बहुत, ढूँढापर कोई ऐसी महिला न मिली जो यह काम प्रेम भापने जो कन्याओ का माता की भांँति पालन करे और अपने प्रेम में अकेली उनकी माताओं का स्थान पूरा कर दे। वह बीमार पड़े तो उनकी सेवा करे, उनके फोड़े फुन्सियाँ, मलमूत्र देखकर घृणा न करे और अपने व्यवहार से उनमे धार्मिक भावों का ऐसा सचार कर दे कि उसके पिछले कु संस्कार मिट जायँ और उनका जीवन सुख से कटे। वात्सल्य के बिना यह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। ईश्वर ने तुम्हे ज्ञान और विवेक दिया है, तुम्हारे हृदय में दया है, करुणा है, धर्म है और तुम्ही इस कर्तव्य का भार संभाल सकती हो। मेरी प्रार्थना स्वीकार करोगी? सुमन की आँखे सजल हो गई। मेरे विषय मे एक ज्ञानी महात्मा का यह विचार है, यह सोचकर उसका चित्त गद्गद हो गया। उसे स्वप्न में भी ऐसी आशा न थी कि उसपर इतना विश्वास किया जायगा और उसे सेवा का ऐसा महान् गौरव प्राप्त होगा। उसे निश्चय हो गया कि परमास्मा ने गजानन्दको यह प्रेरणा की है। अभी थोड़ी देर पहले वह किसी बालक को कीचड़ लपेट देखती तो उसकी ओर से मुंह फेर लेती पर गजानन्द ने उसपर विश्वास करके उस घृणा को जीत लिया, उसमे प्रेम संचार कर दिया था। हम अपने ऊपर विश्वास करनेवालोको कभी निराश नहीं करना चाहते और ऐसे बोझो को उठाने को तैयार हो जाते है जिन्हे हम असाध्य समझते थे। विश्वास से विश्वास उत्पन्न होता है। सुमन ने अत्यंत विनीत भाव से कहा, आप लोग मुझे इस योग्य समझते है, यह मेरा परम सौभाग्य है। मैं किसी के कुछ काम आ सकूँ, किसी की सेवा कर सकूँ, यह मेरी परम लालसा थी। आपके बताये हुए आदर्शपर मै पहुँच न सकूँगी, पर यथाशक्ति मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगी। यह कहते कहते सुमन चुप हो गई। उसका सिर झुक गया और आँखे डबडबा आईं। उसकी वाणी से जो कुछ न हो सका वह उसके मुख के भाव ने प्रकट कर दिया। मानो वह कह रही थी, यह आपकी असीम कृपा है, जो आप मुझपर ऐसा विश्वास करते है। कहाँ मुझ जैसी नीच, दुश्चरित्रा और कहां यह महान पद! पर ईश्वर ने चाहा तो आपको इस विश्वासदान के लिये पछताना न पड़ेगा। गजानन्दने कहा, मुझे तुमसे ऐसी ही आशा थी। परमात्मा तुम्हारा कल्याण करें। यह कहकर गजानन्द उठ खड़े हुए। पौ फट रही थी, पपीहे की ध्वनि सुनाई दे रही थी। उन्होने अपना कमण्डल उठाया और गंगास्नान करने चले गये। सुमन ने कुटी के बाहर निकलकर देखा, जैसे हम नींद से जागकर देखते है। समय कितना सुहावना है, कितना शन्तिमय कितना उत्साह-पूर्ण। क्या उसका भविष्य भी ऐसा ही होगा? क्या उसके भविष्य जीवनका भी प्रभात होगा, उसमें भी कभी उषा की झलक दिखाई देगी, कभी सूर्य का प्रकाश होगा? हाँ, होगा और यह सुहावना शान्तिमय प्रभात आनेवाले दिनरूपी जीवन का प्रभात है। ५८ एक साल बीत गया। पण्डित मदनसिंह तहले तीर्थयात्रापर उधार खाए बैठे थे, जान पड़ता था सदन के घर आते ही वह एक दिन भी न ठहरेंगे, सीधे बद्रीनाथ पहुंँचकर दम लेंगे, पर जब से सदन आ गया है। उन्होने भूलकर भी तीर्थयात्रा का नाम नहीं लिया। पोते को गोद में लिए असामियोंका हिसाब करते है, खेतोकी निगरानी करते है। मायाने और भी जकड़ लिया है। हाँ, भामा अब कुछ निश्चित हो गई है। पड़ोसी से वार्तालाप करने का कर्त्तव्य उसने अपने सिर से नहीं हटाया। शेष कार्य उसने शान्ता पर छोड़ दिये है। पडिण्त पद्मसिहने वकालत छोड़ दी। अब वह म्युनिसिपैलिटी के प्रधान कर्मचारी है। इस काम से उन्हें बहुत रुचि है, शहर दिनोंदिन उन्नति कर रहा हैं। साल के भीतर ही कई नई सड़कें, नये बाग तैयार हो गए है। अब उनका इरादा है कि इसके और गाड़ीवालों के लिए शहर के बाहर एक मुहल्ला बनवा दें। शर्माजी के कई पहले के अब उनके विरोधी हो गए हैं और पहले के कितने ही विरोधियों से मेल हो गया है, किन्तु महाशय विट्ठठलदासपर उनकी श्रद्धा दिनोंदिन बढ़ती जाती है। वह बहुत चाहते है कि महाशयजी को म्युनिसिपैलिटी में कोई अधिकार दे, पर विट्ठलदास राजी नहीं होते। वह नि़स्वार्थ कर्म की प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ना चाहते। उनका विचार है कि अधिकारी बनकर वह इतना हित नहीं कर सकते जितना पृथक् रहकर कर सकते है। उनका विधवाश्रम इन दिनों बहुत उन्नतिपर है और म्युनिसिपैलिटीसे उसे विशेष सहायता मिलती है। आजकल वह कृषको की सहायता के लिए एक कोष स्थापित करने का उद्योग कर रहे है जिससे किसानो को बीज और रुपये नाममात्र सूदपर उधार दिये जा सके। इस सत्कार्य में सदन बाबू विट्ठलदासका दाहिना हाथ बना हुआ है। सदन का अपने गाँवमें मन नहीं लगा। वह शान्ता को वहाँ छोड़कर फिर गंगा किनारे के झोपड़े में आ गया है और उस व्यवसाय को खूब बढ़ा रहा है। उसके पास अब पाँच नावे है और सैकड़ो रुपये महीनेका लाभ हो रहा है। वह अब एक स्टीमर मोल लेनका विचार कर रहा है। स्वामी गजानन्द अधिकतर देहातो में रहते है। उन्होने निर्धनों की कन्याओका उद्धार करनेके निमित्त अपना जीवन अर्पण कर दिया है। शहर में आते है तो दो-एक दिन से अधिक नही ठहरते। कार्तिक का महीना था पद्मसिंह सुभद्रा को गंगा-स्नान कराने ले गए थे। लौटती बार वह अलईपुरकी ओर से आ रहे थे। सुभद्रा गाड़ी की खिड़की से बाहर झाँकती चली आती थी और सोचती थी कि यहाँ इससन्नाटे में लोग कैसे रहते है? उनका मन कैसे लगता है? इतने में उसे एकसुन्दर भवन दिखाई पड़ा, जिसके फाटक़पर मोटे अक्षरोंमें लिखा था- ⁠गजानन्दने कहा, मुझे तुमसे ऐसी ही आशा थी। परमात्मा तुम्हारा कल्याण करें । यह कहकर गजानन्द उठ खडे हुए। पी फट रही थी, पपीहे. ध्वनि सुनाई दे रही थी। उन्होने अपना कमण्डल उठाया और गंगा-स्नान करने चले गये। सुमनने कुटीके बाहर निकलकर देखा, जैसे हम नीदसे जाग देखते है। समय कितना सुहावना है, कितना शन्तिमय कितना उत्साहपूर्ण। क्या उसका भविष्य भी ऐसा ही होगा? क्या उसके भविष्य जीवनका भी प्रभात होगा, उसमें भी कभी उपाकी झलक दिखा देमी, कभी सूर्यका प्रकाश होगा? हाँ, होगा और यह सुहावन शान्तिमय प्रभात आनेवाले दिनरूपी जीवनका प्रभात है। ५८ एक साल बीत गया। पण्डित मदनसिंह तहले तीर्थयात्रापर उधार खाए बैठे थे, जान पड़ता था सदनके घर आते ही वह एक दिन भी न‌ ठहरेगे, सीधे बद्रीनाथ पहुंचकर दम लेगे, पर जबसे सदन आ गया है उन्होने भूलकर भी तीर्थयात्राका नाम नही लिया। पोतेको गोदमें लिए असामियोंका हिसाब करते है , खेतोकी निगरानी करते है। मायाने और भी जकड लिया है। हाँ, भामा अब कुछ निश्चित हो गई है। पड़ो-सिनोसे वार्तालाप करनेका कर्तव्य उसने अपने सिरसे नही हटाया। शेष कार्य उसने शान्तापर छोड दिये है। पडिण्त पद्मसिंहने वकालत छोड़ दी। अब वह म्युनिसिपैलिटीके प्रधान कर्मचारी है। इस कामसे