नियम
मात्राएँ, और वह बिन्दु जो उन्हें स्वर से अलग करता है
इ और ि ब्रेल में एक ही ख़ाना हैं। पढ़ने वाला उन्हें जगह से पहचानता है — और जहाँ जगह काफ़ी न हो वहाँ बिन्दु १ आता है।
लैटिन लिपियों की ब्रेल में हर अक्षर का एक ख़ाना होता है और बात ख़त्म। देवनागरी में ऐसा नहीं है, क्योंकि हर स्वर के दो रूप हैं — अकेला खड़ा स्वर (इ) और व्यंजन पर बैठी मात्रा (ि) — और भारती दोनों को एक ही ख़ाना देता है।
यह कोई कमी नहीं, यही डिज़ाइन है। जगह ही अर्थ बताती है: व्यंजन के तुरन्त बाद आया स्वर-ख़ाना मात्रा पढ़ा जाता है, और कहीं और आया तो स्वर।
"कि" और "कइ" — पहले में मात्रा है, दूसरे में पूरा स्वर।
कि:
कइ:
दूसरे में एक ख़ाना ज़्यादा है, और वह ख़ाना बिन्दु १ है।
बिन्दु १ — स्वर-चिह्न
जब किसी व्यंजन के तुरन्त बाद सचमुच अकेला स्वर आना हो, तब उस स्वर से पहले बिन्दु १ लिखा जाता है। यह कहता है: जो आगे है वह मात्रा नहीं, पूरा स्वर है।
और इसकी सबसे साफ़ बात यह है कि बिन्दु १ स्वयं "अ" भी है। यही इसे काम करने देता है — "कअ" और "क, फिर स्वर-चिह्न" एक ही चीज़ हैं, इसलिए अ के आगे कोई चिह्न लगाना नहीं पड़ता।
| लिखा हुआ | ब्रेल | क्या है |
|---|---|---|
| का | क पर आ की मात्रा — दो ख़ाने | |
| कआ | क, फिर स्वर-चिह्न, फिर आ — तीन ख़ाने | |
| कअ | क, फिर अ — दो ख़ाने, क्योंकि अ स्वयं बिन्दु १ है |
सारी मात्राएँ
| मात्रा | स्वर | ख़ाना | बिन्दु |
|---|---|---|---|
| का | आ | बिन्दु ३, ४ और ५ | |
| कि | इ | बिन्दु २ और ४ | |
| की | ई | बिन्दु ३ और ५ | |
| कु | उ | बिन्दु १, ३ और ६ | |
| कू | ऊ | बिन्दु १, २, ५ और ६ | |
| कृ | ऋ | बिन्दु ५, १, २, ३ और ५ | |
| कॄ | ॠ | बिन्दु ६, १, २, ३ और ५ | |
| कॢ | ऌ | बिन्दु ५, १, २ और ३ | |
| कॣ | ॡ | बिन्दु ६, १, २ और ३ | |
| के | ए | बिन्दु १ और ५ | |
| कै | ऐ | बिन्दु ३ और ४ | |
| कॉ | ऑ | बिन्दु १, ३, ४ और ६ | |
| को | ओ | बिन्दु १, ३ और ५ | |
| कौ | औ | बिन्दु २, ४ और ६ |
अ की कोई मात्रा नहीं
देवनागरी में "क" पहले से ही "का" नहीं बल्कि "क" पढ़ा जाता है — यानी हर व्यंजन अपने साथ अ लेकर चलता है। इसलिए अ की कोई मात्रा नहीं होती, न छपाई में न ब्रेल में। जिस व्यंजन पर कोई मात्रा नहीं, उसमें अ अपने आप है।
और जब अ को हटाना हो, तब हलन्त आता है — जो अपना पन्ना रखता है, क्योंकि ब्रेल में वह उस जगह नहीं लिखा जाता जहाँ छपाई में लिखा जाता है।
जहाँ यह वापस नहीं लौट सकता
अगर किसी शब्द की शुरुआत में ही मात्रा हो — जैसे टाइपिंग की चूक से "िलए" — तो उससे पहले कोई व्यंजन नहीं होता, और ब्रेल के पास यह बताने का कोई तरीक़ा नहीं कि यह मात्रा थी। पढ़ने वाला उसे स्वर पढ़ेगा, और पढ़ना भी यही चाहिए। यह इस साइट की कमी नहीं है; संहिता में वहाँ कहने को कुछ है ही नहीं।
आगे
अनुवादक
देवनागरी लिखिए और उसे भारती ब्रेल में देखिए, बिन्दुओं समेत।
वर्णमाला
हर स्वर और हर व्यंजन, अपने ख़ाने और अपने पन्ने के साथ।
हलन्त और संयुक्ताक्षर
छपाई में हलन्त बाद में आता है, ब्रेल में पहले। यही सबसे बड़ा फ़र्क़ है।
नुक़्ता
क़, ज़, फ़ — और वह बदलाव जो जनवरी २०२६ में आया।
अंक
एक चिह्न, और पहले दस अक्षर अंक बन जाते हैं।
विराम-चिह्न
पूर्ण विराम, अल्पविराम, प्रश्नवाचक — और वे जो आपस में टकराते हैं।