उन्हें बहुत रुचि है, शहर दिनोदिन उन्नति कर रहा है। सालके भीतर ही कई नई सडकें, नये बाग तैयार हो गए है । अब उनका इरादा है कि इवके और गाड़ीबालोके लिए शाहरके बाहर एक मुहल्ला बनवा दें। शर्माजीके कई पहलेके मित्र अब उनके विरोधी हो गए हैं और पहलेके कितने ही विरोधियोसे मेल हो गया किन्तु महाशय लौट आना। मैं चलता हूँ। गाडी छोड़े जाता हूँ। रास्ते में कोई सवारी किराये की कर लूँगा। सुभद्रा— तो इसकी क्या आवश्यकता है। तुम यहीं बैठे रहो, मैं अभी लौट आती हैं। पद्म--(गाड़ी से उतरकर) मैं चलता हूँ, तुम्हारा जब जी चाहे आना। सुभद्रा इस हीलेहवाले का कारण समझ गई। उसने 'जगत' में कितनी बार 'सेवासदन' को प्रशंसा पढ़ी थी। पण्डित प्रभाकरराव की इन दिनों सेवा सदनपर बड़ी दया दृष्टि थी। अतएव सुभद्रा को इस आश्रम से प्रेम-सा हो गया था और सुमनके प्रति उसके हृदय में भक्ति उत्पन्न हो गई थी, पर सुमन को इस नई अवस्था में देखना चाहती थी। उसको आश्चर्य होता था कि सुमन इतने नीचे गिरकर कैसे ऐसी विदुषी हो गई कि पत्रों में उनकी प्रशंसा छपती है। उसके जी में तो आया कि पण्डितजी को खूब आड़े हाथो ले, पर साईस खड़ा था, इसलिए कुछ न बोल सकी। गाड़ी से उतरकर आश्रम में दाखिल हुई। वह ज्योंही बरामदे में पहुँची कि एक स्त्री ने भीतर जाकर सुमन को उसके आने की सूचना दी और एक क्षण में सुभद्रा ने सुमनको आते देखा। वह उन केशहिना; आभूषणविहीनी सुमन को देखकर चकित हो गई। उसमें न वह कोमलता थी, न वह चपलता, न वह मुस्कुराती हुई आँखे, न हँसते हुए होठ है। रूप-लावण्य की जगह पवित्रता की ज्योति झलक रही थी। सुमन निकट जाकर सुभद्रा के पैरों पर गिर पड़ी और सजल नयन होकर बोली— बहूजी, आज, मेरै धन्य भाग्य है कि आपको यहाँ देख रही हूँ। सुभद्रा की आँख भर आयी। उसने सुमन को उठाकर छातीसे लगा लिया और गद्गद स्वर से कहा— बाईजी, आने का तो बहुत जी चाहता था, पर आलस्यवश अबतक न आ सकी थी। सुमन— शर्माजी भी हैं या आप अकेली ही आई हैं? सुभद्रा— साथ तो थे,पर उन्हें देर होती थी, इसलिए वह दूसरी सुमन ने उदास होकर कहा, देर तो क्या होती थी, वह यहाँ आना ही नही चाहते थे। मेरा अभाग्य,दुख केवल यह है कि जिस आश्रम के वह स्वयं जन्मदाता है, उससे मेरे कारण उन्हें इतनी घृणा है। मेरी हृदय से अभिलाषा थी कि एक बार तुम और वह दोनो यहाँ आते। आधी तो आज पूरी हुई,शेष भी कभी-न-कभी पूरी होगी। वह मेरे उद्वारका दिन होगा। यह कहकर सुमनने सुभद्राको आश्रम दिखाना शुरू किया। भवनमे पाँच बड़े कमरे थे। पहले कमरेमें लगभग तीस बालिकाएँ बैठी हुई कुछ पढ़ रही थीं। उनकी अवस्था १२ वर्षसे १५ वर्ष तक थी ।अध्यापिकाने सुभद्रा को देखते ही आकर उससे हाथ मिलाया। सुमनने दोनोंका परिचय कराया। सुभद्राको यह सुनकर बड़ा आशचर्य आ कि वह महिला मिस्टर रुस्तम भाई व बैरिस्टरकी सुयोग्य पत्नी है। नित्य दो घंटेके लिए आश्रम में आकर इन युवतियोंको पढाया करती थी। दूसरे कमरेमें भी इतनी ही कन्याएँ थी। उनकी अवस्था ८ से लेकर १२ वर्ष तक थी। उनमें कोई कपड़े काटती थी,कोई सीती थी और कोई अपने पासवाली लड़कीको चिकोटी काटती थी। यहां कोई अध्यापिका न थी। एक बूढा दरजी काम कर रहा था। सुमनने कन्याओके तैयार किए हुए कुरते, जाकेट आदि सुभद्राको दिखाये। तीसरे कमरेमें १५-२० छोटी-छोटी बालिकाएँ थीं, कोई ५ वर्षसे अधिककी न थी उनमें कोई गुडिया खेलती थी, कोई दीवारपर लटकती हुई तस्वीरे देखती थी। सुमन आप ही इस कक्षाकी अध्यापिका थी। सुभद्रा यहाँ सामनेवाले बगीचे में आकर इन्ही लड़कियों के लगाये हुए फूल पत्ते देखने लगी। कई कन्याएँ वहाँ आलू गोभी की क्या पानी दे रही थीं। उन्होंने सुभद्रा को सुन्दर फूलोका एक गुलदस्ता भेंट किया। भोजनालायमें कई कन्याएँ बैठी भोजन कर रही थीं। सुमन ने सुभद्रा को इन कन्याओं के बनाये हुए अचार, मुरब्बे आदि दिखाए। सुभद्राको यहाँका सुप्रवन्ध, शान्ति और कन्याओंका शील स्वभाव देखकर बड़ा आनंद हुआ। उसने मनमें सोचा, सुमन इतने बड़े आश्रम को अकेले कैसे चलाती होगी, मुझसे तो कभी न हो सकता। कोई लड़की मलोन या उदास नही दिखाई देती। सुमन ने कहा, मैंने यह भार अपने ऊपर ले तो लिया, पर मुझमें उसके सँभालनेकी शक्ति नही है। लोग जो सलाह देते है, वही मेरा आधार है। आपको भी जो कुछ त्रुटि दिखाई दे, वह कृपा करके बता दीजिये। इससे मेरा उपकार होगा। सुभद्रा ने हँस कर कहा, बाई जी मुझे लज्जित न करो, मैंने तो जो कुछ देखा है उसीसे चकित हो रही हूँ, तुम्हें सलाह क्या दूंगी, बस इतना ही कह सकती हूँ कि ऐसा अच्छा प्रबन्ध विधवा आश्रम का भी नहीं है। सुमन— आप संकोच कर रही है। सुभद्रा— नही, सत्य कहती हूँ। मैने जैसा सुना था इसे उससे कहीं बढकर पाया। हाँ तो बताओ, इन बालिकाओं की माताएँ इन्हे देखने आती है या नही? सुमन— आती है, पर मैं यथासाध्य इस मेल-मिलापको रोकती हूँ सुभद्रा— अच्छा, इनका विवाह कहाँ होगा। सुमन— यही तो टेढ़ी खीर है। हमारा कर्त्तव्य यह है कि इन कन्याओंको चतुर गृहिणी बनानेके योग्य बना दे। उनका आदर समाज करेगा या नही, मैं कह नहीं सकती। सुभद्रा— वैरिस्टर साहबकी पत्नीको इस काम से बड़ा प्रेम है। सुमन— यह कहिये कि आश्रम की स्वामिनी वही है। मैं तो केवल उनकी आज्ञाओ का पालन करती हूँ। सुभद्रा— क्या कहूँ में किसी योग्य नही, नही तो मैं भी यहाँ कुछ काम किया करती। सुमन— आते-आते तो आप आज आई है, उस पर शर्मा जी को को नाराज करके। शर्माजी फिर इधर आनेतक न देगे। सुभद्रा - नहीं, अबकी एतवारको मैं उन्हें अवश्य खीच लाऊँगी, बस, मैं लड़कियोको पान लगाना और खाना सिखाया, करुँगी। सुमन- (हँसकर) इस काममे आप कितनी ही लडकियों को अपने- से भी निपुण पावेगी। इतनेमे १० लडकियाँ सुन्दर वस्त्र पहने हुए आई और सुभद्रा के सामने खडी होकर मधुर स्वरसे गाने लगी : हे जगत पिता, जगत प्रभू, मुझे अपना प्रेम और प्यार दे। तेरी भक्तिमे लगे मन मेरा, विषय कामनाको विसार दे। सुभद्रा यह गीत सुनकर बहुत प्रसन्न हुई और लडकियोंको ५) इनाम दिया। जब वह चलने लगे तो सुमनने करुण स्वरसे कहा--मै इसी रवि वारको आपकी राह देखुँगी। सुभद्रा--- मैं अवश्य आऊँगी। सुमन---शान्ता तो कुशलसे है। सुभद्रा---हाँ पत्र आया था। सदन तो यहाँ नही आए? सुमन---नही,पर २) मासिक चन्दा भेज दिया करते है। सुभद्रा---अब आप बैठिये मुझे,आज्ञा दीजिए। सुमन---आपके आनेसे मैं कृतार्थ हो गई। आपकी भक्ति, आपका प्रेम,आपकी कार्यकुशलता, किस-किसको वडाई करूँ। आप वास्तवमे स्त्री समाजका श्रृंगार है (सजल नेत्रोंसे) में तो अपनेको आपकीदासी समझती हूँ। जबतक जीउँगी आप लोगोका यश मानती रहूंगी। मेरी बाँह पकडी और मुझे डूबनेसे बचा लिया। परमात्मा आप लोगोंका सदैव कल्याण करें।